भारत ने टीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की
12 नवंबर 2025 को जारी डब्ल्यूएचओ ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत में 2015 और 2024 के बीच तपेदिक (टीबी) की घटनाओं में 21% की कमी दर्ज की गई है, जो वैश्विक गिरावट दर से लगभग दोगुनी है।
प्रमुख बिंदु
टीबी की घटनाओं में तीव्र गिरावट: भारत में टीबी की घटनाओं में 2015 से 2024 तक 21% की गिरावट आई है, जो वैश्विक औसत कमी दर से बेहतर है।
बेहतर उपचार कवरेज: उपचार कवरेज 2015 में 53% से बढ़कर 2024 में 92% से अधिक हो गया, अनुमानित 27 लाख मामलों में से 26.18 लाख रोगियों का निदान किया गया और उन्हें उपचार दिया गया।
"लापता मामलों" में कमी: विस्तारित निगरानी और रिपोर्टिंग के कारण, टीबी के असूचित मामलों की संख्या 2015 में 15 लाख से नाटकीय रूप से घटकर 2024 में 1 लाख से भी कम हो गई।
एमडीआर-टीबी का बोझ स्थिर: भारत ने बहु-औषधि प्रतिरोधी टीबी मामलों में स्थिरता बनाए रखी है, जबकि टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत उपचार की सफलता 90% तक बढ़ गई है, जो वैश्विक औसत 88% से अधिक है।
टीबी मृत्यु दर में कमी: मृत्यु दर 28 प्रति लाख (2015) से घटकर 21 प्रति लाख (2024) हो गई, जिसे 2015 से सरकारी वित्त पोषण में लगभग दस गुना वृद्धि से समर्थन मिला।
टीबी मुक्त भारत के तहत राष्ट्रव्यापी जांच: 2022 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम में 19 करोड़ से अधिक संवेदनशील व्यक्तियों की जांच की गई है, जिससे प्रारंभिक पहचान को काफी मजबूती मिली है।
नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना: एआई-सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे उपकरणों की तैनाती, विस्तारित एनएएटी परीक्षण और डिजिटल उपकरणों से 24.5 लाख टीबी रोगियों के निदान में सहायता मिली है, जिनमें 8.61 लाख लक्षणहीन मामले शामिल हैं।
सबसे बड़ा टीबी लैब नेटवर्क: भारत में अब 9,391 तीव्र आणविक परीक्षण सुविधाएं और 107 कल्चर एवं डीएसटी प्रयोगशालाएं संचालित हैं, साथ ही 500 से अधिक एआई-सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे इकाइयां (1,500 और स्थापित की जा रही हैं) भी हैं।
सामुदायिक स्तर पर देखभाल को मजबूत करना: 1.78 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से, निदान और उपचार सेवाओं को विकेन्द्रीकृत किया जा रहा है और समुदायों के करीब ले जाया जा रहा है।
उन्नत पोषण सहायता: निक्षय पोषण योजना के अंतर्गत, मासिक डीबीटी सहायता 500 रुपये से दोगुनी होकर 1,000 रुपये प्रति मरीज हो गई है, तथा 2018 से अब तक 1.37 करोड़ लाभार्थियों को 4,406 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए गए हैं।
#CurrentAffairs #Current_affairs #Prelims_Special #DailyCurrentAffairs #SecurePcs
12 नवंबर 2025 को जारी डब्ल्यूएचओ ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत में 2015 और 2024 के बीच तपेदिक (टीबी) की घटनाओं में 21% की कमी दर्ज की गई है, जो वैश्विक गिरावट दर से लगभग दोगुनी है।
प्रमुख बिंदु
टीबी की घटनाओं में तीव्र गिरावट: भारत में टीबी की घटनाओं में 2015 से 2024 तक 21% की गिरावट आई है, जो वैश्विक औसत कमी दर से बेहतर है।
बेहतर उपचार कवरेज: उपचार कवरेज 2015 में 53% से बढ़कर 2024 में 92% से अधिक हो गया, अनुमानित 27 लाख मामलों में से 26.18 लाख रोगियों का निदान किया गया और उन्हें उपचार दिया गया।
"लापता मामलों" में कमी: विस्तारित निगरानी और रिपोर्टिंग के कारण, टीबी के असूचित मामलों की संख्या 2015 में 15 लाख से नाटकीय रूप से घटकर 2024 में 1 लाख से भी कम हो गई।
एमडीआर-टीबी का बोझ स्थिर: भारत ने बहु-औषधि प्रतिरोधी टीबी मामलों में स्थिरता बनाए रखी है, जबकि टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत उपचार की सफलता 90% तक बढ़ गई है, जो वैश्विक औसत 88% से अधिक है।
टीबी मृत्यु दर में कमी: मृत्यु दर 28 प्रति लाख (2015) से घटकर 21 प्रति लाख (2024) हो गई, जिसे 2015 से सरकारी वित्त पोषण में लगभग दस गुना वृद्धि से समर्थन मिला।
टीबी मुक्त भारत के तहत राष्ट्रव्यापी जांच: 2022 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम में 19 करोड़ से अधिक संवेदनशील व्यक्तियों की जांच की गई है, जिससे प्रारंभिक पहचान को काफी मजबूती मिली है।
नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना: एआई-सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे उपकरणों की तैनाती, विस्तारित एनएएटी परीक्षण और डिजिटल उपकरणों से 24.5 लाख टीबी रोगियों के निदान में सहायता मिली है, जिनमें 8.61 लाख लक्षणहीन मामले शामिल हैं।
सबसे बड़ा टीबी लैब नेटवर्क: भारत में अब 9,391 तीव्र आणविक परीक्षण सुविधाएं और 107 कल्चर एवं डीएसटी प्रयोगशालाएं संचालित हैं, साथ ही 500 से अधिक एआई-सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे इकाइयां (1,500 और स्थापित की जा रही हैं) भी हैं।
सामुदायिक स्तर पर देखभाल को मजबूत करना: 1.78 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से, निदान और उपचार सेवाओं को विकेन्द्रीकृत किया जा रहा है और समुदायों के करीब ले जाया जा रहा है।
उन्नत पोषण सहायता: निक्षय पोषण योजना के अंतर्गत, मासिक डीबीटी सहायता 500 रुपये से दोगुनी होकर 1,000 रुपये प्रति मरीज हो गई है, तथा 2018 से अब तक 1.37 करोड़ लाभार्थियों को 4,406 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए गए हैं।
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प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching )
हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) की घटनाओं में तीव्र वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक समुद्री जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) क्या है?
प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) एक पर्यावरणीय घटना है जिसमें प्रवाल (coral) अपने रंग को खो देते हैं और सफेद या पीले दिखाई देने लगते हैं।
इसका मुख्य कारण उनके साथ रहने वाले सहजीवी शैवाल (zooxanthellae) का अपवाह या मर जाना होता है।
ये शैवाल कोरल को रंग और ऊर्जा (photosynthesis के माध्यम से) प्रदान करते हैं।
जब शैवाल चले जाते हैं, तो कोरल का रंग फीका पड़ जाता है और वे जीवित रहने के लिए संघर्ष करने लगते हैं।
प्रवाल का प्राकृतिक वास
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हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) की घटनाओं में तीव्र वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक समुद्री जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) क्या है?
प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) एक पर्यावरणीय घटना है जिसमें प्रवाल (coral) अपने रंग को खो देते हैं और सफेद या पीले दिखाई देने लगते हैं।
इसका मुख्य कारण उनके साथ रहने वाले सहजीवी शैवाल (zooxanthellae) का अपवाह या मर जाना होता है।
ये शैवाल कोरल को रंग और ऊर्जा (photosynthesis के माध्यम से) प्रदान करते हैं।
जब शैवाल चले जाते हैं, तो कोरल का रंग फीका पड़ जाता है और वे जीवित रहने के लिए संघर्ष करने लगते हैं।
प्रवाल का प्राकृतिक वास
अक्षांश: 30°N से 30°S के बीचवैश्विक वितरण
जल: स्वच्छ, उथला, प्रकाश युक्त
तापमान: 16–32°C
गहराई: 50 मीटर से कम
अधिकतम प्रवाल भित्तियाँ: ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस
कोरल ट्रायंगल: विश्व का सबसे समृद्ध समुद्री जैव विविधता क्षेत्र
सदस्य: इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, पापुआ न्यू गिनी, तिमोर लेस्ते, सोलोमन द्वीप
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भारत में क्षय रोग का घटता बोझ: WHO रिपोर्ट
हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा ग्लोबल क्षय रोग रिपोर्ट 2025 जारी की गई।
ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025
यह वैश्विक, क्षेत्रीय और देश स्तर पर टीबी महामारी और इस रोग की रोकथाम, निदान और उपचार में हुई प्रगति का एक व्यापक और अद्यतन आकलन प्रस्तुत करती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मंत्रालयों से वार्षिक डेटा संग्रह दौरों में एकत्र किए गए आंकड़ों पर आधारित।
शामिल देश : वर्ष 2025 में, दुनिया की 99% से अधिक आबादी और टीबी के मामलों वाले 184 देशों और क्षेत्रों (215 में से) ने डाटा रिपोर्ट किया।
मुख्य निष्कर्ष
भारत में क्षय रोग की वार्षिक घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
भारत में टीबी के नए मामलों की संख्या वर्ष 2015 से 2024 के बीच 21% प्रतिवर्ष की दर से घटी है, जो वैश्विक औसत गिरावट (12%) से लगभग दोगुनी है।
वर्ष 2015 में भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर 237 टीबी मरीज दर्ज किए गए थे, जो वर्ष 2024 तक घटकर 187 प्रति लाख रह गए।
यह कमी विश्व स्तर पर सबसे तेज़ गिरावटों में से एक है और भारत को टीबी बोझ वाले देशों की सूची में एक उदाहरणात्मक सफलता के रूप में स्थापित करती है।
मृत्यु दर में कमी
भारत की टीबी मृत्यु दर में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है :
वर्ष 2015 में यह प्रति लाख जनसंख्या पर 28 मृत्यु थी।
जो वर्ष 2024 में घटकर 21 प्रति लाख रह गई है।
यह आँकड़ा इस बात को दर्शाता है कि भारत ने न केवल नए संक्रमणों को रोका है बल्कि मृत्यु दर में भी सतत कमी हासिल की है।
मिसिंग केस में भारी कमी
वर्ष 2015 में भारत में लगभग 15 लाख मिसिंग केस थे, यानी ऐसे लोग जिन्हें टीबी थी लेकिन उन्हें रिपोर्ट या उपचार नहीं मिला।
वर्ष 2024 में यह संख्या घटकर एक लाख से भी कम रह गई है। यह स्वास्थ्य प्रणाली की पहुँच और रिपोर्टिंग क्षमता में सुधार का संकेत है।
भारत की रणनीतिक पहलें
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस सफलता के पीछे भारत की नवोन्मेषी केस फाइंडिंग रणनीति, नई तकनीकों का तीव्र उपयोग, और सेवाओं का विकेंद्रीकरण जैसे कदम अहम रहे हैं।
वर्ष 2024 में 26.18 लाख मरीजों की पहचान की गई, जबकि कुल अनुमानित मामलों की संख्या लगभग 27 लाख थी।
इस प्रकार, भारत का उपचार कवरेज (Treatment Coverage) वर्ष 2015 के 53% से बढ़कर वर्ष 2024 में 92% तक पहुँच गया।
दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) पर नियंत्रण
स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि देश में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (MDR) टीबी के मामलों में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है।
यह इस बात का संकेत है कि भारत में टीबी नियंत्रण कार्यक्रम सही दिशा में कार्य कर रहा है, और उपचार प्रणाली प्रभावी है।
टीबी मुक्त भारत अभियान की सफलता
भारत सरकार द्वारा दिसंबर 2024 में शुरू किया गया “टीबी मुक्त भारत अभियान” देशभर में व्यापक स्तर पर चलाया गया है।
अब तक 19 करोड़ से अधिक संवेदनशील व्यक्तियों की स्क्रीनिंग की गई है।
इनमें से 24.5 लाख टीबी मरीज पहचाने गए हैं, जिनमें 8.61 लाख बिना लक्षण वाले (asymptomatic) मरीज भी शामिल हैं।
इस अभियान के अंतर्गत उपचार सफलता दर 90% तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक औसत 88% से अधिक है।
निष्कर्ष
भारत की टीबी नियंत्रण यात्रा अब वैश्विक सफलता का उदाहरण बन चुकी है। तकनीकी नवाचार, सामुदायिक भागीदारी, और सशक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के माध्यम से भारत ने यह दिखाया है कि टीबी जैसी पुरानी और घातक बीमारी को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
क्षय रोग (TB) के बारे में
#CurrentAffairs #Current_affairs #Prelims_Special #DailyCurrentAffairs #SecurePcs
हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा ग्लोबल क्षय रोग रिपोर्ट 2025 जारी की गई।
ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025
यह वैश्विक, क्षेत्रीय और देश स्तर पर टीबी महामारी और इस रोग की रोकथाम, निदान और उपचार में हुई प्रगति का एक व्यापक और अद्यतन आकलन प्रस्तुत करती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मंत्रालयों से वार्षिक डेटा संग्रह दौरों में एकत्र किए गए आंकड़ों पर आधारित।
शामिल देश : वर्ष 2025 में, दुनिया की 99% से अधिक आबादी और टीबी के मामलों वाले 184 देशों और क्षेत्रों (215 में से) ने डाटा रिपोर्ट किया।
मुख्य निष्कर्ष
भारत में क्षय रोग की वार्षिक घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
भारत में टीबी के नए मामलों की संख्या वर्ष 2015 से 2024 के बीच 21% प्रतिवर्ष की दर से घटी है, जो वैश्विक औसत गिरावट (12%) से लगभग दोगुनी है।
वर्ष 2015 में भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर 237 टीबी मरीज दर्ज किए गए थे, जो वर्ष 2024 तक घटकर 187 प्रति लाख रह गए।
यह कमी विश्व स्तर पर सबसे तेज़ गिरावटों में से एक है और भारत को टीबी बोझ वाले देशों की सूची में एक उदाहरणात्मक सफलता के रूप में स्थापित करती है।
मृत्यु दर में कमी
भारत की टीबी मृत्यु दर में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है :
वर्ष 2015 में यह प्रति लाख जनसंख्या पर 28 मृत्यु थी।
जो वर्ष 2024 में घटकर 21 प्रति लाख रह गई है।
यह आँकड़ा इस बात को दर्शाता है कि भारत ने न केवल नए संक्रमणों को रोका है बल्कि मृत्यु दर में भी सतत कमी हासिल की है।
मिसिंग केस में भारी कमी
वर्ष 2015 में भारत में लगभग 15 लाख मिसिंग केस थे, यानी ऐसे लोग जिन्हें टीबी थी लेकिन उन्हें रिपोर्ट या उपचार नहीं मिला।
वर्ष 2024 में यह संख्या घटकर एक लाख से भी कम रह गई है। यह स्वास्थ्य प्रणाली की पहुँच और रिपोर्टिंग क्षमता में सुधार का संकेत है।
भारत की रणनीतिक पहलें
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस सफलता के पीछे भारत की नवोन्मेषी केस फाइंडिंग रणनीति, नई तकनीकों का तीव्र उपयोग, और सेवाओं का विकेंद्रीकरण जैसे कदम अहम रहे हैं।
वर्ष 2024 में 26.18 लाख मरीजों की पहचान की गई, जबकि कुल अनुमानित मामलों की संख्या लगभग 27 लाख थी।
इस प्रकार, भारत का उपचार कवरेज (Treatment Coverage) वर्ष 2015 के 53% से बढ़कर वर्ष 2024 में 92% तक पहुँच गया।
दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) पर नियंत्रण
स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि देश में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (MDR) टीबी के मामलों में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है।
यह इस बात का संकेत है कि भारत में टीबी नियंत्रण कार्यक्रम सही दिशा में कार्य कर रहा है, और उपचार प्रणाली प्रभावी है।
टीबी मुक्त भारत अभियान की सफलता
भारत सरकार द्वारा दिसंबर 2024 में शुरू किया गया “टीबी मुक्त भारत अभियान” देशभर में व्यापक स्तर पर चलाया गया है।
अब तक 19 करोड़ से अधिक संवेदनशील व्यक्तियों की स्क्रीनिंग की गई है।
इनमें से 24.5 लाख टीबी मरीज पहचाने गए हैं, जिनमें 8.61 लाख बिना लक्षण वाले (asymptomatic) मरीज भी शामिल हैं।
इस अभियान के अंतर्गत उपचार सफलता दर 90% तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक औसत 88% से अधिक है।
निष्कर्ष
भारत की टीबी नियंत्रण यात्रा अब वैश्विक सफलता का उदाहरण बन चुकी है। तकनीकी नवाचार, सामुदायिक भागीदारी, और सशक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के माध्यम से भारत ने यह दिखाया है कि टीबी जैसी पुरानी और घातक बीमारी को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
क्षय रोग (TB) के बारे में
क्षय रोग (टीबी) एक रोकथाम योग्य और आमतौर पर इलाज योग्य बीमारी है।
हर साल 1 करोड़ से ज़्यादा लोग टीबी से बीमार पड़ते हैं और 10 लाख से ज़्यादा लोग इस बीमारी से मर जाते हैं।
यह दुनिया में किसी एक संक्रामक रोग से होने वाली मौत का सबसे बड़ा कारण है और दुनिया भर में मौत के शीर्ष 10 कारणों में से एक है।
वर्ष 2030 तक वैश्विक टीबी महामारी को समाप्त करने के लिए तत्काल कार्रवाई लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन के सभी सदस्य देशों ने अपनाया है।
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रिफ्ट वैली फीवर
हाल ही में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पश्चिमी अफ्रीका के मॉरिटानिया और सेनेगल में रिफ्ट वैली फीवर (RVF) के प्रकोप की पुष्टि की है।
रिफ्ट वैली फीवर के बारे में
यह फेनुइविरिडे (Phenuiviridae) कुल से संबंधित फ्लेबोवायरस के कारण होता है। यह मुख्यतः भेड़, बकरी, मवेशी एवं ऊँट जैसे जानवरों को प्रभावित करता है।
मनुष्य संक्रमित पशुओं के निकट संपर्क से या संक्रमित मच्छरों के काटने से संक्रमित हो जाते हैं। यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता हुआ नहीं पाया गया है।
मच्छरों की कई प्रजातियाँ रिफ्ट वैली बुखार वायरस को संचारित कर सकती हैं तथा प्रमुख वाहक एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न होता है।
रिफ्ट वैली बुखार की उत्पत्ति एवं इतिहास
इसका नाम केन्या की रिफ्ट वैली से लिया गया है जहाँ 1930 के दशक के प्रारंभ में इस रोग की पहली बार पहचान हुई थी। तब से यह संक्रमण उप-सहारा अफ्रीका में फैल गया है।
वर्ष 1977 में यह उत्तर की ओर मिस्र तक फैल गया और 2000 तक यह लाल सागर को पार कर सऊदी अरब व यमन तक पहुँच गया, जो अफ्रीकी महाद्वीप के बाहर इसकी पहली पुष्टि थी।
रिफ्ट वैली फीवर के लक्षण
लगभग 90% मामलों में इसके लक्षण हल्के व फ्लू जैसी बीमारी के रूप में सामने आता है जो संक्रमण के दो से छह दिन बाद शुरू होता है।
इसकी शुरुआत तेज बुखार, मांसपेशियों एवं जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, कमजोरी और पीठ दर्द से होती है जिसमें कभी-कभी मतली, उल्टी व प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता भी होती है।
कुछ रोगियों में रोग गंभीर रूप ले लेता है जिससे आंखें, मस्तिष्क या यकृत प्रभावित होते हैं।
वर्तमान में इसका कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। चिकित्सा देखभाल मुख्यतः सहायक होती है।
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हाल ही में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पश्चिमी अफ्रीका के मॉरिटानिया और सेनेगल में रिफ्ट वैली फीवर (RVF) के प्रकोप की पुष्टि की है।
रिफ्ट वैली फीवर के बारे में
यह फेनुइविरिडे (Phenuiviridae) कुल से संबंधित फ्लेबोवायरस के कारण होता है। यह मुख्यतः भेड़, बकरी, मवेशी एवं ऊँट जैसे जानवरों को प्रभावित करता है।
मनुष्य संक्रमित पशुओं के निकट संपर्क से या संक्रमित मच्छरों के काटने से संक्रमित हो जाते हैं। यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता हुआ नहीं पाया गया है।
मच्छरों की कई प्रजातियाँ रिफ्ट वैली बुखार वायरस को संचारित कर सकती हैं तथा प्रमुख वाहक एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न होता है।
रिफ्ट वैली बुखार की उत्पत्ति एवं इतिहास
इसका नाम केन्या की रिफ्ट वैली से लिया गया है जहाँ 1930 के दशक के प्रारंभ में इस रोग की पहली बार पहचान हुई थी। तब से यह संक्रमण उप-सहारा अफ्रीका में फैल गया है।
वर्ष 1977 में यह उत्तर की ओर मिस्र तक फैल गया और 2000 तक यह लाल सागर को पार कर सऊदी अरब व यमन तक पहुँच गया, जो अफ्रीकी महाद्वीप के बाहर इसकी पहली पुष्टि थी।
रिफ्ट वैली फीवर के लक्षण
लगभग 90% मामलों में इसके लक्षण हल्के व फ्लू जैसी बीमारी के रूप में सामने आता है जो संक्रमण के दो से छह दिन बाद शुरू होता है।
इसकी शुरुआत तेज बुखार, मांसपेशियों एवं जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, कमजोरी और पीठ दर्द से होती है जिसमें कभी-कभी मतली, उल्टी व प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता भी होती है।
कुछ रोगियों में रोग गंभीर रूप ले लेता है जिससे आंखें, मस्तिष्क या यकृत प्रभावित होते हैं।
वर्तमान में इसका कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। चिकित्सा देखभाल मुख्यतः सहायक होती है।
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लेप्चा समुदाय के पारंपरिक वाद्ययंत्रों को मिला GI टैग
भारत सरकार ने सिक्किम के लेप्चा समुदाय के दो पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों —तुंगबुक (Tungbuk) और पुमटोंग पुलित (Pumtong Pulit) — को भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI) टैग प्रदान किया है।
यह मान्यता लेप्चा समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रमुख बिंदु:
घोषणा तिथि: 5 नवंबर 2025
पंजीकरण श्रेणी: वाद्ययंत्र (Musical Instruments Category)
GI पंजीकरण प्राधिकरण: भारत सरकार की भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री (Chennai)
सम्मान समारोह: नई दिल्ली में आयोजित प्रथम जनजातीय व्यापार सम्मेलन
आयोजन: संस्कृति मंत्रालय,जनजातीय कार्य मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
मुख्य अतिथि: केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और जुएल ओराम
GI टैग का महत्व:
इन पारंपरिक वाद्ययंत्रों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और कानूनी सुरक्षा प्राप्त हुई।
इससे इनका सांस्कृतिक पुनरुद्धार (Cultural Revival) होगा।
युवा पीढ़ी में परंपरागत संगीत के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
कारीगरों की आजीविका को नई आर्थिक संभावनाएँ प्राप्त होंगी।
भारत सरकार ने सिक्किम के लेप्चा समुदाय के दो पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों —तुंगबुक (Tungbuk) और पुमटोंग पुलित (Pumtong Pulit) — को भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI) टैग प्रदान किया है।
यह मान्यता लेप्चा समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रमुख बिंदु:
घोषणा तिथि: 5 नवंबर 2025
पंजीकरण श्रेणी: वाद्ययंत्र (Musical Instruments Category)
GI पंजीकरण प्राधिकरण: भारत सरकार की भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री (Chennai)
सम्मान समारोह: नई दिल्ली में आयोजित प्रथम जनजातीय व्यापार सम्मेलन
आयोजन: संस्कृति मंत्रालय,जनजातीय कार्य मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
मुख्य अतिथि: केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और जुएल ओराम
GI टैग का महत्व:
इन पारंपरिक वाद्ययंत्रों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और कानूनी सुरक्षा प्राप्त हुई।
इससे इनका सांस्कृतिक पुनरुद्धार (Cultural Revival) होगा।
युवा पीढ़ी में परंपरागत संगीत के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
कारीगरों की आजीविका को नई आर्थिक संभावनाएँ प्राप्त होंगी।
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लेप्चा समुदाय के पारंपरिक वाद्ययंत्रों को मिला GI टैग भारत सरकार ने सिक्किम के लेप्चा समुदाय के दो पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों —तुंगबुक (Tungbuk) और पुमटोंग पुलित (Pumtong Pulit) — को भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI) टैग प्रदान किया है। यह मान्यता…
महत्वपूर्ण बिंदु:
GI टैग का प्रबंधन: भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत।
प्राधिकरण: भारतीय पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क महानियंत्रक (CGPDTM), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय।
सिक्किम के अन्य GI उत्पाद: सिक्किम टी, दार्जिलिंग टी, सिक्किम ऑरेंज आदि।
GI टैग का प्रबंधन: भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत।
प्राधिकरण: भारतीय पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क महानियंत्रक (CGPDTM), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय।
सिक्किम के अन्य GI उत्पाद: सिक्किम टी, दार्जिलिंग टी, सिक्किम ऑरेंज आदि।
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बचपन में पूछा गया सबसे अधिक सवाल - " बड़ा होकर क्या बनना है ?
अब जाकर जवाब मिला -" फिर से बच्चा बनना है...!"
𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐜𝐡𝐢𝐥𝐝𝐫𝐞𝐧'𝐬 𝐝𝐚𝐲 🫂
अब जाकर जवाब मिला -" फिर से बच्चा बनना है...!"
𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐜𝐡𝐢𝐥𝐝𝐫𝐞𝐧'𝐬 𝐝𝐚𝐲 🫂
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KVS/NVS 2025 Notification Out
Total Vacancies: 10000+
Application Fee: 2800, 2000, 1700
Apply Dates: 14 Nov to 04 Dec 2025
Total Vacancies: 10000+
Application Fee: 2800, 2000, 1700
Apply Dates: 14 Nov to 04 Dec 2025
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वर्तमान में उत्तर प्रदेश लेखपाल के 7994 पदों का अधियाचन आयोग के पास है इसका विज्ञापन PET रिजल्ट के तुंरन्त बाद जारी होने की संभावना है।
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🎲 Quiz 'Ro Aro सामान्य हिंदी 2023 पुनर्परीक्षा प्रश्नोत्तरी।💐 परीक्षा तिथि: 27 जुलाई 2025'
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वैनेडियम
हाल ही में, केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य व विद्युत मंत्री मनोहर लाल ने राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) के नेत्रा में भारत की सबसे बड़ी और पहली 3 मेगावाट-घंटे क्षमता (3 MWh Capacity) वाली वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरी (VRFB) प्रणाली का उद्घाटन किया।
वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरी के बारे में
यह ऐतिहासिक परियोजना लंबे समय के लिए ऊर्जा भंडारण (LDES) संबंधी समाधानों की दिशा में देश का एक बड़ा कदम है जो नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण और ग्रिड लचीलापन को बेहतर करता है।
वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरी एक समकालीन तकनीक है जो पारंपरिक लीथियम आयन-आधारित बैटरियों के विकल्पों में से एक के तौर पर उभरने की क्षमता रखती है। इस एडवांस बैटरी प्रणाली के विकास से बैटरी प्रणालियों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले तत्वों का भंडार बढ़ेगा।
इसे नेत्रा (NETRA) टीम ने विकसित किया है जो ग्रेटर नोएडा में स्थित NTPC का अनुसंधान एवं विकास केंद्र है।
वैनेडियम के बारे में
इस रासायनिक तत्व का प्रतीक ‘V’ और परमाणु संख्या 23 है। यह सिल्वर-ग्रे, तन्य व आघातवर्धनीय धातु तत्व है।
यह अधिकांश धातुओं की तुलना में अधिक कठोर है तथा क्षार व अम्ल के प्रति अच्छा संक्षारण प्रतिरोध प्रदर्शित करता है।https://t.me/SecurePcs
हाल ही में, केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य व विद्युत मंत्री मनोहर लाल ने राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) के नेत्रा में भारत की सबसे बड़ी और पहली 3 मेगावाट-घंटे क्षमता (3 MWh Capacity) वाली वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरी (VRFB) प्रणाली का उद्घाटन किया।
वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरी के बारे में
यह ऐतिहासिक परियोजना लंबे समय के लिए ऊर्जा भंडारण (LDES) संबंधी समाधानों की दिशा में देश का एक बड़ा कदम है जो नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण और ग्रिड लचीलापन को बेहतर करता है।
वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरी एक समकालीन तकनीक है जो पारंपरिक लीथियम आयन-आधारित बैटरियों के विकल्पों में से एक के तौर पर उभरने की क्षमता रखती है। इस एडवांस बैटरी प्रणाली के विकास से बैटरी प्रणालियों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले तत्वों का भंडार बढ़ेगा।
इसे नेत्रा (NETRA) टीम ने विकसित किया है जो ग्रेटर नोएडा में स्थित NTPC का अनुसंधान एवं विकास केंद्र है।
वैनेडियम के बारे में
इस रासायनिक तत्व का प्रतीक ‘V’ और परमाणु संख्या 23 है। यह सिल्वर-ग्रे, तन्य व आघातवर्धनीय धातु तत्व है।
यह अधिकांश धातुओं की तुलना में अधिक कठोर है तथा क्षार व अम्ल के प्रति अच्छा संक्षारण प्रतिरोध प्रदर्शित करता है।https://t.me/SecurePcs
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हाल ही में, विद्युत मंत्रालय और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने भारत की पहली और सबसे बड़ी 3 मेगावाट घंटा क्षमता वाली MWh-स्तरीय वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरी (VRFB) प्रणाली का उद्घाटन किया। वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरियों (VRFB) के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
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हाल ही में, बेलेम में आयोजित COP30 में जलवायु जोखिम सूचकांक (CRI) 2026 जारी किया गया, जिसमें चरम मौसम की घटनाओं के दीर्घकालिक वैश्विक प्रभावों पर प्रकाश डाला गया। CRI 2026 के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
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Anonymous Quiz
63%
यह चरम मौसम की घटनाओं के मानवीय और आर्थिक प्रभावों के आधार पर देशों को रैंक करता है
19%
यह विश्व बैंक द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है
11%
यह पहली बार 2020 में प्रकाशित हुआ था
7%
यह केवल मौसम संबंधी खतरों जैसे तूफानों को कवर करता है
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बाल साहित्य पुरस्कार 2025, 14 नवंबर 2025 को नई दिल्ली में प्रदान किया गया, जिसमें 24 भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य में उत्कृष्ट कृतियों को सम्मानित किया गया।
बाल साहित्य पुरस्कार के बारे में
यह पुरस्कार साहित्य अकादमी द्वारा स्थापित किया गया है और भारत की 24 प्रमुख भाषाओं में लिखे गए बाल साहित्य में उत्कृष्टता को मान्यता देता है।
इन 24 भाषाओं में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ शामिल हैं, साथ ही अंग्रेजी और राजस्थानी को भी सम्मिलित किया गया है।
पुरस्कार के घटक: प्रत्येक पुरस्कार विजेता को ₹50,000 की नकद राशि और साहित्यिक श्रेष्ठता के लिए एक कांस्य पट्टिका प्रदान की जाती है।
पुरस्कृत भाषाएँ और विधाएँ: पुरस्कार कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, और संस्मरण जैसी विधाओं में दिए जाते हैं, जो भारत की बहुभाषी सृजनात्मक समृद्धि को दर्शाते हैं।
प्रमुख विजेता (2025): इस वर्ष कुल 24 बाल लेखकों को सम्मानित किया गया।
अंग्रेजी: दक्षिण: दक्षिण भारतीय मिथक और दंतकथाओं का पुनर्कथन – नितिन कुशलप्पा
हिंदी: एक बटे बारह – सुशील शुक्ला
तमिल: ओट्राई सिरागु ओविया – विष्णुपुरम् सरवनन
मलयालम: पेंगुइनुकालुडे वंकाराविल – श्रीजीत मूठेदथ
पंजाबी: जद्दू पत्ता – पाली खादिम।
महत्त्व: बाल साहित्य पुरस्कार 2025 भारत की साहित्यिक समावेशिता को मजबूत करता है, क्षेत्रीय आवाजों का सम्मान करता है और बाल साहित्य में लेखकों की नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करता है।
बाल साहित्य पुरस्कार के बारे में
यह पुरस्कार साहित्य अकादमी द्वारा स्थापित किया गया है और भारत की 24 प्रमुख भाषाओं में लिखे गए बाल साहित्य में उत्कृष्टता को मान्यता देता है।
इन 24 भाषाओं में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ शामिल हैं, साथ ही अंग्रेजी और राजस्थानी को भी सम्मिलित किया गया है।
पुरस्कार के घटक: प्रत्येक पुरस्कार विजेता को ₹50,000 की नकद राशि और साहित्यिक श्रेष्ठता के लिए एक कांस्य पट्टिका प्रदान की जाती है।
पुरस्कृत भाषाएँ और विधाएँ: पुरस्कार कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, और संस्मरण जैसी विधाओं में दिए जाते हैं, जो भारत की बहुभाषी सृजनात्मक समृद्धि को दर्शाते हैं।
प्रमुख विजेता (2025): इस वर्ष कुल 24 बाल लेखकों को सम्मानित किया गया।
अंग्रेजी: दक्षिण: दक्षिण भारतीय मिथक और दंतकथाओं का पुनर्कथन – नितिन कुशलप्पा
हिंदी: एक बटे बारह – सुशील शुक्ला
तमिल: ओट्राई सिरागु ओविया – विष्णुपुरम् सरवनन
मलयालम: पेंगुइनुकालुडे वंकाराविल – श्रीजीत मूठेदथ
पंजाबी: जद्दू पत्ता – पाली खादिम।
महत्त्व: बाल साहित्य पुरस्कार 2025 भारत की साहित्यिक समावेशिता को मजबूत करता है, क्षेत्रीय आवाजों का सम्मान करता है और बाल साहित्य में लेखकों की नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करता है।
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