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NOTICE FOR AK PHYSICS TUTORIAL 10th brahmastra पेमेंट ध्यान से करें और पेमेंट सक्सेसफुल होने के बाद आप कुछ हटाए नहीं वह खुद व खुद एक फॉर्म चालू होगा जिसे FILL करने के बाद आपको लिंक मिल जाएगा और उसके बाद लिंक से आपको सभी मटेरियल मिल जाएगा
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आज के क्लास का नोट्स
BRAHMASTRA
1st LECTURE CONTENT
साइक्लोट्रॉन: यह एक ऐसा उपकरण है जिसका उपयोग प्रोटॉन, ड्यूटेरॉन और अल्फा कणों जैसे धनात्मक आवेशित कणों को गति देने के लिए किया जाता है। यह स्पष्ट किया गया है कि साइक्लोट्रॉन ऋणात्मक आवेशित या उदासीन कणों को गति नहीं देता है।
ओमीय और अन-ओमीय चालक:
ओमीय चालक वे होते हैं जो ओम के नियम का पालन करते हैं। इनमें वोल्टेज धारा के सीधे आनुपापातिक होता है, और वोल्टेज-धारा ग्राफ एक सीधी रेखा होती है। धात्विक चालक इसके उदाहरण हैं।
अन-ओमीय चालक ओम के नियम का पालन नहीं करते हैं। इनमें वोल्टेज-धारा ग्राफ सीधी रेखा नहीं होता, बल्कि वक्र होता है। अर्धचालक और इलेक्ट्रोलाइट्स इसके उदाहरण हैं।
विद्युत बल रेखाएँ: ये काल्पनिक रेखाएँ हैं (सीधी या वक्र) जो एक स्वतंत्र धनात्मक आवेश के पथ को दर्शाती हैं। ये धनात्मक आवेशों से निकलती हैं और ऋणात्मक आवेशों पर समाप्त होती हैं, और कभी एक दूसरे को नहीं काटतीं।
चुंबक के गुण: चुंबक लोहे, निकल और कोबाल्ट जैसे चुंबकीय पदार्थों को आकर्षित करते हैं। इनमें हमेशा दो ध्रुव (उत्तरी और दक्षिणी) होते हैं जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। समान ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं, जबकि विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। चुंबक का आकर्षण बल ध्रुवों पर सबसे मजबूत होता है।
विद्युत आवेश और उसके गुण:
विद्युत आवेश पदार्थ का एक मौलिक गुण है जो इलेक्ट्रॉनों के स्थानांतरण के कारण उत्पन्न होता है। यह घर्षण, चालन या प्रेरण के माध्यम से उत्पन्न हो सकता है।
आवेश का क्वांटमीकरण: आवेश हमेशा मौलिक आवेश (e = 1.6 × 10^-19 कूलम्ब) के पूर्णांक गुणकों में मौजूद होता है। इसका अर्थ है कि इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण हमेशा पूर्ण संख्याओं में होता है, कभी दशमलव या भिन्न में नहीं।
आवेश का संरक्षण: एक विलगित प्रणाली में, कुल विद्युत आवेश स्थिर रहता है। इसे न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, बल्कि केवल एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित किया जा सकता है।
कूलम्ब के नियम की सीमाएँ: कूलम्ब का नियम केवल स्थिर बिंदु आवेशों और 10^-15 मीटर तथा अनंत के बीच की दूरी के लिए लागू होता है।
किरचॉफ के नियम:
पहला नियम (संधि नियम): एक विद्युत परिपथ में किसी भी संधि पर मिलने वाली सभी धाराओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है। यह नियम आवेश के संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है।
दूसरा नियम (लूप नियम): एक विद्युत परिपथ के किसी भी बंद लूप में, परिपथ के प्रत्येक भाग में धारा और प्रतिरोध के गुणनफल का बीजगणितीय योग उस लूप में विद्युत वाहक बलों (EMF) के बीजगणितीय योग के बराबर होता है। यह नियम ऊर्जा के संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है।
प्रतिरोधकता और विद्युत चालकता:
प्रतिरोधकता: यह किसी पदार्थ का आंतरिक गुण है जो यह दर्शाता है कि वह विद्युत धारा का कितनी प्रबलता से विरोध करता है। इसे विद्युत क्षेत्र की तीव्रता और धारा घनत्व के अनुपात के रूप में या इकाई लंबाई और इकाई अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल वाले चालक के प्रतिरोध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसकी इकाई ओम-मीटर है।
विद्युत चालकता: यह प्रतिरोधकता का व्युत्क्रम है, जो यह दर्शाता है कि कोई पदार्थ कितनी आसानी से विद्युत धारा को प्रवाहित होने देता है। इसकी इकाई ओम^-1 मीटर^-1 है।
BRAHMASTRA
1st LECTURE CONTENT
साइक्लोट्रॉन: यह एक ऐसा उपकरण है जिसका उपयोग प्रोटॉन, ड्यूटेरॉन और अल्फा कणों जैसे धनात्मक आवेशित कणों को गति देने के लिए किया जाता है। यह स्पष्ट किया गया है कि साइक्लोट्रॉन ऋणात्मक आवेशित या उदासीन कणों को गति नहीं देता है।
ओमीय और अन-ओमीय चालक:
ओमीय चालक वे होते हैं जो ओम के नियम का पालन करते हैं। इनमें वोल्टेज धारा के सीधे आनुपापातिक होता है, और वोल्टेज-धारा ग्राफ एक सीधी रेखा होती है। धात्विक चालक इसके उदाहरण हैं।
अन-ओमीय चालक ओम के नियम का पालन नहीं करते हैं। इनमें वोल्टेज-धारा ग्राफ सीधी रेखा नहीं होता, बल्कि वक्र होता है। अर्धचालक और इलेक्ट्रोलाइट्स इसके उदाहरण हैं।
विद्युत बल रेखाएँ: ये काल्पनिक रेखाएँ हैं (सीधी या वक्र) जो एक स्वतंत्र धनात्मक आवेश के पथ को दर्शाती हैं। ये धनात्मक आवेशों से निकलती हैं और ऋणात्मक आवेशों पर समाप्त होती हैं, और कभी एक दूसरे को नहीं काटतीं।
चुंबक के गुण: चुंबक लोहे, निकल और कोबाल्ट जैसे चुंबकीय पदार्थों को आकर्षित करते हैं। इनमें हमेशा दो ध्रुव (उत्तरी और दक्षिणी) होते हैं जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। समान ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं, जबकि विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। चुंबक का आकर्षण बल ध्रुवों पर सबसे मजबूत होता है।
विद्युत आवेश और उसके गुण:
विद्युत आवेश पदार्थ का एक मौलिक गुण है जो इलेक्ट्रॉनों के स्थानांतरण के कारण उत्पन्न होता है। यह घर्षण, चालन या प्रेरण के माध्यम से उत्पन्न हो सकता है।
आवेश का क्वांटमीकरण: आवेश हमेशा मौलिक आवेश (e = 1.6 × 10^-19 कूलम्ब) के पूर्णांक गुणकों में मौजूद होता है। इसका अर्थ है कि इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण हमेशा पूर्ण संख्याओं में होता है, कभी दशमलव या भिन्न में नहीं।
आवेश का संरक्षण: एक विलगित प्रणाली में, कुल विद्युत आवेश स्थिर रहता है। इसे न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, बल्कि केवल एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित किया जा सकता है।
कूलम्ब के नियम की सीमाएँ: कूलम्ब का नियम केवल स्थिर बिंदु आवेशों और 10^-15 मीटर तथा अनंत के बीच की दूरी के लिए लागू होता है।
किरचॉफ के नियम:
पहला नियम (संधि नियम): एक विद्युत परिपथ में किसी भी संधि पर मिलने वाली सभी धाराओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है। यह नियम आवेश के संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है।
दूसरा नियम (लूप नियम): एक विद्युत परिपथ के किसी भी बंद लूप में, परिपथ के प्रत्येक भाग में धारा और प्रतिरोध के गुणनफल का बीजगणितीय योग उस लूप में विद्युत वाहक बलों (EMF) के बीजगणितीय योग के बराबर होता है। यह नियम ऊर्जा के संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है।
प्रतिरोधकता और विद्युत चालकता:
प्रतिरोधकता: यह किसी पदार्थ का आंतरिक गुण है जो यह दर्शाता है कि वह विद्युत धारा का कितनी प्रबलता से विरोध करता है। इसे विद्युत क्षेत्र की तीव्रता और धारा घनत्व के अनुपात के रूप में या इकाई लंबाई और इकाई अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल वाले चालक के प्रतिरोध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसकी इकाई ओम-मीटर है।
विद्युत चालकता: यह प्रतिरोधकता का व्युत्क्रम है, जो यह दर्शाता है कि कोई पदार्थ कितनी आसानी से विद्युत धारा को प्रवाहित होने देता है। इसकी इकाई ओम^-1 मीटर^-1 है।
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BRAHMASTRA
2nd Lecture notes
पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection): यह बताया गया है कि जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में क्रांतिक कोण से अधिक कोण पर आपतित होता है, तो वह विरल माध्यम में प्रवेश करने के बजाय वापस सघन माध्यम में लौट आता है। इसके लिए दो शर्तें बताई गई हैं: प्रकाश का किरण सघन माध्यम में आपतित होना चाहिए, और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए।
क्रांतिक कोण (Critical Angle): क्रांतिक कोण वह आपतन कोण है जिसके लिए विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 90 डिग्री हो जाता है। क्रांतिक कोण और माध्यम के अपवर्तनांक के बीच संबंध भी स्थापित किया गया है।
अर्धचालक (Semiconductors): अर्धचालक वे पदार्थ होते हैं जिनकी चालकता चालक और कुचालक के बीच होती है। यह दो प्रकार के होते हैं:
निज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductors): ये शुद्ध अर्धचालक होते हैं जो केवल वर्ग संख्या 14 के तत्वों (जैसे सिलिकॉन, जर्मेनियम) से बने होते हैं। परम शून्य ताप पर ये कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं।
बाह्य अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors): निज अर्धचालक की चालकता बढ़ाने के लिए जब उसमें कुछ बाहरी पदार्थ (अपद्रव्य) मिलाए जाते हैं, तो उन्हें बाह्य अर्धचालक कहते हैं। इस प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं। बाह्य अर्धचालक भी दो प्रकार के होते हैं:
पी-टाइप अर्धचालक (P-type Semiconductors): जब निज अर्धचालक में वर्ग संख्या 13 के तत्व (जैसे एल्यूमीनियम, गैलियम) मिलाए जाते हैं।
एन-टाइप अर्धचालक (N-type Semiconductors): जब निज अर्धचालक में वर्ग संख्या 15 के तत्व (जैसे फास्फोरस, आर्सेनिक) मिलाए जाते हैं।
पीएन संधि डायोड (PN Junction Diode): जब एक पी-टाइप और एक एन-टाइप अर्धचालक को एक विशेष विधि द्वारा मिलाया जाता है, तो उनके मिलन बिंदु को पीएन संधि कहते हैं, जो एक डायोड के रूप में कार्य करता है।
ट्रांसफार्मर (Transformer): ट्रांसफार्मर एक ऐसी युक्ति है जो बिना ऊर्जा हानि के वोल्टेज और करंट के मान को बदलती है। ट्रांसफार्मर में होने वाली ऊर्जा हानियों के प्रकार बताए गए हैं: ताम्र क्षय, लौह क्षय, शैथिल्य क्षय, और चुंबकीय फ्लक्स क्षरण क्षय। ट्रांसफार्मर की दक्षता (काम करने की क्षमता) को भी समझाया गया है, जो द्वितीयक कुंडली से निर्गत शक्ति और प्राथमिक कुंडली में निवेश शक्ति का अनुपात है।
समांतर प्लेट संधारित्र (Parallel Plate Capacitor): संधारित्र के सिद्धांत और समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता के लिए व्यंजक प्राप्त करने की विधि समझाई गई है। इसमें दो चालक प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र और विभवांतर की गणना शामिल है। संधारित्र की धारिता बढ़ाने के लिए प्लेटों के बीच परावैद्युत पदार्थ रखने का भी उल्लेख किया गया है।
संख्या पद्धतियाँ (Number Systems):
दाशमिक संख्या पद्धति (Decimal Number System): इसमें किसी भी संख्या को दर्शाने के लिए 0 से 9 तक 10 अंकों का उपयोग किया जाता है।
द्विआधारी संख्या पद्धति (Binary Number System): इसमें केवल दो अंक (0 और 1) का उपयोग किया जाता है। वीडियो में दाशमिक संख्या को द्विआधारी में और द्विआधारी को दाशमिक में बदलने की विधि भी बताई गई है।
2nd Lecture notes
पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection): यह बताया गया है कि जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में क्रांतिक कोण से अधिक कोण पर आपतित होता है, तो वह विरल माध्यम में प्रवेश करने के बजाय वापस सघन माध्यम में लौट आता है। इसके लिए दो शर्तें बताई गई हैं: प्रकाश का किरण सघन माध्यम में आपतित होना चाहिए, और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए।
क्रांतिक कोण (Critical Angle): क्रांतिक कोण वह आपतन कोण है जिसके लिए विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 90 डिग्री हो जाता है। क्रांतिक कोण और माध्यम के अपवर्तनांक के बीच संबंध भी स्थापित किया गया है।
अर्धचालक (Semiconductors): अर्धचालक वे पदार्थ होते हैं जिनकी चालकता चालक और कुचालक के बीच होती है। यह दो प्रकार के होते हैं:
निज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductors): ये शुद्ध अर्धचालक होते हैं जो केवल वर्ग संख्या 14 के तत्वों (जैसे सिलिकॉन, जर्मेनियम) से बने होते हैं। परम शून्य ताप पर ये कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं।
बाह्य अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors): निज अर्धचालक की चालकता बढ़ाने के लिए जब उसमें कुछ बाहरी पदार्थ (अपद्रव्य) मिलाए जाते हैं, तो उन्हें बाह्य अर्धचालक कहते हैं। इस प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं। बाह्य अर्धचालक भी दो प्रकार के होते हैं:
पी-टाइप अर्धचालक (P-type Semiconductors): जब निज अर्धचालक में वर्ग संख्या 13 के तत्व (जैसे एल्यूमीनियम, गैलियम) मिलाए जाते हैं।
एन-टाइप अर्धचालक (N-type Semiconductors): जब निज अर्धचालक में वर्ग संख्या 15 के तत्व (जैसे फास्फोरस, आर्सेनिक) मिलाए जाते हैं।
पीएन संधि डायोड (PN Junction Diode): जब एक पी-टाइप और एक एन-टाइप अर्धचालक को एक विशेष विधि द्वारा मिलाया जाता है, तो उनके मिलन बिंदु को पीएन संधि कहते हैं, जो एक डायोड के रूप में कार्य करता है।
ट्रांसफार्मर (Transformer): ट्रांसफार्मर एक ऐसी युक्ति है जो बिना ऊर्जा हानि के वोल्टेज और करंट के मान को बदलती है। ट्रांसफार्मर में होने वाली ऊर्जा हानियों के प्रकार बताए गए हैं: ताम्र क्षय, लौह क्षय, शैथिल्य क्षय, और चुंबकीय फ्लक्स क्षरण क्षय। ट्रांसफार्मर की दक्षता (काम करने की क्षमता) को भी समझाया गया है, जो द्वितीयक कुंडली से निर्गत शक्ति और प्राथमिक कुंडली में निवेश शक्ति का अनुपात है।
समांतर प्लेट संधारित्र (Parallel Plate Capacitor): संधारित्र के सिद्धांत और समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता के लिए व्यंजक प्राप्त करने की विधि समझाई गई है। इसमें दो चालक प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र और विभवांतर की गणना शामिल है। संधारित्र की धारिता बढ़ाने के लिए प्लेटों के बीच परावैद्युत पदार्थ रखने का भी उल्लेख किया गया है।
संख्या पद्धतियाँ (Number Systems):
दाशमिक संख्या पद्धति (Decimal Number System): इसमें किसी भी संख्या को दर्शाने के लिए 0 से 9 तक 10 अंकों का उपयोग किया जाता है।
द्विआधारी संख्या पद्धति (Binary Number System): इसमें केवल दो अंक (0 और 1) का उपयोग किया जाता है। वीडियो में दाशमिक संख्या को द्विआधारी में और द्विआधारी को दाशमिक में बदलने की विधि भी बताई गई है।
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