A K PHYSICS TUTORIAL
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PHYSICS BY Dr. Anil Kumar
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BRAHMASTRA
2nd Lecture notes


पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection): यह बताया गया है कि जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में क्रांतिक कोण से अधिक कोण पर आपतित होता है, तो वह विरल माध्यम में प्रवेश करने के बजाय वापस सघन माध्यम में लौट आता है। इसके लिए दो शर्तें बताई गई हैं: प्रकाश का किरण सघन माध्यम में आपतित होना चाहिए, और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए।
क्रांतिक कोण (Critical Angle): क्रांतिक कोण वह आपतन कोण है जिसके लिए विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 90 डिग्री हो जाता है। क्रांतिक कोण और माध्यम के अपवर्तनांक के बीच संबंध भी स्थापित किया गया है।
अर्धचालक (Semiconductors): अर्धचालक वे पदार्थ होते हैं जिनकी चालकता चालक और कुचालक के बीच होती है। यह दो प्रकार के होते हैं:
निज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductors): ये शुद्ध अर्धचालक होते हैं जो केवल वर्ग संख्या 14 के तत्वों (जैसे सिलिकॉन, जर्मेनियम) से बने होते हैं। परम शून्य ताप पर ये कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं।
बाह्य अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors): निज अर्धचालक की चालकता बढ़ाने के लिए जब उसमें कुछ बाहरी पदार्थ (अपद्रव्य) मिलाए जाते हैं, तो उन्हें बाह्य अर्धचालक कहते हैं। इस प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं। बाह्य अर्धचालक भी दो प्रकार के होते हैं:
पी-टाइप अर्धचालक (P-type Semiconductors): जब निज अर्धचालक में वर्ग संख्या 13 के तत्व (जैसे एल्यूमीनियम, गैलियम) मिलाए जाते हैं।
एन-टाइप अर्धचालक (N-type Semiconductors): जब निज अर्धचालक में वर्ग संख्या 15 के तत्व (जैसे फास्फोरस, आर्सेनिक) मिलाए जाते हैं।
पीएन संधि डायोड (PN Junction Diode): जब एक पी-टाइप और एक एन-टाइप अर्धचालक को एक विशेष विधि द्वारा मिलाया जाता है, तो उनके मिलन बिंदु को पीएन संधि कहते हैं, जो एक डायोड के रूप में कार्य करता है।
ट्रांसफार्मर (Transformer): ट्रांसफार्मर एक ऐसी युक्ति है जो बिना ऊर्जा हानि के वोल्टेज और करंट के मान को बदलती है। ट्रांसफार्मर में होने वाली ऊर्जा हानियों के प्रकार बताए गए हैं: ताम्र क्षय, लौह क्षय, शैथिल्य क्षय, और चुंबकीय फ्लक्स क्षरण क्षय। ट्रांसफार्मर की दक्षता (काम करने की क्षमता) को भी समझाया गया है, जो द्वितीयक कुंडली से निर्गत शक्ति और प्राथमिक कुंडली में निवेश शक्ति का अनुपात है।
समांतर प्लेट संधारित्र (Parallel Plate Capacitor): संधारित्र के सिद्धांत और समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता के लिए व्यंजक प्राप्त करने की विधि समझाई गई है। इसमें दो चालक प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र और विभवांतर की गणना शामिल है। संधारित्र की धारिता बढ़ाने के लिए प्लेटों के बीच परावैद्युत पदार्थ रखने का भी उल्लेख किया गया है।
संख्या पद्धतियाँ (Number Systems):
दाशमिक संख्या पद्धति (Decimal Number System): इसमें किसी भी संख्या को दर्शाने के लिए 0 से 9 तक 10 अंकों का उपयोग किया जाता है।
द्विआधारी संख्या पद्धति (Binary Number System): इसमें केवल दो अंक (0 और 1) का उपयोग किया जाता है। वीडियो में दाशमिक संख्या को द्विआधारी में और द्विआधारी को दाशमिक में बदलने की विधि भी बताई गई है।
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ये BRAHMASTRA के 15 LECTURE + BRAHMASTRA SUGGESTION BOOK = जो कर लिया अच्छे से 100% गारंटी से 70 में 70 आएंगे उसके इसलिए बस आपको जैसे बताया जा रहा है पढ़ने पढ़िए
कभी ऐसा होगा की आपको पढ़ने का मन नहीं करेंगे class देखने का मन नहीं करेंगे पर रुकना नहीं है लगे रहना है बोर्ड एग्जाम फोरना है
इसलिए Daily class करना
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Bas koi bhi message soch samajhkar kriye ga koi waisa word use nhi kariye ga ki block aapko karna prenga
Block hone ke bad aap channel nhi chalu kar payenga
BRAHMASTRA LECTURE 3 NOTES

अतिचालकता: यह वह घटना है जहाँ बहुत कम तापमान पर एक चालक का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है, जिससे अत्यधिक उच्च चालकता प्राप्त होती है। पारे का 4.2 केल्विन पर एक उदाहरण दिया गया है।
चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ: ये काल्पनिक रेखाएँ हैं जो एक चुंबक के बाहर उत्तरी ध्रुव से निकलती हैं और दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं, चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दर्शाती हैं। शिक्षक बताते हैं कि वे क्यों नहीं प्रतिच्छेद करती हैं।
बायोसेवर्ट का नियम: यह नियम एक छोटे से धारा-वाही तार खंड द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का वर्णन करता है। इसमें कहा गया है कि चुंबकीय क्षेत्र धारा, खंड की लंबाई, खंड और स्थिति सदिश के बीच के कोण के साइन के सीधे आनुपापातिक होता है, और दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपातिक होता है।
लेंज का नियम: यह नियम बताता है कि एक परिपथ में प्रेरित धारा की दिशा ऐसी होती है कि यह चुंबकीय फ्लक्स में उस परिवर्तन का विरोध करती है जिसने इसे उत्पन्न किया है। इसे ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत का पालन करने वाला बताया गया है।
भंवर धारा: ये एक बदलते चुंबकीय क्षेत्र द्वारा चालकों के भीतर उत्पन्न विद्युत धारा के लूप होते हैं। इन्हें उस गति का विरोध करने वाला बताया गया है जो उन्हें उत्पन्न करती है, जिससे गर्मी पैदा होती है। ट्रांसफार्मर में भंवर धाराओं को कम करने के लिए लैमिनेटेड कोर के उपयोग का भी उल्लेख किया गया है।
प्रतिचुंबकीय, अनुचुंबकीय और लौह चुंबकीय पदार्थ: वीडियो इन तीन प्रकार की चुंबकीय सामग्रियों को बाहरी चुंबकीय क्षेत्र के साथ उनकी परस्पर क्रिया के आधार पर परिभाषित करता है।
संपर्क में रखे दो लेंसों की समतुल्य फोकस दूरी: जब दो लेंसों को संपर्क में रखा जाता है तो समतुल्य फोकस दूरी के सूत्र की व्युत्पत्ति समझाई जाती है।
ऑप्टिकल फाइबर: कुल आंतरिक परावर्तन के सिद्धांत पर आधारित एक उपकरण के रूप में समझाया गया है, जिसका उपयोग सूचना संकेतों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए किया जाता है।
नाभिकीय बल: परमाणु के नाभिक के भीतर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को एक साथ रखने वाले मजबूत बल का एक संक्षिप्त स्पष्टीकरण।
प्रकाश विद्युत प्रभाव: इस घटना में जब प्रकाश एक धातु की सतह पर पड़ता है तो इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है। शिक्षक इस प्रभाव की शर्तों पर चर्चा करते हैं और "फोटोइलेक्ट्रॉन" और "फोटोकरंट" की अवधारणाओं का परिचय देते हैं।
लोरेंज बल: चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान आवेशित कण द्वारा अनुभव किया जाने वाला बल। सूत्र F = q(v x B) प्रस्तुत किया गया है।
क्यूरी का नियम: यह नियम बताता है कि अनुचुंबकीय सामग्रियों के लिए, चुंबकीय संवेदनशीलता निरपेक्ष तापमान के व्युत्क्रमानुपातिक होती है।
गाउस का प्रमेय: वीडियो में गाउस के नियम का विस्तृत स्पष्टीकरण और प्रमाण दिया गया है, जो एक बंद सतह से गुजरने वाले विद्युत फ्लक्स को संलग्न विद्युत आवेश से संबंधित करता है।
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Shair it
BRAHMASTRA LECTURE 4

विद्युत द्विध्रुव के कारण विद्युत क्षेत्र की तीव्रता और विभव: विद्युत द्विध्रुव के कारण किसी भी स्थिति में विद्युत क्षेत्र की तीव्रता और विभव ज्ञात करने के लिए विस्तृत व्युत्पत्ति दी गई है। यह एक 5 नंबर का प्रश्न है जिसमें +q और -q आवेशों के साथ द्विध्रुव की व्याख्या की गई है, और केंद्र O से R दूरी पर स्थित बिंदु P पर क्षेत्र और विभव की गणना शामिल है।
हगेंस के सिद्धांत के आधार पर प्रकाश का परावर्तन और अपवर्तन: हगेंस के सिद्धांत का उपयोग करके प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन की व्याख्या की गई है। परावर्तन के लिए, एक परावर्तक सतह XY पर एक तरंगाग्र AB के आपतित होने पर, T समय में बिंदु B से A' तक पहुंचने और नए तरंगिकाओं के निकलने की प्रक्रिया को समझाया गया है, जिसके परिणामस्वरूप कोण i = कोण r सिद्ध होता है। अपवर्तन के लिए, एक अपवर्तक सतह पर तरंगाग्र के आपतित होने पर विभिन्न माध्यमों में वेग (V1, V2) का उपयोग करके sin i / sin r = V1 / V2 (स्नेल का नियम) को सिद्ध किया गया है।
व्यतिकरण और उसके प्रकार: व्यतिकरण की परिभाषा दी गई है कि जब समान आवृत्ति की दो या दो से अधिक प्रकाश तरंगें एक साथ चलकर अध्यारोपित होती हैं, तो नई तरंग की ऊर्जा और तीव्रता घटक तरंगों के योगफल से भिन्न होती है। व्यतिकरण दो प्रकार का होता है: संपोषी व्यतिकरण (जब नई तरंग की तीव्रता अधिक हो) और विनाशी व्यतिकरण (जब तीव्रता कम हो)। व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्तों पर भी चर्चा की गई है, जैसे आयाम और तरंग दैर्ध्य का बराबर या लगभग बराबर होना।
हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम: वीडियो में हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की भी संक्षिप्त चर्चा है, जिसमें बामर नामक वैज्ञानिक के योगदान का उल्लेख किया गया है।
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Dekhiye jo class nhi kr rhe hai yad rakhiyega bad me pachtana na pre kyoki yha se aapke exam paper me direct question uthh kar aayenge
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BRAHMASTRA LECTURE 5
वीटस्टोन ब्रिज (सेतु): यह चार प्रतिरोधों की एक व्यवस्था है जिसका उपयोग तीन ज्ञात प्रतिरोधों की सहायता से चौथे अज्ञात प्रतिरोध को ज्ञात करने के लिए किया जाता है। संतुलन की स्थिति में, किसी भी दो आसन्न भुजाओं के प्रतिरोधों का अनुपात अगले दो आसन्न भुजाओं के प्रतिरोधों के अनुपात के बराबर होता है (P/Q = R/S)। इस स्थिति में धारामापी से कोई विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होती है।
प्रकाश के अपवर्तन का सूत्र: उत्तल या अवतल पृष्ठों के माध्यम से प्रकाश के अपवर्तन के लिए सूत्र (μ2/v - μ1/u = (μ2 - μ1)/r) को समझाया गया है। यह सूत्र वस्तुओं की स्थिति, प्रतिबिंब और माध्यम के अपवर्तनांक से संबंधित है।
लेंस मेकर सूत्र: 1/f = (μ - 1)(1/r1 - 1/r2) सूत्र को सिद्ध किया गया है। यह सूत्र लेंस की फोकस दूरी (f), उसके माध्यम के अपवर्तनांक (μ) और उसकी वक्रता त्रिज्याओं (r1, r2) से संबंधित है।
मानव नेत्र: मानव नेत्र की संरचना और कार्यप्रणाली का वर्णन किया गया है। इसमें नेत्र के मुख्य भाग शामिल हैं जैसे स्क्लेरा (दृढ़ पटल), कोरोइड, रेटिना (जिस पर वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनता है), पीत बिंदु (स्पष्ट दृष्टि के लिए), अंध बिंदु (जहां कोई प्रतिबिंब नहीं बनता), और सिलिअरी मांसपेशियां (जो लेंस की फोकस दूरी को समायोजित करती हैं)। समंजन क्षमता (accommodation power) की अवधारणा भी समझाई गई है, जो दूर और पास की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखने की नेत्र की क्षमता है।
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BRAHMASTRA LECTURE 6

मानव नेत्र दोष: शिक्षक ने निकट दृष्टि दोष (मायोपिया), दूर दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया), जरा दृष्टि दोष (प्रेस्बायोपिया), और अबिंदुकता (एस्टिगमैटिज्म) जैसे विभिन्न मानव नेत्र दोषों के बारे में बताया।
कारण और उपचार: प्रत्येक दोष के कारण (जैसे रेटिना और लेंस के बीच की दूरी का बढ़ना या घटना, या नेत्रगोलक का छोटा होना) और उनके उपचार के लिए उपयोग किए जाने वाले लेंस (जैसे अवतल, उत्तल, द्विफोकसी, या बेलनाकार लेंस) की चर्चा की गई।
विद्युत क्षेत्र की तीव्रता: गौस के प्रमेय का उपयोग करके एक लंबे चालक तार के कारण विद्युत क्षेत्र की तीव्रता (E = 1/2πε₀ * λ/r) ज्ञात करने की प्रक्रिया को समझाया गया।
प्रकाश का प्रकीर्णन: प्रकाश के प्रकीर्णन की घटना, जिसमें प्रकाश का विभिन्न दिशाओं में फैलना शामिल है, और इसके उदाहरण (जैसे सूर्योदय/सूर्यास्त के समय आकाश का लाल दिखना, बादलों का सफेद दिखना) का उल्लेख किया गया। रेले के प्रकीर्णन नियम को भी समझाया गया।
लॉजिक गेट्स: लॉजिक गेट्स को आंकिक परिपथ के रूप में परिभाषित किया गया जो इनपुट और आउटपुट सिग्नल के बीच संबंध बताते हैं।
गेट्स के प्रकार: एंड गेट, ऑर गेट, और नॉट गेट जैसे मुख्य लॉजिक गेट्स की व्याख्या की गई, जिसमें उनके प्रतीक चिन्ह, बुलियन व्यंजक (जैसे AND के लिए A.B, OR के लिए A+B, NOT के लिए A') और सत्यता सारणी शामिल थे।
यूनिवर्सल गेट्स: नैंड गेट (नॉट + एंड) और नॉर गेट (नॉट + ऑर) जैसे यूनिवर्सल गेट्स की भी चर्चा की गई, जिनके बुलियन व्यंजक और सत्यता सारणी को प्रस्तुत किया गया।
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BRAHMASTRA LECTURE 7

संधारित्रों का संयोजन: इसमें संधारित्रों के श्रेणी क्रम और समांतर क्रम संयोजन के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिसमें प्रत्येक संयोजन में आवेश, विभवांतर और समतुल्य धारिता के लिए व्यंजक प्राप्त करने की विधि समझाई गई है। यह भी बताया गया है कि श्रेणी क्रम में तुल्य धारिता का मान कम होता है जबकि समांतर क्रम में यह अधिक होता है।
प्रतिरोधों का संयोजन: संधारित्रों की तरह ही प्रतिरोधों के श्रेणी क्रम और समांतर क्रम संयोजन को समझाया गया है। इसमें यह बताया गया है कि श्रेणी क्रम में विद्युत धारा बराबर होती है और तुल्य प्रतिरोध सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है, जबकि समांतर क्रम में विभवांतर बराबर होता है और तुल्य प्रतिरोध का मान सबसे कम प्रतिरोध से भी कम होता है।
जूल का नियम: विद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव से संबंधित जूल के तीन नियमों को समझाया गया है। ये नियम बताते हैं कि उत्पन्न ऊष्मा विद्युत धारा के वर्ग, प्रतिरोध, और प्रवाहित होने के समय के समानुपाती होती है।
परिपथ में विभिन्न घटकों का प्रभाव:
केवल प्रतिरोध: जब परिपथ में केवल प्रतिरोध होता है, तो विद्युत धारा और विभवांतर एक ही दिशा में होते हैं और उनके बीच कलांतर शून्य होता है।
केवल प्रेरकत्व (L): जब केवल प्रेरकत्व होता है, तो धारा वोल्टेज से 90 डिग्री पीछे होती है। इसमें प्रेरणिक प्रतिघात (XL = ωL) होता है और डीसी सर्किट के लिए इसका मान शून्य होता है।
केवल धारिता (C): जब केवल धारिता होती है, तो धारा वोल्टेज से 90 डिग्री आगे होती है। इसमें धारितीय प्रतिघात (XC = 1/ωC) होता है और डीसी सर्किट के लिए इसका मान अनंत होता है।
प्रतिरोध और प्रेरकत्व (LR सर्किट): इसमें कलांतर tan⁻¹(XL/R) होता है और प्रतिबाधा Z = √(R² + XL²) होती है।
प्रतिरोध और धारिता (RC सर्किट): इसमें कलांतर tan⁻¹(XC/R) होता है और प्रतिबाधा Z = √(R² + XC²) होती है।
प्रेरकत्व और धारिता (LC सर्किट): इसमें प्रतिबाधा Z = |XL - XC| होती है।
प्रतिरोध, प्रेरकत्व और धारिता (LCR सर्किट): यह तीनों घटकों वाला परिपथ है, जिसमें प्रतिबाधा Z = √(R² + (XL - XC)²) होती है। प्रतिबाधा का मात्रक ओम होता है।
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