The University Grants Commission (UGC) has approved the list of journals for the “CARE Reference List of Quality Journals”.............
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The Consortium for Academic & Research Ethics (CARE) is tasked to scrutinise & then compile a list of journals for social sciences, humanities, language, arts, culture, Indian Knowledge system etc.
Consortium for Academic & Research Ethics (CARE):::::::
UGC had established Consortium for Academic and Research Ethics (CARE) to prepare a “CARE Reference List of Quality Journals”.
The Consortium would compile a list of “credible quality journals” which would ultimately replace UGC’s own list of journals.
The Consortium would be headed by headed by the UGC Vice Chairman and would consist of government bodies and statutory councils.
Why the UGC has formed the Consortium?
A research paper led by Professor Bhushan Patwardhan had found that 88% of 1,009 journals recommended by universities and included in the white list were dubious and only 112 journals met the criteria set by UGC to be included in the list.
This high instance of the dubious journals had adversely impacted the image of UGC and as well as India at the international stage.
Hence the UGC had announced the setting up of Consortium for Academic and Research Ethics to scrutinise and then compile a list of quality journals.
With Consortium for Academic and Research Ethics (CARE), UGC which is the principal funding agency for the universities aims to effectively discharge the responsibility of setting up academic standards and ensuring that they are followed.
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The Consortium for Academic & Research Ethics (CARE) is tasked to scrutinise & then compile a list of journals for social sciences, humanities, language, arts, culture, Indian Knowledge system etc.
Consortium for Academic & Research Ethics (CARE):::::::
UGC had established Consortium for Academic and Research Ethics (CARE) to prepare a “CARE Reference List of Quality Journals”.
The Consortium would compile a list of “credible quality journals” which would ultimately replace UGC’s own list of journals.
The Consortium would be headed by headed by the UGC Vice Chairman and would consist of government bodies and statutory councils.
Why the UGC has formed the Consortium?
A research paper led by Professor Bhushan Patwardhan had found that 88% of 1,009 journals recommended by universities and included in the white list were dubious and only 112 journals met the criteria set by UGC to be included in the list.
This high instance of the dubious journals had adversely impacted the image of UGC and as well as India at the international stage.
Hence the UGC had announced the setting up of Consortium for Academic and Research Ethics to scrutinise and then compile a list of quality journals.
With Consortium for Academic and Research Ethics (CARE), UGC which is the principal funding agency for the universities aims to effectively discharge the responsibility of setting up academic standards and ensuring that they are followed.
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ओज़ोन अवक्षय...........(पर्यावरण-1)
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समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है।
सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है।
क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।
1970 के दशक के बाद से यह माना जाता है की ओज़ोन ह्रास (अवक्षय) दो अलग लेकिन संबन्धित घटनाओं का वर्णन करता है।
एक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी के समताप मण्डल (ओज़ोन परत) मे ओज़ोन की कुल मात्र मे प्रति दशक 4% की दर से लगातार गिरावट आ रही है। उत्तरार्द्ध घटना को ओज़ोन छिद्र के रूप मे जाना जाता है।
समतापमंडलीय ओजोन परत परबैगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है जिससे पृथ्वी पर आने वाली परबैगनी किरणों की मात्र में कमी आ जाती है। यह ओजोन परत मानव की मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलेनोमा इत्यादि रोगों से रक्षा करती है।
इन परबैगनी किरणों के संपर्क में आने से मुनष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है । इन किरणों से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी प्रभावित होती है तथा जीवित प्राणी के न्युक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते है।
सीएफ़सी और अन्य सायहक पदार्थों को ओज़ोन अवक्षय पदार्थ (ओडीएस) के रूप मे माना जाता है। चूँकि ओज़ोन परत परबैगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट किरण) की सबसे हानिकारक यूवीबी तरंगधैर्य (280-315) को पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करने से रोकती है, ओज़ोन परत मे प्रत्यक्ष (देखी गयी) और अनुमानित रूप से आयी कमी पूरे विश्व मे चिंता का विषय बना हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया है जो सीएफ़सी, हैलोन, और अन्य ओज़ोन अवक्षय रसायनों जैसे कि कार्बन टेट्राक्लोराइड और ट्राइक्लोरो ईथेन के उत्पादन पर रोक लगती है।
सीएफ़सी का आविष्कार थॉमस मिग्ले जूनियर के द्वारा 1920 मे किया गया था।
1970 से पहले इनका प्रयोग वातानुकूलन (एयर कंडीस्निंग) और प्रशीतलन इकाइयों मे एरोसाल स्प्रे प्रणोदको के रूप मे और संवेदनशील इलेक्ट्रोनिक उपकरणो की सफाई प्रक्रिया मे किया जाता था।
ये कुछ रसायनिक क्रियाओं के गौड़ उत्पाद के रूप मे भी होते थे। इन यौगिको के लिए कभी किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक श्रोतों की पहचान नहीं की गयी है – वातावरण मे इनकी उपस्थिती पूरी तरह से मानव विनिर्माण के कारण है।
जैसा की ऊपर दिया गया है, जब इस तरह के ओज़ोन अवक्षय रसायन समताप मण्डल मे पहुचते है, वे क्लोरिन परमाणुओं को उत्सर्जित करने के लिए पराबैगनी किरणों के द्वारा पृथक कर दिये जाते है।
क्लोरिन परमाणु एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और प्रत्येक परमाणु समताप मण्डल से हटा दिये जाने से पूर्व प्रति हजार मे से दस ओज़ोन अणुओ को कम सकता है। सीएफ़सी अणुओं की लंबी आयु को देखते हुये, सुधार (ओजोन क्षरण के) मे लगने वाले समय को दशकों मे मापा जाता है।
ऐसी गणना की गयी है कि एक सीएफ़सी अणु जमीन कि सतह से वायुमंडल की ऊपरी सतह तक जाने के लिए लगभग पाँच से सात साल का औसत समय लेता है और ऐसा कह सकते है कि ये वहाँ पर लगभग एक शताब्दी तक रह सकते है और इस अवधि के दौरान एक सौ हजार ओज़ोन अणुओं कों नष्ट कर सकते है।
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समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है।
सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है।
क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।
1970 के दशक के बाद से यह माना जाता है की ओज़ोन ह्रास (अवक्षय) दो अलग लेकिन संबन्धित घटनाओं का वर्णन करता है।
एक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी के समताप मण्डल (ओज़ोन परत) मे ओज़ोन की कुल मात्र मे प्रति दशक 4% की दर से लगातार गिरावट आ रही है। उत्तरार्द्ध घटना को ओज़ोन छिद्र के रूप मे जाना जाता है।
समतापमंडलीय ओजोन परत परबैगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है जिससे पृथ्वी पर आने वाली परबैगनी किरणों की मात्र में कमी आ जाती है। यह ओजोन परत मानव की मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलेनोमा इत्यादि रोगों से रक्षा करती है।
इन परबैगनी किरणों के संपर्क में आने से मुनष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है । इन किरणों से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी प्रभावित होती है तथा जीवित प्राणी के न्युक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते है।
सीएफ़सी और अन्य सायहक पदार्थों को ओज़ोन अवक्षय पदार्थ (ओडीएस) के रूप मे माना जाता है। चूँकि ओज़ोन परत परबैगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट किरण) की सबसे हानिकारक यूवीबी तरंगधैर्य (280-315) को पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करने से रोकती है, ओज़ोन परत मे प्रत्यक्ष (देखी गयी) और अनुमानित रूप से आयी कमी पूरे विश्व मे चिंता का विषय बना हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया है जो सीएफ़सी, हैलोन, और अन्य ओज़ोन अवक्षय रसायनों जैसे कि कार्बन टेट्राक्लोराइड और ट्राइक्लोरो ईथेन के उत्पादन पर रोक लगती है।
सीएफ़सी का आविष्कार थॉमस मिग्ले जूनियर के द्वारा 1920 मे किया गया था।
1970 से पहले इनका प्रयोग वातानुकूलन (एयर कंडीस्निंग) और प्रशीतलन इकाइयों मे एरोसाल स्प्रे प्रणोदको के रूप मे और संवेदनशील इलेक्ट्रोनिक उपकरणो की सफाई प्रक्रिया मे किया जाता था।
ये कुछ रसायनिक क्रियाओं के गौड़ उत्पाद के रूप मे भी होते थे। इन यौगिको के लिए कभी किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक श्रोतों की पहचान नहीं की गयी है – वातावरण मे इनकी उपस्थिती पूरी तरह से मानव विनिर्माण के कारण है।
जैसा की ऊपर दिया गया है, जब इस तरह के ओज़ोन अवक्षय रसायन समताप मण्डल मे पहुचते है, वे क्लोरिन परमाणुओं को उत्सर्जित करने के लिए पराबैगनी किरणों के द्वारा पृथक कर दिये जाते है।
क्लोरिन परमाणु एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और प्रत्येक परमाणु समताप मण्डल से हटा दिये जाने से पूर्व प्रति हजार मे से दस ओज़ोन अणुओ को कम सकता है। सीएफ़सी अणुओं की लंबी आयु को देखते हुये, सुधार (ओजोन क्षरण के) मे लगने वाले समय को दशकों मे मापा जाता है।
ऐसी गणना की गयी है कि एक सीएफ़सी अणु जमीन कि सतह से वायुमंडल की ऊपरी सतह तक जाने के लिए लगभग पाँच से सात साल का औसत समय लेता है और ऐसा कह सकते है कि ये वहाँ पर लगभग एक शताब्दी तक रह सकते है और इस अवधि के दौरान एक सौ हजार ओज़ोन अणुओं कों नष्ट कर सकते है।
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ओज़ोन अवक्षय...........(पर्यावरण-2)
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अंटार्कटिक ओज़ोन छिद्र अंटार्कटिक समताप मण्डल का क्षेत्र है जिसमे हाल ही के ओज़ोन स्तर, 1975 के पहले के परिमाण मे कम से कम 33 % तक गिर गए थे।
सितंबर से लेकर दिसम्बर के प्रारम्भ तक अंटार्कटिक बसंत के दौरान ओज़ोन छिद्र बनते है, जैसे ही प्रबल पश्चिमी हवाये महाद्वीप के चरो ओर बहने लगती है और और एक वायुमंडलीय घेरे का निर्माण करती है।
इस ध्रुवीय भँवर के भीतर निचली समताप मण्डलीय ओज़ोन का 50% से अधिक अंटार्कटिक बसंत के दौरान नष्ट हो जाता है।
जैसा कि ऊपर उल्लिखित है, ओज़ोन अवक्षय का प्रमुख कारण क्लोरिन युक्त गैसों (मुख्य रूप से सीएफ़सी और संबन्धित हैलोकार्बन) की उपस्थिती है।
परबैगनी किरणों की उपस्थिती मे, ये गैसे अपघटित हो कर क्लोरिन अणुओ कों मुक्त करती है, जो ओज़ोन के विनाश के लिए उत्प्रेरित करती है।
क्लोरिन, उत्प्रेरित ओज़ोन अवक्षय गैसीय अवस्था मे हो सकता है, लेकिन ध्रुवीय समताप मंडलीय बादलो की उपस्थिती मे इसमे नाटकीय रूप से वृद्धि होती है।
ये ध्रुवीय समताप मंडलीय बादल ( पीएससी ) भीषण ठंढ मे सर्दियों के दौरान बनते है। ध्रुवीय सर्दिया 3 महीने तक बिना सौर्य विकिरण (धूप) के अंधकारमय होती है।
सूर्य के प्रकाश मे कमी की वजह से तापमान मे गिरावट और ध्रुवीय भंवर के जाल और हवा को ठंढा करती है। और जब बसंत आता है तब सूर्य का प्रकाश एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और रसायनिक प्रतिक्रिया मे सहायता करता है जिसके परिणाम स्वरूप ओज़ोन छिद्र का निर्माण होता है।
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अंटार्कटिक ओज़ोन छिद्र अंटार्कटिक समताप मण्डल का क्षेत्र है जिसमे हाल ही के ओज़ोन स्तर, 1975 के पहले के परिमाण मे कम से कम 33 % तक गिर गए थे।
सितंबर से लेकर दिसम्बर के प्रारम्भ तक अंटार्कटिक बसंत के दौरान ओज़ोन छिद्र बनते है, जैसे ही प्रबल पश्चिमी हवाये महाद्वीप के चरो ओर बहने लगती है और और एक वायुमंडलीय घेरे का निर्माण करती है।
इस ध्रुवीय भँवर के भीतर निचली समताप मण्डलीय ओज़ोन का 50% से अधिक अंटार्कटिक बसंत के दौरान नष्ट हो जाता है।
जैसा कि ऊपर उल्लिखित है, ओज़ोन अवक्षय का प्रमुख कारण क्लोरिन युक्त गैसों (मुख्य रूप से सीएफ़सी और संबन्धित हैलोकार्बन) की उपस्थिती है।
परबैगनी किरणों की उपस्थिती मे, ये गैसे अपघटित हो कर क्लोरिन अणुओ कों मुक्त करती है, जो ओज़ोन के विनाश के लिए उत्प्रेरित करती है।
क्लोरिन, उत्प्रेरित ओज़ोन अवक्षय गैसीय अवस्था मे हो सकता है, लेकिन ध्रुवीय समताप मंडलीय बादलो की उपस्थिती मे इसमे नाटकीय रूप से वृद्धि होती है।
ये ध्रुवीय समताप मंडलीय बादल ( पीएससी ) भीषण ठंढ मे सर्दियों के दौरान बनते है। ध्रुवीय सर्दिया 3 महीने तक बिना सौर्य विकिरण (धूप) के अंधकारमय होती है।
सूर्य के प्रकाश मे कमी की वजह से तापमान मे गिरावट और ध्रुवीय भंवर के जाल और हवा को ठंढा करती है। और जब बसंत आता है तब सूर्य का प्रकाश एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और रसायनिक प्रतिक्रिया मे सहायता करता है जिसके परिणाम स्वरूप ओज़ोन छिद्र का निर्माण होता है।
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ओज़ोन परत अवक्षय के परिणाम (पर्यावरण)
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• परबैगनी किरणों की पृथ्वी पर वृद्धि
• बेसल और पपड़ीदार कोशिका कैंसर – मानव मे कैंसर का एक सबसे सामान्य रूप।
• घातक मेलानोमा – अन्य प्रकार का त्वचा कैंसर।
• कोर्टिकल मोतियाबिंद।
• परबैगनी किरणों की वृद्धि से फसलों के प्रभावित होने की संभावना है। पौधो के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण विभिन्न प्रजातियों मे जैसे कि चावल साइनोबैक्टीरिया पर निर्भर रहता है जो नाइट्रोजन के धारण के लिए इसकी जड़ो मे रहता है।
साइनोबैक्टीरिया परबैगनी किरणों के प्रति संवेदनशील होते है और इसकी वृद्धि के परिणाम स्वरूप प्रभावित हो सकते है।
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• परबैगनी किरणों की पृथ्वी पर वृद्धि
• बेसल और पपड़ीदार कोशिका कैंसर – मानव मे कैंसर का एक सबसे सामान्य रूप।
• घातक मेलानोमा – अन्य प्रकार का त्वचा कैंसर।
• कोर्टिकल मोतियाबिंद।
• परबैगनी किरणों की वृद्धि से फसलों के प्रभावित होने की संभावना है। पौधो के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण विभिन्न प्रजातियों मे जैसे कि चावल साइनोबैक्टीरिया पर निर्भर रहता है जो नाइट्रोजन के धारण के लिए इसकी जड़ो मे रहता है।
साइनोबैक्टीरिया परबैगनी किरणों के प्रति संवेदनशील होते है और इसकी वृद्धि के परिणाम स्वरूप प्रभावित हो सकते है।
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मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल........(पर्यावरण)
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मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे ओजोन क्षरण को रोकने KE LIYE बनाया गया है।
इस प्रोटोकॉल के माध्यम से उन पदार्थों के उत्पादन को कम करना है जो कि ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार है।
इस संधि पर 16 सितंबर, 1987 को हस्ताक्षर किए गये थे और यह 1 जनवरी, 1989 से यह प्रभावी हो गयी, जिसकी पहली बैठक मई 1989 में हेलसिंकी में हुयी थी।
तब से अभी तक इसमें सात संशोधन 1990 (लंदन), 1991 (नैरोबी), 1992 (कोपेनहेगन), 1993 (बैंकाक), 1995 (वियना), 1997 (मॉन्ट्रियल), और 1999 (बीजिंग) हो चुके हैं।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन क्षयकारी पदार्थों या तत्वों के कुल वैश्विक उत्पादन और खपत की गिरावट में उल्लेखनीय योगदान दिया है जिसका प्रय़ोग विश्व भर में कृषि, उपभोक्ता और अद्यौगिक क्षेत्रों में प्रयोग किया गया।
2010 के बाद से, प्रोटोकॉल के एजेंडे का ध्यान हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) को कम करने पर केंद्रित है जिनका मुख्य रूप से ठंडे और प्रशीतन अनुप्रयोगों और फोम उत्पादों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है।
ओजोन लाभ के अतिरिक्त, HCFCs का फेज आउट एजेंडा दृढ़ता से जलवायु शमन और ऊर्जा दक्षता पर जोर देता है। जलवायु लाभ कम या बिना ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता के साथ पदार्थों का उपयोग करके प्राप्त किया जा सकता है और निश्चित प्रौद्योगिकी उन्नयन के माध्यम से बड़े पैमाने पर ऊर्जा दक्षता में सुधार प्राप्त किया जा सकता है।
रणनीति :::::::
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विश्व बैंक की रणनीति, परियोजना की गतिविधियों मेंओजोन और जलवायु कार्यसूची को बेहतर तरीके सेपरिलक्षित करके एचसीएफसी चरण के लिए पर्यावरणीयलाभ को अधिकतम करने पर केंद्रित है।
बैंक द्वारा वित्तपोषित ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम में एचसीएफसीका लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से बेहतर कार्य करना है जबकिगैर-एचसीएफसी उपकरणों की बढ़ती मांग तथा वैकल्पिकतकनीकों के संभावित जलवायु प्रभाव के बारे मेंउपयोगकर्ताओं को जानकारी देना है।
परियोजनाओं में प्रौद्योगिकी के उपयोग का प्रदर्शन करने के लिए रणनीति निर्माताओं और सेवा क्षेत्र के साथ सीधे काम करने का भी समर्थन करती है जिससे प्रर्दशन में सुधार, कम ऊर्जा की खपत को सुनिश्चित करने में मदद मिलती है जबकि इससे जलवायु को लाभ मिलता है।
विशेष रूप से कुछ विकासशील देशों में, वाणिज्यिक उपलब्धता और वैकल्पिक समाधान की लागत का मुद्दा इसे HCFCs को कम करना कुछ निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकता है।
विश्व बैंक के द्वारा कार्यक्रमों और प्रस्तावों की एक श्रृखंला के अंतर्गत तकनीकी सहायता के माध्यम से तकनीकी दक्षता को बढ़ावा देना है साथ ही इन उपायों को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की जरुरत पर भी बल देने पर बल दिया गया है ।
विश्व बैंक की एक तीन साल की शहरी ऊर्जा कुशल परिवर्तन पहल, शहर प्रमुखों से शहर में ऊर्जा दक्षता के नियोजन को सुद्रण करने में मदद करती है यह योजना इमारतों तथा लक्षित शहरी क्षेत्रों को डिजाइन करने में सहायता उपलब्ध करती है।
इस प्रोटोकॉल के समर्थकों को इस बात का भरोसा है कि अगर इस अन्तर्राष्टीय समझौते का पालन किया जाता है तो 2050 तक ओजोन परत फिर से हासिल हो सकती है। इसके व्यापक तरीके से अपनाने और लागू करने के कारण इसे असाधारण अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की एक मिशाल के रूप में मान्यता मिल चुकी है ।
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व प्रमुख कोफी अन्नान ने कहा "शायद यह आज की तारीख में इकलौता सबसे सफल अन्तर्राष्ट्रीय समझौते का मॉन्ट्रिलय प्रोटोकॉल है"।
इस संधि को 197 देशों द्वारा समर्थन दिया गया है । यूरोपीय संघ ने इस प्रोटोकॉल को संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण संधि का दर्जा दिया है।
वियना संधि (कन्वेंशन) :::::::::::::::
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यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक बहुपक्षीय पर्यावरण समझौता है। इस पर 1985 के वियना सम्मेलन में सहमति बनी और 1988 में यह लागू किया गया।
196 देशों (सभी संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के साथ- साथ ही होली सी, नियू और कुक आइलैंड्स) के साथ-साथ यूरोपीय संघों द्वारा इसे मंजूर किया जा चुका है।
वियना संधि, ओजोन परत की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीयप्रयासों के लिए एक ढांचे के रूप में कार्य करता है।
हालांकि, इसमें सीएफसी के इस्तेमाल के लिए कानूनी रूप सेबाध्यकारी न्यूनता के लक्ष्य शामिल नहीं हैं, ओजोनरिक्तीकरण का मुख्य कारण रासायनिक कारक हैं।
उपरोक्तबातें मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में रखी गयीं हैं।
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मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे ओजोन क्षरण को रोकने KE LIYE बनाया गया है।
इस प्रोटोकॉल के माध्यम से उन पदार्थों के उत्पादन को कम करना है जो कि ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार है।
इस संधि पर 16 सितंबर, 1987 को हस्ताक्षर किए गये थे और यह 1 जनवरी, 1989 से यह प्रभावी हो गयी, जिसकी पहली बैठक मई 1989 में हेलसिंकी में हुयी थी।
तब से अभी तक इसमें सात संशोधन 1990 (लंदन), 1991 (नैरोबी), 1992 (कोपेनहेगन), 1993 (बैंकाक), 1995 (वियना), 1997 (मॉन्ट्रियल), और 1999 (बीजिंग) हो चुके हैं।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन क्षयकारी पदार्थों या तत्वों के कुल वैश्विक उत्पादन और खपत की गिरावट में उल्लेखनीय योगदान दिया है जिसका प्रय़ोग विश्व भर में कृषि, उपभोक्ता और अद्यौगिक क्षेत्रों में प्रयोग किया गया।
2010 के बाद से, प्रोटोकॉल के एजेंडे का ध्यान हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) को कम करने पर केंद्रित है जिनका मुख्य रूप से ठंडे और प्रशीतन अनुप्रयोगों और फोम उत्पादों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है।
ओजोन लाभ के अतिरिक्त, HCFCs का फेज आउट एजेंडा दृढ़ता से जलवायु शमन और ऊर्जा दक्षता पर जोर देता है। जलवायु लाभ कम या बिना ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता के साथ पदार्थों का उपयोग करके प्राप्त किया जा सकता है और निश्चित प्रौद्योगिकी उन्नयन के माध्यम से बड़े पैमाने पर ऊर्जा दक्षता में सुधार प्राप्त किया जा सकता है।
रणनीति :::::::
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विश्व बैंक की रणनीति, परियोजना की गतिविधियों मेंओजोन और जलवायु कार्यसूची को बेहतर तरीके सेपरिलक्षित करके एचसीएफसी चरण के लिए पर्यावरणीयलाभ को अधिकतम करने पर केंद्रित है।
बैंक द्वारा वित्तपोषित ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम में एचसीएफसीका लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से बेहतर कार्य करना है जबकिगैर-एचसीएफसी उपकरणों की बढ़ती मांग तथा वैकल्पिकतकनीकों के संभावित जलवायु प्रभाव के बारे मेंउपयोगकर्ताओं को जानकारी देना है।
परियोजनाओं में प्रौद्योगिकी के उपयोग का प्रदर्शन करने के लिए रणनीति निर्माताओं और सेवा क्षेत्र के साथ सीधे काम करने का भी समर्थन करती है जिससे प्रर्दशन में सुधार, कम ऊर्जा की खपत को सुनिश्चित करने में मदद मिलती है जबकि इससे जलवायु को लाभ मिलता है।
विशेष रूप से कुछ विकासशील देशों में, वाणिज्यिक उपलब्धता और वैकल्पिक समाधान की लागत का मुद्दा इसे HCFCs को कम करना कुछ निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकता है।
विश्व बैंक के द्वारा कार्यक्रमों और प्रस्तावों की एक श्रृखंला के अंतर्गत तकनीकी सहायता के माध्यम से तकनीकी दक्षता को बढ़ावा देना है साथ ही इन उपायों को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की जरुरत पर भी बल देने पर बल दिया गया है ।
विश्व बैंक की एक तीन साल की शहरी ऊर्जा कुशल परिवर्तन पहल, शहर प्रमुखों से शहर में ऊर्जा दक्षता के नियोजन को सुद्रण करने में मदद करती है यह योजना इमारतों तथा लक्षित शहरी क्षेत्रों को डिजाइन करने में सहायता उपलब्ध करती है।
इस प्रोटोकॉल के समर्थकों को इस बात का भरोसा है कि अगर इस अन्तर्राष्टीय समझौते का पालन किया जाता है तो 2050 तक ओजोन परत फिर से हासिल हो सकती है। इसके व्यापक तरीके से अपनाने और लागू करने के कारण इसे असाधारण अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की एक मिशाल के रूप में मान्यता मिल चुकी है ।
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व प्रमुख कोफी अन्नान ने कहा "शायद यह आज की तारीख में इकलौता सबसे सफल अन्तर्राष्ट्रीय समझौते का मॉन्ट्रिलय प्रोटोकॉल है"।
इस संधि को 197 देशों द्वारा समर्थन दिया गया है । यूरोपीय संघ ने इस प्रोटोकॉल को संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण संधि का दर्जा दिया है।
वियना संधि (कन्वेंशन) :::::::::::::::
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यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक बहुपक्षीय पर्यावरण समझौता है। इस पर 1985 के वियना सम्मेलन में सहमति बनी और 1988 में यह लागू किया गया।
196 देशों (सभी संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के साथ- साथ ही होली सी, नियू और कुक आइलैंड्स) के साथ-साथ यूरोपीय संघों द्वारा इसे मंजूर किया जा चुका है।
वियना संधि, ओजोन परत की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीयप्रयासों के लिए एक ढांचे के रूप में कार्य करता है।
हालांकि, इसमें सीएफसी के इस्तेमाल के लिए कानूनी रूप सेबाध्यकारी न्यूनता के लक्ष्य शामिल नहीं हैं, ओजोनरिक्तीकरण का मुख्य कारण रासायनिक कारक हैं।
उपरोक्तबातें मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में रखी गयीं हैं।
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संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के सतत् विकास सम्मेलन (रियो, 2012)..............(पर्यावरण)
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संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के सतत् विकास सम्मेलन जिसे रियो, 2012 के नाम से भी जाना जाता है।
सतत् विकास पर तीसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन है जो विश्व समुदाय के पर्यावरणीय तथा आर्थक उद्देश्यों से संबंधित है।
ब्राजील में 13 से 22 जून, 2012 तक रियो डि जेनेरियो में हुआ यह सम्मेलन 1992 के पृथ्वी सम्मेलन से अब तक 20 वर्षों में हुई प्रगति से संबंधित है। तथा 2002 के सतत् विकास के जोहान्सबर्ग विश्व सम्मेलन का द्योतक है।
यह इस दस दिवसीय महासम्मेलन जिसमें तीन दिन का उच्च स्तरीय संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन सम्मिलित है जिसमे संयुक्त राष्ट्र संघ के 192 सदस्यों ने हिस्सा लिया जिनमें 57 देशों के प्रमुखों तथा 31 देशों के सरकारों के प्रमुखों ने, निजी कंपनियों, गैर सरकारी संस्थानों तथा अन्य समूहों ने हिस्सा लिया।
इस सम्मेलन को करने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव संख्या A/RES/64/236 द्वारा 24 दिसंबर, 2009 को लिया गया।
एक बड़े स्तर का सम्मेलन करने का निर्णय लिया है जिसमें राष्ट्राध्यक्षों तथा सरकार के अध्यक्षों तथा अन्य प्रस्तुतकर्ता शामिल हुए तथा जिससे वैश्विक पर्यावरणीय नीति संबंधित एक केन्द्रित राजनैतिक प्रस्ताव तैयार हो सके।
इस सम्मेलन के तीन मुख्य उद्देश्य हैं ::::::::::::
______________________________________
सतत् विकास हेतु एक नई राजनैतिक प्रतिबद्धता स्थापित करना।
पिछली निर्धारित प्रतिबद्धताओं की प्रगति का आंकलन तथा योजनाओं को कार्यबद्ध करने में आने वाली समस्याओं का आंकलन।
नयी समस्याओं को संबोधित करना।
परिणाम ::::: इस सम्मेलन का प्राथमिक परिणाम गैर-बाध्य प्रपत्र, “भविष्य जो हम चाहते हैं” जो एक 49 पृष्ठों का कार्यकारी दस्तावेज था। इसमें 192 सरकारों के राष्ट्राध्यक्षों ने उपस्थित होकर, सतत् विकास से संबंधित अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को नवीकृत किया तथा उन्होंने सतत् भविष्य के लिए की गई प्रतिबद्धताओं का उल्लेख किया।
इस दस्तावेज में मुख्यत: सभी राष्ट्रों ने अपने पिछली कार्यकारी योजनाओं जैसे एजेंडा 21 को अपना विश्वास दिखाया। कुछ मुख्य परिणाम इस प्रकार हैं :::::::::
इस लेख में सतत् विकास लक्ष्यों के विकास का समर्थन करने वाली भाषा का प्रयोग किया गया है जिसमें वैश्विक स्तर पर सतत् विकास को बढ़ावा देने वाले लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है। यह सोचा गया है कि सतत् विकास के लक्ष्य वहां से शुरू करेंगे जहां शताब्दी विकास लक्ष्य समाप्त होंगे तथा इइस आलोचना को कि जहां मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के विकास में हार जाएंगे को संबोधित करेंगे।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम को सुदृढ़ करने का प्रयास ताकि इसे अग्रिम वैश्विक पर्यावरणीय ईकाई बनाया जा सके, इसकी 48 प्रमुख सलाहों को मानकर इसकी कारिणी को वैश्विक सदस्यता से सुदृढ़ करना, इसके आर्थिक स्त्रोतों को बढ़ाकर तथा संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों से इसका सामंजस्य बढ़ाकर।
राष्ट्रों ने सकल घरेलू उत्पाद के स्थान पर संपदा के एक ऐसे मानक को चुनने पर सहमति जताई जिसमें पर्यावरणीय तथा सामाजिक कारकों को सम्मिलित किया जाए तथा पर्यारण द्वारा दी गई सेवाओं का भुगतान किया जाए जैसे कार्बन श्रंखलाकरण तथा निकाय संरक्षण।
इस बात को मान्यता दी गई कि किन मुख्य परिवर्तनों जिनसे समाज ग्रहण तथा उत्पादन करता है ताकि एक वैश्विक सतत् विकास को प्राप्त किया जा सके। यूरोपियन संघ के अधिकारी यह सलाह देते हैं कि एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें मजदूरों को कम तथा प्रदूषकों को ज्यादा कर देना पड़े।
यह दस्तावेज सामुद्रिक भंडारों को सतत् स्तर तक पहुंचाने तथा देशों को विज्ञान संबंधी प्रबंधन तकनीकें अपनाने पर बल देते हैं।
सभी राष्ट्रों में जीवाश्म ईंधनों पर मिलने वाली सरकारी छूट (सब्सिडी) को समाप्त करने पर बल दिया।
एजेंडा 21 सतत् विकास से संबंधित एक स्वायत्त, गैर बाध्य संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यकारी योजना है। यह पर्यावरण तथा विकास पर संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मेलन का एक उत्पाद है जो 1992 में ब्राजील के रियो डि जेनेरियो शहर में हुआ।
यह संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्य बहुमुखी संस्थाओं तथा वैयक्तिक सरकारों की एक कार्यकारी योजना है जिसे क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर लागू किया जा सकता है। ऐजेंडा 21 में ‘21’ से अभिप्राय 21सवीं शताब्दी से है। यह आगे हुई संयुक्त राष्ट्र संध के अन्य सम्मेलनों में हुए कुछ बदलाव तथा पुन: अधिकृत किया गया।
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संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के सतत् विकास सम्मेलन जिसे रियो, 2012 के नाम से भी जाना जाता है।
सतत् विकास पर तीसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन है जो विश्व समुदाय के पर्यावरणीय तथा आर्थक उद्देश्यों से संबंधित है।
ब्राजील में 13 से 22 जून, 2012 तक रियो डि जेनेरियो में हुआ यह सम्मेलन 1992 के पृथ्वी सम्मेलन से अब तक 20 वर्षों में हुई प्रगति से संबंधित है। तथा 2002 के सतत् विकास के जोहान्सबर्ग विश्व सम्मेलन का द्योतक है।
यह इस दस दिवसीय महासम्मेलन जिसमें तीन दिन का उच्च स्तरीय संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन सम्मिलित है जिसमे संयुक्त राष्ट्र संघ के 192 सदस्यों ने हिस्सा लिया जिनमें 57 देशों के प्रमुखों तथा 31 देशों के सरकारों के प्रमुखों ने, निजी कंपनियों, गैर सरकारी संस्थानों तथा अन्य समूहों ने हिस्सा लिया।
इस सम्मेलन को करने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव संख्या A/RES/64/236 द्वारा 24 दिसंबर, 2009 को लिया गया।
एक बड़े स्तर का सम्मेलन करने का निर्णय लिया है जिसमें राष्ट्राध्यक्षों तथा सरकार के अध्यक्षों तथा अन्य प्रस्तुतकर्ता शामिल हुए तथा जिससे वैश्विक पर्यावरणीय नीति संबंधित एक केन्द्रित राजनैतिक प्रस्ताव तैयार हो सके।
इस सम्मेलन के तीन मुख्य उद्देश्य हैं ::::::::::::
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सतत् विकास हेतु एक नई राजनैतिक प्रतिबद्धता स्थापित करना।
पिछली निर्धारित प्रतिबद्धताओं की प्रगति का आंकलन तथा योजनाओं को कार्यबद्ध करने में आने वाली समस्याओं का आंकलन।
नयी समस्याओं को संबोधित करना।
परिणाम ::::: इस सम्मेलन का प्राथमिक परिणाम गैर-बाध्य प्रपत्र, “भविष्य जो हम चाहते हैं” जो एक 49 पृष्ठों का कार्यकारी दस्तावेज था। इसमें 192 सरकारों के राष्ट्राध्यक्षों ने उपस्थित होकर, सतत् विकास से संबंधित अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को नवीकृत किया तथा उन्होंने सतत् भविष्य के लिए की गई प्रतिबद्धताओं का उल्लेख किया।
इस दस्तावेज में मुख्यत: सभी राष्ट्रों ने अपने पिछली कार्यकारी योजनाओं जैसे एजेंडा 21 को अपना विश्वास दिखाया। कुछ मुख्य परिणाम इस प्रकार हैं :::::::::
इस लेख में सतत् विकास लक्ष्यों के विकास का समर्थन करने वाली भाषा का प्रयोग किया गया है जिसमें वैश्विक स्तर पर सतत् विकास को बढ़ावा देने वाले लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है। यह सोचा गया है कि सतत् विकास के लक्ष्य वहां से शुरू करेंगे जहां शताब्दी विकास लक्ष्य समाप्त होंगे तथा इइस आलोचना को कि जहां मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के विकास में हार जाएंगे को संबोधित करेंगे।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम को सुदृढ़ करने का प्रयास ताकि इसे अग्रिम वैश्विक पर्यावरणीय ईकाई बनाया जा सके, इसकी 48 प्रमुख सलाहों को मानकर इसकी कारिणी को वैश्विक सदस्यता से सुदृढ़ करना, इसके आर्थिक स्त्रोतों को बढ़ाकर तथा संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों से इसका सामंजस्य बढ़ाकर।
राष्ट्रों ने सकल घरेलू उत्पाद के स्थान पर संपदा के एक ऐसे मानक को चुनने पर सहमति जताई जिसमें पर्यावरणीय तथा सामाजिक कारकों को सम्मिलित किया जाए तथा पर्यारण द्वारा दी गई सेवाओं का भुगतान किया जाए जैसे कार्बन श्रंखलाकरण तथा निकाय संरक्षण।
इस बात को मान्यता दी गई कि किन मुख्य परिवर्तनों जिनसे समाज ग्रहण तथा उत्पादन करता है ताकि एक वैश्विक सतत् विकास को प्राप्त किया जा सके। यूरोपियन संघ के अधिकारी यह सलाह देते हैं कि एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें मजदूरों को कम तथा प्रदूषकों को ज्यादा कर देना पड़े।
यह दस्तावेज सामुद्रिक भंडारों को सतत् स्तर तक पहुंचाने तथा देशों को विज्ञान संबंधी प्रबंधन तकनीकें अपनाने पर बल देते हैं।
सभी राष्ट्रों में जीवाश्म ईंधनों पर मिलने वाली सरकारी छूट (सब्सिडी) को समाप्त करने पर बल दिया।
एजेंडा 21 सतत् विकास से संबंधित एक स्वायत्त, गैर बाध्य संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यकारी योजना है। यह पर्यावरण तथा विकास पर संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मेलन का एक उत्पाद है जो 1992 में ब्राजील के रियो डि जेनेरियो शहर में हुआ।
यह संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्य बहुमुखी संस्थाओं तथा वैयक्तिक सरकारों की एक कार्यकारी योजना है जिसे क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर लागू किया जा सकता है। ऐजेंडा 21 में ‘21’ से अभिप्राय 21सवीं शताब्दी से है। यह आगे हुई संयुक्त राष्ट्र संध के अन्य सम्मेलनों में हुए कुछ बदलाव तथा पुन: अधिकृत किया गया।
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Educationist & Author Govind Prasad Sharma has been appointed as the Chairman of National Book Trust (NBT)
______________________________________
Govind Prasad Sharma :::::::
Govind Prasad Sharma in his long carrier has served as the Principal of Government P.G. College in Madhya Pradesh, Additional Director of Higher Education of Gwalior Chambal Division, Director of Madhya Pradesh Hindi Granth Akademi & also as Vice Chairman of Madhya Pradesh Board of Secondary Education....!
National Book Trust :::::::
__________________________________
National Book Trust (NBT) is an apex body established by the Government Of India in the Year 1957 under the Department Of Higher Education, Ministry Of Human Resource Development....!
Objectives of NBT :::::::::
______________________________________
To produce and encourage the production of good literature in English, Hindi And Other Indian Languages.
To make such literature available at moderate prices to the public.
To bring out book catalogues.
Arrange Book Fairs/Exhibitions and Seminars.
Take all necessary steps to make the people book-minded.
To pursue these objectives NBT publishes ::::::::::::::
______________________________________
The Classical Literature of India.
Outstanding works of Indian authors in Indian Languages and their translation from one Indian Language to another.
Translation of outstanding books from foreign languages.
Outstanding Books of Modern Knowledge for Popular Diffusion.
The major activities of NBT include publishing non- textbooks, organizing book fairs, book exhibitions, conducting literary events, activities for children, training in publishing throughout the country, participating in international book fairs to promote Indian literature.
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Govind Prasad Sharma :::::::
Govind Prasad Sharma in his long carrier has served as the Principal of Government P.G. College in Madhya Pradesh, Additional Director of Higher Education of Gwalior Chambal Division, Director of Madhya Pradesh Hindi Granth Akademi & also as Vice Chairman of Madhya Pradesh Board of Secondary Education....!
National Book Trust :::::::
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National Book Trust (NBT) is an apex body established by the Government Of India in the Year 1957 under the Department Of Higher Education, Ministry Of Human Resource Development....!
Objectives of NBT :::::::::
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To produce and encourage the production of good literature in English, Hindi And Other Indian Languages.
To make such literature available at moderate prices to the public.
To bring out book catalogues.
Arrange Book Fairs/Exhibitions and Seminars.
Take all necessary steps to make the people book-minded.
To pursue these objectives NBT publishes ::::::::::::::
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The Classical Literature of India.
Outstanding works of Indian authors in Indian Languages and their translation from one Indian Language to another.
Translation of outstanding books from foreign languages.
Outstanding Books of Modern Knowledge for Popular Diffusion.
The major activities of NBT include publishing non- textbooks, organizing book fairs, book exhibitions, conducting literary events, activities for children, training in publishing throughout the country, participating in international book fairs to promote Indian literature.
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MCQs on Research Aptitude..........
______________________________________
1.The main purpose of research in education is to ___________
a) Help in the personal growth of an individual...
b) Help the candidate become an eminent educationist...
c) Increase job prospects of an individual...
d) Increase social status of an individual....
__________________________________
2. Sampling is advantageous as it __
a) Helps in capital-saving....
b) Saves time....
c) Increases accuracy...
d) Both (a) and (b)...
__________________________________
3. Tippit table refers to ___________
a) Table of random digits....
b) Table used in sampling methods...
c) Table used in statistical investigations....
d) All the above..…..
______________________________________
4. _________ is a preferred sampling method for the population with finite size.
a) Area sampling....
b) Cluster sampling...
c) Purposive sampling....
d) Systematic sampling...
______________________________________
5. _________ refers to inferring about the whole population based on the observations made on a small part.
a) Deductive inference...
b) Inductive inference....
c) Pseudo-inference....
d) Objective inference....
______________________________________
6. Random sampling is helpful as it is ____________
a) An economical method of data collection....
b) Free from personal biases....
c) Reasonably accurate.....
d) All the above..…
______________________________________
7.The data of research is ___________
a) Qualitative only......
b) Quantitative only....
c) Both (a) and (b)....
d) Neither (a) nor (b)....
______________________________________
8.The longitudinal approach of research deals with _____________.
a) Horizontal researches...
b) Long-term researches...
c) Short-term researches...
d) None of the above........
______________________________________
9.A researcher divides the populations into PG, graduates and 10 + 2 students and using the random digit table he selects some of them from each. This is technically called ::::
A. stratified sampling.....
B. stratified random sampling.....
C. representative sampling....
D. none of these......
__________________________________
10. A researcher divides his population into certain groups and fixes the size of the sample from each group. It is called :::
A. stratified sample....
B. quota sample.........
C. cluster sample.....
D. all of the above.....
______________________________________
11. Field study is related to ::::::
A real life situations........
B experimental situations.....
C laboratory situations......
D none of the above......
______________________________________
12. Attributes of objects, events or things which can be measured are called :::::::::
A. qualitative measure....
B. data......
C. variables......
D. none of the above......
______________________________________
1- B, 2- D, 3- D, 4- D, 5-B, 6-D,
7- C,. 8- B, 9-B, 10- B, 11- A, 12- C..!
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t.me/UGC_NET_SET
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1.The main purpose of research in education is to ___________
a) Help in the personal growth of an individual...
b) Help the candidate become an eminent educationist...
c) Increase job prospects of an individual...
d) Increase social status of an individual....
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2. Sampling is advantageous as it __
a) Helps in capital-saving....
b) Saves time....
c) Increases accuracy...
d) Both (a) and (b)...
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3. Tippit table refers to ___________
a) Table of random digits....
b) Table used in sampling methods...
c) Table used in statistical investigations....
d) All the above..…..
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4. _________ is a preferred sampling method for the population with finite size.
a) Area sampling....
b) Cluster sampling...
c) Purposive sampling....
d) Systematic sampling...
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5. _________ refers to inferring about the whole population based on the observations made on a small part.
a) Deductive inference...
b) Inductive inference....
c) Pseudo-inference....
d) Objective inference....
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6. Random sampling is helpful as it is ____________
a) An economical method of data collection....
b) Free from personal biases....
c) Reasonably accurate.....
d) All the above..…
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7.The data of research is ___________
a) Qualitative only......
b) Quantitative only....
c) Both (a) and (b)....
d) Neither (a) nor (b)....
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8.The longitudinal approach of research deals with _____________.
a) Horizontal researches...
b) Long-term researches...
c) Short-term researches...
d) None of the above........
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9.A researcher divides the populations into PG, graduates and 10 + 2 students and using the random digit table he selects some of them from each. This is technically called ::::
A. stratified sampling.....
B. stratified random sampling.....
C. representative sampling....
D. none of these......
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10. A researcher divides his population into certain groups and fixes the size of the sample from each group. It is called :::
A. stratified sample....
B. quota sample.........
C. cluster sample.....
D. all of the above.....
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11. Field study is related to ::::::
A real life situations........
B experimental situations.....
C laboratory situations......
D none of the above......
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12. Attributes of objects, events or things which can be measured are called :::::::::
A. qualitative measure....
B. data......
C. variables......
D. none of the above......
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1- B, 2- D, 3- D, 4- D, 5-B, 6-D,
7- C,. 8- B, 9-B, 10- B, 11- A, 12- C..!
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UGC NET_JRF PAPER 1
Do your Best...!!!
The Union Cabinet headed by Prime Minister Narendra Modi has cleared the ordinance for the Reservation Roster for University Teachers.......!
______________________________________
What was the issue?
______________________________________
Following an order by the Allahabad high court in April 2017, the University Grants Commission had announced in March last year that an individual department should be considered as the base unit to calculate the number of teaching posts to be reserved for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes candidates.
This order of UGC led to a series of protests.
The protestors were demanding the restoration of the 200-point roster and the government had filed a review petition against the verdict of the Allahabad High Court which was dismissed by the Supreme Court.
The ordinance has been brought in by the Supreme Court to nullify the verdict of the Supreme Court.
What is the 200-point Roster System?
______________________________________
200 point roster system is a roster system for faculty positions that includes 99 posts reserved for the SC, ST and OBC communities and 101 posts for the unreserved.
Under this roster, in case there is a deficit of reserved seats in one department, it could be compensated by more people from the reserved communities in other departments in the university.
It considers college or university as a unit for reservation in teaching posts.
Whereas under the new 13 point roster proposed by the UGC, an individual department should be considered as the base unit to calculate the number of teaching posts to be reserved for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes candidates. This system had drawbacks for small departments of the university or college.
Also, the 200 point roster system provided an advantage wherein the deficit in reservation in one department could be compensated by other departments.
The government has brought an ordinance to restore the 200-point roster system.
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What was the issue?
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Following an order by the Allahabad high court in April 2017, the University Grants Commission had announced in March last year that an individual department should be considered as the base unit to calculate the number of teaching posts to be reserved for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes candidates.
This order of UGC led to a series of protests.
The protestors were demanding the restoration of the 200-point roster and the government had filed a review petition against the verdict of the Allahabad High Court which was dismissed by the Supreme Court.
The ordinance has been brought in by the Supreme Court to nullify the verdict of the Supreme Court.
What is the 200-point Roster System?
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200 point roster system is a roster system for faculty positions that includes 99 posts reserved for the SC, ST and OBC communities and 101 posts for the unreserved.
Under this roster, in case there is a deficit of reserved seats in one department, it could be compensated by more people from the reserved communities in other departments in the university.
It considers college or university as a unit for reservation in teaching posts.
Whereas under the new 13 point roster proposed by the UGC, an individual department should be considered as the base unit to calculate the number of teaching posts to be reserved for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes candidates. This system had drawbacks for small departments of the university or college.
Also, the 200 point roster system provided an advantage wherein the deficit in reservation in one department could be compensated by other departments.
The government has brought an ordinance to restore the 200-point roster system.
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मंत्रिमंडल ने शिक्षक कैडर अध्यादेश, 2019 में आरक्षण को मंजूरी दी.....(8 मार्च)
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• केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विश्वविद्यालय/कॉलेज को एक विभाग/विषय के बजाय एक इकाई मानते हुए केंद्रीय शैक्षिक संस्थान (शिक्षक के कैडर में आरक्षण) अध्यादेश, 2019 की घोषणा के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दी है. इस निर्णय से पात्र प्रतिभाशाली आवेदकों को आकर्षित करके उच्च शैक्षिक संस्थानों में शिक्षा के मानकों में सुधार होने की उम्मीद है.
• इस निर्णय से अनुसूचित जातियों/ जनजातियों और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित आरक्षण मानदंडों के साथ-साथ अनुच्छेद 14, 16 और 19 के संवैधानिक प्रावधानों को विधिवत रूप से सुनिश्चित करते हुए शिक्षक कैडर में सीधी भर्ती द्वारा 5000 से अधिक खाली पदों को भरने की अनुमति मिलेगी.
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राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE).......
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यह भारत सरकार की एक संस्था है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम, १९९३ के अन्तर्गत १७ अगस्त, १९९५ में की गई थी।
इसका उत्तरदायित्व भारतीय शिक्षा प्रणाली के मानक, प्रक्रियाएं एवं धाराओं की स्थापना एवं निरीक्षण करना है।
1973 के पूर्व राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की भूमिका अध्यापक शिक्षा से संबंधित सभी विषयो पर केंद्रीय और राज्य सरकारो के लिए एक सलाहकार निकाय के रूप में थी।
परिषद का सचिवालय राष्ट्रीय शेक्षिक अनुशंधान तथा प्रशिक्षण परिषद, (एनसीईआरटी) के अध्यापक शिक्षा विभाग में स्थित था।
शैक्षणिक क्षेत्र में अपने प्रशंसनीय कार्य के बाबजूद परिषद, अध्यापक शिक्षा में मानको को बनाये रखने तथा घटिया अध्यापक शिक्षा संस्थानों की बरोतरी को रोकने के अपने अनिवार्ये विनियामक कार्य नहीं कर सकी थी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1986 और उसके अधीन कार्य योजना में अध्यापक शिक्षा प्रणाली को सर्वथा दुरुस्त करने के लिए पहले उपाय के रूप में संविधिक दर्जे और अपेक्षित संसाधनों से युक्त राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद की कल्पना की गई थी। एक साविधिक निकाय के रूप में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद अधिनियम 1993 के अधीन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद 17 अगस्त 1995 से अस्तितव में आई।
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद का मूल उद्देश्य समूचे भारत में अध्यापक शिक्षा प्रणाली का नियोजित और समन्वित विकास करना, अध्यापक शिक्षा प्रणाली में मानदंडों और मानको का विनियमन तथा उन्हे समुचित रूप से बनाये रखना और तत्संबंधी विषय हैं।
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का मुख्यालय दिल्ली में है तथा भोपाल, भुवनेश्वर, बंगलुरु तथा जयपुर में इसकी क्षेत्रिय समितियाँ हैं।
प्रेम व आदरसाहित,
अंकुश-जाधव-सर...📚🕚📚😊🙌
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http://t.me/UGC_NET_SET
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यह भारत सरकार की एक संस्था है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम, १९९३ के अन्तर्गत १७ अगस्त, १९९५ में की गई थी।
इसका उत्तरदायित्व भारतीय शिक्षा प्रणाली के मानक, प्रक्रियाएं एवं धाराओं की स्थापना एवं निरीक्षण करना है।
1973 के पूर्व राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की भूमिका अध्यापक शिक्षा से संबंधित सभी विषयो पर केंद्रीय और राज्य सरकारो के लिए एक सलाहकार निकाय के रूप में थी।
परिषद का सचिवालय राष्ट्रीय शेक्षिक अनुशंधान तथा प्रशिक्षण परिषद, (एनसीईआरटी) के अध्यापक शिक्षा विभाग में स्थित था।
शैक्षणिक क्षेत्र में अपने प्रशंसनीय कार्य के बाबजूद परिषद, अध्यापक शिक्षा में मानको को बनाये रखने तथा घटिया अध्यापक शिक्षा संस्थानों की बरोतरी को रोकने के अपने अनिवार्ये विनियामक कार्य नहीं कर सकी थी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1986 और उसके अधीन कार्य योजना में अध्यापक शिक्षा प्रणाली को सर्वथा दुरुस्त करने के लिए पहले उपाय के रूप में संविधिक दर्जे और अपेक्षित संसाधनों से युक्त राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद की कल्पना की गई थी। एक साविधिक निकाय के रूप में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद अधिनियम 1993 के अधीन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद 17 अगस्त 1995 से अस्तितव में आई।
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद का मूल उद्देश्य समूचे भारत में अध्यापक शिक्षा प्रणाली का नियोजित और समन्वित विकास करना, अध्यापक शिक्षा प्रणाली में मानदंडों और मानको का विनियमन तथा उन्हे समुचित रूप से बनाये रखना और तत्संबंधी विषय हैं।
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का मुख्यालय दिल्ली में है तथा भोपाल, भुवनेश्वर, बंगलुरु तथा जयपुर में इसकी क्षेत्रिय समितियाँ हैं।
प्रेम व आदरसाहित,
अंकुश-जाधव-सर...📚🕚📚😊🙌
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UGC NET_JRF PAPER 1
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आकाशवाणी (All India Radio):::::
__________________________________
भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन संचालित सार्वजनिक क्षेत्र की रेडियो प्रसारण सेवा है।
भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुंबई और कोलकाता में सन १९२७ में दो निजी ट्रांसमीटरों से हुई। १९३० में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम भारतीय प्रसारण सेवा (इंडियन ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन) रखा गया। बाद में १९५७ में इसका नाम बदल कर आकाशवाणी रखा गया।
आकाशवाणी की बहुत भषाओं में विभिन्न सेवाएं हैं जो प्रत्येक देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
विविध भरती आकाशवाणी की सबसे लोकप्रिय - ज्ञात सेवा है। इसे विज्ञापन प्रसारण सेवा भी कहा जाता है।
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भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन संचालित सार्वजनिक क्षेत्र की रेडियो प्रसारण सेवा है।
भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुंबई और कोलकाता में सन १९२७ में दो निजी ट्रांसमीटरों से हुई। १९३० में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम भारतीय प्रसारण सेवा (इंडियन ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन) रखा गया। बाद में १९५७ में इसका नाम बदल कर आकाशवाणी रखा गया।
आकाशवाणी की बहुत भषाओं में विभिन्न सेवाएं हैं जो प्रत्येक देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
विविध भरती आकाशवाणी की सबसे लोकप्रिय - ज्ञात सेवा है। इसे विज्ञापन प्रसारण सेवा भी कहा जाता है।
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SCHEDULES IN THE CONSTITUTION..
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1 : List of States & Union Territories
2 : Contains provisions as to the President, Governor, Speaker, Deputy Speaker of the House of the people, chairman and deputy chairman of the council of states and the speaker of the legislative assembly and chairman and deputy chairman of the legislative council of a state, Salary of President, Governors, Chief Judges, Judges of High Court and Supreme court, Comptroller and Auditor General
3 : Forms of Oaths and affirmations
4 : Allocate seats for each state of India in Rajya Sabha
5 : Administration and control of scheduled areas and tribes
6 : Provisions for administration of Tribal Area in Assam, Meghalaya, Tripura, Mizoram & Arunachal Pradesh
7 : Gives allocation of powers and functions between Union & States. It contains 3 lists
1) Union List (For central Govt) .
2) States List (Powers of State Govt)
3) Concurrent List (Central & States)
8 : List of 22 languages of India recognized by Constitution
1. Assamese. 2. Bengali
3. Gujarati. 4. Hindi
5. Kannada. 6. Kashmiri
7. Manipuri. 8. Malayalam
9. Konkani. 10. Marathi
11. Nepali. 12. Oriya
13. Punjabi. 14. Sanskrit
15. Sindhi. 16. Tamil
17. Telugu. 18. Urdu
19. Santhali. 20. Bodo
21. Maithili. 22. Dogri
# Sindhi was added in 1967 by 21 Amendment
# Konkani, Manipuri ad Nepali were added in 1992 by 71 amendment
# Santhali, Maithili, Bodo and Dogri were added in 2003 by 92 amendment
9 : Added by first amendment in 1951. Contains acts & orders related to land tenure, land tax, railways, industries.{Right of property not a fundamental right now}
10 : Added by 52nd amendment in 1985. Contains provisions of disqualification of grounds of defection
11 : By 73rd amendment in 1992. Contains provisions of Panchayati Raj.
12 : By 74thamendment in 1992. Contains provisions of Municipal Corporation.
__________________________________
http://t.me/UGC_NET_SET (APJSIR)
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1 : List of States & Union Territories
2 : Contains provisions as to the President, Governor, Speaker, Deputy Speaker of the House of the people, chairman and deputy chairman of the council of states and the speaker of the legislative assembly and chairman and deputy chairman of the legislative council of a state, Salary of President, Governors, Chief Judges, Judges of High Court and Supreme court, Comptroller and Auditor General
3 : Forms of Oaths and affirmations
4 : Allocate seats for each state of India in Rajya Sabha
5 : Administration and control of scheduled areas and tribes
6 : Provisions for administration of Tribal Area in Assam, Meghalaya, Tripura, Mizoram & Arunachal Pradesh
7 : Gives allocation of powers and functions between Union & States. It contains 3 lists
1) Union List (For central Govt) .
2) States List (Powers of State Govt)
3) Concurrent List (Central & States)
8 : List of 22 languages of India recognized by Constitution
1. Assamese. 2. Bengali
3. Gujarati. 4. Hindi
5. Kannada. 6. Kashmiri
7. Manipuri. 8. Malayalam
9. Konkani. 10. Marathi
11. Nepali. 12. Oriya
13. Punjabi. 14. Sanskrit
15. Sindhi. 16. Tamil
17. Telugu. 18. Urdu
19. Santhali. 20. Bodo
21. Maithili. 22. Dogri
# Sindhi was added in 1967 by 21 Amendment
# Konkani, Manipuri ad Nepali were added in 1992 by 71 amendment
# Santhali, Maithili, Bodo and Dogri were added in 2003 by 92 amendment
9 : Added by first amendment in 1951. Contains acts & orders related to land tenure, land tax, railways, industries.{Right of property not a fundamental right now}
10 : Added by 52nd amendment in 1985. Contains provisions of disqualification of grounds of defection
11 : By 73rd amendment in 1992. Contains provisions of Panchayati Raj.
12 : By 74thamendment in 1992. Contains provisions of Municipal Corporation.
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