[UGC NET] is good,have a look at it! http://ntanet.nic.in/ntaresults/root/LoginPageDob.aspx
UGC NET_JRF PAPER 1
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Result :::: December 2018...! 📚🕚📚
संपादकीय (Editorials)
आपको यह सारे संपादकीय लेख......
१. सामान्य अध्ययन
२. वैकल्पिक विषय
३. निबन्ध लेखन
४. CSAT (आकलन क्षमता/Passages)
आदि विषयों के अभ्यास के लिए उपयुक्त है।
इसीलिए आप इन सभी संपादकीय लेख को ध्यानपूर्वक पढ़े।
" @Ankushjadhavsir "📚🕚📚📰📰📰
https://t.me/Jansatta_Editorials
आपको यह सारे संपादकीय लेख......
१. सामान्य अध्ययन
२. वैकल्पिक विषय
३. निबन्ध लेखन
४. CSAT (आकलन क्षमता/Passages)
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The University Grants Commission (UGC) has approved the list of journals for the “CARE Reference List of Quality Journals”.............
______________________________________
The Consortium for Academic & Research Ethics (CARE) is tasked to scrutinise & then compile a list of journals for social sciences, humanities, language, arts, culture, Indian Knowledge system etc.
Consortium for Academic & Research Ethics (CARE):::::::
UGC had established Consortium for Academic and Research Ethics (CARE) to prepare a “CARE Reference List of Quality Journals”.
The Consortium would compile a list of “credible quality journals” which would ultimately replace UGC’s own list of journals.
The Consortium would be headed by headed by the UGC Vice Chairman and would consist of government bodies and statutory councils.
Why the UGC has formed the Consortium?
A research paper led by Professor Bhushan Patwardhan had found that 88% of 1,009 journals recommended by universities and included in the white list were dubious and only 112 journals met the criteria set by UGC to be included in the list.
This high instance of the dubious journals had adversely impacted the image of UGC and as well as India at the international stage.
Hence the UGC had announced the setting up of Consortium for Academic and Research Ethics to scrutinise and then compile a list of quality journals.
With Consortium for Academic and Research Ethics (CARE), UGC which is the principal funding agency for the universities aims to effectively discharge the responsibility of setting up academic standards and ensuring that they are followed.
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https://t.me/Ankushjadhavsir
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The Consortium for Academic & Research Ethics (CARE) is tasked to scrutinise & then compile a list of journals for social sciences, humanities, language, arts, culture, Indian Knowledge system etc.
Consortium for Academic & Research Ethics (CARE):::::::
UGC had established Consortium for Academic and Research Ethics (CARE) to prepare a “CARE Reference List of Quality Journals”.
The Consortium would compile a list of “credible quality journals” which would ultimately replace UGC’s own list of journals.
The Consortium would be headed by headed by the UGC Vice Chairman and would consist of government bodies and statutory councils.
Why the UGC has formed the Consortium?
A research paper led by Professor Bhushan Patwardhan had found that 88% of 1,009 journals recommended by universities and included in the white list were dubious and only 112 journals met the criteria set by UGC to be included in the list.
This high instance of the dubious journals had adversely impacted the image of UGC and as well as India at the international stage.
Hence the UGC had announced the setting up of Consortium for Academic and Research Ethics to scrutinise and then compile a list of quality journals.
With Consortium for Academic and Research Ethics (CARE), UGC which is the principal funding agency for the universities aims to effectively discharge the responsibility of setting up academic standards and ensuring that they are followed.
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Forwarded from IAS Ankushjadhavsir 📰🗞️ (Ankush Jadhav Sir)
ओज़ोन अवक्षय...........(पर्यावरण-1)
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समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है।
सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है।
क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।
1970 के दशक के बाद से यह माना जाता है की ओज़ोन ह्रास (अवक्षय) दो अलग लेकिन संबन्धित घटनाओं का वर्णन करता है।
एक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी के समताप मण्डल (ओज़ोन परत) मे ओज़ोन की कुल मात्र मे प्रति दशक 4% की दर से लगातार गिरावट आ रही है। उत्तरार्द्ध घटना को ओज़ोन छिद्र के रूप मे जाना जाता है।
समतापमंडलीय ओजोन परत परबैगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है जिससे पृथ्वी पर आने वाली परबैगनी किरणों की मात्र में कमी आ जाती है। यह ओजोन परत मानव की मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलेनोमा इत्यादि रोगों से रक्षा करती है।
इन परबैगनी किरणों के संपर्क में आने से मुनष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है । इन किरणों से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी प्रभावित होती है तथा जीवित प्राणी के न्युक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते है।
सीएफ़सी और अन्य सायहक पदार्थों को ओज़ोन अवक्षय पदार्थ (ओडीएस) के रूप मे माना जाता है। चूँकि ओज़ोन परत परबैगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट किरण) की सबसे हानिकारक यूवीबी तरंगधैर्य (280-315) को पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करने से रोकती है, ओज़ोन परत मे प्रत्यक्ष (देखी गयी) और अनुमानित रूप से आयी कमी पूरे विश्व मे चिंता का विषय बना हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया है जो सीएफ़सी, हैलोन, और अन्य ओज़ोन अवक्षय रसायनों जैसे कि कार्बन टेट्राक्लोराइड और ट्राइक्लोरो ईथेन के उत्पादन पर रोक लगती है।
सीएफ़सी का आविष्कार थॉमस मिग्ले जूनियर के द्वारा 1920 मे किया गया था।
1970 से पहले इनका प्रयोग वातानुकूलन (एयर कंडीस्निंग) और प्रशीतलन इकाइयों मे एरोसाल स्प्रे प्रणोदको के रूप मे और संवेदनशील इलेक्ट्रोनिक उपकरणो की सफाई प्रक्रिया मे किया जाता था।
ये कुछ रसायनिक क्रियाओं के गौड़ उत्पाद के रूप मे भी होते थे। इन यौगिको के लिए कभी किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक श्रोतों की पहचान नहीं की गयी है – वातावरण मे इनकी उपस्थिती पूरी तरह से मानव विनिर्माण के कारण है।
जैसा की ऊपर दिया गया है, जब इस तरह के ओज़ोन अवक्षय रसायन समताप मण्डल मे पहुचते है, वे क्लोरिन परमाणुओं को उत्सर्जित करने के लिए पराबैगनी किरणों के द्वारा पृथक कर दिये जाते है।
क्लोरिन परमाणु एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और प्रत्येक परमाणु समताप मण्डल से हटा दिये जाने से पूर्व प्रति हजार मे से दस ओज़ोन अणुओ को कम सकता है। सीएफ़सी अणुओं की लंबी आयु को देखते हुये, सुधार (ओजोन क्षरण के) मे लगने वाले समय को दशकों मे मापा जाता है।
ऐसी गणना की गयी है कि एक सीएफ़सी अणु जमीन कि सतह से वायुमंडल की ऊपरी सतह तक जाने के लिए लगभग पाँच से सात साल का औसत समय लेता है और ऐसा कह सकते है कि ये वहाँ पर लगभग एक शताब्दी तक रह सकते है और इस अवधि के दौरान एक सौ हजार ओज़ोन अणुओं कों नष्ट कर सकते है।
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समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है।
सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है।
क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।
1970 के दशक के बाद से यह माना जाता है की ओज़ोन ह्रास (अवक्षय) दो अलग लेकिन संबन्धित घटनाओं का वर्णन करता है।
एक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी के समताप मण्डल (ओज़ोन परत) मे ओज़ोन की कुल मात्र मे प्रति दशक 4% की दर से लगातार गिरावट आ रही है। उत्तरार्द्ध घटना को ओज़ोन छिद्र के रूप मे जाना जाता है।
समतापमंडलीय ओजोन परत परबैगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है जिससे पृथ्वी पर आने वाली परबैगनी किरणों की मात्र में कमी आ जाती है। यह ओजोन परत मानव की मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलेनोमा इत्यादि रोगों से रक्षा करती है।
इन परबैगनी किरणों के संपर्क में आने से मुनष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है । इन किरणों से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी प्रभावित होती है तथा जीवित प्राणी के न्युक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते है।
सीएफ़सी और अन्य सायहक पदार्थों को ओज़ोन अवक्षय पदार्थ (ओडीएस) के रूप मे माना जाता है। चूँकि ओज़ोन परत परबैगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट किरण) की सबसे हानिकारक यूवीबी तरंगधैर्य (280-315) को पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करने से रोकती है, ओज़ोन परत मे प्रत्यक्ष (देखी गयी) और अनुमानित रूप से आयी कमी पूरे विश्व मे चिंता का विषय बना हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया है जो सीएफ़सी, हैलोन, और अन्य ओज़ोन अवक्षय रसायनों जैसे कि कार्बन टेट्राक्लोराइड और ट्राइक्लोरो ईथेन के उत्पादन पर रोक लगती है।
सीएफ़सी का आविष्कार थॉमस मिग्ले जूनियर के द्वारा 1920 मे किया गया था।
1970 से पहले इनका प्रयोग वातानुकूलन (एयर कंडीस्निंग) और प्रशीतलन इकाइयों मे एरोसाल स्प्रे प्रणोदको के रूप मे और संवेदनशील इलेक्ट्रोनिक उपकरणो की सफाई प्रक्रिया मे किया जाता था।
ये कुछ रसायनिक क्रियाओं के गौड़ उत्पाद के रूप मे भी होते थे। इन यौगिको के लिए कभी किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक श्रोतों की पहचान नहीं की गयी है – वातावरण मे इनकी उपस्थिती पूरी तरह से मानव विनिर्माण के कारण है।
जैसा की ऊपर दिया गया है, जब इस तरह के ओज़ोन अवक्षय रसायन समताप मण्डल मे पहुचते है, वे क्लोरिन परमाणुओं को उत्सर्जित करने के लिए पराबैगनी किरणों के द्वारा पृथक कर दिये जाते है।
क्लोरिन परमाणु एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और प्रत्येक परमाणु समताप मण्डल से हटा दिये जाने से पूर्व प्रति हजार मे से दस ओज़ोन अणुओ को कम सकता है। सीएफ़सी अणुओं की लंबी आयु को देखते हुये, सुधार (ओजोन क्षरण के) मे लगने वाले समय को दशकों मे मापा जाता है।
ऐसी गणना की गयी है कि एक सीएफ़सी अणु जमीन कि सतह से वायुमंडल की ऊपरी सतह तक जाने के लिए लगभग पाँच से सात साल का औसत समय लेता है और ऐसा कह सकते है कि ये वहाँ पर लगभग एक शताब्दी तक रह सकते है और इस अवधि के दौरान एक सौ हजार ओज़ोन अणुओं कों नष्ट कर सकते है।
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