Srimad Bhagvatam (Bhagvat Puran) 10.47.28-30 gita press
यहाँ भी अद्वैत आ गया। भगवान खुद को ही रचते हैं, खुद को ही पालते हैं और खुद को ही समेट लेते हैं।
भागवत पुराण में एक कथा है। जब श्री कृष्ण वृंदावन छोड़कर द्वारका चले गए थे, तब गोपियाँ उनकी याद में रो रही थीं। तो कृष्ण ने उद्धव को अपना एक संदेश भिजवाने के लिए वृंदावन भेजा।
कृष्ण का संदेश यह था कि तुम लोग रो क्यों रही हो? मैं तुमसे अलग थोड़े ही हूँ कि तुम लोग मेरे लिए रो रही हो। मैं तुम सबकी आत्मा हूँ (गीता 10.20)। मैं ही सभी के रूप में हूँ, और सच पूछो तो मैं ही उन सबके रूप में प्रकट हो रहा हूँ। मैं इस संसार में खुद को ही रचता हूँ, खुद को ही पलता हूँ और खुद को ही समेट लेता हूँ। तो तुम्हारा और मेरा वियोग कैसा?
आगे के श्लोक में फिर लिखा है की
कृष्ण का यह संदेश सुनकर गोपियाँ रोना बंद कर देती हैं और उद्धव का आदर-सत्कार करने लगती हैं।
यहाँ भी अद्वैत आ गया। भगवान खुद को ही रचते हैं, खुद को ही पालते हैं और खुद को ही समेट लेते हैं।
भागवत पुराण में एक कथा है। जब श्री कृष्ण वृंदावन छोड़कर द्वारका चले गए थे, तब गोपियाँ उनकी याद में रो रही थीं। तो कृष्ण ने उद्धव को अपना एक संदेश भिजवाने के लिए वृंदावन भेजा।
कृष्ण का संदेश यह था कि तुम लोग रो क्यों रही हो? मैं तुमसे अलग थोड़े ही हूँ कि तुम लोग मेरे लिए रो रही हो। मैं तुम सबकी आत्मा हूँ (गीता 10.20)। मैं ही सभी के रूप में हूँ, और सच पूछो तो मैं ही उन सबके रूप में प्रकट हो रहा हूँ। मैं इस संसार में खुद को ही रचता हूँ, खुद को ही पलता हूँ और खुद को ही समेट लेता हूँ। तो तुम्हारा और मेरा वियोग कैसा?
आगे के श्लोक में फिर लिखा है की
कृष्ण का यह संदेश सुनकर गोपियाँ रोना बंद कर देती हैं और उद्धव का आदर-सत्कार करने लगती हैं।
Advaitik references
Srimad bhagvatam (bhagvat puran)12.13.12. Gita Press Bhagvat puran likhne ka uddeshya kya hai vo bataya ja rha h.
Kaivalya Moksha means Advaitik moksha
नारद पुराण में बता रखा है कौन भक्ति सबसे उत्तम है और कौन राजसिक भक्ति है।
सालोक्य मुक्ति अर्थात भगवान के लोक जाना जैसे गोलोक, शिव लोक, वैकुंठ लोक आदि।
और सारूप्य अर्थात सगुण साकार भगवान का रूप धारण कर लेना।
https://archive.org/details/narada-puran-gita-press-gorakhpur/page/n89/mode/2up
#Bhakti@advaitikreference
सालोक्य मुक्ति अर्थात भगवान के लोक जाना जैसे गोलोक, शिव लोक, वैकुंठ लोक आदि।
और सारूप्य अर्थात सगुण साकार भगवान का रूप धारण कर लेना।
https://archive.org/details/narada-puran-gita-press-gorakhpur/page/n89/mode/2up
#Bhakti@advaitikreference
Advaitik references
नारद पुराण में बता रखा है कौन भक्ति सबसे उत्तम है और कौन राजसिक भक्ति है। सालोक्य मुक्ति अर्थात भगवान के लोक जाना जैसे गोलोक, शिव लोक, वैकुंठ लोक आदि। और सारूप्य अर्थात सगुण साकार भगवान का रूप धारण कर लेना। https://archive.org/details/narada-puran-gita…
Salokya mukti arthat bhagwan ke loka Jana jaise golok Shiva lok vaikuntha lok etc.
Aur sarupya arthat saguna sakar bhagwan ka rup dharan kar lena
Aur sarupya arthat saguna sakar bhagwan ka rup dharan kar lena
कई लोगों को लगता है कि सबके अंदर अलग-अलग आत्मा है लेकिन ऐसा नहीं है, हम सबके अंदर एक ही आत्मा है।
एक ही आत्मा है इस संसार में जो हर जगह है, वह शरीर के अंदर भी है और शरीर के बाहर भी। Living things में भी है और non-living things में भी।
मुझे पता है आप लोगों को मेरी बातों का इतनी आसानी से विश्वास नहीं होगा, इसलिए मैं शास्त्रों से कुछ references भेजता हूँ।
References में सर्व्यापी/सर्व्यापक/omnipresent शब्द use हुआ है, इसका अर्थ होता है जो हर जगह हो। नीचे references दिया गया है। गीता प्रेस गोरखपुर का translation है। Blue link पर click कीजिए।
Reference 1 (Vishnu Puran Gita Press)
Reference 2 (Bhagvat Gita Gita Press)
Reference 3 (Srimad Bhagwatam Gita Press)
Reference 4 (Chhandogya Upanishad Gita press)
Reference 5 (Bhagvat Gita Gita Press)
Reference 6 (Vishnu Puran Gita Press)
Reference 7 (Bhagvat Puran Gita Press)
तो अब सवाल आता है की आत्मा अगर हर जगह है तो किसी की मृत्यु होती है तो शरीर से क्या निकलता है? जानने के लिए यहां click करें।
एक ही आत्मा है इस संसार में जो हर जगह है, वह शरीर के अंदर भी है और शरीर के बाहर भी। Living things में भी है और non-living things में भी।
मुझे पता है आप लोगों को मेरी बातों का इतनी आसानी से विश्वास नहीं होगा, इसलिए मैं शास्त्रों से कुछ references भेजता हूँ।
References में सर्व्यापी/सर्व्यापक/omnipresent शब्द use हुआ है, इसका अर्थ होता है जो हर जगह हो। नीचे references दिया गया है। गीता प्रेस गोरखपुर का translation है। Blue link पर click कीजिए।
Reference 1 (Vishnu Puran Gita Press)
Reference 2 (Bhagvat Gita Gita Press)
Reference 3 (Srimad Bhagwatam Gita Press)
Reference 4 (Chhandogya Upanishad Gita press)
Reference 5 (Bhagvat Gita Gita Press)
Reference 6 (Vishnu Puran Gita Press)
Reference 7 (Bhagvat Puran Gita Press)
तो अब सवाल आता है की आत्मा अगर हर जगह है तो किसी की मृत्यु होती है तो शरीर से क्या निकलता है? जानने के लिए यहां click करें।
Vishnu puran 2.14.29-32 Gita Press
In Vishnu purana It's written in it that only one Atman(soul) exist in the world. And it is distributed like sky it is everywhere. And this Atman (soul) is Vishnu/krishna. Ekovyapi word is also mentioned. Eko means one.
Similar thing is written in gita 2.24. here it is written that soul is present everywhere. And also immovable is written in the same verse. Any thing which is all pervading and present everywhere is absolutely immovable
In Vishnu purana It's written in it that only one Atman(soul) exist in the world. And it is distributed like sky it is everywhere. And this Atman (soul) is Vishnu/krishna. Ekovyapi word is also mentioned. Eko means one.
Similar thing is written in gita 2.24. here it is written that soul is present everywhere. And also immovable is written in the same verse. Any thing which is all pervading and present everywhere is absolutely immovable
तो अब सवाल आता है कि आत्मा अगर omnipresent है, हर जगह है। तो जब कोई मरता है तो शरीर से क्या निकलता है? उसका उत्तर नीचे देता हूँ।
हमलोग का जो शरीर है वो 3 प्रकार के शरीर से बना है:
1. स्थूल शरीर
2. सूक्ष्म शरीर
3. कारण शरीर
तो मरने पर कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर जाता है, आत्मा कहीं नहीं जाती है। क्योंकि आत्मा तो हर जगह है और immovable है, ऐसा गीता में 2.24 में लिखा है और कई और शास्त्रों में लिखा है।
बस आत्मा consciousness डालती है शरीर में। आत्मा तो हर जगह है सर्वयापक (omnipresent) है लेकिन फिर भी उसे ऐसे क्यों लग रहा है कि वो बस एक particular शरीर तक limited है? इसका कारण है कारण शरीर। कारण शरीर अज्ञान (avidya) generate करता है जिसके वजह से आत्मा को लगता है कि वो बस यह शरीर है। तब उसे जीवात्मा कहते हैं। यानी आत्मा जब शरीर के साथ रहती है तब।
जीवात्मा = जीव (शरीर/living beings with individual consciousness) + आत्मा
हमारा वास्तविक स्वरुप जीव नहीं है बल्कि आत्मा है। जीव और आत्मा में फर्क है। आत्मा को जब देहाभिमान (आत्मा सर्वयापक है/ब्रह्म है लेकिन उसे लग रहा है की वो बस एक शरीर है इसे ही देहाभीमान कहते हैं) हो जाता है तब उसे जीव कहते हैं।
अब देखिये कुछ लोगो को कई प्रकार के प्रश्न आ सकते हैं की कई बार शास्त्र पढ़ने पर लगता है की आत्मा अनु है। size में छोटा है। तो अगर आप ध्यान से देखोगे तो वहा पर आत्मा शब्द श्लोक में नहीं होगा। वहाँ पर जीव, भूत, देहि इत्यादि शब्दों का प्रयोग हुआ होगा। जिसका अर्थ होता है जीवात्मा जो मैंने बताया की आत्मा को अविद्या के कारण जब ऐसा लगता है की वह बस यह शरीर है तो उसे जीव कहते हैं। अविद्या हटते ही आत्मा को परमात्मा कहा जाता है। आत्मा शब्द का अर्थ होता है self यानि अपना वास्तविक स्वरुप। जैसे आत्मसम्मान होता है न self respect. परमात्मा में भी आत्म शब्द ही है। उपनिषदों में इसलिए आत्म शब्द इस्तेमाल होता है बताने के लिए हमारा जो वास्तविक self है वो क्या है। हम वास्तव में कौन है? तो उपनिषद (वेद) कहता है,
अयम् आत्मा ब्रह्म (Mandukya Upanishad verse 2, Atharva Veda)
यानी हमारा वास्तविक स्वरूप ब्रह्म (God) है। हम ही ब्रह्म हैं। ब्रह्म ही सर्वयापक है उसे ही आत्मा कहते हैं।
For seeing reference click here.
#Explainers@advaitikreference
हमलोग का जो शरीर है वो 3 प्रकार के शरीर से बना है:
1. स्थूल शरीर
2. सूक्ष्म शरीर
3. कारण शरीर
तो मरने पर कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर जाता है, आत्मा कहीं नहीं जाती है। क्योंकि आत्मा तो हर जगह है और immovable है, ऐसा गीता में 2.24 में लिखा है और कई और शास्त्रों में लिखा है।
बस आत्मा consciousness डालती है शरीर में। आत्मा तो हर जगह है सर्वयापक (omnipresent) है लेकिन फिर भी उसे ऐसे क्यों लग रहा है कि वो बस एक particular शरीर तक limited है? इसका कारण है कारण शरीर। कारण शरीर अज्ञान (avidya) generate करता है जिसके वजह से आत्मा को लगता है कि वो बस यह शरीर है। तब उसे जीवात्मा कहते हैं। यानी आत्मा जब शरीर के साथ रहती है तब।
जीवात्मा = जीव (शरीर/living beings with individual consciousness) + आत्मा
हमारा वास्तविक स्वरुप जीव नहीं है बल्कि आत्मा है। जीव और आत्मा में फर्क है। आत्मा को जब देहाभिमान (आत्मा सर्वयापक है/ब्रह्म है लेकिन उसे लग रहा है की वो बस एक शरीर है इसे ही देहाभीमान कहते हैं) हो जाता है तब उसे जीव कहते हैं।
अब देखिये कुछ लोगो को कई प्रकार के प्रश्न आ सकते हैं की कई बार शास्त्र पढ़ने पर लगता है की आत्मा अनु है। size में छोटा है। तो अगर आप ध्यान से देखोगे तो वहा पर आत्मा शब्द श्लोक में नहीं होगा। वहाँ पर जीव, भूत, देहि इत्यादि शब्दों का प्रयोग हुआ होगा। जिसका अर्थ होता है जीवात्मा जो मैंने बताया की आत्मा को अविद्या के कारण जब ऐसा लगता है की वह बस यह शरीर है तो उसे जीव कहते हैं। अविद्या हटते ही आत्मा को परमात्मा कहा जाता है। आत्मा शब्द का अर्थ होता है self यानि अपना वास्तविक स्वरुप। जैसे आत्मसम्मान होता है न self respect. परमात्मा में भी आत्म शब्द ही है। उपनिषदों में इसलिए आत्म शब्द इस्तेमाल होता है बताने के लिए हमारा जो वास्तविक self है वो क्या है। हम वास्तव में कौन है? तो उपनिषद (वेद) कहता है,
अयम् आत्मा ब्रह्म (Mandukya Upanishad verse 2, Atharva Veda)
यानी हमारा वास्तविक स्वरूप ब्रह्म (God) है। हम ही ब्रह्म हैं। ब्रह्म ही सर्वयापक है उसे ही आत्मा कहते हैं।
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Forwarded from Dharma Insights
अब मैं भगवान् विष्णुके भक्तोंका लक्षण
बतलाता हूँ-
जिनका चित्त अत्यन्त शान्त है, जो सबके प्रति कोमल भाव रखते हैं, जिन्होंने स्वेच्छानुसार अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी दूसरोंसे द्रोह करनेकी इच्छा नहीं रखते, जिनका चित्त दयासे द्रवीभूत होता है, जो चोरी और हिंसासे सदा ही मुख मोड़े रहते हैं,
सद्गुणोंके संग्रह तथा दूसरोंके कार्यसाधनमें जो प्रसन्नतापूर्वक संलग्न रहते हैं, सदाचारसे जिनका जीवन सदा उज्ज्वल (निष्कलंक) बना रहता है, जो दूसरोंके उत्सवको अपना उत्सव मानते हैं, सब प्राणियोंके भीतर भगवान् वासुदेवको विराजमान देखकर कभी किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते,
दीनोंपर दया करना जिनका स्वभाव बन गया है और जो सदा परहितसाधनकी इच्छा रखते हैं, अविवेकी मनुष्योंका विषयोंमें जैसा प्रेम होता है, उससे सौ कोटि गुनी अधिक प्रीतिका विस्तार वे भगवान् श्रीहरिके प्रति करते हैं।
नित्य कर्तव्यबुद्धिसे विष्णुस्वरूप शंकर आदि देवताओंका भक्तिपूर्वक पूजन और ध्यान करते हैं, पितरोंमें भगवान् विष्णुकी ही बुद्धि रखते हैं, भगवान् विष्णुसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखते। समष्टि और व्यष्टि सब भगवान्के ही स्वरूप हैं, भगवान् जगत्से भिन्न होकर भी भिन्न नहीं हैं,
'हे भगवान् जगन्नाथ! मैं आपका दास हूँ, आपके स्वरूपमें भी मैं हूँ, आपसे पृथक् कदापि नहीं हूँ, जब आप भगवान् विष्णु अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं, तब सेव्य अथवा सेवक कोई भी आपसे भिन्न नहीं है।'इस भावनासे सदा सावधान रहकर जो ब्रह्माजीके द्वारा वन्दनीय युगल चरणारविन्दोंवाले श्रीहरिको सदा प्रणाम करते, उनके नामोंका कीर्तन करते, उन्हींके भजनमें तत्पर रहते और संसारके लोगोंके समीप अपनेको तृणके समान तुच्छ मानकर विनयपूर्ण बर्ताव करते हैं।
जगत्में सब लोगोंका उपकार करनेके लिये जो कुशलताका परिचय देते हैं, दूसरोंके कुशल-क्षेमको अपना ही मानते हैं, दूसरोंका तिरस्कार देखकर उनके प्रति दयासे द्रवीभूत हो जाते हैं तथा सबके प्रति मनमें कल्याणकी भावना करते हैं, वे ही विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो पत्थर, परधन और मिट्टीके ढेलेमें, परायी स्त्री और कूटशाल्मली नामक नरकमें, मित्र, शत्रु, भाई तथा बन्धुवर्गमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, वे ही निश्चितरूपसे विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं।
(संक्षिप्त स्कन्दपुराण, गीता प्रेस, वैष्णवखण्ड, पृष्ठ ३४२)
बतलाता हूँ-
जिनका चित्त अत्यन्त शान्त है, जो सबके प्रति कोमल भाव रखते हैं, जिन्होंने स्वेच्छानुसार अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी दूसरोंसे द्रोह करनेकी इच्छा नहीं रखते, जिनका चित्त दयासे द्रवीभूत होता है, जो चोरी और हिंसासे सदा ही मुख मोड़े रहते हैं,
सद्गुणोंके संग्रह तथा दूसरोंके कार्यसाधनमें जो प्रसन्नतापूर्वक संलग्न रहते हैं, सदाचारसे जिनका जीवन सदा उज्ज्वल (निष्कलंक) बना रहता है, जो दूसरोंके उत्सवको अपना उत्सव मानते हैं, सब प्राणियोंके भीतर भगवान् वासुदेवको विराजमान देखकर कभी किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते,
दीनोंपर दया करना जिनका स्वभाव बन गया है और जो सदा परहितसाधनकी इच्छा रखते हैं, अविवेकी मनुष्योंका विषयोंमें जैसा प्रेम होता है, उससे सौ कोटि गुनी अधिक प्रीतिका विस्तार वे भगवान् श्रीहरिके प्रति करते हैं।
नित्य कर्तव्यबुद्धिसे विष्णुस्वरूप शंकर आदि देवताओंका भक्तिपूर्वक पूजन और ध्यान करते हैं, पितरोंमें भगवान् विष्णुकी ही बुद्धि रखते हैं, भगवान् विष्णुसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखते। समष्टि और व्यष्टि सब भगवान्के ही स्वरूप हैं, भगवान् जगत्से भिन्न होकर भी भिन्न नहीं हैं,
'हे भगवान् जगन्नाथ! मैं आपका दास हूँ, आपके स्वरूपमें भी मैं हूँ, आपसे पृथक् कदापि नहीं हूँ, जब आप भगवान् विष्णु अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं, तब सेव्य अथवा सेवक कोई भी आपसे भिन्न नहीं है।'इस भावनासे सदा सावधान रहकर जो ब्रह्माजीके द्वारा वन्दनीय युगल चरणारविन्दोंवाले श्रीहरिको सदा प्रणाम करते, उनके नामोंका कीर्तन करते, उन्हींके भजनमें तत्पर रहते और संसारके लोगोंके समीप अपनेको तृणके समान तुच्छ मानकर विनयपूर्ण बर्ताव करते हैं।
जगत्में सब लोगोंका उपकार करनेके लिये जो कुशलताका परिचय देते हैं, दूसरोंके कुशल-क्षेमको अपना ही मानते हैं, दूसरोंका तिरस्कार देखकर उनके प्रति दयासे द्रवीभूत हो जाते हैं तथा सबके प्रति मनमें कल्याणकी भावना करते हैं, वे ही विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो पत्थर, परधन और मिट्टीके ढेलेमें, परायी स्त्री और कूटशाल्मली नामक नरकमें, मित्र, शत्रु, भाई तथा बन्धुवर्गमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, वे ही निश्चितरूपसे विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं।
(संक्षिप्त स्कन्दपुराण, गीता प्रेस, वैष्णवखण्ड, पृष्ठ ३४२)
