These days, many #professionals are stepping away from corporate roles.
Interestingly, #teaching is emerging as one of the most fulfilling career choices.
While teaching salaries in #India may not be very high, the profession is well-compensated in countries like the #USA and the #UK, both in terms of income and respect.
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While teaching salaries in #India may not be very high, the profession is well-compensated in countries like the #USA and the #UK, both in terms of income and respect.
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IIM अहमदाबाद के एक प्रोफेसर ने इकॉनॉमिक्स की क्लास में एक दिन “प्रेम समीकरण” सिखाया।
यूटिलिटी फंक्शन (utility function) माइक्रोइकॉनॉमिक्स की सबसे बुनियादी अवधारणाओं में से एक है। किसी वस्तु को जितना ज़्यादा पाते हैं, उसकी महत्ता उतनी कम होती जाती है। लेकिन कुछ मामलों में, जितना ज़्यादा मिलता है, उतनी ही ज़्यादा चाहत भी होती है।
मार्जिनल यूटिलिटी की गिरावट का नियम (Law of Diminishing Marginal Utility) शराब और ड्रग्स के सामने फेल हो जाता है। कुछ लोगों के लिए तो ये पैसा भी हो सकता है — जितना मिलता है, उतना और चाहिए।
लेकिन प्रेम के बारे में क्या?
मान लीजिए दो व्यक्ति हैं — पति (H) और पत्नी (W)।
• UH = पति को पत्नी के प्रेम से मिलने वाला लाभ (utility)
• UW = पत्नी को पति के प्रेम से मिलने वाला लाभ
अगर पत्नी, पति की ज़्यादा परवाह करती है, तो पति को ज़्यादा लाभ होता है। और पत्नी को तब ज़्यादा लाभ मिलता है जब पति उसकी ज़्यादा परवाह करता है। इस प्रकार, दोनों की देखभाल एक-दूसरे पर निर्भर होती है। यह एक recursive फंक्शन बन जाता है:
UH(UW(UH(UW(…))))
अगर किसी एक ने प्रेम थोड़ा कम कर दिया, तो यह एक चेन रिएक्शन शुरू कर सकता है — प्रेम और कम होता जाएगा।
लेकिन यदि आप थोड़ा ज़्यादा प्रेम कर दें, तो इस चेन को तोड़ा जा सकता है।
सबक क्या है?
इकॉनॉमिक्स मानता है कि हर व्यक्ति स्वार्थी और तर्कसंगत होता है। लेकिन अगर आप स्वार्थी भी हैं, तो भी आपको अपने पार्टनर की परवाह करनी चाहिए — क्योंकि इससे आपकी अपनी यूटिलिटी भी अधिकतम होगी।
क्या ये सब सिर्फ सैद्धांतिक बातें हैं?
Recursive utility theory की मदद से एसेट प्राइसिंग, इक्विटी vs डेब्ट रिटर्न, लॉन्ग टर्म vs शॉर्ट टर्म यील्ड, क्लाइमेट पॉलिसी डिज़ाइन और पेंशन फंड योजनाएं भी समझी जा सकती हैं।
लेकिन प्रेम का मॉडल बनाना शायद अब तक का सबसे कठिन काम है।
फैसला अभी बाकी है।
यूटिलिटी फंक्शन (utility function) माइक्रोइकॉनॉमिक्स की सबसे बुनियादी अवधारणाओं में से एक है। किसी वस्तु को जितना ज़्यादा पाते हैं, उसकी महत्ता उतनी कम होती जाती है। लेकिन कुछ मामलों में, जितना ज़्यादा मिलता है, उतनी ही ज़्यादा चाहत भी होती है।
मार्जिनल यूटिलिटी की गिरावट का नियम (Law of Diminishing Marginal Utility) शराब और ड्रग्स के सामने फेल हो जाता है। कुछ लोगों के लिए तो ये पैसा भी हो सकता है — जितना मिलता है, उतना और चाहिए।
लेकिन प्रेम के बारे में क्या?
मान लीजिए दो व्यक्ति हैं — पति (H) और पत्नी (W)।
• UH = पति को पत्नी के प्रेम से मिलने वाला लाभ (utility)
• UW = पत्नी को पति के प्रेम से मिलने वाला लाभ
अगर पत्नी, पति की ज़्यादा परवाह करती है, तो पति को ज़्यादा लाभ होता है। और पत्नी को तब ज़्यादा लाभ मिलता है जब पति उसकी ज़्यादा परवाह करता है। इस प्रकार, दोनों की देखभाल एक-दूसरे पर निर्भर होती है। यह एक recursive फंक्शन बन जाता है:
UH(UW(UH(UW(…))))
अगर किसी एक ने प्रेम थोड़ा कम कर दिया, तो यह एक चेन रिएक्शन शुरू कर सकता है — प्रेम और कम होता जाएगा।
लेकिन यदि आप थोड़ा ज़्यादा प्रेम कर दें, तो इस चेन को तोड़ा जा सकता है।
सबक क्या है?
इकॉनॉमिक्स मानता है कि हर व्यक्ति स्वार्थी और तर्कसंगत होता है। लेकिन अगर आप स्वार्थी भी हैं, तो भी आपको अपने पार्टनर की परवाह करनी चाहिए — क्योंकि इससे आपकी अपनी यूटिलिटी भी अधिकतम होगी।
क्या ये सब सिर्फ सैद्धांतिक बातें हैं?
Recursive utility theory की मदद से एसेट प्राइसिंग, इक्विटी vs डेब्ट रिटर्न, लॉन्ग टर्म vs शॉर्ट टर्म यील्ड, क्लाइमेट पॉलिसी डिज़ाइन और पेंशन फंड योजनाएं भी समझी जा सकती हैं।
लेकिन प्रेम का मॉडल बनाना शायद अब तक का सबसे कठिन काम है।
फैसला अभी बाकी है।
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