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राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE).......
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यह भारत सरकार की एक संस्था है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम, १९९३ के अन्तर्गत १७ अगस्त, १९९५ में की गई थी।

इसका उत्तरदायित्व भारतीय शिक्षा प्रणाली के मानक, प्रक्रियाएं एवं धाराओं की स्थापना एवं निरीक्षण करना है।

1973 के पूर्व राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की भूमिका अध्यापक शिक्षा से संबंधित सभी विषयो पर केंद्रीय और राज्य सरकारो के लिए एक सलाहकार निकाय के रूप में थी।

परिषद का सचिवालय राष्ट्रीय शेक्षिक अनुशंधान तथा प्रशिक्षण परिषद, (एनसीईआरटी) के अध्यापक शिक्षा विभाग में स्थित था।

शैक्षणिक क्षेत्र में अपने प्रशंसनीय कार्य के बाबजूद परिषद, अध्यापक शिक्षा में मानको को बनाये रखने तथा घटिया अध्यापक शिक्षा संस्थानों की बरोतरी को रोकने के अपने अनिवार्ये विनियामक कार्य नहीं कर सकी थी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1986 और उसके अधीन कार्य योजना में अध्यापक शिक्षा प्रणाली को सर्वथा दुरुस्त करने के लिए पहले उपाय के रूप में संविधिक दर्जे और अपेक्षित संसाधनों से युक्त राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद की कल्पना की गई थी। एक साविधिक निकाय के रूप में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद अधिनियम 1993 के अधीन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद 17 अगस्त 1995 से अस्तितव में आई।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा प्ररिषद का मूल उद्देश्य समूचे भारत में अध्यापक शिक्षा प्रणाली का नियोजित और समन्वित विकास करना, अध्यापक शिक्षा प्रणाली में मानदंडों और मानको का विनियमन तथा उन्हे समुचित रूप से बनाये रखना और तत्संबंधी विषय हैं।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का मुख्यालय दिल्ली में है तथा भोपाल, भुवनेश्वर, बंगलुरु तथा जयपुर में इसकी क्षेत्रिय समितियाँ हैं।

प्रेम व आदरसाहित,
अंकुश-जाधव-सर...📚🕚📚😊🙌
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आकाशवाणी (All India Radio):::::
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भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन संचालित सार्वजनिक क्षेत्र की रेडियो प्रसारण सेवा है।

भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुंबई और कोलकाता में सन १९२७ में दो निजी ट्रांसमीटरों से हुई। १९३० में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम भारतीय प्रसारण सेवा (इंडियन ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन) रखा गया। बाद में १९५७ में इसका नाम बदल कर आकाशवाणी रखा गया।

आकाशवाणी की बहुत भषाओं में विभिन्न सेवाएं हैं जो प्रत्येक देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

विविध भरती आकाशवाणी की सबसे लोकप्रिय - ज्ञात सेवा है। इसे विज्ञापन प्रसारण सेवा भी कहा जाता है।
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New Doc 2019-03-18 13.09.48 - Page 1
New Doc 2019-03-18 13.30.56 - Sample of my Writing Notes...!
SCHEDULES IN THE CONSTITUTION..
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1 : List of States & Union Territories
2 : Contains provisions as to the President, Governor, Speaker, Deputy Speaker of the House of the people, chairman and deputy chairman of the council of states and the speaker of the legislative assembly and chairman and deputy chairman of the legislative council of a state, Salary of President, Governors, Chief Judges, Judges of High Court and Supreme court, Comptroller and Auditor General

3 : Forms of Oaths and affirmations
4 : Allocate seats for each state of India in Rajya Sabha
5 : Administration and control of scheduled areas and tribes
6 : Provisions for administration of Tribal Area in Assam, Meghalaya, Tripura, Mizoram & Arunachal Pradesh

7 : Gives allocation of powers and functions between Union & States. It contains 3 lists

1) Union List (For central Govt) .
2) States List (Powers of State Govt)
3) Concurrent List (Central & States)

8 : List of 22 languages of India recognized by Constitution

1. Assamese. 2. Bengali
3. Gujarati. 4. Hindi
5. Kannada. 6. Kashmiri
7. Manipuri. 8. Malayalam
9. Konkani. 10. Marathi
11. Nepali. 12. Oriya
13. Punjabi. 14. Sanskrit
15. Sindhi. 16. Tamil
17. Telugu. 18. Urdu
19. Santhali. 20. Bodo
21. Maithili. 22. Dogri

# Sindhi was added in 1967 by 21 Amendment
# Konkani, Manipuri ad Nepali were added in 1992 by 71 amendment
# Santhali, Maithili, Bodo and Dogri were added in 2003 by 92 amendment

9 : Added by first amendment in 1951. Contains acts & orders related to land tenure, land tax, railways, industries.{Right of property not a fundamental right now}

10 : Added by 52nd amendment in 1985. Contains provisions of disqualification of grounds of defection

11 : By 73rd amendment in 1992. Contains provisions of Panchayati Raj.

12 : By 74thamendment in 1992. Contains provisions of Municipal Corporation.
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Indian Constitution when adopted by Constituent Assembly in 1949 had 395 articles & 22 parts. Many other articles & three other parts were added to it by subsequent constitutional amendments................
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List of Important Article & Description
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Article 1- 4 ::: Deals with the territory of India, formation of new states, alterations, names of existing states.

Article 5-11 ::: Deals with various rights of citizenship.

Article 12-35 ::: Deals with fundamental rights of Indian Citizen Abolition of untouchability and titles.

Articles 36-51 ::: Deals with Directive Principles of State Policy

Articles 51A ::: This part was added by 42nnd Amendment in 1976, which contains the fundamental duties of the citizens.

Articles 52-151 ::: Deals with government at the centre level.

Articles 152-237 ::: Deals with government at the state level.

Article 238 ::: Deals with States.

Articles 239-241 ::: Deals with Union Territories

Articles 242-243 ::: It consists of two parts::::
(i) added by 73rd amendment in 1992, which contains a new schedule. It contains 29 subjects related to Panchayati Raj, who have been given administrative powers.
(ii) It is added by 74th amendment in 1992, which contains a new schedule. It contains 18 subjects relate to municipalities, who have been given administrative powers.

Articles 244-244A ::: Deals with scheduled and tribal areas.

Articles 245-263 ::: Deals with the relationship between union and states.

Articles 264-300A ::: Deals with the distribution of revenue between union and states, appointment of Finance Commission etc.

Article 301-307 ::: Deals with the trade, commerce and intercourse within the territory of India.

Article 308-323 ::: Deals with Union Public Service Commission and State Public Services Commissions.

Article 323A, 323B ::: Added by 42nd Amendment in 1976. Deals with administrative tribunals set up by parliament to hear disputes and complaints regarding Union, states or local Government Employees.

Articles 324-329 ::: Deals with election.

Articles 330-342 ::: Deals with special provision for SCs and STs and Anglo-Indian Representatives.

Articles 343-351 ::: Deals with official language of union and states.

Article 352-360 ::: Deals with emergency provisions, President’s rule.

Articles 361-367 ::: Deals with exemption of criminal proceedings for their official acts of president and governors.

Article 368 ::: Deals with Amendment of constitution.

Article 369-392 ::: Article 370 deals with Special status to J&K.

Article 371A ::: Gives special provisions with respect to state of Nagaland.

Articles 393-395 ::: Deals with the short title, commencement and repeal of the constitution.
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वर्ल्ड वाइड वेब (www)..................
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वर्ल्ड वाइड वेब इंटरनेट का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है क्योंकि इसके बिना एक-दूसरे से जुड़ना बहुत मुश्किल है.

वर्ल्ड वाइड वेब क्या है.....?

यह हाइपरटेक्स्ट मार्क-अप भाषा या HTML का उपयोग करके हाइपरमीडिया को संदर्भित करता है. इसे WWW, W3 या web के नाम से भी जाना जाता है.

यह इन्टरनेट पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली सर्विस है. इसके जरिये कई सारे वेब servers और क्लाइंट्स एक साथ जुड़ते है.

ये हम सब जानते हैं कि वेब सर्वर के HTML डाक्यूमेंट्स में images, videos और अलग-अलग प्रकार के ऑनलाइन कंटेंट्स स्टोर रहते हैं जिन्हें वेब की मदद से एक्सेस किया जा सकता है.

WWW एक प्रकार का इनफार्मेशन स्पेस है जहां पर डाक्यूमेंट्स और अन्य संसाधनों की पहचान यूनिफ़ॉर्म रिसोर्स लोकेटर यूआरएल जैसे https://www.apjsir.com द्वारा की जाती है जो हाइपरटेक्स्ट द्वारा इंटरलिंक हो सकते हैं और इंटरनेट के माध्यम से एक्सेस किए जा सकते हैं.

WWW संसाधनों को वेब ब्राउज़र के रूप में जाना जाने वाले सॉफ़्टवेयर एप्लिकेशन के माध्यम से उपयोगकर्ताओं द्वारा एक्सेस किया जाता है.

इसलिए, ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि दुनियाभर में जितने भी वेबसाइटस और वेब पेजेज हैं जिन्हें आप अपने वेब ब्राउज़र पर देखते हैं वे सभी वेब से जुड़े होते हैं और इन्हें एक्सेस करने के लिए हाइपरटेक्स्ट ट्रान्सफर प्रोटोकॉल का इस्तेमाल किया जाता है. ये सारे वेब servers का एक प्रकार का कलेक्शन ही तो है. अधिक समझने के लिए जब किसी ब्राउज़र के एड्रेस बार पर किसी वेबसाइट के URL से पहले www लगा हो तो इसका अर्थ है कि वह वेबसाइट किसी वेब सर्वर पर स्टोर है जो कि वेब से जुड़ा हुआ है इसीलिए ही तो उसे एक्सेस करने के लिए www की मदद ली जाती है.

हाइपरटेक्स्ट क्या होता है......?

हाइपरटेक्स्ट का मतलब है कि यह एक ऐसा टेक्स्ट है जिसमें अन्य टेक्स्ट के 'लिंक' होते हैं और जरूरी नहीं है कि वह लीनियर हों. यह शब्द 1965 के आसपास टेड नेल्सन द्वारा इस्तेमाल किया गया था.

इतिहास ::::::::::

1989 में, CERN में काम करते हुए, ब्रिटिश वैज्ञानिक टीम बेर्नेर्स–ली ने वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) का आविष्कार किया. यह दुनिया भर के विश्वविद्यालयों और संस्थानों में वैज्ञानिकों के बीच स्वचालित सूचना-साझाकरण की मांग को पूरा करने के लिए विकसित किया गया था. क्या आप जानते हैं कि CERN एक अलग प्रयोगशाला नहीं है; इसमें 100 से अधिक देशों के लगभग 17,000 वैज्ञानिक शामिल हैं. WWW का मूल विचार कंप्यूटर, डेटा नेटवर्क और हाइपरटेक्स्ट की विकसित तकनीकों को वैश्विक सूचना प्रणाली का एक शक्तिशाली और आसान उपयोग में विलय करना था.

आपको बता दें कि मार्च 1989 में टीम बर्नर्स-ली ने WWW के लिए पहला प्रस्ताव और मई 1990 में अपना दूसरा प्रस्ताव लिखा था. नवंबर 1990 में, रॉबर्ट कैलीयू (Robert Cailliu) के साथ बेल्जियम के सिस्टम इंजीनियर के रूप में इस प्रणाली को प्रबंधन प्रस्ताव के रूप में औपचारिक रूप दिया गया था. इस डाक्यूमेंट्स में हाइपरटेक्स्ट डॉक्यूमेंट के वेब ब्राउज़र को देखा जा सकता है. 1992 में इलिनोइस विश्वविद्यालय ने पहला वेब ब्राउज़र पेश किया, एक ऑनलाइन सर्च टूल, जो वेब पर मौजूद सभी सूचनाओं को "surfs" करता है, मैच का पता लगाता है, और फिर रिजल्ट्स को रैंक करता है.
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वर्ल्ड वाइड वेब कैसे कार्य करता है .....?

जब कोई यूजर वेब डॉक्यूमेंट को खोलता है तो वह इसके लिए एक प्रकार की एप्लीकेशन का इस्तेमाल करता है जिसे वेब ब्राउज़र कहते हैं. जब किसी वेब ब्राउज़र मैं डोमेन या URL का नाम लिखा जाता है तो ब्राउज़र http के डोमेन एड्रेस को खोजने की रिक्वेस्ट generate करता है क्योंकि हर डोमेन का अपना अलग एड्रेस होता है. इसके बाद ब्राउज़र डोमेन name को सर्वर IP एड्रेस में बदल देता है. जिसको www उस सर्वर में सर्च करता है. जब एड्रेस वह सर्वर जिससे डोमेन को होस्ट किया गया है वह मैच हो जाता है तो सर्वर उस पेज को ब्राउज़र के पास वापस भेज देता है. जिसको आप अपने वेब ब्राउज़र पर आसानी से देख सकते है.

वर्ल्ड वाइड वेब के लाभ ::::::::::

- जानकारी की उपलब्धता और दुनिया भर से आसानी से कांटेक्ट स्थापित किया जा सकता है.
- प्रकटीकरण (divulgation) की लागत को कम करता है.
- रैपिड इंटरैक्टिव संचार जो विभिन्न सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
- प्रोफेशनल कांटेक्ट की स्थापना के साथ-साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान.
- प्रारंभिक कनेक्शन की कम लागत.
- जानकारी के विभिन्न स्रोतों तक पहुंच को सुगम बनाता है, जो लगातार अपडेट किया जाता है.
- यह एक प्रकार का वैश्विक मीडिया (global media) बन गया है.

कुछ नुकसान इस प्रकार हैं:::::::::

- ओवरलोड और अधिक जानकारी का खतरा.
- कुशल सूचना खोज रणनीति की आवश्यकता है.
- सर्च धीमा हो सकता है.
- जानकारी को फ़िल्टर करना और प्राथमिकता देना मुश्किल हो सकता है.
- नेट भी ओवरलोड हो जाता है क्योंकि बड़ी संख्या में उपयोगकर्ता इसका इस्तेमाल करते हैं.
- उपलब्ध डेटा इत्यादि पर गुणवत्ता का नियंत्रण करना कठिन हो सकता है.

ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि वर्ल्ड वाइड वेब हाइपरटेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज या HTML का उपयोग करने वाला हाइपरमीडिया है. यह अनूठी भाषा उपयोगकर्ता को उन सूचनाओं तक पहुंचने में मदद करेगी जो लिंक की जाती हैं ताकि जब कोई व्यक्ति किसी लिंक के एक हिस्से पर चयन या क्लिक करे तो स्वचालित रूप से निर्दिष्ट जानकारी मिल जाए. अनूठी विशेषता यह है कि यह उपयोगकर्ताओं को एक शब्द पर 'क्लिक' करने का अधिकार देता है और इससे संबंधित वेब स्थान पर भी ले जाता है.
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इंटरनेट का क्रमिक विकास............
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1969 ई.: अमेरिकी रक्षा विभाग के एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (APRA) ने सं. रा. अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों के कम्प्यूटरों की नेटवर्किंग करके इंटरनेट 'अप्रानेट' (APRANET) की शुरुआत की। इसका विकास, शोध, शिक्षा और सरकारी संस्थाओं के लिए किया गया था। इसका एक अन्य उद्देश्य था आपात स्थिति में जबकि संपर्क के सभी साधन निष्क्रिय हो चुके हों, आपस में सम्पर्क स्थापित किया जा सके। 1971 तक एपीआरए नेट लगभग 2 दर्जन कम्प्यूटरों को जोड़ चुका था।

1972 ई.: इलेक्ट्रॉनिक मेल अथवा ई-मेल की शुरुआत।

1973 ई.: ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल/ इंटरनेट प्रोटोकॉल (टीसीपी/आईपी) को डिजाइन किया गया। 1983 तक आते-आते यह इंटरनेट पर दो कम्प्यूटरों के बीच संचार का माध्यम बन गया। इसमें से एक प्रोटोकॉल, एफ टी पी (फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल) की सहायता से इंटरनेट प्रयोगकर्ता किसी भी कम्प्यूटर से जुड़कर फाइलें डाउनलोड कर सकता है।

1983 ई.: अप्रानेट के मिलेट्री हिस्से को मिलनेट (MILNET) में डाल दिया गया।

1986 ई.: यू. एस. नेशनल साइंस फाउंडेशन (NSF) ने एनएसएफनेट (NSFNET) लाँच किया। यह पहला बड़े पैमाने का नेटवर्क था, जिसमें इंटरनेट तकनीक का प्रयोग किया गया था।

1988 ई.: फिनलैंड के जाक्र्को ओकेरीनेने ने इंटरनेट चैटिंग का विकास किया।

1989 ई.: मैकगिल यूनीवर्सिटी, माँट्रियाल के पीटर ड्यूश ने प्रथम बार इंटरनेट का इंडेक्स (अनुक्रमणिका) बनाने का प्रयास किया। थिंकिंग मशीन कार्पोरेशन के ब्रिऊस्टर कहले ने एक अन्य इंडेक्सिंग सिक्सड, डब्ल्यू ए आई एस (वाइड एरिया इंफॉर्मेशन सर्वर) का विकास किया। सीईआरएन (यूरोपियन लेबोरेटरी फॉर पाटकल फिजिक्स) के बर्नर्स-ली ने इंटरनेट पर सूचना के वितरण की एक नई तकनीक का विकास किया, जिसे अंतत: वल्र्ड वाइड वेब कहा गया। यह वेब हाइपरटेक्स्ट पर आधारित है, जो कि किसी इंटरनेट प्रयोगकर्ता को इंटरनेट की विभिन्न साइट्स पर एक डाक्यूमेंट को दूसरे से जोड़ता है। यह कार्य हाइपरलिंक (विशेष रूप से प्रोग्राम किए गए शब्दों, बटन अथवा ग्राफिक्स) के माध्यम से होता है।

1991 ई.: प्रथम यूज़र फ्रेंडली इंटरफेस, गोफर का मिन्नेसोटा यूनिवर्सिटी (सं.रा. अमेरिका) में विकास। तब से गोफर सर्वाधिक विख्यात इंटरफेस बना हुआ है; एनएसएफनेट को कॉमॢशयल ट्रैफिक के लिए खोला गया।

1993 ई.: 'नेशनल सेंटर ऑफ सुपरकम्प्यूटिंग एप्लीकेशंसÓ के मार्क एंड्रीसन ने मोजेइक नामक नेवीगेटिंग सिस्टम का विकास किया। इस सॉफ्टवेयर के द्वारा इंटरनेट को मैगज़ीन फॉर्मेट में पेश किया जाने लगा। इस सॉफ्टवेयर से टेक्स्ट और ग्राफिक्स इंटरनेट पर उपलब्ध हो गए। आज भी यह वल्र्ड वाइड वेब के लिए मुख्य नेवीगेटिंग सिस्टम है।

1994 ई.: नेटस्केप कम्युनिकेशन और 1995 में माइक्रोसॉफ्ट ने अपने-अपने ब्राउज़र बाजार में उतारे। इन ब्राउज़रों से प्रयोगकर्ताओं के लिए इंटरनेट का प्रयोग अत्यन्त आसान हो गया।

1995 ई.: प्रारंभिक व्यावसायिक साइट्स को इंटरनेट पर लाँच किया गया। ई-मेल के द्वारा मास मार्केटिंग कैम्पेन चलाए जाने लगे।

1996 ई.: 1996 तक आते आते दुनिया भर में इंटरनेट को काफी लोकप्रियता हासिल हो गई। इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या 4.5 करोड़ पहुँची।

1999 ई.: ई-कॉमर्स की अवधारणा अत्यन्त तेजी से फैली, जिससे इंटरनेट के द्वारा खरीद-फरोख्त लोकप्रिय हो गई।

2003 ई.: न्यूजीलैण्ड में 'नियूइ' (NIUE) ने इंटरनेट में देशव्यापी 'वायरलेस एक्सेस' प्रणाली का प्रयोग आरंभ किया (इसमें ङ्खद्ब-स्नद्ब तकनीक का प्रयोग किया जाता है)।
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कम्प्यूटर का परिचय.......(APJSIR)
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कम्प्यूटर एक डाटा प्रोसेसिंग उपकरण होता है जो पढ़ व लिख सकता है, गणना और तुलना कर सकता है, डाटा की भारी मात्रा को उच्च गति, सटीकता और विश्वसनीयता के साथ स्टोर व प्रोसेस कर सकता है।

यह दिए हुए निर्देशों पर कार्य करता है।
एक बार डाटा और निर्देशों का समुच्चय इसकी मेमोरी में फीड कर दिया जाता है तो यह निर्देशों का अनुपालन करता है, डाटा पर निर्देशानुसार कार्य करता है और परिणाम देता है।

इसकी कार्यप्रणाली स्वचालित होती है।
यह इलेक्ट्रॉनिक अवयवों का प्रयोग करता है; ट्रांजिस्टर, रेजिस्टर, डायोड और सर्किट।

इनपुट (Input) :::::: डाटा को इकठ्ठा करके कम्प्यूटर में डाला जाता है। इसे इनपुट प्रोसेस कहते हैं।

भंडारण (Storage) ::::::::: जो भी डाटा कम्प्यूटर के अंदर पहुँचता है वह उसकी मेमोरी में स्टोर हो जाता है जिसे कम्प्यूटर की फिजि़कल मेमोरी (Physical Memory) कहते हैं। फिजि़कल मेमोरी की एक सहायक मेमोरी ऑक्ज़ीलरी मेमोरी (auxilary memory) भी होती है।

प्रोसेसिंग (Processing) :::::: कम्प्यूटर की फिजि़कल मेमोरी में स्टोर डाटा पर इच्छित परिणाम पाने के लिए कार्य किया जाता है, जिसे प्रोसेसिंग कहते हैं। परिणाम फिर से फिजि़कल मेमोरी में स्टोर हो जाते हैं।

आउटपुट (output) :::::: फिजि़कल मेमोरी से स्टोर डाटा को निकालने की प्रक्रिया को आउटपुट कहते हैं।

कम्प्यूटर का आर्किटेक्चर (Architecture Of Computer) किसी भी पारम्परिक कम्प्यूटर के निम्नलिखित अवयव होते हैं ::::::::::

इनपुट उपकरण (Input device) :::::::::

इस उपकरण का उपयोग मनुष्य से मशीन के बीच सँचार के लिए किया जाता है। जिस डाटा की कम्प्यूटर में प्रोसेसिंग की जानी है उसे इसी उपकरण के द्वारा डाला जाता है, उदाहरणस्वरूप की-बोर्ड, ऑप्टिकल कैरेक्टर रीडर, मार्क रीडर, मैग्नेटिक इंक कैरेक्टर रीडर।

आउटपुट उपकरण (Output Device) ::::

इस उपकरण का प्रयोग मशीन से मनुष्य के बीच संचार के लिए किया जाता है। प्रोसेस्ड परिणामों को इन उपकरणों के द्वारा कम्प्यूटर प्रणाली से निकाला जाता है, उदाहरणस्वरूप, वीडियो डिस्प्ले यूनिट, प्रिंटर्स, प्लॉटर्स इत्यादि।


सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (CPU)
(Central Processing Unit) :::::::::::

सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट कम्प्यूटर के सभी ऑपरेशनों का समन्वय एवँ संगठन करके सम्पूर्ण प्रणाली को नियंत्रित करती है। यह की-बोर्ड जैसे विभिन्न इनपुट उपकरणों द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करती है और प्रिंटर जैसे विभिन्न पैरीफेरल उपकरणों के लिए आउटपुट का इंतजाम करती है। यह प्राइमरी स्टोरेज में स्टोर निर्देशों को लाने के लिए जिम्मेदार होती है, उनकी व्याख्या करती है और उन सभी हार्डवेयर यूनिटों को निर्देश जारी करती है जो उन निर्देशों पर कार्य करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

ए एल यू (ALU) :::::::::

यह उपकरण कम्प्यूटर की सभी गणितीय और तार्किक ऑपरेशनों को करने के लिए जिम्मेवार होता है। गणितीय ऑपरेशनों का प्रयोग सँख्याओं की तुलना और 'लेस दैन' ( Less Than), 'इक्वल टू' (Equal to) और 'ग्रेटर देन' (Greater than) इत्यादि निरूपित करने में किया जाता है। ए एल यू टेक्स्ट व सँख्याओं दोनों को ही सँभाल सकता है। कभी-कभी कम्प्यूटर में गणितीय को- प्रोसेसर लगा होता है जो कि दूसरा माइक्रोप्रोसेसर होता है जो गणितीय कार्य के लिए ही होता है। को-प्रोसेसर का मुख्य लाभ गणना की बढ़ी हुई गति होती है।

मेमोरी यूनिट (Memory unit) ::::::::

इसका प्रयोग डाटा और प्रोग्राम को स्टोर करने के लिए किया जाता है। सम्पूर्ण मेमोरी को दो भागों में बाँटा जाता है। एक भाग में भारी सँख्या में लेबल्ड बॉक्स होते हैं- इसका अर्थ है एक बॉक्स प्रति डाटा आइटम। दूसरा भाग विधि-विशेष (Algorithm) को स्टोर करता है। मेमोरी के बॉक्स में स्थित डेटम (Datum) को बॉक्स के नाम अथवा लेबल से निर्दिष्टï करने पर प्राप्त किया जा सकता है। जब किसी डेटम का प्रयोग बॉक्स से किया जाता है तो ऐसे में डेटम की एक कॉपी का ही प्रयोग किया जाता है, वास्तविक डेटम नष्टï नहीं होता है। जब किसी डेटम को मेमोरी में लिखते हैं तो यह एक विशेष बॉक्स में स्टोर हो जाता है और बॉक्स की पुरानी विषयवस्तु नष्ट हो जाती है।
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Unit : 9 : Kyoto Protocol.............?
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The Kyoto Protocol is an international treaty which extends the 1992 United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) that commits State Parties to reduce greenhouse gas emissions, based on the scientific consensus that ::::::

global warming is occurring and

it is extremely likely that human-made CO2 emissions have predominantly caused it.

The Kyoto Protocol was adopted in Kyoto, Japan, on 11 December 1997 and entered into force on 16 February 2005.

The detailed rules for the implementation of the Protocol were adopted at COP 7 in Marrakesh, Morocco, in 2001, and are referred to as the "Marrakesh Accords."

Its first commitment period started in 2008 and ended in 2012.

The protocol was developed under the United Nations Framework Convention on Climate Change-UNFCCC.

The participating countries have ratified the Kyoto Protocol and committed to cutting the emissions of the Green House Gases such as :::: Methane (CH4), Nitrous oxide (N2O), Hydrofluorocarbons (HFCs), Perfluorocarbons (PFCs), Sulphur hexafluoride (SF6) & carbon dioxide(CO2).

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Classification Of Parties TO Kyoto Protocol ::::::::
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Annex I : Parties to the UNFCCC listed in Annex I of the Convention. These are the industrialised (developed) countries and "economies in transition" (EITs).

EITs are the former centrally-planned (Soviet) economies of Russia and Eastern Europe. The European Union-15 (EU-15) is also an Annex I Party.

Annex II : Parties to the UNFCCC listed in Annex II of the Convention. Annex II Parties are made up of members of the Organisation for Economic Cooperation and Development (OECD).

Annex II Parties are required to provide financial resources to enable developing countries in reducing their greenhouse gas emissions (climate change mitigation) and manage the impacts of climate change (climate change adaptation).

Annex B ::::: Parties listed in Annex B of the Kyoto Protocol are Annex I Parties with first or second round Kyoto greenhouse gas emissions targets.

Non-Annex I :::: Parties to the UNFCCC not listed in Annex I of the Convention are mostly low-income developing countries. Developing countries may volunteer to become Annex I countries when they are sufficiently developed.

Least-developed countries (LDCs) ::: 49 Parties are LDCs, and are given special status under the treaty in view of their limited capacity to adapt to the effects of climate change.

Mechanisms For Green Investment :::
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Emission Trading ::::  Emissions Trading‐mechanism allows parties to the Kyoto Protocol to buy 'Kyoto units' (emission permits for greenhouse gas) from other countries to help meet their domestic emission reduction targets.

Clean Development Mechanism (CDM) ::::: Countries can meet their domestic emission reduction targets by buying greenhouse gas reduction units from (projects in) non Annex I countries to the Kyoto protocol.

Joint Implementation :::: Any Annex I country can invest in emission reduction projects (referred to as "Joint Implementation Projects") in any other Annex I country as an alternative to reducing emissions domestically.
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Initiatives By India To Counter Climate Change :::::::
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National action plan on climate change (NAPCC) :::::: Government of India has launched eight Missions as part of NAPCC in specific areas which include assessment of the impact of climate change and actions needed to address climate change.

National Solar Mission

National Mission for Enhanced Energy Efficiency

National Mission on Sustainable Habitat

National Water Mission

National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem

National Mission for a "Green India"

National Mission for Sustainable Agriculture

National Mission on Strategic Knowledge for Climate Change


National Action Programme to Combat Desertification ::::::: 
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It is proposed to initiate activities such as assessment and mapping of land degradation, drought monitoring and early warning system, drought preparedness plans, and on-farm research activities for development of indigenous technology etc.
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