संपादकीय (Editorials)
आपको यह सारे संपादकीय लेख......
१. सामान्य अध्ययन
२. वैकल्पिक विषय
३. निबन्ध लेखन
४. CSAT (आकलन क्षमता/Passages)
आदि विषयों के अभ्यास के लिए उपयुक्त है।
इसीलिए आप इन सभी संपादकीय लेख को ध्यानपूर्वक पढ़े।
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The University Grants Commission (UGC) has approved the list of journals for the “CARE Reference List of Quality Journals”.............
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The Consortium for Academic & Research Ethics (CARE) is tasked to scrutinise & then compile a list of journals for social sciences, humanities, language, arts, culture, Indian Knowledge system etc.
Consortium for Academic & Research Ethics (CARE):::::::
UGC had established Consortium for Academic and Research Ethics (CARE) to prepare a “CARE Reference List of Quality Journals”.
The Consortium would compile a list of “credible quality journals” which would ultimately replace UGC’s own list of journals.
The Consortium would be headed by headed by the UGC Vice Chairman and would consist of government bodies and statutory councils.
Why the UGC has formed the Consortium?
A research paper led by Professor Bhushan Patwardhan had found that 88% of 1,009 journals recommended by universities and included in the white list were dubious and only 112 journals met the criteria set by UGC to be included in the list.
This high instance of the dubious journals had adversely impacted the image of UGC and as well as India at the international stage.
Hence the UGC had announced the setting up of Consortium for Academic and Research Ethics to scrutinise and then compile a list of quality journals.
With Consortium for Academic and Research Ethics (CARE), UGC which is the principal funding agency for the universities aims to effectively discharge the responsibility of setting up academic standards and ensuring that they are followed.
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The Consortium for Academic & Research Ethics (CARE) is tasked to scrutinise & then compile a list of journals for social sciences, humanities, language, arts, culture, Indian Knowledge system etc.
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UGC had established Consortium for Academic and Research Ethics (CARE) to prepare a “CARE Reference List of Quality Journals”.
The Consortium would compile a list of “credible quality journals” which would ultimately replace UGC’s own list of journals.
The Consortium would be headed by headed by the UGC Vice Chairman and would consist of government bodies and statutory councils.
Why the UGC has formed the Consortium?
A research paper led by Professor Bhushan Patwardhan had found that 88% of 1,009 journals recommended by universities and included in the white list were dubious and only 112 journals met the criteria set by UGC to be included in the list.
This high instance of the dubious journals had adversely impacted the image of UGC and as well as India at the international stage.
Hence the UGC had announced the setting up of Consortium for Academic and Research Ethics to scrutinise and then compile a list of quality journals.
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ओज़ोन अवक्षय...........(पर्यावरण-1)
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समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है।
सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है।
क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।
1970 के दशक के बाद से यह माना जाता है की ओज़ोन ह्रास (अवक्षय) दो अलग लेकिन संबन्धित घटनाओं का वर्णन करता है।
एक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी के समताप मण्डल (ओज़ोन परत) मे ओज़ोन की कुल मात्र मे प्रति दशक 4% की दर से लगातार गिरावट आ रही है। उत्तरार्द्ध घटना को ओज़ोन छिद्र के रूप मे जाना जाता है।
समतापमंडलीय ओजोन परत परबैगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है जिससे पृथ्वी पर आने वाली परबैगनी किरणों की मात्र में कमी आ जाती है। यह ओजोन परत मानव की मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलेनोमा इत्यादि रोगों से रक्षा करती है।
इन परबैगनी किरणों के संपर्क में आने से मुनष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है । इन किरणों से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी प्रभावित होती है तथा जीवित प्राणी के न्युक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते है।
सीएफ़सी और अन्य सायहक पदार्थों को ओज़ोन अवक्षय पदार्थ (ओडीएस) के रूप मे माना जाता है। चूँकि ओज़ोन परत परबैगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट किरण) की सबसे हानिकारक यूवीबी तरंगधैर्य (280-315) को पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करने से रोकती है, ओज़ोन परत मे प्रत्यक्ष (देखी गयी) और अनुमानित रूप से आयी कमी पूरे विश्व मे चिंता का विषय बना हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया है जो सीएफ़सी, हैलोन, और अन्य ओज़ोन अवक्षय रसायनों जैसे कि कार्बन टेट्राक्लोराइड और ट्राइक्लोरो ईथेन के उत्पादन पर रोक लगती है।
सीएफ़सी का आविष्कार थॉमस मिग्ले जूनियर के द्वारा 1920 मे किया गया था।
1970 से पहले इनका प्रयोग वातानुकूलन (एयर कंडीस्निंग) और प्रशीतलन इकाइयों मे एरोसाल स्प्रे प्रणोदको के रूप मे और संवेदनशील इलेक्ट्रोनिक उपकरणो की सफाई प्रक्रिया मे किया जाता था।
ये कुछ रसायनिक क्रियाओं के गौड़ उत्पाद के रूप मे भी होते थे। इन यौगिको के लिए कभी किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक श्रोतों की पहचान नहीं की गयी है – वातावरण मे इनकी उपस्थिती पूरी तरह से मानव विनिर्माण के कारण है।
जैसा की ऊपर दिया गया है, जब इस तरह के ओज़ोन अवक्षय रसायन समताप मण्डल मे पहुचते है, वे क्लोरिन परमाणुओं को उत्सर्जित करने के लिए पराबैगनी किरणों के द्वारा पृथक कर दिये जाते है।
क्लोरिन परमाणु एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और प्रत्येक परमाणु समताप मण्डल से हटा दिये जाने से पूर्व प्रति हजार मे से दस ओज़ोन अणुओ को कम सकता है। सीएफ़सी अणुओं की लंबी आयु को देखते हुये, सुधार (ओजोन क्षरण के) मे लगने वाले समय को दशकों मे मापा जाता है।
ऐसी गणना की गयी है कि एक सीएफ़सी अणु जमीन कि सतह से वायुमंडल की ऊपरी सतह तक जाने के लिए लगभग पाँच से सात साल का औसत समय लेता है और ऐसा कह सकते है कि ये वहाँ पर लगभग एक शताब्दी तक रह सकते है और इस अवधि के दौरान एक सौ हजार ओज़ोन अणुओं कों नष्ट कर सकते है।
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समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है।
सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है।
क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।
1970 के दशक के बाद से यह माना जाता है की ओज़ोन ह्रास (अवक्षय) दो अलग लेकिन संबन्धित घटनाओं का वर्णन करता है।
एक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी के समताप मण्डल (ओज़ोन परत) मे ओज़ोन की कुल मात्र मे प्रति दशक 4% की दर से लगातार गिरावट आ रही है। उत्तरार्द्ध घटना को ओज़ोन छिद्र के रूप मे जाना जाता है।
समतापमंडलीय ओजोन परत परबैगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है जिससे पृथ्वी पर आने वाली परबैगनी किरणों की मात्र में कमी आ जाती है। यह ओजोन परत मानव की मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलेनोमा इत्यादि रोगों से रक्षा करती है।
इन परबैगनी किरणों के संपर्क में आने से मुनष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है । इन किरणों से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी प्रभावित होती है तथा जीवित प्राणी के न्युक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते है।
सीएफ़सी और अन्य सायहक पदार्थों को ओज़ोन अवक्षय पदार्थ (ओडीएस) के रूप मे माना जाता है। चूँकि ओज़ोन परत परबैगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट किरण) की सबसे हानिकारक यूवीबी तरंगधैर्य (280-315) को पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करने से रोकती है, ओज़ोन परत मे प्रत्यक्ष (देखी गयी) और अनुमानित रूप से आयी कमी पूरे विश्व मे चिंता का विषय बना हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया है जो सीएफ़सी, हैलोन, और अन्य ओज़ोन अवक्षय रसायनों जैसे कि कार्बन टेट्राक्लोराइड और ट्राइक्लोरो ईथेन के उत्पादन पर रोक लगती है।
सीएफ़सी का आविष्कार थॉमस मिग्ले जूनियर के द्वारा 1920 मे किया गया था।
1970 से पहले इनका प्रयोग वातानुकूलन (एयर कंडीस्निंग) और प्रशीतलन इकाइयों मे एरोसाल स्प्रे प्रणोदको के रूप मे और संवेदनशील इलेक्ट्रोनिक उपकरणो की सफाई प्रक्रिया मे किया जाता था।
ये कुछ रसायनिक क्रियाओं के गौड़ उत्पाद के रूप मे भी होते थे। इन यौगिको के लिए कभी किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक श्रोतों की पहचान नहीं की गयी है – वातावरण मे इनकी उपस्थिती पूरी तरह से मानव विनिर्माण के कारण है।
जैसा की ऊपर दिया गया है, जब इस तरह के ओज़ोन अवक्षय रसायन समताप मण्डल मे पहुचते है, वे क्लोरिन परमाणुओं को उत्सर्जित करने के लिए पराबैगनी किरणों के द्वारा पृथक कर दिये जाते है।
क्लोरिन परमाणु एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और प्रत्येक परमाणु समताप मण्डल से हटा दिये जाने से पूर्व प्रति हजार मे से दस ओज़ोन अणुओ को कम सकता है। सीएफ़सी अणुओं की लंबी आयु को देखते हुये, सुधार (ओजोन क्षरण के) मे लगने वाले समय को दशकों मे मापा जाता है।
ऐसी गणना की गयी है कि एक सीएफ़सी अणु जमीन कि सतह से वायुमंडल की ऊपरी सतह तक जाने के लिए लगभग पाँच से सात साल का औसत समय लेता है और ऐसा कह सकते है कि ये वहाँ पर लगभग एक शताब्दी तक रह सकते है और इस अवधि के दौरान एक सौ हजार ओज़ोन अणुओं कों नष्ट कर सकते है।
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ओज़ोन अवक्षय...........(पर्यावरण-2)
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अंटार्कटिक ओज़ोन छिद्र अंटार्कटिक समताप मण्डल का क्षेत्र है जिसमे हाल ही के ओज़ोन स्तर, 1975 के पहले के परिमाण मे कम से कम 33 % तक गिर गए थे।
सितंबर से लेकर दिसम्बर के प्रारम्भ तक अंटार्कटिक बसंत के दौरान ओज़ोन छिद्र बनते है, जैसे ही प्रबल पश्चिमी हवाये महाद्वीप के चरो ओर बहने लगती है और और एक वायुमंडलीय घेरे का निर्माण करती है।
इस ध्रुवीय भँवर के भीतर निचली समताप मण्डलीय ओज़ोन का 50% से अधिक अंटार्कटिक बसंत के दौरान नष्ट हो जाता है।
जैसा कि ऊपर उल्लिखित है, ओज़ोन अवक्षय का प्रमुख कारण क्लोरिन युक्त गैसों (मुख्य रूप से सीएफ़सी और संबन्धित हैलोकार्बन) की उपस्थिती है।
परबैगनी किरणों की उपस्थिती मे, ये गैसे अपघटित हो कर क्लोरिन अणुओ कों मुक्त करती है, जो ओज़ोन के विनाश के लिए उत्प्रेरित करती है।
क्लोरिन, उत्प्रेरित ओज़ोन अवक्षय गैसीय अवस्था मे हो सकता है, लेकिन ध्रुवीय समताप मंडलीय बादलो की उपस्थिती मे इसमे नाटकीय रूप से वृद्धि होती है।
ये ध्रुवीय समताप मंडलीय बादल ( पीएससी ) भीषण ठंढ मे सर्दियों के दौरान बनते है। ध्रुवीय सर्दिया 3 महीने तक बिना सौर्य विकिरण (धूप) के अंधकारमय होती है।
सूर्य के प्रकाश मे कमी की वजह से तापमान मे गिरावट और ध्रुवीय भंवर के जाल और हवा को ठंढा करती है। और जब बसंत आता है तब सूर्य का प्रकाश एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और रसायनिक प्रतिक्रिया मे सहायता करता है जिसके परिणाम स्वरूप ओज़ोन छिद्र का निर्माण होता है।
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अंटार्कटिक ओज़ोन छिद्र अंटार्कटिक समताप मण्डल का क्षेत्र है जिसमे हाल ही के ओज़ोन स्तर, 1975 के पहले के परिमाण मे कम से कम 33 % तक गिर गए थे।
सितंबर से लेकर दिसम्बर के प्रारम्भ तक अंटार्कटिक बसंत के दौरान ओज़ोन छिद्र बनते है, जैसे ही प्रबल पश्चिमी हवाये महाद्वीप के चरो ओर बहने लगती है और और एक वायुमंडलीय घेरे का निर्माण करती है।
इस ध्रुवीय भँवर के भीतर निचली समताप मण्डलीय ओज़ोन का 50% से अधिक अंटार्कटिक बसंत के दौरान नष्ट हो जाता है।
जैसा कि ऊपर उल्लिखित है, ओज़ोन अवक्षय का प्रमुख कारण क्लोरिन युक्त गैसों (मुख्य रूप से सीएफ़सी और संबन्धित हैलोकार्बन) की उपस्थिती है।
परबैगनी किरणों की उपस्थिती मे, ये गैसे अपघटित हो कर क्लोरिन अणुओ कों मुक्त करती है, जो ओज़ोन के विनाश के लिए उत्प्रेरित करती है।
क्लोरिन, उत्प्रेरित ओज़ोन अवक्षय गैसीय अवस्था मे हो सकता है, लेकिन ध्रुवीय समताप मंडलीय बादलो की उपस्थिती मे इसमे नाटकीय रूप से वृद्धि होती है।
ये ध्रुवीय समताप मंडलीय बादल ( पीएससी ) भीषण ठंढ मे सर्दियों के दौरान बनते है। ध्रुवीय सर्दिया 3 महीने तक बिना सौर्य विकिरण (धूप) के अंधकारमय होती है।
सूर्य के प्रकाश मे कमी की वजह से तापमान मे गिरावट और ध्रुवीय भंवर के जाल और हवा को ठंढा करती है। और जब बसंत आता है तब सूर्य का प्रकाश एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और रसायनिक प्रतिक्रिया मे सहायता करता है जिसके परिणाम स्वरूप ओज़ोन छिद्र का निर्माण होता है।
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ओज़ोन परत अवक्षय के परिणाम (पर्यावरण)
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• परबैगनी किरणों की पृथ्वी पर वृद्धि
• बेसल और पपड़ीदार कोशिका कैंसर – मानव मे कैंसर का एक सबसे सामान्य रूप।
• घातक मेलानोमा – अन्य प्रकार का त्वचा कैंसर।
• कोर्टिकल मोतियाबिंद।
• परबैगनी किरणों की वृद्धि से फसलों के प्रभावित होने की संभावना है। पौधो के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण विभिन्न प्रजातियों मे जैसे कि चावल साइनोबैक्टीरिया पर निर्भर रहता है जो नाइट्रोजन के धारण के लिए इसकी जड़ो मे रहता है।
साइनोबैक्टीरिया परबैगनी किरणों के प्रति संवेदनशील होते है और इसकी वृद्धि के परिणाम स्वरूप प्रभावित हो सकते है।
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• परबैगनी किरणों की पृथ्वी पर वृद्धि
• बेसल और पपड़ीदार कोशिका कैंसर – मानव मे कैंसर का एक सबसे सामान्य रूप।
• घातक मेलानोमा – अन्य प्रकार का त्वचा कैंसर।
• कोर्टिकल मोतियाबिंद।
• परबैगनी किरणों की वृद्धि से फसलों के प्रभावित होने की संभावना है। पौधो के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण विभिन्न प्रजातियों मे जैसे कि चावल साइनोबैक्टीरिया पर निर्भर रहता है जो नाइट्रोजन के धारण के लिए इसकी जड़ो मे रहता है।
साइनोबैक्टीरिया परबैगनी किरणों के प्रति संवेदनशील होते है और इसकी वृद्धि के परिणाम स्वरूप प्रभावित हो सकते है।
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मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल........(पर्यावरण)
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मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे ओजोन क्षरण को रोकने KE LIYE बनाया गया है।
इस प्रोटोकॉल के माध्यम से उन पदार्थों के उत्पादन को कम करना है जो कि ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार है।
इस संधि पर 16 सितंबर, 1987 को हस्ताक्षर किए गये थे और यह 1 जनवरी, 1989 से यह प्रभावी हो गयी, जिसकी पहली बैठक मई 1989 में हेलसिंकी में हुयी थी।
तब से अभी तक इसमें सात संशोधन 1990 (लंदन), 1991 (नैरोबी), 1992 (कोपेनहेगन), 1993 (बैंकाक), 1995 (वियना), 1997 (मॉन्ट्रियल), और 1999 (बीजिंग) हो चुके हैं।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन क्षयकारी पदार्थों या तत्वों के कुल वैश्विक उत्पादन और खपत की गिरावट में उल्लेखनीय योगदान दिया है जिसका प्रय़ोग विश्व भर में कृषि, उपभोक्ता और अद्यौगिक क्षेत्रों में प्रयोग किया गया।
2010 के बाद से, प्रोटोकॉल के एजेंडे का ध्यान हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) को कम करने पर केंद्रित है जिनका मुख्य रूप से ठंडे और प्रशीतन अनुप्रयोगों और फोम उत्पादों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है।
ओजोन लाभ के अतिरिक्त, HCFCs का फेज आउट एजेंडा दृढ़ता से जलवायु शमन और ऊर्जा दक्षता पर जोर देता है। जलवायु लाभ कम या बिना ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता के साथ पदार्थों का उपयोग करके प्राप्त किया जा सकता है और निश्चित प्रौद्योगिकी उन्नयन के माध्यम से बड़े पैमाने पर ऊर्जा दक्षता में सुधार प्राप्त किया जा सकता है।
रणनीति :::::::
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विश्व बैंक की रणनीति, परियोजना की गतिविधियों मेंओजोन और जलवायु कार्यसूची को बेहतर तरीके सेपरिलक्षित करके एचसीएफसी चरण के लिए पर्यावरणीयलाभ को अधिकतम करने पर केंद्रित है।
बैंक द्वारा वित्तपोषित ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम में एचसीएफसीका लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से बेहतर कार्य करना है जबकिगैर-एचसीएफसी उपकरणों की बढ़ती मांग तथा वैकल्पिकतकनीकों के संभावित जलवायु प्रभाव के बारे मेंउपयोगकर्ताओं को जानकारी देना है।
परियोजनाओं में प्रौद्योगिकी के उपयोग का प्रदर्शन करने के लिए रणनीति निर्माताओं और सेवा क्षेत्र के साथ सीधे काम करने का भी समर्थन करती है जिससे प्रर्दशन में सुधार, कम ऊर्जा की खपत को सुनिश्चित करने में मदद मिलती है जबकि इससे जलवायु को लाभ मिलता है।
विशेष रूप से कुछ विकासशील देशों में, वाणिज्यिक उपलब्धता और वैकल्पिक समाधान की लागत का मुद्दा इसे HCFCs को कम करना कुछ निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकता है।
विश्व बैंक के द्वारा कार्यक्रमों और प्रस्तावों की एक श्रृखंला के अंतर्गत तकनीकी सहायता के माध्यम से तकनीकी दक्षता को बढ़ावा देना है साथ ही इन उपायों को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की जरुरत पर भी बल देने पर बल दिया गया है ।
विश्व बैंक की एक तीन साल की शहरी ऊर्जा कुशल परिवर्तन पहल, शहर प्रमुखों से शहर में ऊर्जा दक्षता के नियोजन को सुद्रण करने में मदद करती है यह योजना इमारतों तथा लक्षित शहरी क्षेत्रों को डिजाइन करने में सहायता उपलब्ध करती है।
इस प्रोटोकॉल के समर्थकों को इस बात का भरोसा है कि अगर इस अन्तर्राष्टीय समझौते का पालन किया जाता है तो 2050 तक ओजोन परत फिर से हासिल हो सकती है। इसके व्यापक तरीके से अपनाने और लागू करने के कारण इसे असाधारण अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की एक मिशाल के रूप में मान्यता मिल चुकी है ।
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व प्रमुख कोफी अन्नान ने कहा "शायद यह आज की तारीख में इकलौता सबसे सफल अन्तर्राष्ट्रीय समझौते का मॉन्ट्रिलय प्रोटोकॉल है"।
इस संधि को 197 देशों द्वारा समर्थन दिया गया है । यूरोपीय संघ ने इस प्रोटोकॉल को संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण संधि का दर्जा दिया है।
वियना संधि (कन्वेंशन) :::::::::::::::
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यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक बहुपक्षीय पर्यावरण समझौता है। इस पर 1985 के वियना सम्मेलन में सहमति बनी और 1988 में यह लागू किया गया।
196 देशों (सभी संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के साथ- साथ ही होली सी, नियू और कुक आइलैंड्स) के साथ-साथ यूरोपीय संघों द्वारा इसे मंजूर किया जा चुका है।
वियना संधि, ओजोन परत की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीयप्रयासों के लिए एक ढांचे के रूप में कार्य करता है।
हालांकि, इसमें सीएफसी के इस्तेमाल के लिए कानूनी रूप सेबाध्यकारी न्यूनता के लक्ष्य शामिल नहीं हैं, ओजोनरिक्तीकरण का मुख्य कारण रासायनिक कारक हैं।
उपरोक्तबातें मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में रखी गयीं हैं।
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मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे ओजोन क्षरण को रोकने KE LIYE बनाया गया है।
इस प्रोटोकॉल के माध्यम से उन पदार्थों के उत्पादन को कम करना है जो कि ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार है।
इस संधि पर 16 सितंबर, 1987 को हस्ताक्षर किए गये थे और यह 1 जनवरी, 1989 से यह प्रभावी हो गयी, जिसकी पहली बैठक मई 1989 में हेलसिंकी में हुयी थी।
तब से अभी तक इसमें सात संशोधन 1990 (लंदन), 1991 (नैरोबी), 1992 (कोपेनहेगन), 1993 (बैंकाक), 1995 (वियना), 1997 (मॉन्ट्रियल), और 1999 (बीजिंग) हो चुके हैं।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन क्षयकारी पदार्थों या तत्वों के कुल वैश्विक उत्पादन और खपत की गिरावट में उल्लेखनीय योगदान दिया है जिसका प्रय़ोग विश्व भर में कृषि, उपभोक्ता और अद्यौगिक क्षेत्रों में प्रयोग किया गया।
2010 के बाद से, प्रोटोकॉल के एजेंडे का ध्यान हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) को कम करने पर केंद्रित है जिनका मुख्य रूप से ठंडे और प्रशीतन अनुप्रयोगों और फोम उत्पादों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है।
ओजोन लाभ के अतिरिक्त, HCFCs का फेज आउट एजेंडा दृढ़ता से जलवायु शमन और ऊर्जा दक्षता पर जोर देता है। जलवायु लाभ कम या बिना ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता के साथ पदार्थों का उपयोग करके प्राप्त किया जा सकता है और निश्चित प्रौद्योगिकी उन्नयन के माध्यम से बड़े पैमाने पर ऊर्जा दक्षता में सुधार प्राप्त किया जा सकता है।
रणनीति :::::::
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विश्व बैंक की रणनीति, परियोजना की गतिविधियों मेंओजोन और जलवायु कार्यसूची को बेहतर तरीके सेपरिलक्षित करके एचसीएफसी चरण के लिए पर्यावरणीयलाभ को अधिकतम करने पर केंद्रित है।
बैंक द्वारा वित्तपोषित ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम में एचसीएफसीका लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से बेहतर कार्य करना है जबकिगैर-एचसीएफसी उपकरणों की बढ़ती मांग तथा वैकल्पिकतकनीकों के संभावित जलवायु प्रभाव के बारे मेंउपयोगकर्ताओं को जानकारी देना है।
परियोजनाओं में प्रौद्योगिकी के उपयोग का प्रदर्शन करने के लिए रणनीति निर्माताओं और सेवा क्षेत्र के साथ सीधे काम करने का भी समर्थन करती है जिससे प्रर्दशन में सुधार, कम ऊर्जा की खपत को सुनिश्चित करने में मदद मिलती है जबकि इससे जलवायु को लाभ मिलता है।
विशेष रूप से कुछ विकासशील देशों में, वाणिज्यिक उपलब्धता और वैकल्पिक समाधान की लागत का मुद्दा इसे HCFCs को कम करना कुछ निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकता है।
विश्व बैंक के द्वारा कार्यक्रमों और प्रस्तावों की एक श्रृखंला के अंतर्गत तकनीकी सहायता के माध्यम से तकनीकी दक्षता को बढ़ावा देना है साथ ही इन उपायों को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की जरुरत पर भी बल देने पर बल दिया गया है ।
विश्व बैंक की एक तीन साल की शहरी ऊर्जा कुशल परिवर्तन पहल, शहर प्रमुखों से शहर में ऊर्जा दक्षता के नियोजन को सुद्रण करने में मदद करती है यह योजना इमारतों तथा लक्षित शहरी क्षेत्रों को डिजाइन करने में सहायता उपलब्ध करती है।
इस प्रोटोकॉल के समर्थकों को इस बात का भरोसा है कि अगर इस अन्तर्राष्टीय समझौते का पालन किया जाता है तो 2050 तक ओजोन परत फिर से हासिल हो सकती है। इसके व्यापक तरीके से अपनाने और लागू करने के कारण इसे असाधारण अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की एक मिशाल के रूप में मान्यता मिल चुकी है ।
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व प्रमुख कोफी अन्नान ने कहा "शायद यह आज की तारीख में इकलौता सबसे सफल अन्तर्राष्ट्रीय समझौते का मॉन्ट्रिलय प्रोटोकॉल है"।
इस संधि को 197 देशों द्वारा समर्थन दिया गया है । यूरोपीय संघ ने इस प्रोटोकॉल को संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण संधि का दर्जा दिया है।
वियना संधि (कन्वेंशन) :::::::::::::::
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यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक बहुपक्षीय पर्यावरण समझौता है। इस पर 1985 के वियना सम्मेलन में सहमति बनी और 1988 में यह लागू किया गया।
196 देशों (सभी संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के साथ- साथ ही होली सी, नियू और कुक आइलैंड्स) के साथ-साथ यूरोपीय संघों द्वारा इसे मंजूर किया जा चुका है।
वियना संधि, ओजोन परत की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीयप्रयासों के लिए एक ढांचे के रूप में कार्य करता है।
हालांकि, इसमें सीएफसी के इस्तेमाल के लिए कानूनी रूप सेबाध्यकारी न्यूनता के लक्ष्य शामिल नहीं हैं, ओजोनरिक्तीकरण का मुख्य कारण रासायनिक कारक हैं।
उपरोक्तबातें मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में रखी गयीं हैं।
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