(Part 1/2)
Vishnu puran 1.19.83-86 Gita press.
Prahlad ji Vishnu ji ke bhakt unko bhi advait realisation ho gya. Prahlad ji hi bol rhe hain yaha par. Ye vahi Prahlad hain jinka aapne story bachpan me suna hoga Hiranyakasyap aur Prahlad wala. Jinke liye Bhagwan Vishnu ne Narsingh avatar dharan kiya tha.
#Bhakti@advaitikreference
Part 2 👇
Vishnu puran 1.19.83-86 Gita press.
Prahlad ji Vishnu ji ke bhakt unko bhi advait realisation ho gya. Prahlad ji hi bol rhe hain yaha par. Ye vahi Prahlad hain jinka aapne story bachpan me suna hoga Hiranyakasyap aur Prahlad wala. Jinke liye Bhagwan Vishnu ne Narsingh avatar dharan kiya tha.
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(Part 2/2)
Vishnu puran 1.20.1-2
Prahlad ji ko bhi advait realisation ho gya.
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Vishnu puran 1.20.1-2
Prahlad ji ko bhi advait realisation ho gya.
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Forwarded from Shastra Manthan 🕉 ((योगी) सर्वोत्तम)
ऐतरेयोपनिषद 1.1
अद्वैतोपदेश
अर्थात:-
पहले यह [जगत्] एकमात्र आत्मा ही था, उसके सिवा और कोई सक्रिय वस्तु नहीं थी। उसने यह सोचा कि 'लोकोंकी रचना करूँ' ॥१॥
विशेषटिप्पणी:-
कुछ लोग दो,तीन तत्वो की बात करते है। अब दो, तीन तत्व होते तो, यहा उना निरूपण कीया गया होता। यहा पर ऐसा नही कहा।
अब भगवान कृष्ण गीता के सप्तमोऽध्याय में १९वे श्लोक में कहते है।
"वासुदेवः सर्वमिति" अर्थात वासुदेव ही सब कुछ है। (कृष्ण यहा स्वयं को परम के रूप में बता रहे है।)
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अद्वैतोपदेश
ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किंचन
मिषत । स ईक्षत् लोकान्नु सृजा इति ॥१॥
अर्थात:-
पहले यह [जगत्] एकमात्र आत्मा ही था, उसके सिवा और कोई सक्रिय वस्तु नहीं थी। उसने यह सोचा कि 'लोकोंकी रचना करूँ' ॥१॥
विशेषटिप्पणी:-
कुछ लोग दो,तीन तत्वो की बात करते है। अब दो, तीन तत्व होते तो, यहा उना निरूपण कीया गया होता। यहा पर ऐसा नही कहा।
अब भगवान कृष्ण गीता के सप्तमोऽध्याय में १९वे श्लोक में कहते है।
"वासुदेवः सर्वमिति" अर्थात वासुदेव ही सब कुछ है। (कृष्ण यहा स्वयं को परम के रूप में बता रहे है।)
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Srimad Bhagvatam (Bhagvat Puran) 10.47.28-30 gita press
यहाँ भी अद्वैत आ गया। भगवान खुद को ही रचते हैं, खुद को ही पालते हैं और खुद को ही समेट लेते हैं।
भागवत पुराण में एक कथा है। जब श्री कृष्ण वृंदावन छोड़कर द्वारका चले गए थे, तब गोपियाँ उनकी याद में रो रही थीं। तो कृष्ण ने उद्धव को अपना एक संदेश भिजवाने के लिए वृंदावन भेजा।
कृष्ण का संदेश यह था कि तुम लोग रो क्यों रही हो? मैं तुमसे अलग थोड़े ही हूँ कि तुम लोग मेरे लिए रो रही हो। मैं तुम सबकी आत्मा हूँ (गीता 10.20)। मैं ही सभी के रूप में हूँ, और सच पूछो तो मैं ही उन सबके रूप में प्रकट हो रहा हूँ। मैं इस संसार में खुद को ही रचता हूँ, खुद को ही पलता हूँ और खुद को ही समेट लेता हूँ। तो तुम्हारा और मेरा वियोग कैसा?
आगे के श्लोक में फिर लिखा है की
कृष्ण का यह संदेश सुनकर गोपियाँ रोना बंद कर देती हैं और उद्धव का आदर-सत्कार करने लगती हैं।
यहाँ भी अद्वैत आ गया। भगवान खुद को ही रचते हैं, खुद को ही पालते हैं और खुद को ही समेट लेते हैं।
भागवत पुराण में एक कथा है। जब श्री कृष्ण वृंदावन छोड़कर द्वारका चले गए थे, तब गोपियाँ उनकी याद में रो रही थीं। तो कृष्ण ने उद्धव को अपना एक संदेश भिजवाने के लिए वृंदावन भेजा।
कृष्ण का संदेश यह था कि तुम लोग रो क्यों रही हो? मैं तुमसे अलग थोड़े ही हूँ कि तुम लोग मेरे लिए रो रही हो। मैं तुम सबकी आत्मा हूँ (गीता 10.20)। मैं ही सभी के रूप में हूँ, और सच पूछो तो मैं ही उन सबके रूप में प्रकट हो रहा हूँ। मैं इस संसार में खुद को ही रचता हूँ, खुद को ही पलता हूँ और खुद को ही समेट लेता हूँ। तो तुम्हारा और मेरा वियोग कैसा?
आगे के श्लोक में फिर लिखा है की
कृष्ण का यह संदेश सुनकर गोपियाँ रोना बंद कर देती हैं और उद्धव का आदर-सत्कार करने लगती हैं।
Advaitik references
Srimad bhagvatam (bhagvat puran)12.13.12. Gita Press Bhagvat puran likhne ka uddeshya kya hai vo bataya ja rha h.
Kaivalya Moksha means Advaitik moksha
नारद पुराण में बता रखा है कौन भक्ति सबसे उत्तम है और कौन राजसिक भक्ति है।
सालोक्य मुक्ति अर्थात भगवान के लोक जाना जैसे गोलोक, शिव लोक, वैकुंठ लोक आदि।
और सारूप्य अर्थात सगुण साकार भगवान का रूप धारण कर लेना।
https://archive.org/details/narada-puran-gita-press-gorakhpur/page/n89/mode/2up
#Bhakti@advaitikreference
सालोक्य मुक्ति अर्थात भगवान के लोक जाना जैसे गोलोक, शिव लोक, वैकुंठ लोक आदि।
और सारूप्य अर्थात सगुण साकार भगवान का रूप धारण कर लेना।
https://archive.org/details/narada-puran-gita-press-gorakhpur/page/n89/mode/2up
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Advaitik references
नारद पुराण में बता रखा है कौन भक्ति सबसे उत्तम है और कौन राजसिक भक्ति है। सालोक्य मुक्ति अर्थात भगवान के लोक जाना जैसे गोलोक, शिव लोक, वैकुंठ लोक आदि। और सारूप्य अर्थात सगुण साकार भगवान का रूप धारण कर लेना। https://archive.org/details/narada-puran-gita…
Salokya mukti arthat bhagwan ke loka Jana jaise golok Shiva lok vaikuntha lok etc.
Aur sarupya arthat saguna sakar bhagwan ka rup dharan kar lena
Aur sarupya arthat saguna sakar bhagwan ka rup dharan kar lena