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UGC NET June 2020 Exam : Important Dates ::: APJSIR
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Online Application and Registration Date :::

16th March 2020 to 16th April 2020

Downloading of Admit Cards :::

15th May 2020

UGC NET June 2019 Exam Dates :::

15th June 2020 to 20th June 2020

Date for announcing results :::

5th July 2020
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Wish You All The Very Best...! 📚📚🙌🏻
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उच्च शिक्षा हेतु सामान्य परीक्षा :::::
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मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अनुमोदन के पश्चात् राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (National Testing Agency- NTA) अगले शैक्षणिक सत्र के लिये देश के 15 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश हेतु एक साझा प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा। अब तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों हेतु साझा प्रवेश परीक्षा का आयोजन सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान द्वारा किया जाता था। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे के अनुसार, NTA NEET, JEE, CAT जैसी प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करेगा।

NTA ही क्यों....?

अब तक OMR आधारित टेस्ट हुआ करता था, जिसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठता रहा है। इसके अलावा कभी-कभी विकल्प को पेन या पेंसिल द्वारा सही से न भर पाने के कारण भी परिक्षण में परेशानी होती रही है; लेकिन NTA कंप्यूटर आधारित परीक्षण (Computer Based Test- CBT) है जिसमें ऐसी समस्याएँ नहीं हैं।

अधिकांश स्थानों में कंप्यूटर आधारित टेस्ट वर्ष भर लिया जा सकता है। उम्मीदवार परीक्षण के लिये उपलब्ध स्थानों (Examination Center) में सेअपनी सुविधा के अनुसार स्थानों का चयन कर सकते हैं। इस तरह उन्हें परीक्षा देने के लिये किसी विशेष स्थान की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। अत: यह दूर-दराज के क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिये भी सहायक है।

CBT में प्रश्नों का उत्तर देने के लिये उम्मीदवारों को निर्धारित समय दिया जाएगा। उन्हें अपने उत्तर तय समय में देने होंगे एवं वो अगले प्रश्न हेतु आगे बढ़ जाएँगे। उम्मीदवारों के लिये प्रश्नों का उत्तर बदलने के लिये पुन: उस प्रश्न पर जाना संभव नहीं होगा। इससे परीक्षण कम समय में पूरा हो जायेगा साथ ही यह भी पता चल जाएगा कि उम्मीदवार ने किस प्रकार के प्रश्नों को हल करने में कितना समय लिया है।

कंप्यूटर आधारित परीक्षण में धोखा-धड़ी एवं नक़ल की समस्या में भी कमी आएगी। इसके माध्यम से दिव्यांग उम्मीदवार भी अपनी सुविधानुसार स्थान चुनकर परीक्षा दे सकते हैं।

NTA के बारे में :::::

स्थापना ::: राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की स्थापना भारतीय संस्था पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत की गई थी।

इसे देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश / छात्रवृत्ति हेतु प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के लिये एक प्रमुख, विशेषज्ञ, स्वायत्त और आत्मनिर्भर परीक्षण संगठन के रूप में स्थापित किया गया है।

उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश हेतु उम्मीदवारों की क्षमता का पारदर्शी , दक्ष एवं त्रुटिहीन आकलन अंतरराष्ट्रीय मानकों पर करना हमेशा एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है।

उद्देश्य :::: इस एजेंसी का उद्देश्य प्रवेश एवं छात्रवृत्ति हेतु उम्मीदवारों की योग्यता का अंतर्राष्ट्रीय मानकों के आधार पर कुशल और पारदर्शी परीक्षण करना है।
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NTA कार्य ::::

यह ऑनलाइन माध्यम में परीक्षा आयोजित करवाता है जिसके लिये इसे ऐसे विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों का चयन करना होता है जहाँ पर सभी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हों और परीक्षा के आयोजन से उनके शैक्षणिक दिनचर्या पर कोई प्रभाव न पड़े।

अत्याधुनिक तकनीक की सहायता से सभी विषयों का प्रश्न-पत्र बनाना।

अनुसंधान एवं विकास के साथ-साथ परीक्षण हेतु विषय के विशेषज्ञों का क पैनल तैयार करना।

भारतीय शैक्षणिक संस्थानों में समय-समय पर प्रशिक्षण प्रदान करना और सलाहकारी सेवाएँ उपलब्ध कराना।

एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विसेज़ (Educational Testing Services) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करना।

विभिन्न मंत्रालयों एवं केंद्र सरकार के विभागों तथा राज्य सरकारों द्वारा किसी परीक्षा के आयोजन का दायित्व सौंपे जाने कि स्थिति में उसका संचालन करना।

स्कूलों, बोर्ड तथा अन्य निकायों में प्रशिक्षण के साथ-साथ सुधार सुनिश्चित करना एवं प्रवेश परीक्षाओं के परीक्षण संबंधी मानकों की समय-समय पर जाँच करना।

प्रशासन :::

NTA का अध्यक्ष एक प्रख्यात शिक्षाविद् होता है एवं इसकी नियुक्ति मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा की जाती है।

इसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer-CEO) एक महानिदेशक होता है जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।

इसमें एक बोर्ड ऑफ़ गवर्नर होगा जिसमें परीक्षा आयोजित करवाने वाले संस्थानों के सदस्य भी शामिल होंगे।

महत्त्व ::::

NTA जैसी विशिष्ट परीक्षण एजेंसी की स्थापना से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (Central Board of Secondary Education-CBSE), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (All India For Technical Education-AICTE) जैसी संस्थाओं से परीक्षा आयोजित कराने का बोझ कम हुआ है।

NTA प्रत्येक वर्ष ऑनलाइन माध्यम से कम-से-कम दो बार परीक्षाओं का आयोजन करता है जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिये प्रवेश के अवसर बढ़ जाते हैं।

NTA ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँच बढ़ाने के लिये तथा अभ्यर्थियों की सुविधा हेतु ज़िला स्तर एवं उप-ज़िला स्तर पर अपने केंद्र स्थापित कर रहा है।

NTA ने एक मोबाइल एप प्रारंभ करने के साथ ही अभ्यास परीक्षण केंद्रों की स्थापना की है जिसकी सहायता से अभ्यर्थी अपने स्मार्टफोन पर भी मॉक टेस्ट (Mock Test) देकर परीक्षा पूर्व अपना मूल्यांकन कर सकते हैं।

NTA के सामने चुनौतियाँ ::::

कंप्यूटर आधारित परीक्षण में तकनीकी समस्याओं, जैसे-इंटरनेट की पहुँच, बिजली की निरंतर आपूर्ति इत्यादि, का सामना करना पड़ सकता हैं।

इसके अतिरिक्त मानविकी विषयों में कई बार प्रश्नों को एप्टीट्यूड के आधार पर हल करना होता है, जो इस तरह के परीक्षण की सीमा है।
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BPSC Recruitment 2020 :::::
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 बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने 553 असिस्टेंट प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर (APO) पदों पर भर्ती हेतु आवेदन आमंत्रित किये हैं.

BPSC APO Recruitment 2020 के लिए उम्मीदवार 7 फरवरी से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. ऑनलाइन आवेदन का लिंक 21 फरवरी 2020 तक एक्टिव रहेगा.

BPSC APO वेकेंसी के लिए ऑनलाइन एप्लीकेशन फी उम्मीदवार 26 फरवरी 2020 तक जमा कर सकते हैं. उम्मीदवार 6 मार्च 2020 तक एप्लीकेशन अंतिम रूप से सबमिट कर सकते हैं. 

वैसे उम्मीदवार जो BPSC APO Recruitment 2020 के लिए आवेदन करना चाहते हैं उनके पास किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री होनी चाहिए.

महत्वपूर्ण तिथि :::

ऑनलाइन आवेदन शुरू होने की तिथि- 7 फरवरी 2020

ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि- 21 फरवरी 2020

ऑनलाइन आवेदन शुल्क जमा करने की अंतिम तिथि- 6 मार्च 2020

BPSC APO 2020 रिक्ति विवरण ::::

असिस्टेंट प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर (APO)- 553 पद

BPSC APO शैक्षणिक योग्यता ::: किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से लॉ में ग्रेजुएट होना चाहिए.

आयु सीमा :::

जनरल मेल- 18 से 37 वर्ष

जनरल फीमेल/बीसी/ओबीसी (पुरुष/महिला)- 18 से 42 वर्ष

एससी/एसटी (मेल/फीमेल)- 18 से 40 वर्ष

चयन प्रक्रिया ::: उम्मीदवारों का चयन प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा एवं इंटरव्यू में उनके प्रदर्शन के आधार पर किया जायेगा.

आवेदन कैसे करें ::: योग्य उम्मीदवार बिहार लोक सेवा आयोग के ऑफिशियल वेबसाइट से 7 फरवरी से 21 फरवरी 2020 तक आवेदन कर सकते हैं...!
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ऑनलाइन अपराध संबंधी रिपोर्ट :::::
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दोस्तों, हाल ही में ‘बाल अधिकार और आप’ (Child Rights and You-CRY) नामक एक गैर सरकारी संगठन द्वारा स्कूली छात्रों पर किये गए एक अध्ययन में पता चला है कि प्रत्येक तीन में से एक किशोर ऑनलाइन अपराध का शिकार है।

प्रमुख बिंदु :::::

गैर सरकारी संगठन ‘बाल अधिकार और आप’ द्वारा ‘फोरम फाॅर लर्निंग एंड एक्शन विद इनोवेशन एंड रिगोर’ (Forum for Learning and Action with Innovation and Rigour-FLAIR) के सहयोग से इंटरनेट उपयोग और ऑनलाइन सुरक्षा के पैटर्न का आकलन करने हेतु दिल्ली-एनसीआर के 13 -18 आयु वर्ग के 630 स्कूली छात्रों पर एक सर्वेक्षण किया गया।

अध्ययन से पता चलता है कि 93% छात्रों के घरों में इंटरनेट उपयोग संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध थी।

इंटरनेट उपकरणों तक व्यक्तिगत पहुँच के संदर्भ में पर्याप्त लैंगिक असमानता देखी जा सकती है, आँकड़ों से पता चलता है कि 60% बालकों की इंटरनेट उपकरणों तक व्यक्तिगत पहुँच के सापेक्ष केवल 40% बालिकाओं की इंटरनेट उपकरणों तक व्यक्तिगत पहुँच है।

अध्ययन से यह भी पता चला है कि इंटरनेट उपयोग के संदर्भ में 30% छात्रों का अनुभव नकारात्मक रहा।

इंटरनेट अपराध की विभिन्न श्रेणियों के आँकड़ो से पता चलता है कि लगभग 10% किशोर साइबर बुलिंग (Cyberbullying), अन्य 10% किशोर सोशल मीडिया अकाउंट और प्रोफाइल के दुरुपयोग तथा 23% किशोर फोटो व वीडियो में छेड़छाड़ को घटना से पीड़ित थे।

इंटरनेट उपयोग संबंधी आदत :::

NCERT द्वारा विकसित इंटरनेट सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों की जानकारी के संबंध में जागरुकता का अभाव है। केवल 30% छात्रों को इंटरनेट सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों की जानकारी थी।

इंटरनेट उपयोग संबंधी एक टेस्ट में लगभग 48% छात्र सामान्य रूप से इंटरनेट के उपयोग से ग्रस्त पाये गए वहीं 1% छात्र इंटरनेट के उपयोग से अत्यधिक ग्रस्त थे।

इंटरनेट तक पहुँच सभी के लिये हानिकारक नहीं है क्योंकि 40% छात्रों ने माना कि उन्होंने इसका प्रयोग अपने अध्ययन में मदद के लिये किया (जैसे कि शब्दों या सूचनाओं, ट्यूटोरियल और अपने स्कूल के ऑनलाइन शिक्षा कार्यक्रम तक ऑनलाइन खोज)।

लगभग 50% छात्रों ने पाठ्येतर गतिविधियों जैसे कि संगीत, पेंटिंग या खेल के लिये भी इंटरनेट का उपयोग किया।

कानूनी प्रावधान ::::

भारत में ऑनलाइन अपराध के मामलों में सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम 2000 और सूचना प्रोद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम 2008 लागू होते हैं।
भारत में बच्चों से संबंधित ऑनलाइन अपराध के मामले में कोई विशेष कानून नहीं है।

सूचना प्रोद्योगिकी कानून की धारा 66(a)(b) साइबर बुलिंग पर लागू होती है, जिसके तहत तीन साल तक की सज़ा तथा जुर्माना हो सकता है।

आगे की राह ::::

इंटरनेट उपयोग संबंधी जागरूकता उत्पन्न करने के लिये स्कूलों में वर्कशॉप आयोजित किये जाने चाहिये।

किशोरों के खिलाफ साइबर अपराधों से निपटने के लिये बुनियादी ढाँचे के निर्माण हेतु केंद्र सरकार की बाल संरक्षण योजना को संशोधित करने की आवश्यकता है।

पारिवारिक स्तर पर अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करने का प्रयास करना चाहिये।
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संविधान और रोचक तथ्य ::::
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वर्तमान में भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य है और इसका शासन एक मजबूत संविधान में दिए गए दिशा निर्देशों से चलता है. लेकिन क्या आपको पता है कि इस मजबूत संविधान को बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च होने के साथ साथ कई लोगों ने अपना अमूल्य समय और परिश्रम भी खर्च किया था..?

भारत में संविधान सभा के गठन का विचार सर्वप्रथम एम एन राय ने 1934 में रखा था. इसके बाद 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार भारत के संविधान के निर्माण के लिए आधिकारिक रूप से संविधान सभा के गठन की मांग की थी.
आइये इस लेख में भारतीय संविधान से सम्बंधित कुछ रोचक तथ्यों को जानते हैं. इन तथ्यों के बारे में या तो लोग जानते नहीं या फिर जानते हैं तो गलत जानते हैं.

1. संविधान सभा की पहली बैठक : संविधान सभा, स्वतंत्र भारत की पहली संसद थी. डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा संविधान सभा के पहले अध्यक्ष (अस्थायी अध्यक्ष) थे. इस संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी.

2. संविधान निर्माताओं ने लगभग 60 देशों के संविधानों का अवलोकन किया था और जिस संविधान में जो प्रावधान भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ लगा उसे भारत के संविधान में शामिल कर लिया गया था.

3. कुल खर्च : संविधान के निर्माण पर कुल 64 लाख रुपये का खर्च आया था.

4. कुल समय : संविधान के बनने में 2 साल, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा था.

5.जब संविधान का मसौदा (Draft) तैयार किया गया था और बहस और चर्चा के लिए रखा गया था, तो अंतिम रूप देने से पहले इसमें 2000 से अधिक संशोधन किए गए थे.

6. फाइनल ड्राफ्ट तैयार : संविधान सभा कुल 11 सत्रों के लिए बैठी थी. संविधान सभा का 11 वां सत्र 14-26 नवंबर 1949 के बीच आयोजित किया गया था. 26 नवंबर 1949 को संविधान का अंतिम ड्राफ्ट तैयार हुआ था.

7. यह दुनिया का सबसे लंबा संविधान : भारतीय संविधान दुनिया में किसी भी संप्रभु देश का सबसे लंबा है. अपने वर्तमान रूप में, इसमें; एक प्रस्तावना, 22 भाग, 448 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं.

8.  संविधान पर हस्ताक्षर : 24 जनवरी 1950 को, संविधान सभा के 284 सदस्यों ने भारतीय संविधान को संविधान भवन में हस्ताक्षरित किया थ, जिसे अब संसद के केंद्रीय कक्ष के रूप में जाना जाता है.

9. भारतीय संविधान टाइप या प्रिंट नहीं : भारतीय संविधान के हिंदी और अंग्रेजी के दोनों संस्करण हस्तलिखित थे. यह पृथ्वी पर किसी भी देश का सबसे लंबा हस्तलिखित संविधान है.

10.भारतीय संविधान, प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा (Prem Behari Narain Raizada) ने लिखा था : भारत के मूल संविधान को 'प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा' ने सुंदर सुलेख के साथ  इटैलिक शैली में लिखा था. 

11. भारतीय संविधान का प्रकाशन देहरादून में किया गया था और सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा फोटोलिथोग्राफ किया गया था.

12. कलाकारी : प्रत्येक पृष्ठ को शांतिनिकेतन के कलाकारों ने सजाया था: मूल संविधान हस्तलिखित है, जिसमें शान्तिनिकेतन के कलाकारों द्वारा प्रत्येक पृष्ठ को अनोखे ढंग से सजाया गया है. इन कलाकारों में राममनोहर सिन्हा और नंदलाल बोस शामिल हैं. 


13. मूल प्रतियां हीलियम बॉक्स में रखी गयीं हैं : हिंदी और अंग्रेजी में लिखी गई भारतीय संविधान की मूल प्रतियों को भारत की संसद की लाइब्रेरी में विशेष हीलियम से भरे केस में रखा गया है ताकि लम्बे समय तक सुरक्षित रहें.
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वर्ल्ड वाइड एजुकेटिंग फॉर द फ्यूचर इंडेक्स :::
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दोस्तों, हाल ही में द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (The Economist Intellligence Unit) नामक संस्था द्वारा जारी वर्ल्ड वाइड एजुकेटिंग फॉर द फ्यूचर इंडेक्स (Worldwide Educating for the Future Index), 2019 में भारत को 35वाँ स्थान प्राप्त हुआ है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु ::::

यह सूचकांक छात्रों को कौशल-आधारित शिक्षा से लैस करने की देशों की क्षमताओं के आधार पर रैंक प्रदान करता है।

यह रिपोर्ट कौशल आधारित शिक्षा के परिप्रेक्ष्य से महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण, समस्या को सुलझाने की क्षमता, नेतृत्व, सहयोग, रचनात्मकता और उद्यमशीलता तथा डिजिटल एवं तकनीकी कौशल जैसे क्षेत्रों में शिक्षा प्रणाली का विश्लेषण करती है।

इस रिपोर्ट में दी जाने वाली रैंकिंग तीन श्रेणियों पर आधारित है :::

1. नीतिगत वातावरण
2. शैक्षणिक वातावरण
3. समग्र सामाजिक-आर्थिक वातावरण

वर्ष 2019 में सूचकांक का विषय "नीति से अभ्यास तक” (From Policy to Practice) है।

वर्ल्ड वाइड एजुकेटिंग फॉर द फ्यूचर इंडेक्स :::

इस सूचकांक (इंडेक्स) और रिपोर्ट को येडान प्राइस फाउंडेशन (Yidan Prize Foundation) द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

तेज़ी से बदलते परिदृश्य में कार्य और बेहतर जीवनयापन के लिये छात्रों को तैयार करने में शिक्षा प्रणालियों की प्रभावशीलता का आकलन करने हेतु इसे विकसित किया गया था।

सूचकांक के मुख्य बिंदु :::

फिनलैंड इस सूचकांक में शीर्ष पर है जबकि स्वीडन दूसरे स्थान पर है।

वर्ष 2019 में तीनों श्रेणियों (नीतिगत वातावरण, शैक्षणिक वातावरण और समग्र सामाजिक-आर्थिक वातावरण) के आधार पर 53 के कुल स्कोर के साथ भारत समग्र सूचकांक में 35वें स्थान पर रहा। वर्ष 2018 में इन्हीं श्रेणियों में 41.2 के समग्र स्कोर के साथ भारत 40वें स्थान पर था।

भारत का स्कोर नीतिगत वातावरण के संदर्भ में वर्ष 2018 में 61.5 की तुलना में वर्ष 2019 में घटकर 56.3 हो गया है। इसके अतिरिक्त शैक्षणिक वातावरण श्रेणी एवं समग्र सामाजिक-आर्थिक वातावरण श्रेणी में भारत का स्कोर वर्ष 2018 में क्रमशः 32.2 एवं 33.3 की तुलना में बढ़कर क्रमशः 52.2 और 50.1 हो गया है।

सूचकांक में भारत की स्थिति में सुधार के कारण :::

रिपोर्ट के अनुसार, सूचकांक की ‘शैक्षणिक वातावरण’ श्रेणी में भारत के बेहतर प्रदर्शन का प्रमुख कारण सरकार द्वारा शुरू की गई नई शिक्षा नीति है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2019 की शुरुआत में प्रकाशित एक नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण, संचार और उद्यमिता जैसे भविष्योन्मुखी कौशल का उल्लेख करते हुए नीतिगत माहौल में प्रगति की है।

केंद्रीय बजट 2020 में ‘एस्पिरेशनल इंडिया’ के तहत नई शिक्षा नीति पर प्रकाश डाला गया है जिसका उद्देश्य प्रतिभावान शिक्षकों को आकर्षित करने के लिये वित्त की अधिक से अधिक प्राप्ति, नई प्रयोगशालाओं का निर्माण और नवाचार करना है।

साथ ही 150 उच्च शिक्षण संस्थानों में अप्रेंटिसशिप एम्बेडेड डिग्री या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के साथ डिग्री स्तर के पूर्ण-ऑनलाइन शिक्षा कार्यक्रम शुरू करने का भी प्रस्ताव है जो मार्च 2021 तक शुरू हो जाएगा।

गौरतलब है कि ये सभी कारण भारत के इस सूचकांक में बेहतर प्रदर्शन के लिये ज़िम्मेदार हैं।

भारत के समक्ष चुनौतियाँ :::

वर्ष 2018 की रिपोर्ट में उच्च शिक्षा प्रणाली के अंतर्राष्ट्रीयकरण के अवसर का उपयोग करने से संबंधित भारतीय शिक्षा प्रणाली की अक्षमता पर प्रकाश डाला गया था।

वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, विकेंद्रीकृत शिक्षा प्रणाली भी भारतीय शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती है।

कौशल विकास से संबंधित सुविचारित नीतिगत लक्ष्य अक्सर ज़मीनी स्तर तक नहीं पहुँच पाते हैं जो कि अमेरिका और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं में एक बड़ी समस्या है।

समाधान :::

भारत को अपनी शिक्षा प्रणाली को विकसित करना चाहिये ताकि वह उच्च शिक्षा के लिये पसंदीदा स्थान बन जाए।

भारतीय शिक्षा पद्धति में व्यापक बदलाव किया जाना चाहिये एवं शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने का प्रयास किया जाना चाहिये।

आगे की राह :::

भारत को अपने शैक्षणिक वातावरण, नीतिगत वातावरण एवं समग्र सामाजिक-आर्थिक वातावरण में सुधार के प्रयास करने चाहिये।

ध्यातव्य है कि भारत द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक बेहतर गंतव्य बनने के लिये स्टडी इन इंडिया (Study In India) एवं वज्र योजना के अंतर्गत प्रयास किया जा रहा है किंतु इसे और व्यापक स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है।
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Jeevan Kaushal Curriculum :::
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Friends, Recently, the Minister of Human Resource Development informed about the implementation of Jeevan Kaushal (life skills) curriculum in a written reply in the Lok Sabha.

Key Points about Curriculum :::

a) The University Grants Commission (UGC) has developed life skills (Jeevan Kaushal) curriculum for undergraduate students at Universities and Colleges.

b) It covers the courses on communication skills, professional skills, leadership & management skills and universal human values.

c) The implementation of curriculum is suggestive.

d) The objectives of the curriculum are :::

1. Enhancement of self awareness

2. Creation of emotional competency and emotional intelligence

3. Learning through practical experiences

4. Development of interpersonal skills

5. Time and Stress management

6. Achievement of excellence with ethics.
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New Test with Quantum Coins & Computers for Quantum Sensing :::
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Friends, Researchers from the Raman Research Institute (RRI) (autonomous institution under the Department of Science & Technology) have devised a new test for fairness of quantum coin or qubit using entanglement theory.

Key Points :::

The test uses entanglement to test the fairness of the quantum coin. Their strategy enables better discrimination between quantum states. Such an advantage is valuable in quantum sensors.

This is a significant contribution to quantum state discrimination and an essential aspect of quantum information science which is expected to influence quantum sensing.

Quantum Information and Quantum Computing Technology :::

The domain of Quantum Information and Quantum Computing Technology is a growing area of research which is expected to influence Data Processing, which in turn, plays a central role in our lives in this Information Age.

For instance, bank transactions, online shopping and so on crucially depend on the efficiency of information transfer.

Thus the work on quantum state discrimination is expected to be valuable in people’s lives in the current era.

Qubit ::::

A quantum bit, or qubit, is the basic unit of information for a quantum computer, analogous to a bit in ordinary machines.

But unlike a bit, which can have the value 0 or 1, a qubit can take on an infinite number of values.

Quantum computer :::

A quantum computer is any device for computation that makes direct use of distinctively quantum mechanical phenomena, such as superposition and entanglement, to perform operations on data.

Superposition means that each qubit can represent both a ‘1’ and a ‘0’ at the same time.

Quantum entanglement occurs when two particles become inextricably linked, and whatever happens to one immediately affects the other, regardless of how far apart they are.

Entanglement is a special type of correlation that exists in the quantum world with no classical counterpart.
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Gender Parity Index: UNESCO :::
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Friends, Gender Parity Index in primary, secondary and tertiary education is the ratio of the number of female students enrolled at primary, secondary and tertiary levels of education to the number of male students in each level.

In short, GPI at various levels reflect equitable participation of girls in the School system.

GPI is released by the United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization (UNESCO) as a part of its Global Education Monitoring Report.

A GPI of 1 indicates parity between the sexes; a GPI that varies between 0 and 1 typically means a disparity in favour of males; whereas a GPI greater than 1 indicates a disparity in favour of females.

India’s GPI for the year 2018-19 at different levels of School Education is as under :

1) Primary Education: 1.03
2) Upper Primary Education: 1.12
3) Secondary Education: 1.04
4) Higher Secondary Education: 1.04

India’s GPI indicates that the number of girls is more than the number of boys at all levels of school Education.

In 2018-19, the Ministry of Human Resource Development launched the ‘Samagra Shiksha’ scheme. It is a Centrally Sponsored Scheme.


1) It is an overarching programme for the school education sector extending from pre-school to class XII and aims to ensure inclusive and equitable quality education at all levels of school education.

2) One of its objectives is to bridge social and gender gaps in school education.

3) To provide quality education to girls from disadvantaged groups, Kasturba Gandhi BalikaVidyalayas (KGBVs) have been sanctioned in Educationally Backward Blocks (EBBs) under SamagraShiksha.

4) KGBVs are residential schools from class VI to XII for girls belonging to disadvantaged groups such as SC, ST, OBC, Minority and Below Poverty Line (BPL).

Note : Educationally Backward Blocks are drawn on the basis of twin criteria of Female Literacy Rate and Gender Gap in Literacy. However, some blocks have been identified only on the basis of Female Literacy Rate also.
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""''मुझे इतनी “फुर्सत” कहाँ दोस्तों, कि मैँ अपनी तकदीर का लिखा देखुँ.....

बस अपनी माँ की ” मुस्कुराहट” देख कर समझ जाता हुँ, कि “मेरी तकदीर” पूरी कायनात में बुलँद है....!"""

महिला दिवस के अवसर पर शुभकामनाएं।।

@Ankushjadhavsir 📚🎯📚😊
क्वांटम सिक्कों एवं कंप्यूटर के साथ नया परीक्षण :::::
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दोस्तों, हाल ही में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science & Technology) के अधीन एक स्वायत्त संस्थान रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (Raman Research Institute-RRI) के शोधकर्त्ताओं द्वारा क्वांटम सिक्कों (Quantum Coins) या क्यूबिट (Qubit) की सटीकता की जाँच करने के लिये एक नई परीक्षण प्रणाली विकसित की गई है।

इस परीक्षण में क्वांटम सिक्के या क्यूबिट की सटीकता जानने के लिये एन्टैंगलमेंट सिद्धांत (Entanglement Theory) का प्रयोग किया गया है।
क्वांटम कंप्यूटर में क्यूबिट सूचना की बुनियादी इकाई होती है।

नए परीक्षण के बारे में भौतिक विज्ञान की एक पत्रिका ‘प्रमाण’ (Pramana) में जानकारी दी गई है तथा इससे संबंधित शोध पत्र को इंटरनेशनल जर्नल आफ क्‍वांटम इन्फाॅरमेशन (International Journal of Quantum Information) में प्रकाशित किया गया।

परीक्षण के बारे में :::

इस परीक्षण में अनुसंधानकर्त्ताओं द्वारा आईबीएम क्‍वांटम कंप्यूटर (IBM quantum computer) से जुड़े सैद्धांतिक विचार पर कार्य किया गया।

अनुसंधानकर्त्ताओं द्वारा IBM कंप्यूटर के साथ कई प्रयोग किये जिसमें प्रयोग में आने वाले हार्डवेयर की कई कमियाँ भी उभरकर सामने आई।

अपने इस अन्वेषण में शोधकर्त्ताओं द्वारा आईबीएम क्वांटम कंप्यूटिंग सुविधा (IBM Quantum Computing Facility) पर विभिन्न प्रकार के उपकरणों यथा-विश्लेषणात्मक तकनीक, संख्यात्मक और कंप्यूटर सिमुलेशन का उपयोग किया गया।

क्वांटम की स्थिति जानने में एन्टैंगलमेंट की भूमिका को समझने के लिये इन सभी उपकरणों का एक साथ प्रयोग किया गया।

क्वांटम कंप्यूटर :::

क्वांटम कंप्यूटर भौतिक विज्ञान के क्वांटम सिद्धांत पर कार्य करता है।

क्वांटम कंप्यूटर में सूचना ‘क्वांटम बिट’ या ‘क्यूबिट’ में संग्रहीत होती है।

क्वांटम कंप्यूटर दोनों बाइनरी इनपुट (0 और 1) को एक साथ ऑपरेट कर सकता है।

क्वांटम सूचना और क्वांटम कंप्यूटिंग प्रौद्योगिकी :::

क्वांटम सूचना और क्वांटम कंप्यूटिंग प्रौद्योगिकी का एक उभरता हुआ क्षेत्र है जो अपेक्षित रूप से डेटा प्रोसेसिंग को प्रभावित करने की क्षमता रखती है, साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में हमारे जीवन में एक केंद्रीय भूमिका भी निभाती है।

इसका प्रयोग बैंकिंग से जुड़े लेन-देन, ऑनलाइन शॉपिंग इत्यादि में काफी अधिक देखने को मिलता है। अत: क्‍वांटम की स्थिति की पहचान करने से जुड़ा यह परीक्षण वर्तमान समय में काफी महत्त्वपूर्ण साबित होगा।
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11th Petersberg Climate Dialogue :::
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Friends, Recently, the Union Minister for Environment, Forest and Climate Change attended the 11th Petersberg Climate Dialogue. The dialogue was held virtually for the first time in the wake of the Covid-19 pandemic.

About the key Points :::

Petersberg Climate Dialogue :

It has been hosted by Germany since 2010 to provide a forum for informal high-level political discussions, focusing both on international climate negotiations and the advancement of climate action.

The virtual XI Petersberg Climate Dialogue was co-chaired by Germany and the United Kingdom (UK) and was attended by about 30 countries including India.

The UK is the incoming Presidency of the 26th Conference of Parties (COP 26) to the United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC).

COP 25 was held at Madrid, Spain in December 2019.

This year’s dialogue was crucial because of the efforts to contain coronavirus as well as countries preparing to move into the implementation phase of the Paris Agreement 2015 in the post-2020 period.

India’s Contributions in the Dialogue :

India expressed solidarity with the world as it combats the Covid-19 pandemic and emphasised on adopting more sustainable consumption patterns in line with the requirement of sustainable lifestyles.

India suggested having climate technology as an open source available to all countries at affordable prices.

India stressed on climate finance and urged to plan for 1 trillion USD in grants to the developing world immediately.

India highlighted its Nationally Determined Contributions spanning a ten-year time frame and in compliance with the temperature goal of the Paris Agreement.

India focused on the opportunity to accelerate renewable energy deployment and create new green jobs in the renewable energy and energy efficiency sector.

Paris Agreement 2015 :::

Parties to UNFCCC agreed to strive to limit the rise in global warming to well under 2 degrees Celsius, over pre-industrial levels, by 2100, under Paris Agreement 2015.

Nationally determined contributions (NDCs) were conceived at the Paris summit which require each Party to prepare, communicate and maintain successive NDCs that it intends to achieve.

Parties shall pursue domestic mitigation measures, with the aim of achieving the objectives of such contributions.
Paris Agreement replaced earlier agreement to deal with climate change, Kyoto Protocol.

Kyoto Protocol :::

It was an international agreement linked to the UNFCCC, which committed its parties by setting internationally binding emission reduction targets.

It was adopted in Kyoto, Japan in 1997 and entered into force in 2005.

It recognized that developed countries are principally responsible for the current high levels of greenhouse gases (GHG) emissions in the atmosphere as a result of more than 150 years of industrial activity.

The detailed rules for the implementation of the Protocol were adopted at COP-7 in Marrakesh, in 2001 and are referred to as the Marrakesh Accords.


1) Kyoto Protocol Phase-1 (2005-12) gave the target of cutting down emissions by 5%.

2) Phase-2 (2013-20) gave the target of reducing emissions by at least 18% by the industrialized countries.
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Know About The Anti-corruption Law Covers Deemed Universities :::
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Friends, The Supreme Court has held that bribery and corruption in a deemed university can be tried under the Prevention of Corruption Act, 1988.

It has said that individuals, authorities connected to a deemed university come under the definition of ‘public servant’ and can be tried and punished under the anti-corruption law.

About the key Points :::

The Supreme Court observed that the officials of a deemed university do not perform any less of a public duty than their counterparts in other universities.

Deemed universities come within the ambit of the term ‘university’ in Section 2(c)(xi) of the Prevention of Corruption (PC) Act, 1988. A deemed institution under the University Grants Commission (UGC) Act of 1956 has the same common public duty like a university to confer academic degrees, which are recognised in the society.

The object of the PC Act was not only to prevent the social evil of bribery and corruption, but also to make the same applicable to individuals who might conventionally not be considered public servants.

Prevention of Corruption (PC) Act, 1988 ::: Section 2(c)(xi) of the Prevention of Corruption Act states that a “public servant” includes “any person who is a vice­-chancellor or member of any governing body, professor, reader, lecturer or any other teacher or employee, by whatever designation called, of any university.

Deemed University :::

The status of deemed-to-be-university is awarded in accordance with the Section 3 of the University Grants Commission (UGC) Act, 1956.

An Institution of Higher Education, other than universities, working at a very high standard in a specific area of study, can be declared by the Central Government on the advice of the UGC as an Institution ‘deemed-to-be-university’.

Institutions that are ‘deemed-to-be-university’ enjoy academic status and privileges of a university.
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जानिए इलेक्ट्रॉनिक शिक्षा : विशेषताएँ और चुनौतियाँ :::
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दोस्तों, पिछले तीन दशकों में जीवन के हर क्षेत्र में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी सेवाओं का काफी विस्तार हुआ है। शिक्षा क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है। प्राचीन गुरुकुल तथा आश्रम की वाचिक परंपरा से होते हुए शिक्षा ने अनेक सोपान तय किये हैं। पिछली सदी के कमोबेश पारंपरिक श्यामपट तथा खड़िया मिट्टी (चाॅक) के दौर से गुजरते हुए इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में पठन-पाठन का समूचा परिदृश्य बहुत बदल चुका है। आज की स्कूली शिक्षा नवयुगीन साधनों तथा युक्तियों से सुसज्जित होती जा रही है। साधारण ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्टबोर्ड ने ले ली है तथा विविध प्रकार के मार्कर पेन ने खड़िया मिट्टी (चाॅक) का स्थान ले लिया है। इंगित करने के लिये इस्तेमाल होने वाली स्टिक का स्थान लेज़र पॉइंटर ने ले लिया है। स्लाइड प्रोजेक्टर तथा एलसीडी प्रोजेक्टर अब हर कक्षा की अनिवार्य आवश्यकता बनते जा रहे हैं।

शिक्षा में दृश्यश्रव्य प्रणाली का प्रचलन उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। सुगम तथा बेहतर प्रस्तुतिकरण के लिये टच स्क्रीन वाले बोर्ड अब स्कूलों में इस्तेमाल किये जा रहे हैं। शिक्षण प्रणाली के तौर-तरीकों में बहुत तेज़ी से बदलाव हो रहा है। COVID-19 महामारी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये लागू किये गए लॉकडाउन के कारण स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की शिक्षा प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रही है। परिणामस्वरूप शिक्षा अब तेज़ी से ई-शिक्षा की ओर अग्रसर हो रही है।

इस आलेख में ई-शिक्षा की बढ़ती भूमिका, उसकी विशेषताएँ तथा इस क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों पर विमर्श किया गया है।

ई-शिक्षा से क्या तात्पर्य है...?

ई-शिक्षा से तात्पर्य अपने स्थान पर ही इंटरनेट व अन्य संचार उपकरणों की सहायता से प्राप्त की जाने वाली शिक्षा से है।

ई-शिक्षा के विभिन्न रूप हैं, जिसमें वेब आधारित लर्निंग, मोबाइल आधारित लर्निंग या कंप्यूटर आधारित लर्निंग और वर्चुअल क्लासरूम इत्यादि शामिल हैं। आज से जब कई वर्ष पहले ई-शिक्षा की अवधारणा आई थी, तो दुनिया इसके प्रति उतनी सहज नहीं थी, परंतु समय के साथ ही ई-शिक्षा ने संपूर्ण शैक्षिक व्यवस्था में अपना स्थान बना लिया है।

ई-शिक्षा के प्रकार ::: ई-शिक्षा को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है - सिंक्रोनस (Synchronous) तथा असिंक्रोनस (Asynchronous) ::::

1) सिंक्रोनस शैक्षिक व्यवस्था - इस शैक्षिक व्यवस्था से तात्पर्य है कि ‘एक ही समय में’ अर्थात विद्यार्थी और शिक्षक अलग-अलग स्थानों से एक दूसरे से शैक्षिक संवाद करते हैं। इस तरह से किसी विषय को सीखने पर विद्यार्थी अपने प्रश्नों का तत्काल उत्तर जान पाते हैं, जिससे उनके उस विषय से संबंधित संदेह भी दूर हो जाते हैं। इसी कारण से इसे रियल टाइम लर्निंग भी कहा जाता है। इस प्रकार की ई-लर्निंग व्यवस्था में कई ऑनलाइन उपकरण की मदद से छात्रों को स्टडी मटीरियल उपलब्ध कराया जाता है। सिंक्रोनस ई-शैक्षिक व्यवस्था के कुछ उदाहरणों में ऑडियो और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, लाइव चैट तथा वर्चुअल क्लासरूम आदि शामिल हैं। ये तरीके बीते कुछ वर्षो में अधिक लोकप्रिय हो गए हैं।

2) असिंक्रोनस शैक्षिक व्यवस्था - इस शैक्षिक व्यवस्था से तात्पर्य है कि ‘एक समय में नहीं’ अर्थात यहाँ विद्यार्थी और शिक्षक के बीच वास्तविक समय में शैक्षिक संवाद करने का कोई विकल्प नहीं है। इस व्यवस्था में पाठ्क्रम से संबंधित जानकरी पहले ही उपलब्ध होती है। उदाहरण के लिये वेब आधारित अध्ययन, जिसमें विद्यार्थी किसी ऑनलाइन कोर्स, ब्लॉग, वेबसाइट, वीडियो ट्युटोरिअल्स, ई-बुक्स इत्यादि की मदद से शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस तरह की ई-शैक्षिक व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह है कि विद्यार्थी किसी भी समय, जब चाहे तब शैक्षिक पाठ्यक्रमों तक पहुँच सकते हैं। यही कारण है कि छात्रों का एक बड़ा वर्ग असिंक्रोनस शैक्षिक व्यवस्था के माध्यम से अपनी पढ़ाई करना पसंद करता है।
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क्या है भारत में ई-शिक्षा की स्थिति :::

ई-शिक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा शैक्षणिक उपकरणों और संचार माध्यमों का उपयोग करते हुए शिक्षा प्रदान करने के लिये पहचाने जाने वाले प्रमुख क्षेत्रों में से एक है। वस्तुतः अभी भारत में ई-शिक्षा अपने शैशवावस्था में है।

ई-शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये सरकार ने विभिन्न ई-लर्निंग कार्यक्रमों का समर्थन किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय इसे बढ़ावा देने के लिये सक्रिय रूप से उपकरण और तकनीक विकसित करने पर बल दे रहा है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में ई-शिक्षा पर केंद्रित शोध एवं अनुसंधान परियोजनाओं को प्रोत्साहित कर रहा है। इनमें दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से साक्षरता में सुधार के लिये पाठ्य सामग्री विकास, शोध एवं अनुसंधान पहल, मानव संसाधन विकास से जुड़ी परियोजनाएँ और संकाय प्रशिक्षण पहल शामिल हैं।

वर्ष 2025 तक भारत में इंटरनेट उपयोगकर्त्ताओं की संख्या 900 मिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है, भारत में ई-शिक्षा के क्षेत्र में एक विशाल बाज़ार तैयार होने की संभावनाएँ हैं। बड़ी संख्या में नए उपयोगकर्त्ता इंटरनेट व अन्य संचार उपकरणों के माध्यम से ई-शिक्षा तक पहुँच रहे हैं।

जानिए ई-शिक्षा बढ़ाने हेतु सरकार के प्रयास :::

स्वयं (SWAYAM) :::

स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स (SWAYAM) एक एकीकृत मंच है जो स्कूल (9वीं- 12वीं) से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक ऑनलाइन पाठ्यक्रम प्रदान करता है।

अब तक SWAYAM पर 2769 बड़े पैमाने के ऑनलाइन कोर्सेज़ (Massive Open Online Courses- MOOC) बड़े पैमाने पर ओपन ऑनलाइन पाठ्यक्रम) की पेशकश की गई है, जिसमें लगभग 1.02 करोड़ छात्रों ने विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया है।

ऑनलाइन पाठ्यक्रमों का उपयोग न केवल छात्रों द्वारा बल्कि शिक्षकों और गैर-छात्र शिक्षार्थियों द्वारा भी जीवन में कभी भी सीखने के रूप में किया जा रहा है।

NCERT कक्षा IX-XII तक के लिये 12 विषयों में स्कूल शिक्षा प्रणाली हेतु बड़े पैमाने पर ऑनलाइन पाठ्यक्रमों (Massive Open Online Courses- MOOCs) का मॉड्यूल विकसित कर रहा है।

स्वयं प्रभा (SWAYAM Prabha) :::

यह 24X7 आधार पर देश में सभी जगह डायरेक्ट टू होम (Direct to Home- DTH) के माध्यम से 32 उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षिक चैनल प्रदान करने की एक पहल है।

इसमें पाठ्यक्रम आधारित पाठ्य सामग्री होती है जो विविध विषयों को कवर करती है।

इसका प्राथमिक उद्देश्य गुणवत्ता वाले शिक्षण संसाधनों को दूरदराज़ के ऐसे क्षेत्रों तक पहुँचाना है जहाँ इंटरनेट की उपलब्धता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।

राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी (National Digital Library) :::

भारत की राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी (National Digital Library of India-NDL) एक एकल-खिड़की खोज सुविधा (Single-Window Search Facility) के तहत सीखने के संसाधनों के आभाषी भंडार का एक ढाँचा विकसित करने की परियोजना है।

इसके माध्यम से यहाँ 3 करोड़ से अधिक डिजिटल संसाधन उपलब्ध हैं।

लगभग 20 लाख सक्रिय उपयोगकर्त्ताओं के साथ 50 लाख से अधिक छात्रों ने इसमें अपना पंजीकरण कराया है।

स्पोकन ट्यूटोरियल (Spoken Tutorial) :::

छात्रों की रोज़गार क्षमता को बेहतर बनाने के लिये ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर पर 10 मिनट के ऑडियो-वीडियो ट्यूटोरियल उपलब्ध हैं।

यह सभी 22 भाषाओं की उपलब्धता के साथ ऑनलाइन संस्करण है जो स्वयं सीखने के लिये बनाया गया है।

स्पोकन ट्यूटोरियल के माध्यम से बिना शिक्षक की उपस्थिति के पाठ्यक्रम को प्रभावी रूप से नए उपयोगकर्त्ता को प्रशिक्षित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
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शिक्षा के लिये नि:शुल्क और ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर (Free and Open Source Software for Education) :::

यह शिक्षण संस्थानों में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के उपयोग को बढ़ावा देने वाली एक परियोजना है।

इसमें शिक्षण कार्य, जैसे कि स्पोकन ट्यूटोरियल्स, डॉक्यूमेंटेशन, जागरूकता कार्यक्रम, यथा कॉन्फ्रेंस, ट्रेनिंग वर्कशॉप इत्यादि इंटर्नशिप के माध्यम से किया जाता है।

इस परियोजना में लगभग 2,000 कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों ने इस गतिविधि में भाग लिया है।

वर्चुअल लैब (Virtual Lab) :::

इस प्रोजेक्ट का उपयोग प्राप्त ज्ञान की समझ का आकलन करने, आँकड़े एकत्र करने और सवालों के उत्तर देने के लिये पूरी तरह से इंटरेक्टिव सिमुलेशन एन्वायरनमेंट (Interactive Simulation Environment) विकसित करना है।

महत्त्वाकांक्षी परियोजना के उद्देश्यों को प्राप्त करने, वास्तविक दुनिया के वातावरण और समस्याओं से निपटने की क्षमता विकसित करने के लिये अत्याधुनिक कंप्यूटर सिमुलेशन तकनीक के साथ आभासी प्रयोगशालाओं को विकसित करना आवश्यक है।

इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत 1800 से अधिक प्रयोगों के साथ लगभग 225 ऐसी प्रयोगशालाएँ संचालित हैं और 15 लाख से अधिक छात्रों को लाभ प्रदान कर रही हैं।

ई-यंत्र (e-Yantra) :::

यह भारत में इंजीनियरिंग कॉलेजों में एम्बेडेड सिस्टम (Embedded Systems) और रोबोटिक्स (Robotics) पर प्रभावी शिक्षा को सक्षम करने की एक परियोजना है।

शिक्षकों और छात्रों को प्रशिक्षण कार्यशालाओं के माध्यम से एम्बेडेड सिस्टम और प्रोग्रामिंग की मूल बातें सिखाई जाती हैं।

NCERT द्वारा ई- रिसोर्सेज़ (eResources जैसे ऑडियो, वीडिओ इंटरएक्टिव आदि) के रूप में विकसित अध्ययन सामग्री को वेब पोर्टल्स के माध्यम से हितधारकों के साथ साझा किया गया है। उदाहरण के लिये- स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स (SWAYAM), ई- पाठशाला (ePathshala), नेशनल रिपोज़िटरी ओपन एजुकेशनल रिसोर्सेज़ (NROER) और मोबाइल एप्लीकेशंस।

* ई-शिक्षा की विशेषताएँ :::

ई-शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि छात्र अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी भी समय और कहीं पर भी अपना शैक्षिक कार्य कर सकते हैं। अर्थात इस शैक्षिक व्यवस्था में समय और स्थान की कोई पाबंदी नहीं है।

ई-शिक्षा के माध्यम से छात्र वेब आधारित स्टडी मटीरियल को अनिश्चित काल तक एक्सेस कर सकते है और बार-बार देख कर इसके जटिल पहलूओं को समझ सकते हैं।

ई-शिक्षा के माध्यम से पढ़ाई करना काफी हद तक कम लागत वाली होती है। क्योंकि छात्रों को पुस्तकें या किसी दूसरे स्टडी मटीरियल पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है।

ई-शिक्षा पर्यावरण की दृष्टि से भी लाभदायक है, क्योंकि यहाँ जानकारी को किताब के बजाय वेब आधारित एप व पोर्टल पर स्टोर किया जाता है। जिससे कागज़ के निर्माण हेतु पेड़ों की कटाई पर रोक लगती है और हमारे पर्यावरण को बचाने में मदद मिलती है।

ई-शिक्षा इंटरनेट और कंप्यूटर कौशल का ज्ञान विकसित करता है जो विद्यार्थियों को अपने जीवन और करियर के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करेगा।

ई-शिक्षा के माध्यम से छात्र नए कौशल सीखने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

जानिए ई-शिक्षा की राह में चुनौतियाँ ::::

बिना आत्म अनुशासन या अच्छे संगठनात्मक कौशल के अभाव में विद्यार्थी ई-शिक्षा मोड में की जाने वाली पढ़ाई में पिछड़ सकते हैं।

छात्र बिना किसी शिक्षक और सहपाठियों के अकेला महसूस कर सकते हैं। परिणामस्वरूप वे अवसाद से पीड़ित हो सकते हैं।

खराब इंटरनेट कनेक्शन या पुराने कंप्यूटर, पाठ्यक्रम एक्सेस करने वाली सामग्री को निराशाजनक बना सकते हैं।

भारत में बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी का अभाव व इंटरनेट की कम गति ई-शिक्षा की राह में सबसे बड़ी चुनौती है।

वर्चुअल क्लासरूम में प्रैक्टिकल या लैब वर्क करना मुश्किल होता है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की भांति विद्युत व्यवस्था का अभाव है, जो ई-शिक्षा में रुकावट बन सकती है।
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Primary Education ::::
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Friends, In the second week of March, state governments across the country began shutting down schools and colleges temporarily as a measure to contain the spread of the novel coronavirus. It’s close to two months and there is no certainty when they will reopen. This is a crucial time for the education sector.

As the days pass by with no immediate solution to stop the outbreak of Covid-19, school closures are facing both short-term as well as far-reaching consequences. The structure of schooling and learning, including teaching and assessment methodologies, has been affected by these closures.

Impact of the Pandemic on Primary Education ::::

1) Connectivity and Resources issues :
Many students from villages and from economically backward backgrounds are facing a serious issue in keeping up with online education.

Only a handful of private schools could adopt online teaching methods. Their low-income private and government school counterparts, on the other hand, have completely shut down for not having access to e-learning solutions.

The students, in addition to the missed opportunities for learning, no longer have access to healthy meals during this time and are subject to economic and social stress.

The pandemic has significantly disrupted the higher education sector as well, which is a critical determinant of a country’s economic future.

2) Unpreparedness towards digitized environment : Many teachers and parents are facing challenges in coping with the new mode of teaching and learning.

Despite so much push for a digital India, sustained push for digitisation of education and training of teachers to deal with it has been lacking.

Technological investment in the education sector has been abysmally low.

3) Parental support issues : Many kids face a hostile environment at home where the family members are engaged in quarreling and altercations with each other.

This kind of surroundings adversely affects the mental health of children and also brings down their learning outcomes.
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