DR NARAYAN DUTT SHRIMALI
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दुर्भाग्य की रेखा को मिटाकर जो सौभाग्य प्रदान करता है वही तंत्र का मूल स्वरूप है।दीन,हीन एवं रंक भिक्षुक को भी अनन्त ऐश्वर्य देकर राजा बना देता है वही तंत्र की अनिवर्चनीय शक्ति है।दान,मान तथा सभी प्राप्तव्य पदार्थ को प्रदान करे उसी को तंत्र कहते हैं उसी विशिष्टत तंत्र शक्ति को अपनी तपस्या के प्रभाव से सुशोभित करने वाले तंत्रावतार गुरु देव निखिल को मैं भावपूर्ण ह्रदय से नमन करता हूं।
।। श्रीहरि ।।

🌸 भगवान् केवल एक बात देखते है--वह मुझे चाहता है कि नहीं । फिर वह चाहे जिस वर्ण का, कुल का, पद का, स्थिति का, एवं योग्यता का व्यक्ति हो, भगवान् उसे स्वीकार कर लेते हैं ।

'सत्संग वाटिका के बिखरे सुमन' पुस्तक से, पृष्ठ-संख्या- १९, गीतावाटिका प्रकाशन, गोरखपुर

नित्यलीलालीन श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारजी
।।श्रीहरि:।।🌺

*जब साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है* कि मेरेको कभी किसी परिस्थितिमें मन, वाणी अथवा क्रियासे चोरी, झूठ, व्यभिचार, हिंसा, छल, कपट, अभक्ष्य-भक्षण आदि *कोई शास्त्र-विरुद्ध कर्म नहीं करने हैं, तब उसके द्वारा स्वत: विहित कर्म होने लगते हैं।*


 🌟 *श्रीमद्भगवद्गीता साधक - संजीवनी* ( अध्याय 12 /12) गीताप्रेस गोरखपुर
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज*

नारायण! नारायण! नारायण !नारायण!
*।। श्रीहरि: हर शरणम् ।।* 🌷

★ साधक भूलसे अपनेको तत्त्वज्ञ न मान ले, इसलिये यह पहचान बतायी है कि *अगर बुद्धिमें समता नहीं आयी है तो समझ लेना चाहिये कि अभी तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, केवल वहम हुआ है!* बुद्धिकी समताका स्वरूप है- *राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि न होना।* (५। १९ परि.)

*संजीवनी-सुधा* पृष्ठ संख्या ९२
स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज

*।। श्री कृष्णार्पणमस्तु ।।* 🌹🙏
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।।श्रीहरि:।।🌺

*किसी तरह से भगवान के साथ संबंध जोड़ लो।* नाम - जप करो तो *जबान* से, पुस्तक पढ़ो तो *नेत्रों* से, चिंतन करो तो *मन* से भगवान के साथ संबंध जुड़ गया।


🌟सत्संग के फूल पुस्तक से पृष्ठ से 71 गीताप्रेस गोरखपुर
*परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदास जी महाराज*

नारायण !नारायण! नारायण! नारायण!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*भगवान् के सिवाय कुछ नहीं है - यह ऊंची से ऊंची दार्शनिक दृष्टि है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

आप "साधक संजीवनी" आदरपूर्वक समझ -समझकर पढ़ो तो अंतः करण में फर्क जरूर पड़ेगा ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २१*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

भगवान् सर्वज्ञ हैं, सर्वसमर्थ हैं और दयालु भी हैं, ऐसे भगवान् के रहते हम अपने को अनाथ क्यों मानें ?

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २२*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!


शरीर प्रतिक्षण बदलता है, एक क्षण भी आपके साथ नहीं रहता । शरीर को अपना मानना बेइमानी है । बेईमानी को छोड़ दो तो मुक्ति है । बेईमानी से बंधन है, ईमानदारी से मुक्ति है।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २२*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!


थोड़ा धन होने से आप विशेष पुण्य कर सकते हैं, ज्यादा धन होने से नहीं ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २3*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*संसार की सेवा करने से भी भगवान् में प्रेम होगा और भगवान् को (अपना मानकर) याद करने से भी भगवान् में प्रेम होगा ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २3*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*।। श्रीहरि: हर शरणम् ।।* 🌷

★ सब लौकिक विद्याओंसे *अनजान* होते हुए भी *जिसने परमात्माको जान लिया है, वही वास्तवमें ज्ञानवान् है।* (१५। २०) 🌷

*संजीवनी-सुधा* पृष्ठ संख्या ९८
स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज

*।। श्री कृष्णार्पणमस्तु ।।* 🌹🙏
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

असत् को सत्ता देना, महत्ता देना और अपना मानना - ये तीन बाधाएं हैं । इन तीन बाधाओं के रहते कितना ही साधन करो, वहीं - के - वहीं रहोगे, जैसे - रस्सी नौका से बंधी रहे तो रात भर नौका चलाते रहो, वहीं - के - वहीं रहोगे ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*मुक्ति स्वर्ग आदि लोकों की तरह एक स्थान विशेष में नहीं है । मुक्त आप हैं ही । मिटने वाले से अलग हो जाओ तो मुक्ति स्वत: सिद्ध है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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