Mandukya Upanishad
मांडूक्य उपनिषद सबसे छोटा उपनिषद है। इसमें बस 12 श्लोक है लेकिन यह ज्ञान में अद्वैत वेदांत के कई concepts को इन्ही 12 श्लोकों में समाए हुए है। माण्डूक्य उपनिषद् अकेला ही मोक्ष दिला पाने में सक्षम है। इसके बारे में मुक्तिका उपनिषद् में एक कथा मिलती है ।
हनुमान भगवान राम से मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने के सर्वोच्च साधन के बारे में पूछते हैं। इसके उत्तर में, भगवान राम कहते हैं कि उपनिषदों का ज्ञान ही मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। तब हनुमान पूछते हैं कि कौन सा उपनिषद सबसे महत्वपूर्ण है। इस पर राम उत्तर देते हैं कि केवल माण्डूक्य उपनिषद ही मोक्ष के लिए पर्याप्त है—(माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये)। वे कहते हैं कि यदि कोई इस उपनिषद को गहराई से समझ ले, तो आत्म-साक्षात्कार के लिए किसी अन्य ग्रंथ की आवश्यकता नहीं होती।
Mandukya Upanishad Verses Explanation
Verse 1
Verse 2
Verse 3
#Episodes@advaitikreference
मांडूक्य उपनिषद सबसे छोटा उपनिषद है। इसमें बस 12 श्लोक है लेकिन यह ज्ञान में अद्वैत वेदांत के कई concepts को इन्ही 12 श्लोकों में समाए हुए है। माण्डूक्य उपनिषद् अकेला ही मोक्ष दिला पाने में सक्षम है। इसके बारे में मुक्तिका उपनिषद् में एक कथा मिलती है ।
हनुमान भगवान राम से मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने के सर्वोच्च साधन के बारे में पूछते हैं। इसके उत्तर में, भगवान राम कहते हैं कि उपनिषदों का ज्ञान ही मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। तब हनुमान पूछते हैं कि कौन सा उपनिषद सबसे महत्वपूर्ण है। इस पर राम उत्तर देते हैं कि केवल माण्डूक्य उपनिषद ही मोक्ष के लिए पर्याप्त है—(माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये)। वे कहते हैं कि यदि कोई इस उपनिषद को गहराई से समझ ले, तो आत्म-साक्षात्कार के लिए किसी अन्य ग्रंथ की आवश्यकता नहीं होती।
Mandukya Upanishad Verses Explanation
Verse 1
Verse 2
Verse 3
#Episodes@advaitikreference
Mandukya Upanishad Verse 1
Translation:
'ॐ', यह शाश्वत अक्षर ही सब कुछ है जो अस्तित्व में है। इसकी विस्तृत व्याख्या यह है कि जो था, है और होगा - यह सब वास्तव में 'ॐ' है। और जो कुछ भी त्रिकाल से परे है, वह भी वास्तव में 'ॐ' है।
Explanation:
- ॐ केवल एक ध्वनि नही है बल्कि ये पूरे reality को दर्शाता है।
- सबकुछ ब्रह्म ही है। जो कुछ भी अतीत में हो चुका है, जो वर्तमान में है, और जो कुछ भविष्य में होने वाला है सबकुछ ब्रह्म ही है और ॐ उसका symbol है।
- यहा तक की जो समय से परे है वह भी ब्रह्म ही है और उसे भी ॐ से ही दर्शाया जाता है।
- [ब्रह्म समय से भी परे है, समय भी बाद में आया यह modern science भी मानता है Einstein's General Relativity, Space time fabric.]
- [क्योंकि समय भी बाद में आया इसलिए कहा जाता है की अविद्या अनादि है यानी शुरू से ही है।, समय को experience तो जीव ही करता है। और समय भी relative है। (time dilation, general and special relativity)]
- [ब्रह्म को ही भगवान या परमात्मा भी कहते हैं। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं। ]
Translation:
'ॐ', यह शाश्वत अक्षर ही सब कुछ है जो अस्तित्व में है। इसकी विस्तृत व्याख्या यह है कि जो था, है और होगा - यह सब वास्तव में 'ॐ' है। और जो कुछ भी त्रिकाल से परे है, वह भी वास्तव में 'ॐ' है।
Explanation:
- ॐ केवल एक ध्वनि नही है बल्कि ये पूरे reality को दर्शाता है।
- सबकुछ ब्रह्म ही है। जो कुछ भी अतीत में हो चुका है, जो वर्तमान में है, और जो कुछ भविष्य में होने वाला है सबकुछ ब्रह्म ही है और ॐ उसका symbol है।
- यहा तक की जो समय से परे है वह भी ब्रह्म ही है और उसे भी ॐ से ही दर्शाया जाता है।
- [ब्रह्म समय से भी परे है, समय भी बाद में आया यह modern science भी मानता है Einstein's General Relativity, Space time fabric.]
- [क्योंकि समय भी बाद में आया इसलिए कहा जाता है की अविद्या अनादि है यानी शुरू से ही है।, समय को experience तो जीव ही करता है। और समय भी relative है। (time dilation, general and special relativity)]
- [ब्रह्म को ही भगवान या परमात्मा भी कहते हैं। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं। ]
Mandukya Upanishad Verse 2
Translation:
सब कुछ ब्रह्म है; यह आत्मा ही ब्रह्म है। इस आत्मा के चार अवस्था हैं।
Explanation:
- यह सबकुछ ब्रह्म (भगवान) है। यह आत्मा ब्रह्म है। आत्मा शब्द हमारे आत्मस्वरुप को दर्शाने के लिए इस्तेमाल होता है। आत्मा यानी self। जैसे Self respect आत्मसम्मान। इसमें भी आत्म शब्द ही है। यहां कहा गया है की हमारा आत्मस्वरुप ब्रह्म है। यानी वास्तव में हम ब्रह्म है। और ब्रह्म सबकुछ है।
-आपको लग रहा है की आप बस यह शरीर हो लेकिन आप सबकुछ हो। समस्त संसार आप ही हो। जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह आप ही हो। भूत, वर्तमान, भविष्य भी आप ही हो और आप इन तीनो से परे भी हो।
- यह श्लोक इस बात को दर्शाता है की जीव (individual consciousness/embodied consciousness) ही ब्रह्म (universal consciousness/ultimate consciousness) है।
- इस आत्मा के चार अवस्था होते हैं।
1. जागृत
2. स्वप्न
3. सुषुप्ती
4. तुरिया
Translation:
सब कुछ ब्रह्म है; यह आत्मा ही ब्रह्म है। इस आत्मा के चार अवस्था हैं।
Explanation:
- यह सबकुछ ब्रह्म (भगवान) है। यह आत्मा ब्रह्म है। आत्मा शब्द हमारे आत्मस्वरुप को दर्शाने के लिए इस्तेमाल होता है। आत्मा यानी self। जैसे Self respect आत्मसम्मान। इसमें भी आत्म शब्द ही है। यहां कहा गया है की हमारा आत्मस्वरुप ब्रह्म है। यानी वास्तव में हम ब्रह्म है। और ब्रह्म सबकुछ है।
-आपको लग रहा है की आप बस यह शरीर हो लेकिन आप सबकुछ हो। समस्त संसार आप ही हो। जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह आप ही हो। भूत, वर्तमान, भविष्य भी आप ही हो और आप इन तीनो से परे भी हो।
- यह श्लोक इस बात को दर्शाता है की जीव (individual consciousness/embodied consciousness) ही ब्रह्म (universal consciousness/ultimate consciousness) है।
- इस आत्मा के चार अवस्था होते हैं।
1. जागृत
2. स्वप्न
3. सुषुप्ती
4. तुरिया
Mandukya Upanishad Verse 3
Translation:
जाग्रत अवस्था में, बाहर के दुनिया का experience करने वाला। , सात अंगों और उन्नीस मुखों वाला, स्थूल वस्तुओं का अनुभव करने वाला वैश्वानर, आत्मा की पहली अवस्था है।
Explanation:
- आप इस समय बाहरी दुनिया को experience कर रहे हैं। इसे ही जाग्रत अवस्था कहते हैं, जिसमें आपको यह सारा संसार दिखाई देता है।
- यह वैश्वानर है यानि आपकी चेतना केवल इस शरीर तक ही limited नहीं है, बल्कि सभी शरीरों में आपकी ही चेतना है.
कौन है जो सभी आँखों से देख रहा है, कौन है जो सभी कानों से सुन रहा है, कौन है जो सभी दिमागों से सोच रहा है? वह आपका अंतर आत्मा है👇
एक बुद्धिमान व्यक्ति समस्त संसार को अपना परिवार मानता है लेकिन एक बुद्ध (An Enlightened Person) समस्त संसार को अपने में ही देखता है।
7 अंग वैश्वानर के 7 अंग को दर्शाते हैं। For more information about these 7 limbs Click Here
19 मुख का अर्थ है: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण और चार अंतःकरण: मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त। For more information about these 19 mouths Click here: Part 1 Part 2
Translation:
जाग्रत अवस्था में, बाहर के दुनिया का experience करने वाला। , सात अंगों और उन्नीस मुखों वाला, स्थूल वस्तुओं का अनुभव करने वाला वैश्वानर, आत्मा की पहली अवस्था है।
Explanation:
- आप इस समय बाहरी दुनिया को experience कर रहे हैं। इसे ही जाग्रत अवस्था कहते हैं, जिसमें आपको यह सारा संसार दिखाई देता है।
- यह वैश्वानर है यानि आपकी चेतना केवल इस शरीर तक ही limited नहीं है, बल्कि सभी शरीरों में आपकी ही चेतना है.
"उसकी हर जगह हाथ और पैर हैं, हर जगह उसकी आँखें, सिर और मुख हैं; उसके कान हर जगह हैं। वह संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त होकर स्थित है।"
- Gita 13.14 / Shvetashvatara Up 3.16
कौन है जो सभी आँखों से देख रहा है, कौन है जो सभी कानों से सुन रहा है, कौन है जो सभी दिमागों से सोच रहा है? वह आपका अंतर आत्मा है👇
"वह स्वयं नहीं देखा जाता, बल्कि वही देखने वाला (द्रष्टा) है; वह स्वयं नहीं सुना जाता, बल्कि वही श्रोता है; वह स्वयं नहीं समझा जाता, बल्कि वही समझने वाला है; वह स्वयं नहीं जाना जाता, बल्कि वही जानने वाला है। उसके अलावा कोई दूसरा देखने वाला नहीं है, कोई दूसरा सुनने वाला नहीं है, कोई दूसरा सोचने वाला नहीं है। वह तुम्हारा अंतरात्मा है। "
- Brihadaranyak Up 3.7.23
एक बुद्धिमान व्यक्ति समस्त संसार को अपना परिवार मानता है लेकिन एक बुद्ध (An Enlightened Person) समस्त संसार को अपने में ही देखता है।
प्रबुद्ध व्यक्ति समस्त जीवों को अपने में और अपने को समस्त जीवों में देखते हैं।
- Gita 6.29, Isha Up verse 6
7 अंग वैश्वानर के 7 अंग को दर्शाते हैं। For more information about these 7 limbs Click Here
19 मुख का अर्थ है: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण और चार अंतःकरण: मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त। For more information about these 19 mouths Click here: Part 1 Part 2
Forwarded from 𝐒𝐩𝐢𝐫𝐢𝐭𝐮𝐚𝐥 𝐉𝐨𝐮𝐫𝐧𝐞𝐲
आप सभी को वैदिक सनातन हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩
विक्रम संवत २०८२
सृष्टि संवत 1,95,58,85,126
* चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि। शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति।।’ (ब्रह्मापुराण)
अर्थात् ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही किया था।
* इस दिन श्री हरि ने मत्स्यावतार लिया था।
* सतयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ था।
* छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक आज के ही दिन हुआ था ।
* इस दिन प्रभु श्रीराम ने बाली का वध किया। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे आयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी ।
* वर्ष के विशेष साढे तीन मुहूर्तों में से एक : वर्षप्रतिपदा साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है, इसलिए इस दिन कोई भी शुभकार्य कर सकते हैं। इस दिन कोई भी घटिका (समय) शुभमुहूर्त ही होता है।
* न्याय प्रणेता महर्षि गौतम की जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है ।
* सिक्खों के दूसरे गुरु अंगद देव साहिब का अवतरण भी इसी दिन हुआ था ।
जय श्री राम 🚩
जय श्री राधे 🙏
जय भवानी
हर हर महादेव 🚩
# उपरोक्त जानकारी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त है ।
विक्रम संवत २०८२
सृष्टि संवत 1,95,58,85,126
* चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि। शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति।।’ (ब्रह्मापुराण)
अर्थात् ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही किया था।
* इस दिन श्री हरि ने मत्स्यावतार लिया था।
* सतयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ था।
* छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक आज के ही दिन हुआ था ।
* इस दिन प्रभु श्रीराम ने बाली का वध किया। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे आयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी ।
* वर्ष के विशेष साढे तीन मुहूर्तों में से एक : वर्षप्रतिपदा साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है, इसलिए इस दिन कोई भी शुभकार्य कर सकते हैं। इस दिन कोई भी घटिका (समय) शुभमुहूर्त ही होता है।
* न्याय प्रणेता महर्षि गौतम की जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है ।
* सिक्खों के दूसरे गुरु अंगद देव साहिब का अवतरण भी इसी दिन हुआ था ।
जय श्री राम 🚩
जय श्री राधे 🙏
जय भवानी
हर हर महादेव 🚩
# उपरोक्त जानकारी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त है ।
Happy New Year 2082!! 🥳🥳
And a very Happy Navaratri 🎉🎉
May this year bring you joy, health, and endless opportunities. May your days be filled with love, your goals be achieved, and your dreams take flight. Here's to new beginnings and a year of growth and happiness!
Here is your new year gift 🎁
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Srimad Bhagvatam (Bhagvat Puran) 1.2.32 Gita press Ek hi tattva hai lekin vo bas aisa pratit ho rha h ki vah bahut sara h. Usi tattva ko bhagwan ya brahm kahte hain. Eko aham bahusyam.
"As fire, though one, having entered the world, takes a separate form in respect of every form, so does the internal Atman of all living things even though it is one assumes a form for every form and is also outside all forms."
- Katha Upanishad 2.2.9, Krishna Yajurveda
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- Katha Upanishad 2.2.9, Krishna Yajurveda
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"वही यह महान अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है। ब्रह्म अभय है, जो ऐसा जनता है वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है।"
"That great, birthless Self is undecaying, immortal, undying, fearless and Brahman (infinite). Brahman is indeed fearless. He who knows It as such becomes the fearless Brahman."
- Brihadaranyaka Upanishad 4.4.25, Yajur Veda
"That great, birthless Self is undecaying, immortal, undying, fearless and Brahman (infinite). Brahman is indeed fearless. He who knows It as such becomes the fearless Brahman."
- Brihadaranyaka Upanishad 4.4.25, Yajur Veda
As these flowing rivers, bound for the ocean, disappear into the ocean after having reached it, their names and forms being destroyed and are called simply the ocean, even so, these sixteen parts of the seer, whose goal is the Purusha, disappear into the Purusha after having reached Him, their names and forms being destroyed and are called simply the Purusha. He becomes free of parts and immortal.
- Prashna Upanishad 6.5, Atharva Veda
- Prashna Upanishad 6.5, Atharva Veda
‘These eastern rivers, dear boy, flow along to the east and the western ones to the west. They rise from the ocean and merge in the ocean, and become that ocean itself.
And there as these rivers do not know themselves as "I am this river, I am that river", even so, dear boy, all these creatures, having come from Being, do not know, "We have come from Being". And whatever these creatures were here, tiger or lion or wolf or boar or worm or flying insect or gad-fly or mosquito, that they become again.
‘That Being which is this subtle essence (cause), even That all this world has for its self. That is the true. That is the Atman. You are that (Tat Tvam Asi) O Svetaketu.’
- Chhandogya Upanishad 6.10.1-3, Saam Veda
And there as these rivers do not know themselves as "I am this river, I am that river", even so, dear boy, all these creatures, having come from Being, do not know, "We have come from Being". And whatever these creatures were here, tiger or lion or wolf or boar or worm or flying insect or gad-fly or mosquito, that they become again.
‘That Being which is this subtle essence (cause), even That all this world has for its self. That is the true. That is the Atman. You are that (Tat Tvam Asi) O Svetaketu.’
- Chhandogya Upanishad 6.10.1-3, Saam Veda
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राजा जनक के दरबार में महान शास्त्रार्थ (Episode 1/8)
राजा जनक विदेह के महान राजा थे, जो ज्ञान और आध्यात्म में गहरी रुचि रखते थे। वे अपने दरबार में विद्वानों और ऋषियों को बुलाकर गूढ़ आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा कराते थे। एक दिन, उनके दरबार में एक महत्वपूर्ण शास्त्रार्थ (विवाद) हुआ, जिसमें महान ऋषि याज्ञवल्क्य और कई अन्य विद्वान शामिल थे।
इस शास्त्रार्थ में उद्दालक आरुणि, जो एक प्रसिद्ध ऋषि थे, खड़े हुए और याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया।
"क्या तुम उस सूत्र (गुप्त धागा) के बारे में जानते हो, जिससे यह संसार, परलोक और समस्त प्राणी बंधे हुए हैं?’ क्या तुम उस अंतःयामी (भीतर से सबको नियंत्रित करने वाले) के बारे में जानते हो, जो इस लोक, परलोक और समस्त जीवों को नियंत्रित करता है?
जो व्यक्ति उस सूत्र और अंतःयामी को जानता है, वही वास्तव में ब्रह्म (परम सत्य) को जानता है। वह लोकों को जानता है, देवताओं को जानता है, वेदों को जानता है, सभी प्राणियों को जानता है, अपने आत्मा को जानता है, और सभी चीजों का सच्चा ज्ञान रखता है।"
याज्ञवल्क्य शांत और आत्मविश्वास से भरे थे। उन्होंने उत्तर दिया, "हे गौतम (उद्दालक), मैं उस सूत्र और अंतःयामी को जानता हूँ।"
- Brihadaranyak Upanishad 3.7.1, Yajur Veda
राजा जनक विदेह के महान राजा थे, जो ज्ञान और आध्यात्म में गहरी रुचि रखते थे। वे अपने दरबार में विद्वानों और ऋषियों को बुलाकर गूढ़ आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा कराते थे। एक दिन, उनके दरबार में एक महत्वपूर्ण शास्त्रार्थ (विवाद) हुआ, जिसमें महान ऋषि याज्ञवल्क्य और कई अन्य विद्वान शामिल थे।
इस शास्त्रार्थ में उद्दालक आरुणि, जो एक प्रसिद्ध ऋषि थे, खड़े हुए और याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया।
"क्या तुम उस सूत्र (गुप्त धागा) के बारे में जानते हो, जिससे यह संसार, परलोक और समस्त प्राणी बंधे हुए हैं?’ क्या तुम उस अंतःयामी (भीतर से सबको नियंत्रित करने वाले) के बारे में जानते हो, जो इस लोक, परलोक और समस्त जीवों को नियंत्रित करता है?
जो व्यक्ति उस सूत्र और अंतःयामी को जानता है, वही वास्तव में ब्रह्म (परम सत्य) को जानता है। वह लोकों को जानता है, देवताओं को जानता है, वेदों को जानता है, सभी प्राणियों को जानता है, अपने आत्मा को जानता है, और सभी चीजों का सच्चा ज्ञान रखता है।"
याज्ञवल्क्य शांत और आत्मविश्वास से भरे थे। उन्होंने उत्तर दिया, "हे गौतम (उद्दालक), मैं उस सूत्र और अंतःयामी को जानता हूँ।"
- Brihadaranyak Upanishad 3.7.1, Yajur Veda
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राजा जनक के दरबार में महान शास्त्रार्थ (Episode 1/8) राजा जनक विदेह के महान राजा थे, जो ज्ञान और आध्यात्म में गहरी रुचि रखते थे। वे अपने दरबार में विद्वानों और ऋषियों को बुलाकर गूढ़ आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा कराते थे। एक दिन, उनके दरबार में एक महत्वपूर्ण…
is series ke total 8 episodes hain. agla episode kal release hoga. daily 1 episode release hoga. isme yagyavalk us antaryami ke bare me batate hain jo pure sansar ko niyantrit karta h. isme yagyavalk advait vedant se judi chije batayenge
(Episode 2/8)
याज्ञवल्क्य ने कहा: "हे गौतम, वह सूत्र (धागा) वायु है। वायु ही वह शक्ति है जो इस संसार, परलोक और सभी जीवों को एक साथ बाँधकर रखती है, जैसे धागा मोतियों को एक माला में जोड़ता है।"
"यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो कहा जाता है कि उसके अंग शिथिल (ढीले) हो गए हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर को जोड़े रखने वाला वायु (प्राण) उसे छोड़ देता है, ठीक वैसे ही जैसे धागा टूटने पर मोती बिखर जाते हैं।"
गौतम ने कहा: "यह सत्य है, याज्ञवल्क्य। अब मुझे अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाले) के बारे में बताइए।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.2, Yajur Veda
याज्ञवल्क्य ने कहा: "हे गौतम, वह सूत्र (धागा) वायु है। वायु ही वह शक्ति है जो इस संसार, परलोक और सभी जीवों को एक साथ बाँधकर रखती है, जैसे धागा मोतियों को एक माला में जोड़ता है।"
"यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो कहा जाता है कि उसके अंग शिथिल (ढीले) हो गए हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर को जोड़े रखने वाला वायु (प्राण) उसे छोड़ देता है, ठीक वैसे ही जैसे धागा टूटने पर मोती बिखर जाते हैं।"
गौतम ने कहा: "यह सत्य है, याज्ञवल्क्य। अब मुझे अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाले) के बारे में बताइए।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.2, Yajur Veda
Happy Rama Navami!
"O, most wise! thou art incorporeal and supreme Lord, thou art personified pure wisdom, thou the Antaryamin (knowest thou the minds of all), thou art visible only to those who love thy lotus-like feet, as a bee loves to suck the nectar and who have thy knowledge for their aim."
- Lakshmana to Lord Rama
Source: Shri Rama Gita (4), translated by Swami Vijnanananda
Credits: Ramkrishna Sharanam
"O, most wise! thou art incorporeal and supreme Lord, thou art personified pure wisdom, thou the Antaryamin (knowest thou the minds of all), thou art visible only to those who love thy lotus-like feet, as a bee loves to suck the nectar and who have thy knowledge for their aim."
- Lakshmana to Lord Rama
Source: Shri Rama Gita (4), translated by Swami Vijnanananda
Credits: Ramkrishna Sharanam
(Episode 3/8)
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो पृथ्वी में निवास करता है, लेकिन पृथ्वी के भीतर भी है, जिसे पृथ्वी पहचान नहीं पाती, पृथ्वी जिसका शरीर है, और जो पृथ्वी को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"वह जो जल (पानी) में निवास करता है, लेकिन जल के भीतर भी है, जिसे जल पहचान नहीं पाता, जल जिसका शरीर है, और जो जल को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो अग्नि (आग) में निवास करता है, लेकिन अग्नि के भीतर भी है, जिसे अग्नि पहचान नहीं पाती, अग्नि जिसका शरीर है, और जो अग्नि को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
वह जो आकाश में निवास करता है, लेकिन आकाश के भीतर भी है, जिसे आकाश पहचान नहीं पाता, आकाश जिसका शरीर है, और जो आकाश को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।
वह जो वायु (हवा) में निवास करता है, लेकिन वायु के भीतर भी है, जिसे वायु पहचान नहीं पाती, वायु जिसका शरीर है, है, और जो वायु को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.3-7, Yajur Veda
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो पृथ्वी में निवास करता है, लेकिन पृथ्वी के भीतर भी है, जिसे पृथ्वी पहचान नहीं पाती, पृथ्वी जिसका शरीर है, और जो पृथ्वी को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"वह जो जल (पानी) में निवास करता है, लेकिन जल के भीतर भी है, जिसे जल पहचान नहीं पाता, जल जिसका शरीर है, और जो जल को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो अग्नि (आग) में निवास करता है, लेकिन अग्नि के भीतर भी है, जिसे अग्नि पहचान नहीं पाती, अग्नि जिसका शरीर है, और जो अग्नि को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
वह जो आकाश में निवास करता है, लेकिन आकाश के भीतर भी है, जिसे आकाश पहचान नहीं पाता, आकाश जिसका शरीर है, और जो आकाश को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।
वह जो वायु (हवा) में निवास करता है, लेकिन वायु के भीतर भी है, जिसे वायु पहचान नहीं पाती, वायु जिसका शरीर है, है, और जो वायु को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.3-7, Yajur Veda
(Episode 4/8)
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो स्वर्ग में निवास करता है, लेकिन स्वर्ग के भीतर भी है, जिसे स्वर्ग पहचान नहीं पाता, स्वर्ग जिसका शरीर है,और जो स्वर्ग को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"वह जो सूर्य में निवास करता है, लेकिन सूर्य के भीतर भी है, जिसे सूर्य पहचान नहीं पाता, सूर्य जिसका शरीर है, और जो सूर्य को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो दिशाओं (आकाश के विभिन्न भागों) में निवास करता है, लेकिन दिशाओं के भीतर भी है, जिसे दिशाएँ पहचान नहीं पातीं, दिशाएँ जिसका शरीर है, और जो दिशाओं को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो चंद्रमा और तारों में निवास करता है, लेकिन उनके भीतर भी है, जिसे चंद्रमा और तारे पहचान नहीं पाते, चंद्रमा और तारे जिसका शरीर है, और जो चंद्रमा और तारों को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो आकाश (व्यापक अंतरिक्ष) में निवास करता है, लेकिन आकाश के भीतर भी है, जिसे आकाश पहचान नहीं पाता, आकाश जिसका शरीर है, और जो आकाश को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.8-12, Yajur Veda
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो स्वर्ग में निवास करता है, लेकिन स्वर्ग के भीतर भी है, जिसे स्वर्ग पहचान नहीं पाता, स्वर्ग जिसका शरीर है,और जो स्वर्ग को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"वह जो सूर्य में निवास करता है, लेकिन सूर्य के भीतर भी है, जिसे सूर्य पहचान नहीं पाता, सूर्य जिसका शरीर है, और जो सूर्य को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो दिशाओं (आकाश के विभिन्न भागों) में निवास करता है, लेकिन दिशाओं के भीतर भी है, जिसे दिशाएँ पहचान नहीं पातीं, दिशाएँ जिसका शरीर है, और जो दिशाओं को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो चंद्रमा और तारों में निवास करता है, लेकिन उनके भीतर भी है, जिसे चंद्रमा और तारे पहचान नहीं पाते, चंद्रमा और तारे जिसका शरीर है, और जो चंद्रमा और तारों को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"वह जो आकाश (व्यापक अंतरिक्ष) में निवास करता है, लेकिन आकाश के भीतर भी है, जिसे आकाश पहचान नहीं पाता, आकाश जिसका शरीर है, और जो आकाश को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.8-12, Yajur Veda
(Episode 5/8)
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो अंधकार (अँधेरा) में निवास करता है, लेकिन अंधकार के भीतर भी है, जिसे अंधकार पहचान नहीं पाता, अंधकार जिसका शरीर है, और जो अंधकार को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"वह जो प्रकाश में निवास करता है, लेकिन प्रकाश के भीतर भी है, जिसे प्रकाश पहचान नहीं पाता, प्रकाश जिसका शरीर है, और जो प्रकाश को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"यह तो देवताओं (adhidaivatam) के संदर्भ में था। अब प्राणियों (adhibhutam) के संदर्भ में समझो।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.13-14, Yajur Veda
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो अंधकार (अँधेरा) में निवास करता है, लेकिन अंधकार के भीतर भी है, जिसे अंधकार पहचान नहीं पाता, अंधकार जिसका शरीर है, और जो अंधकार को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"वह जो प्रकाश में निवास करता है, लेकिन प्रकाश के भीतर भी है, जिसे प्रकाश पहचान नहीं पाता, प्रकाश जिसका शरीर है, और जो प्रकाश को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी और अमर है।"
"यह तो देवताओं (adhidaivatam) के संदर्भ में था। अब प्राणियों (adhibhutam) के संदर्भ में समझो।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.13-14, Yajur Veda
(Episode 6/8)
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो सभी प्राणियों में निवास करता है, लेकिन सभी प्राणियों के भीतर भी है, जिसे कोई भी प्राणी पहचान नहीं पाता, सभी प्राणी जिसका शरीर है, और जो सभी प्राणियों को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"यह तो प्राणियों (adhibhutam) के संदर्भ में था। अब शरीर (शरीर के तत्वों) के संदर्भ में समझो।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.15, Yajur Veda
याज्ञवल्क्य ने कहा:
"वह जो सभी प्राणियों में निवास करता है, लेकिन सभी प्राणियों के भीतर भी है, जिसे कोई भी प्राणी पहचान नहीं पाता, सभी प्राणी जिसका शरीर है, और जो सभी प्राणियों को भीतर से नियंत्रित करता है—वही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतःयामी (भीतर से नियंत्रित करने वाला) और अमर है।"
"यह तो प्राणियों (adhibhutam) के संदर्भ में था। अब शरीर (शरीर के तत्वों) के संदर्भ में समझो।"
- Brihadaranyaka Upanishad 3.7.15, Yajur Veda