Meaning of Shiva
When we say “Shiva,” there are two fundamental aspects that we are referring to. The word “Shiva” means literally, “that which is not.”
Shiva is Nothingness
Today, modern science is proving to us that everything comes from nothing and goes back to nothing. The basis of existence and the fundamental quality of the cosmos is vast nothingness. The galaxies are just a small happening – a sprinkling. The rest is all vast empty space, which is referred to as Shiva. That is the womb from which everything is born, and that is the oblivion into which everything is sucked back. Everything comes from Shiva and goes back to Shiva.

Shiva is Darkness
So Shiva is described as a non-being, not as a being. Shiva is not described as light, but as darkness. Humanity has gone about eulogizing light only because of the nature of the visual apparatus that they carry. Otherwise, the only thing that is always, is darkness. Light is a limited happening in the sense that any source of light – whether a light
When we say “Shiva,” there are two fundamental aspects that we are referring to. The word “Shiva” means literally, “that which is not.”
Shiva is Nothingness
Today, modern science is proving to us that everything comes from nothing and goes back to nothing. The basis of existence and the fundamental quality of the cosmos is vast nothingness. The galaxies are just a small happening – a sprinkling. The rest is all vast empty space, which is referred to as Shiva. That is the womb from which everything is born, and that is the oblivion into which everything is sucked back. Everything comes from Shiva and goes back to Shiva.

Shiva is Darkness
So Shiva is described as a non-being, not as a being. Shiva is not described as light, but as darkness. Humanity has gone about eulogizing light only because of the nature of the visual apparatus that they carry. Otherwise, the only thing that is always, is darkness. Light is a limited happening in the sense that any source of light – whether a light
#जय_श्री_राम ⛳ #सुन्दरकांड
हनुमान जी अतिप्रसन्न हो प्रभु श्री राम ने हनुमान जी से कहा आज तुम जो चाहो मुझसे माँगलो। हनुमान जी ने कहा प्रभु मुझे कुछ नही चाहिए। परंतु जब प्रभु श्री राम ने हठ पूर्वक मांगने को कहा तो हनुमान जी प्रभु श्री राम से श्री राम चरणो की भक्ति मांगी।
सन्त जन कहते है इस जगत में जितने भी सांसारिक सुख है उन सब के साथ कोई न कोई दुख अवश्य जुड़ा रहता है। परंतु प्रभु की भक्ति ही एक ऐसा सुख है जिसके साथ कोई दुख नही जुड़ा हुआ है। अर्थात सुख ही सुख.....
हनुमान जी की सरलता देख प्रभु अति प्रसन्न हुए ओर एवमस्तु बोल अपने चरणों की भक्ति प्रदान की। प्रभु श्री राम के सुंदर वचन सुन पूरी वानर सेना जय श्री राम का जयकारा लगाने लगी।
श्री राम और हनुमान जी के इस सुंदर संवाद के बारे में स्वयं भगवान शंकर ने कहा है कि जो इस संवाद को अपने ह्रदय में धारण करले तो समझो उसको प्रभु की भक्ति मिल गई।
प्रभु श्री राम ने वानरराज सुग्रीव को बुला कर कहा कि महाराज अब विलंब किस कारण अपने वानर सेना को आदेश दिजीये।
अति शीघ्र वानर सेना के बलशाली योद्धा वंहा आने लगे और सबने प्रभु श्री राम के चरणों मे प्रणाम किया। प्रभु की कृपा रूपी आशीर्वाद पाकर पूरी वानर सेना जय श्री राम के जयकारे के साथ लंका नगरी की ओर दक्षिण दिशा में पवन वेग से बढ़ने लगे।
प्रभु के लंका की ओर बढ़ते ही माता सीता को मंगल शगुन होने लगे। रावण के समक्ष अमंगलकारी अपशकुन होने लगे।
परंतु अभिमानी रावण ने अहंकार वश अमंगलकारी लक्षणों की कोई चिंता नही की।
अनगिनत वानर भालू बड़ी ही तेजी से गरजते हुए जयकारे लगाते हुये सागर तट पर पहुंच गए। ऐसा दृश्य बनने लगा मानो दो समुद्रो का मिलान हो रहा हो।
( एक समुद्र तो अथा सागर जल का ओर दूसरा राम जी की सेना का )
वाल्मीकि रामायण में सुन्दरकांड यही तक कहा गया है। परंतु गोस्वामी तुलसीदास जी एक बार पुनः सागर के पार लंका नगरी में हमे लेकर चलते है......
बोलो बजरंगबली की..........जय
श्री राम,,,जय राम,,,,,जय जय राम
श्री राम,,,जय राम,,,,,जय जय राम
#राम_राम ⛳ #सुन्दरकांड_पाठ
* नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥1॥
भावार्थ:-हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिए। हनुमान्जी की अत्यंत सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्री रामचंद्रजी ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा॥1॥
* उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥2॥
भावार्थ:-हे उमा! जिसने श्री रामजी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती। यह स्वामी-सेवक का संवाद जिसके हृदय में आ गया, वही श्री रघुनाथजी के चरणों की भक्ति पा गया॥2॥
* सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥3॥
भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर वानरगण कहने लगे- कृपालु आनंदकंद श्री रामजी की जय हो जय हो, जय हो! तब श्री रघुनाथजी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा- चलने की तैयारी करो॥3॥
*अब बिलंबु केह कारन कीजे। तुरंत कपिन्ह कहँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥4॥
भावार्थ:-अब विलंब किस कारण किया जाए। वानरों को तुरंत आज्ञा दो। (भगवान् की) यह लीला (रावणवध की तैयारी) देखकर, बहुत से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाश से अपने-अपने लोक को चले॥4॥
श्रीराम जी का वानरों की सेना के साथ चलकर समुद्र तट पर पहुँचना
दोहा :
* कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥34॥
भावार्थ:-वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र ही वानरों को बुलाया, सेनापतियों के समूह आ गए। वानर-भालुओं के झुंड अनेक रंगों के हैं और उनमें अतुलनीय बल है॥34॥
चौपाई :
* प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥1॥
भावार्थ:-वे प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्री रामजी ने वानरों की सारी सेना देखी। तब कमल नेत्रों से कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली॥1॥
* राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥2॥
भावार्थ:-राम कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गए। तब श्री रामजी ने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुंदर और शुभ शकुन हुए॥2॥
* जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥3॥
भावार्थ:-जिनकी कीर्ति सब मंगलों से पूर्ण है, उनके प्रस्थान के समय शकुन होना, यह नीति है (लीला की मर्यादा है)। प्रभु का प्रस्थान जानकीजी ने भी जान लिया। उनके
हनुमान जी अतिप्रसन्न हो प्रभु श्री राम ने हनुमान जी से कहा आज तुम जो चाहो मुझसे माँगलो। हनुमान जी ने कहा प्रभु मुझे कुछ नही चाहिए। परंतु जब प्रभु श्री राम ने हठ पूर्वक मांगने को कहा तो हनुमान जी प्रभु श्री राम से श्री राम चरणो की भक्ति मांगी।
सन्त जन कहते है इस जगत में जितने भी सांसारिक सुख है उन सब के साथ कोई न कोई दुख अवश्य जुड़ा रहता है। परंतु प्रभु की भक्ति ही एक ऐसा सुख है जिसके साथ कोई दुख नही जुड़ा हुआ है। अर्थात सुख ही सुख.....
हनुमान जी की सरलता देख प्रभु अति प्रसन्न हुए ओर एवमस्तु बोल अपने चरणों की भक्ति प्रदान की। प्रभु श्री राम के सुंदर वचन सुन पूरी वानर सेना जय श्री राम का जयकारा लगाने लगी।
श्री राम और हनुमान जी के इस सुंदर संवाद के बारे में स्वयं भगवान शंकर ने कहा है कि जो इस संवाद को अपने ह्रदय में धारण करले तो समझो उसको प्रभु की भक्ति मिल गई।
प्रभु श्री राम ने वानरराज सुग्रीव को बुला कर कहा कि महाराज अब विलंब किस कारण अपने वानर सेना को आदेश दिजीये।
अति शीघ्र वानर सेना के बलशाली योद्धा वंहा आने लगे और सबने प्रभु श्री राम के चरणों मे प्रणाम किया। प्रभु की कृपा रूपी आशीर्वाद पाकर पूरी वानर सेना जय श्री राम के जयकारे के साथ लंका नगरी की ओर दक्षिण दिशा में पवन वेग से बढ़ने लगे।
प्रभु के लंका की ओर बढ़ते ही माता सीता को मंगल शगुन होने लगे। रावण के समक्ष अमंगलकारी अपशकुन होने लगे।
परंतु अभिमानी रावण ने अहंकार वश अमंगलकारी लक्षणों की कोई चिंता नही की।
अनगिनत वानर भालू बड़ी ही तेजी से गरजते हुए जयकारे लगाते हुये सागर तट पर पहुंच गए। ऐसा दृश्य बनने लगा मानो दो समुद्रो का मिलान हो रहा हो।
( एक समुद्र तो अथा सागर जल का ओर दूसरा राम जी की सेना का )
वाल्मीकि रामायण में सुन्दरकांड यही तक कहा गया है। परंतु गोस्वामी तुलसीदास जी एक बार पुनः सागर के पार लंका नगरी में हमे लेकर चलते है......
बोलो बजरंगबली की..........जय
श्री राम,,,जय राम,,,,,जय जय राम
श्री राम,,,जय राम,,,,,जय जय राम
#राम_राम ⛳ #सुन्दरकांड_पाठ
* नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥1॥
भावार्थ:-हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिए। हनुमान्जी की अत्यंत सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्री रामचंद्रजी ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा॥1॥
* उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥2॥
भावार्थ:-हे उमा! जिसने श्री रामजी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती। यह स्वामी-सेवक का संवाद जिसके हृदय में आ गया, वही श्री रघुनाथजी के चरणों की भक्ति पा गया॥2॥
* सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥3॥
भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर वानरगण कहने लगे- कृपालु आनंदकंद श्री रामजी की जय हो जय हो, जय हो! तब श्री रघुनाथजी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा- चलने की तैयारी करो॥3॥
*अब बिलंबु केह कारन कीजे। तुरंत कपिन्ह कहँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥4॥
भावार्थ:-अब विलंब किस कारण किया जाए। वानरों को तुरंत आज्ञा दो। (भगवान् की) यह लीला (रावणवध की तैयारी) देखकर, बहुत से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाश से अपने-अपने लोक को चले॥4॥
श्रीराम जी का वानरों की सेना के साथ चलकर समुद्र तट पर पहुँचना
दोहा :
* कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥34॥
भावार्थ:-वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र ही वानरों को बुलाया, सेनापतियों के समूह आ गए। वानर-भालुओं के झुंड अनेक रंगों के हैं और उनमें अतुलनीय बल है॥34॥
चौपाई :
* प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥1॥
भावार्थ:-वे प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्री रामजी ने वानरों की सारी सेना देखी। तब कमल नेत्रों से कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली॥1॥
* राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥2॥
भावार्थ:-राम कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गए। तब श्री रामजी ने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुंदर और शुभ शकुन हुए॥2॥
* जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥3॥
भावार्थ:-जिनकी कीर्ति सब मंगलों से पूर्ण है, उनके प्रस्थान के समय शकुन होना, यह नीति है (लीला की मर्यादा है)। प्रभु का प्रस्थान जानकीजी ने भी जान लिया। उनके
बाएँ अंग फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे (कि श्री रामजी आ रहे हैं)॥3॥
* जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहिं सोई॥
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥4॥
भावार्थ:-जानकीजी को जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं॥4॥
* नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥5॥
भावार्थ:-नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलने वाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षों को धारण किए कोई आकाश मार्ग से और कोई पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। वे सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। (उनके चलने और गर्जने से) दिशाओं के हाथी विचलित होकर चिंग्घाड़ रहे हैं॥5॥
छंद :
* चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥1॥
भावार्थ:-दिशाओं के हाथी चिंग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चंचल हो गए (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब के सब मन में हर्षित हुए' कि (अब) हमारे दुःख टल गए। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्री रामचंद्रजी की जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहों को गा रहे हैं॥1॥
* सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥2॥
भावार्थ:-उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेना का बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात् बार-बार दाँतों को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्री रामचंद्रजी की सुंदर प्रस्थान यात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेषजी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों॥2॥
दोहा :
* एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥35॥
भावार्थ:-इस प्रकार कृपानिधान श्री रामजी समुद्र तट पर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥35॥
जय श्री राम
जय बजरंगबली
* जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहिं सोई॥
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥4॥
भावार्थ:-जानकीजी को जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं॥4॥
* नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥5॥
भावार्थ:-नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलने वाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षों को धारण किए कोई आकाश मार्ग से और कोई पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। वे सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। (उनके चलने और गर्जने से) दिशाओं के हाथी विचलित होकर चिंग्घाड़ रहे हैं॥5॥
छंद :
* चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥1॥
भावार्थ:-दिशाओं के हाथी चिंग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चंचल हो गए (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब के सब मन में हर्षित हुए' कि (अब) हमारे दुःख टल गए। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्री रामचंद्रजी की जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहों को गा रहे हैं॥1॥
* सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥2॥
भावार्थ:-उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेना का बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात् बार-बार दाँतों को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्री रामचंद्रजी की सुंदर प्रस्थान यात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेषजी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों॥2॥
दोहा :
* एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥35॥
भावार्थ:-इस प्रकार कृपानिधान श्री रामजी समुद्र तट पर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥35॥
जय श्री राम
जय बजरंगबली
*स्कूल टीचर ने बोर्ड पर लिखा:*
9×1=9
9×2=18
9×3=27
9×4=36
9×5=45
9×6=54
9×7=63
9×8=72
9×9=81
9×10=89
*लिखने के बाद बच्चों को देखा तो बच्चे शिक्षक पर हंस रहे थे, क्योंकि आखिरी लाइन गलत थी।*
*फिर शिक्षक ने कहा:*
*"मैंने आखिरी लाइन किसी उद्देश्य से गलत लिखी है क्यूंकि मैं तुम सभी को कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण सिखाना चाहता हूं।*
*दुनिया तुम्हारे साथ ऐसा ही व्यवहार करेगी..!*
*तुम देख सकते हो कि मैंने ऊपर 9 बार सही लिखा है पर किसी ने भी मेरी तारीफ नहीं की..??*
*पर मेरी सिर्फ एक ही गलती पर तुम लोग हंसे और मुझे क्रिटिसाइज भी किया।"*
*तो यही नसीहत है :*
*दुनिया कभी भी आपके लाख अच्छे कार्यों को एप्रीशिएट (appreciate) नहीं करेगी, परन्तु आपके द्वारा की गई एक गलती को क्रिटिसाइज (criticize) जरूर करेगी।*
*-ये एक कटु सत्य है*
9×1=9
9×2=18
9×3=27
9×4=36
9×5=45
9×6=54
9×7=63
9×8=72
9×9=81
9×10=89
*लिखने के बाद बच्चों को देखा तो बच्चे शिक्षक पर हंस रहे थे, क्योंकि आखिरी लाइन गलत थी।*
*फिर शिक्षक ने कहा:*
*"मैंने आखिरी लाइन किसी उद्देश्य से गलत लिखी है क्यूंकि मैं तुम सभी को कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण सिखाना चाहता हूं।*
*दुनिया तुम्हारे साथ ऐसा ही व्यवहार करेगी..!*
*तुम देख सकते हो कि मैंने ऊपर 9 बार सही लिखा है पर किसी ने भी मेरी तारीफ नहीं की..??*
*पर मेरी सिर्फ एक ही गलती पर तुम लोग हंसे और मुझे क्रिटिसाइज भी किया।"*
*तो यही नसीहत है :*
*दुनिया कभी भी आपके लाख अच्छे कार्यों को एप्रीशिएट (appreciate) नहीं करेगी, परन्तु आपके द्वारा की गई एक गलती को क्रिटिसाइज (criticize) जरूर करेगी।*
*-ये एक कटु सत्य है*
