न जाने क्यों एक चाहत अधूरी कहानी में बदल जाती है,
रंगों से भरी महफ़िल की वो रंगीन शाम कयामत में बदल जाती है।
खुदा की सलामती में चंद पलों की बरकत भी न ठहर पाती है,
कच्चे धागों की बंधी एक डोर बिखरे टुकङों में बदल जाती है।
अंदाजा यूं ही लगाकर एक रिश्ते की समझ गलतफहमी में बदल जाती है
और अल्फाजों के महक की वो महफिल खामोशी के शोर में बदल जाती है।
रंगों से भरी महफ़िल की वो रंगीन शाम कयामत में बदल जाती है।
खुदा की सलामती में चंद पलों की बरकत भी न ठहर पाती है,
कच्चे धागों की बंधी एक डोर बिखरे टुकङों में बदल जाती है।
अंदाजा यूं ही लगाकर एक रिश्ते की समझ गलतफहमी में बदल जाती है
और अल्फाजों के महक की वो महफिल खामोशी के शोर में बदल जाती है।
हर किसी के लिए, खुद को बदलना मना है,
मुसीबत के हर पङाव में, यूं ही झुकना मना है।
आंखों में कैद इन मोतियों से कह दो,
जज्बात की हर बात में बहना मना है।
बंद मुठ्ठी के सपनों को आजाद कर दो,
इन सपनों को सच करना कब मना है।
एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर तो देखो,
अपने अंतस की सुनना कब मना है।
बस एक बार अपने डर से लङकर तो देखो,
यूं ही हर डर से अब डरना मना है।
मुसीबत के हर पङाव में, यूं ही झुकना मना है।
आंखों में कैद इन मोतियों से कह दो,
जज्बात की हर बात में बहना मना है।
बंद मुठ्ठी के सपनों को आजाद कर दो,
इन सपनों को सच करना कब मना है।
एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर तो देखो,
अपने अंतस की सुनना कब मना है।
बस एक बार अपने डर से लङकर तो देखो,
यूं ही हर डर से अब डरना मना है।
दीपोत्सव से मनी दिवाली,
जग - मग, जग - मग रोशन जग में
खुशियाँ लाई कोटि - कोटि की,
श्रीराम की भव्य अगवानी में।
महावीर जब मोक्ष सिधारे,
मन मंदिर हर्षित उर में
जग सारा खुशहाल हो गया,
तमस स्वयं हर लेने में।
रोम - रोम हर्षित हो जाता,
स्वर्णमयी उज्जवल क्षण में
बैर, क्रोध जब मिट जाता तो,
प्रेम वृक्ष खिलता उर में।
दीपोत्सव से मनी दिवाली,
जग - मग, जग - मग रोशन जग में।
जग - मग, जग - मग रोशन जग में
खुशियाँ लाई कोटि - कोटि की,
श्रीराम की भव्य अगवानी में।
महावीर जब मोक्ष सिधारे,
मन मंदिर हर्षित उर में
जग सारा खुशहाल हो गया,
तमस स्वयं हर लेने में।
रोम - रोम हर्षित हो जाता,
स्वर्णमयी उज्जवल क्षण में
बैर, क्रोध जब मिट जाता तो,
प्रेम वृक्ष खिलता उर में।
दीपोत्सव से मनी दिवाली,
जग - मग, जग - मग रोशन जग में।
प्रेम और वात्सल्य से भरा मोह का ये रिश्ता अटूट और बेशकीमती हो जाता है। जब भाई, बहन और बहन, भाई के साथ हर मुश्किल में एक - दूसरे की ढाल साबित होते हैं।
HAPPY Dooj 😊
HAPPY Dooj 😊
तुमने बिना छुये मेरे दिल को छुआ है,
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
संवेदनाओं और अहसासों को एक नया मोड़ मिला है,
मन आशियाने को सुकूं अनकहा मिला है
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
आंखों में बसता मासूम-सा चेहरा खिला है,
गुलदान में मानो एक नया गुल खिला है
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
किताबों के पन्नों में नया एक अध्याय मिला है,
जिंदगी में एक नया आयाम मिला है
तुमने बिना छुये मेरे दिल को छुआ है
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
संवेदनाओं और अहसासों को एक नया मोड़ मिला है,
मन आशियाने को सुकूं अनकहा मिला है
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
आंखों में बसता मासूम-सा चेहरा खिला है,
गुलदान में मानो एक नया गुल खिला है
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
किताबों के पन्नों में नया एक अध्याय मिला है,
जिंदगी में एक नया आयाम मिला है
तुमने बिना छुये मेरे दिल को छुआ है
ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।
सहम- सी गई है आज दुनिया न जाने क्यों
एक डर है अजीब - सा
मृत्यु का मंजर है कि रुकता ही
नहीं
स्वजनों का शोक हिला देता है
अंतस की हर एक दीवार
चाह उठती है मदद की
तो हाथ पीछे खींच लेती है
अपनी ही सुरक्षा
न जाने क्यों आज इंसान खुद इंसान का दुश्मन बन गया
एक डर है अजीब - सा
मृत्यु का मंजर है कि रुकता ही
नहीं
स्वजनों का शोक हिला देता है
अंतस की हर एक दीवार
चाह उठती है मदद की
तो हाथ पीछे खींच लेती है
अपनी ही सुरक्षा
न जाने क्यों आज इंसान खुद इंसान का दुश्मन बन गया
किशोरावस्था के दौरान जब फिसलती गई,
वो कामुकता की दल-दल में।
अंधकार से भरी धुप्प दुनिया में बढते गये कदम,
लौट न सके फिर कभी।
शायद ये किसी विशेष के लिए हो सुखानुभूति,
किन्तु एक स्त्री के लिए होती सदैव चरित्रहीनता।
मर्द और औरत के मध्य अकस्मात हुई वार्ता,
समाज में इस तरह परोसी जायेगी विश्वास नहीं होता।
किशोरावस्था में कदम इतना फिसलेंगे विश्वास नहीं होता,
आश्चर्य है बंद दुनिया का स्वतंत्र रूप।
जहाँ प्रत्येक रंग, कला, भाव, विचार सबकुछ,
एक-दूसरे से कोशों दूर विभक्त हैं।
ममत्व की चाह, विश्वास की अनुभूति, संवेदना के कुछ शब्द, आपसी अनकहे रिश्ते
दुनिया के लिये हमेशा,
निष्कलंक हो जरूरी तो नहीं।
काश ये जीवन एक-दूसरे के विचारों के अनुरूप चलने के अधीनस्थ न होता।
वो कामुकता की दल-दल में।
अंधकार से भरी धुप्प दुनिया में बढते गये कदम,
लौट न सके फिर कभी।
शायद ये किसी विशेष के लिए हो सुखानुभूति,
किन्तु एक स्त्री के लिए होती सदैव चरित्रहीनता।
मर्द और औरत के मध्य अकस्मात हुई वार्ता,
समाज में इस तरह परोसी जायेगी विश्वास नहीं होता।
किशोरावस्था में कदम इतना फिसलेंगे विश्वास नहीं होता,
आश्चर्य है बंद दुनिया का स्वतंत्र रूप।
जहाँ प्रत्येक रंग, कला, भाव, विचार सबकुछ,
एक-दूसरे से कोशों दूर विभक्त हैं।
ममत्व की चाह, विश्वास की अनुभूति, संवेदना के कुछ शब्द, आपसी अनकहे रिश्ते
दुनिया के लिये हमेशा,
निष्कलंक हो जरूरी तो नहीं।
काश ये जीवन एक-दूसरे के विचारों के अनुरूप चलने के अधीनस्थ न होता।
कितने सुरक्षित होते हैं हम अपनी मां की कोख में,
बाहरी दुनिया के अनुचित क्रियाकलापों से।
होता है वो अनुभव और स्नेह साथ,
जो बना देता है हमें एकदम साहसी।
बाहरी दुनिया से रुबरू होने वाले,
पहले और बाद के संघर्षों के लिए।
जब आते हैं हम इस दुनिया में,
अनेक संघर्षों का सामना कर।
तब आती है असहनीय पीढा से गुजरी,
हमारी मां के चेहरे पर एक प्यारी-सी मुस्कान।
खिल जाता है वो हर एक चेहरा
और होती है तैयारी जश्न की हमारे 'जन्मदिन' की।
मिलते हैं शुभाशीष हमें स्वजनों के,
भर जाते हैं हम आत्मीय भावनाओं से।
हम बनते हैं साहसी, निडर, कठोर, हृदय की कोमल भावनाओं को साथ लिए असीम प्रेम और विश्वास, समझ जैसी कई अनुभूतियाँ लिए बाहरी दुनिया के संघर्षों के लिए।
बाहरी दुनिया के अनुचित क्रियाकलापों से।
होता है वो अनुभव और स्नेह साथ,
जो बना देता है हमें एकदम साहसी।
बाहरी दुनिया से रुबरू होने वाले,
पहले और बाद के संघर्षों के लिए।
जब आते हैं हम इस दुनिया में,
अनेक संघर्षों का सामना कर।
तब आती है असहनीय पीढा से गुजरी,
हमारी मां के चेहरे पर एक प्यारी-सी मुस्कान।
खिल जाता है वो हर एक चेहरा
और होती है तैयारी जश्न की हमारे 'जन्मदिन' की।
मिलते हैं शुभाशीष हमें स्वजनों के,
भर जाते हैं हम आत्मीय भावनाओं से।
हम बनते हैं साहसी, निडर, कठोर, हृदय की कोमल भावनाओं को साथ लिए असीम प्रेम और विश्वास, समझ जैसी कई अनुभूतियाँ लिए बाहरी दुनिया के संघर्षों के लिए।
रखना है मुझको बचपन की खुशियां,
काश वक्त फिर ठहर जाता
वो वक्त फिर जीना है,
काश वो मौसम फिर बन पाता
समेट लेनी हैं अठखेलियाँ
काश वो दिन फिर बन जाता
कागज की कश्ती, बिन बात की हंसी, खेल और उमंग
चिंताओं का साथ फिर छूट जाता
काश वो दिन फिर से आ पाता
काश वक्त फिर ठहर जाता
वो वक्त फिर जीना है,
काश वो मौसम फिर बन पाता
समेट लेनी हैं अठखेलियाँ
काश वो दिन फिर बन जाता
कागज की कश्ती, बिन बात की हंसी, खेल और उमंग
चिंताओं का साथ फिर छूट जाता
काश वो दिन फिर से आ पाता
बचपन की खुशियां, वे दिन, अनकही यादें, निस्वार्थ भावनाएं, नये उमंग और उल्लास, यारों का साथ, आपके और हमारे जीवन से वीरान - सा हो गया है।
इसे निरंतर जीवंत रखने का प्रयास करें।
इसे निरंतर जीवंत रखने का प्रयास करें।
वक्त की दहलीज पर वो आश बाकी है,
वक्त की तहजीब में वो राज बाकी है,
दफन है कुछ अनकही दास्ताँ वो वक्त की,
वक्त पर कुछ वक्त की वो बात बाकी है,
वक्त ये ठहरे अगर तो प्यार बाकी है,
वक्त पर अटकी हुई हर चाह बाकी है,
वक्त की दहलीज पर वो आश बाकी है।
वक्त की तहजीब में वो राज बाकी है,
दफन है कुछ अनकही दास्ताँ वो वक्त की,
वक्त पर कुछ वक्त की वो बात बाकी है,
वक्त ये ठहरे अगर तो प्यार बाकी है,
वक्त पर अटकी हुई हर चाह बाकी है,
वक्त की दहलीज पर वो आश बाकी है।
आगे बढते जीवन की खुशियों के मिले आशियाने में एक दफा अतीत का टूटा-फूटा घर याद आ ही जाता है।
जिम्मेदारियों के हर एक बोझ को सहने लगा हूँ मैं,
अब आंसुओं को भी अपनी आँखों की हदों तक समेटने लगा हूँ मैं।
अब आंसुओं को भी अपनी आँखों की हदों तक समेटने लगा हूँ मैं।