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New York Times की शानदार रिपोर्ट पूरा मामला आसानी से समझ आ जाता है
क्या होंगी हॉर्मूज़ स्ट्रेट खुलवाने में मुश्किल


ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध अब इतना बढ़ गया है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद है. सैकड़ों तेल के टैंकर दोनों तरफ खड़े हैं. इससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुकी हैं. इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ‘किसी भी तरह’ उसे फिर से खोलने की बात कर रहे हैं. लेकिन जानकार बताते हैं, ये काम आसान नहीं है. ईरान से कोई समझौता नहीं होता या अमेरिका कोई बड़ा मिलिट्री एक्शन नहीं लेता, तो स्ट्रेट बंद ही रहेगा.

होर्मुज स्ट्रेट बहुत संकरा और उथला है. भौगोलिक स्थिति ने ईरान की पकड़ को मज़बूती दी है. वहां जहाजों को ईरान के पहाड़ी तट के बहुत करीब से गुजरना पड़ता है. यही वजह है कि ईरान इस इलाके का फायदा उठाकर हमले करता है.

ईरान के पास छोटे हथियार हैं, जिनको पहाड़ों, गुफाओं और सुरंगों में छिपाया जाता है. जरूरत पड़ने पर इन्हें तट के पास से ही लॉन्च किया जा सकता है. हमला इतने कम समय में होता है कि जवाब देने का टाइम ही नहीं मिलता.

ट्रम्प का नौसेना के जहाजों का टैंकरों को एस्कॉर्ट करने, विमान से निगरानी और तट पर मौजूद मिसाइलों के हमलों का प्लान जटिल है. इसमें काफी संसाधन लगेगा और ये जोखिम भरा होगा.

जानकार बताते हैं: वहां वॉरशिप खुद भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होंगे. संकरे इलाके में जहाजों को चारों तरफ से खतरा होगा. ड्रोन और मिसाइल से बचाव मुश्किल होगा.

सबसे बड़ा खतरा समुद्र में बिछाई गई माइंस से है. थोड़ा भी ख़तरे का डर हो, तो कोई भी देश अपने बड़े जहाज वहां नहीं भेजेगा. उनको हटाने में वक़्त लगेगा, जो टीमें माइंस हटाती हैं, उन्हें भी सुरक्षा की जरूरत होती है.

अमेरिकी मरीन सैनिक इस इलाके की तरफ भेजे जा रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि उन्हें स्ट्रेट के आसपास के छोटे-छोटे द्वीपों पर तैनात किया जा सकता है, जहां से वे हमले रोकने या एयर डिफेंस सिस्टम लगाने का काम कर सकते हैं। लेकिन ईरान की बड़ी आर्मी को देखते वहां घुसना बहुत जोखिम भरा mission होगा. ट्रम्प इसके लिए तैयार नहीं होंगे.

जानकार एकमत हैं कि स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि आपसी बातचीत और राजनीतिक समझौते से ही निकलेगा
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इसमें दोराय नहीं कि डिजिटल क्रांति ने मानव जीवन को एक नई दिशा दी है। इसने गति और संपर्क की सुविधा का विस्तार किया है, लेकिन इस चमकदार तकनीकी संसार के पीछे एक अदृश्य संकट भी आकार ले रहा है। कृत्रिम मेधा, 'क्लाउड कंप्यूटिंग' और डेटा विस्तार के साथ-साथ दुनिया भर में डेटा सेंटरों का जाल तेजी से फैल रहा है। भारत भी इस वैश्विक दौड़ का प्रमुख केंद्र बन रहा है।

मगर यह निवेश भारत की तकनीकी महत्त्वाकांक्षाओं और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए जितना आशाजनक दिखता है, उतना ही देश के जल और ऊर्जा संसाधनों के लिए गहरी चिंता का कारण भी बनता जा रहा है।
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हाल ही में गूगल ने अपनी पर्यावरण रपट जारी की है, जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कृत्रिम मेधा पानी एआइ और डेटा सेंटर बिजली एवं पानी की मांग तेजी से बढ़ा रहे हैं। इसके अनुसार, गूगल डेटा सेंटरों ने 6.1 अरब गैलन पानी का उपयोग किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 17 फीसद अधिक था।
गूगल के मुताबिक, चर्ष 2030 तक बिजली की मांग भी चौदह गुना तक बढ़ सकती है। डेटा सेंटर सुनने में भले ही महज डिजिटल ढांचा लगें, लेकिन वास्तव में यह एक ऐसा विशाल संयंत्र हैं, जिन्हें चलाने के लिए निरंतर चिजली और पानी की आवश्यकता होती है। हजारों सर्वर चौबीसों घंटे चलते हैं और भीषण गर्मी पैदा करते हैं। इस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए 'कूलिंग सिस्टम' में स्वच्छ पानी जाता है।

आज जब हम स्मार्टफोन पर वीडियो काल करते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते हैं या एआइ से कोई सवाल पूछते हैं, तब अनजाने में हम धरती के जल संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा रहे होते हैं। दुनिया के कई हिस्सों से यह चेतावनी पहले ही सामने आ चुकी है कि डेटा सेंटर किस तरह स्थानीय जल संकट को जन्म दे रहे हैं।
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कच्चे तेल से पेट्रोल बनने तक का खर्चा
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जी7 देशों ने होर्मुज जलमार्ग को सुरक्षित करने का संकल्प लिया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, इटली, जर्मनी और कनाडा से मिलकर बने सात देशों के समूह (जी7) और यूरोपीय संघ (ईयू) ने शुक्रवार को घोषणा की कि वे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करने को तैयार हैं और होर्मुज जलमार्ग सहित समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए संकल्पित हैं।

विश्व के लगभग 20 फीसद तेल और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से होता है।






जी7 (G7) के बारे में मूल तथ्य

सदस्य देश: अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन (UK)। (नोट: यूरोपीय संघ/EU भी इसमें शामिल होता है)।
स्थापना: 1975 में (शुरुआत में G6 था, 1976 में कनाडा शामिल हुआ)।
भारत की स्थिति: भारत जी7 का सदस्य नहीं है, लेकिन इसे लगातार 'आउटरीच' या 'साझेदार देश' के रूप में आमंत्रित किया जाता रहा है।
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भारत खरीदेगा S– मिसाइल प्रणाली....
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नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली गिरफ्तार


Gen-Z प्रोटेस्ट में 77 लोगों की मौत हुई थी. आयोग की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई हुई है.
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Married Man का live in relationship में रहना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट


नैतिकता और कानून को अलग रखना होगा....यदि कानून के तहत अपराध नहीं बनता, तो सामाजिक विचार, नैतिकता अदालत का मार्गदर्शन नहीं करेंगे।
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JA 3281 अब हुआ JA 3280

पंचायती राज लेखा निदेशालय में 'कनिष्ठ सहायक' (Junior Assistant) के कुल पदों की संख्या 5 से घटाकर 4 कर दी गई है (विज्ञापन संख्या-12-परीक्षा/2024 के तहत)।
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प्रदूषण नियंत्रक भर्ती :


🍁कुल पदों में हुई कमी: यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इस भर्ती (विज्ञापन संख्या-02-परीक्षा/2026) में कुल पदों की संख्या 115 से घटाकर 93 कर दी गई है।

🍁कौन से पद हटाए गए: 'लेखाकार/लेखा परीक्षक' (Accountant/Auditor) के 22 पदों को इस चयन प्रक्रिया से हटा लिया गया है।

🍁कारण: विभाग की सेवा नियमावली में हाल ही में संशोधन हुआ है, जिसके कारण विभाग ने इन 22 पदों का विज्ञापन निरस्त करके अपना अधियाचन (requisition) वापस ले लिया है।
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22 मई से शुरू हो रही है मकान जनगणना
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भारत की विभिन्न जनजातियां...
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