Forwarded from Dharma Insights
अब मैं भगवान् विष्णुके भक्तोंका लक्षण
बतलाता हूँ-
जिनका चित्त अत्यन्त शान्त है, जो सबके प्रति कोमल भाव रखते हैं, जिन्होंने स्वेच्छानुसार अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी दूसरोंसे द्रोह करनेकी इच्छा नहीं रखते, जिनका चित्त दयासे द्रवीभूत होता है, जो चोरी और हिंसासे सदा ही मुख मोड़े रहते हैं,
सद्गुणोंके संग्रह तथा दूसरोंके कार्यसाधनमें जो प्रसन्नतापूर्वक संलग्न रहते हैं, सदाचारसे जिनका जीवन सदा उज्ज्वल (निष्कलंक) बना रहता है, जो दूसरोंके उत्सवको अपना उत्सव मानते हैं, सब प्राणियोंके भीतर भगवान् वासुदेवको विराजमान देखकर कभी किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते,
दीनोंपर दया करना जिनका स्वभाव बन गया है और जो सदा परहितसाधनकी इच्छा रखते हैं, अविवेकी मनुष्योंका विषयोंमें जैसा प्रेम होता है, उससे सौ कोटि गुनी अधिक प्रीतिका विस्तार वे भगवान् श्रीहरिके प्रति करते हैं।
नित्य कर्तव्यबुद्धिसे विष्णुस्वरूप शंकर आदि देवताओंका भक्तिपूर्वक पूजन और ध्यान करते हैं, पितरोंमें भगवान् विष्णुकी ही बुद्धि रखते हैं, भगवान् विष्णुसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखते। समष्टि और व्यष्टि सब भगवान्के ही स्वरूप हैं, भगवान् जगत्से भिन्न होकर भी भिन्न नहीं हैं,
'हे भगवान् जगन्नाथ! मैं आपका दास हूँ, आपके स्वरूपमें भी मैं हूँ, आपसे पृथक् कदापि नहीं हूँ, जब आप भगवान् विष्णु अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं, तब सेव्य अथवा सेवक कोई भी आपसे भिन्न नहीं है।'इस भावनासे सदा सावधान रहकर जो ब्रह्माजीके द्वारा वन्दनीय युगल चरणारविन्दोंवाले श्रीहरिको सदा प्रणाम करते, उनके नामोंका कीर्तन करते, उन्हींके भजनमें तत्पर रहते और संसारके लोगोंके समीप अपनेको तृणके समान तुच्छ मानकर विनयपूर्ण बर्ताव करते हैं।
जगत्में सब लोगोंका उपकार करनेके लिये जो कुशलताका परिचय देते हैं, दूसरोंके कुशल-क्षेमको अपना ही मानते हैं, दूसरोंका तिरस्कार देखकर उनके प्रति दयासे द्रवीभूत हो जाते हैं तथा सबके प्रति मनमें कल्याणकी भावना करते हैं, वे ही विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो पत्थर, परधन और मिट्टीके ढेलेमें, परायी स्त्री और कूटशाल्मली नामक नरकमें, मित्र, शत्रु, भाई तथा बन्धुवर्गमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, वे ही निश्चितरूपसे विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं।
(संक्षिप्त स्कन्दपुराण, गीता प्रेस, वैष्णवखण्ड, पृष्ठ ३४२)
बतलाता हूँ-
जिनका चित्त अत्यन्त शान्त है, जो सबके प्रति कोमल भाव रखते हैं, जिन्होंने स्वेच्छानुसार अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी दूसरोंसे द्रोह करनेकी इच्छा नहीं रखते, जिनका चित्त दयासे द्रवीभूत होता है, जो चोरी और हिंसासे सदा ही मुख मोड़े रहते हैं,
सद्गुणोंके संग्रह तथा दूसरोंके कार्यसाधनमें जो प्रसन्नतापूर्वक संलग्न रहते हैं, सदाचारसे जिनका जीवन सदा उज्ज्वल (निष्कलंक) बना रहता है, जो दूसरोंके उत्सवको अपना उत्सव मानते हैं, सब प्राणियोंके भीतर भगवान् वासुदेवको विराजमान देखकर कभी किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते,
दीनोंपर दया करना जिनका स्वभाव बन गया है और जो सदा परहितसाधनकी इच्छा रखते हैं, अविवेकी मनुष्योंका विषयोंमें जैसा प्रेम होता है, उससे सौ कोटि गुनी अधिक प्रीतिका विस्तार वे भगवान् श्रीहरिके प्रति करते हैं।
नित्य कर्तव्यबुद्धिसे विष्णुस्वरूप शंकर आदि देवताओंका भक्तिपूर्वक पूजन और ध्यान करते हैं, पितरोंमें भगवान् विष्णुकी ही बुद्धि रखते हैं, भगवान् विष्णुसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखते। समष्टि और व्यष्टि सब भगवान्के ही स्वरूप हैं, भगवान् जगत्से भिन्न होकर भी भिन्न नहीं हैं,
'हे भगवान् जगन्नाथ! मैं आपका दास हूँ, आपके स्वरूपमें भी मैं हूँ, आपसे पृथक् कदापि नहीं हूँ, जब आप भगवान् विष्णु अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं, तब सेव्य अथवा सेवक कोई भी आपसे भिन्न नहीं है।'इस भावनासे सदा सावधान रहकर जो ब्रह्माजीके द्वारा वन्दनीय युगल चरणारविन्दोंवाले श्रीहरिको सदा प्रणाम करते, उनके नामोंका कीर्तन करते, उन्हींके भजनमें तत्पर रहते और संसारके लोगोंके समीप अपनेको तृणके समान तुच्छ मानकर विनयपूर्ण बर्ताव करते हैं।
जगत्में सब लोगोंका उपकार करनेके लिये जो कुशलताका परिचय देते हैं, दूसरोंके कुशल-क्षेमको अपना ही मानते हैं, दूसरोंका तिरस्कार देखकर उनके प्रति दयासे द्रवीभूत हो जाते हैं तथा सबके प्रति मनमें कल्याणकी भावना करते हैं, वे ही विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो पत्थर, परधन और मिट्टीके ढेलेमें, परायी स्त्री और कूटशाल्मली नामक नरकमें, मित्र, शत्रु, भाई तथा बन्धुवर्गमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, वे ही निश्चितरूपसे विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं।
(संक्षिप्त स्कन्दपुराण, गीता प्रेस, वैष्णवखण्ड, पृष्ठ ३४२)
Forwarded from Vivek Choudhary
Garud puran, Acharya khand, Ch - 236 Lord Brahma says in all vedant Sar only Advait yog and Sankhya yoga is True knowledge
Forwarded from Bhagavad Gita Daily
भगवद्गीता– अध्याय ६, श्लोक २९
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: ||
अनुवाद: सर्वत्र समभाव से देखने वाले योगयुक्त व्यक्ति आत्मा को समस्त भूतों में और समस्त भूतों को आत्मा में देखते हैं।
BG 6.29: The person harmonized in yoga looks everywhere with equanimity, seeing the self (atman) in all beings and all beings in the self.
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: ||
अनुवाद: सर्वत्र समभाव से देखने वाले योगयुक्त व्यक्ति आत्मा को समस्त भूतों में और समस्त भूतों को आत्मा में देखते हैं।
BG 6.29: The person harmonized in yoga looks everywhere with equanimity, seeing the self (atman) in all beings and all beings in the self.
Forwarded from Vivek Choudhary
~ YajurVed :- Uttar-Ardha, 40th Adhyay, Verse 6 and 7
Advaita in YajurVeda 🤣🤣
Advaita in YajurVeda 🤣🤣
Srimad Bhagvatam (Bhagvat Puran) 12.5.10-12 Gita Press
Sukhdev ji raja parikshit ji ko updesha de rhe hain ki tum hi bhagwan ho.
Sukhdev ji raja parikshit ji ko updesha de rhe hain ki tum hi bhagwan ho.
Forwarded from Shastra Manthan 🕉 ((योगी) सर्वोत्तम)
ऋग्वेद से अद्वैत प्रतिपादन
ब्रह्मांड उत्पत्ति
अर्थात:-
प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् था। उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष था, न कोई आवरण था और न ढकने योग्य पदार्थ था। कहीं भी न कोई प्राणी था और न कोई सुख पहुंचाने वाला भोग था। उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था।
अर्थात:-
उस समय न मृत्यु थी और न अमृत था। न रात्रि थी और न दिन का ज्ञान था।
उस समय एकमात्र ब्रह्मा ही स्वधा के साथ प्राणयुक्त था। उससे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं था।
स्वधा:- माया , या प्रकृति
टिप्पणी:-
वेद, वेदांत आदी शास्त्र तुम्हारा अस्तित्व है, यही सभीका मुल सिद्धांत है। इसी की और तुम्हे आना है।
समस्या दिखे तो गुरुवो, आचार्यो से उसका समाधान करवा लीजिए, भोंदु, भांगडुओ से नही।
🙏ब्रह्मणे नमः🙏
Join:- @Shastra_Manthan
ब्रह्मांड उत्पत्ति
नासासादिनो सदासित्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। किमाफोरिवः कुह कस्य शर्मन्नंभः किमासीद्घनं गभीरम् ॥
अर्थात:-
प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् था। उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष था, न कोई आवरण था और न ढकने योग्य पदार्थ था। कहीं भी न कोई प्राणी था और न कोई सुख पहुंचाने वाला भोग था। उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था।
न मृत्युरासीदमृतं न तारहि न रात्रिया अहं आसीत्प्रकेतः। अनिदावतं स्वध्या तदेकं तस्माधान्यान्न परः किं चानस ॥
अर्थात:-
उस समय न मृत्यु थी और न अमृत था। न रात्रि थी और न दिन का ज्ञान था।
उस समय एकमात्र ब्रह्मा ही स्वधा के साथ प्राणयुक्त था। उससे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं था।
स्वधा:- माया , या प्रकृति
टिप्पणी:-
वेद, वेदांत आदी शास्त्र तुम्हारा अस्तित्व है, यही सभीका मुल सिद्धांत है। इसी की और तुम्हे आना है।
समस्या दिखे तो गुरुवो, आचार्यो से उसका समाधान करवा लीजिए, भोंदु, भांगडुओ से नही।
🙏ब्रह्मणे नमः🙏
Join:- @Shastra_Manthan
Gita 7.19 बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष सब कुछ वासुदेव ही है इस प्रकार मुझको भजता है। वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
Advait me hamlog aise hi bhagwan ko bhajte hain. Sabkuchh Vasudev hi hain. Unke alawa is sansar me aur kuchh nahi h
#Bhakti@advaitikreference
Advait me hamlog aise hi bhagwan ko bhajte hain. Sabkuchh Vasudev hi hain. Unke alawa is sansar me aur kuchh nahi h
#Bhakti@advaitikreference