लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धाराएं- 33 से 36
प्रमुख प्रावधान (RPA, 1951- धाराएं 33-36):
धारा 33 (नामांकन दाखिल करना): उम्मीदवार स्वयं और प्रस्तावकों द्वारा हस्ताक्षरित नामांकन पत्र जमा करेंगे। किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के मामले में एक और निर्दलीय के लिए दस प्रस्तावक होंगे।
धारा 33A (प्रकटीकरण): उम्मीदवार द्वारा आपराधिक मामलों, संपत्ति, देनदारियों और शिक्षा की अनिवार्य घोषणा।
धारा 33B (सीमा): धारा 33A में निर्धारित जानकारी के अतिरिक्त जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है।
धारा 34 (जमानत राशि): ₹25,000 (लोक सभा) या ₹10,000 (विधान सभा)। कुल मतों के छठे हिस्से से कम मत मिलने पर जमानत जब्त हो जाएगी (धारा 158)।
धारा 35 (अधिसूचना): रिटर्निंग ऑफिसर (RO) नामांकन, संवीक्षा और नाम वापसी (यानी उम्मीदवारी वापस लेने) के लिए समय व स्थान की घोषणा करेगा।
धारा 36 (संवीक्षा): RO दोषपूर्ण कागजात की जांच करेगा और उसे अस्वीकार कर सकेगा।
#imp #Current #CurrentAffairs #uppcsmains
नामांकन पत्रों की अस्वीकृति पर हालिया बहस ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 के तहत भारत की चुनावी नामांकन प्रक्रिया में सुधार की मांग को फिर से प्रकट किया है।
प्रमुख प्रावधान (RPA, 1951- धाराएं 33-36):
धारा 33 (नामांकन दाखिल करना): उम्मीदवार स्वयं और प्रस्तावकों द्वारा हस्ताक्षरित नामांकन पत्र जमा करेंगे। किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के मामले में एक और निर्दलीय के लिए दस प्रस्तावक होंगे।
धारा 33A (प्रकटीकरण): उम्मीदवार द्वारा आपराधिक मामलों, संपत्ति, देनदारियों और शिक्षा की अनिवार्य घोषणा।
धारा 33B (सीमा): धारा 33A में निर्धारित जानकारी के अतिरिक्त जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है।
धारा 34 (जमानत राशि): ₹25,000 (लोक सभा) या ₹10,000 (विधान सभा)। कुल मतों के छठे हिस्से से कम मत मिलने पर जमानत जब्त हो जाएगी (धारा 158)।
धारा 35 (अधिसूचना): रिटर्निंग ऑफिसर (RO) नामांकन, संवीक्षा और नाम वापसी (यानी उम्मीदवारी वापस लेने) के लिए समय व स्थान की घोषणा करेगा।
धारा 36 (संवीक्षा): RO दोषपूर्ण कागजात की जांच करेगा और उसे अस्वीकार कर सकेगा।
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फार्मा और मेडटेक में अनुसंधान और नवाचार को संवर्धन (पीआरआईपी) योजना
PRIP योजना के बारे में
#Current #CurrentAffairs #uppcsmains #Current_affairs
केंद्र ने फार्मा एवं मेडटेक में अनुसंधान एवं नवाचार को संवर्धन (PRIP) योजना के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि बढ़ा दी।
PRIP योजना के बारे में
प्रारंभकर्ता: रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के तहत औषध विभाग।
वित्तीय परिव्यय: 5000 करोड़ रुपये।
उद्देश्य: फार्मा और मेडटेक क्षेत्रक में अनुसंधान एवं विकास के लिए भारत को एक वैश्विक केंद्र बनाना।
विशेषताएं:
घटक A: राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (NIPERs) में उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना करके अनुसंधान से संबंधित अवसंरचना को मजबूत करना।
घटक B: फार्मा और मेडटेक क्षेत्रक में अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देना।
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रीसस मकाक
इससे इसे अवैध रूप से अपने पास रखने और क्रूरता के विरुद्ध इसकी वैधानिक सुरक्षा बहाल होगी।
रीसस मकैक के बारे में
वैज्ञानिक नाम: मकाका मूलाटा।
मूल पर्यावास: मुख्य भूमि एशिया।
ये गैर-मानव प्राइमेट हैं, जो मनुष्यों के साथ लगभग 93% आनुवंशिक अनुक्रम समानता साझा करते हैं।
आहार: सर्वाहारी।
विशेषताएं: ये वृक्षों और स्थल दोनों पर रह सकते हैं।
संरक्षण स्थिति: लीस्ट कंसर्न (IUCN)।
#Current #uppcsmains #CurrentAffairs #Prelims_Special
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने रीसस मकैक को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची II में फिर से शामिल करने की सिफ़ारिश की है।
इससे इसे अवैध रूप से अपने पास रखने और क्रूरता के विरुद्ध इसकी वैधानिक सुरक्षा बहाल होगी।
रीसस मकैक के बारे में
वैज्ञानिक नाम: मकाका मूलाटा।
मूल पर्यावास: मुख्य भूमि एशिया।
ये गैर-मानव प्राइमेट हैं, जो मनुष्यों के साथ लगभग 93% आनुवंशिक अनुक्रम समानता साझा करते हैं।
आहार: सर्वाहारी।
विशेषताएं: ये वृक्षों और स्थल दोनों पर रह सकते हैं।
संरक्षण स्थिति: लीस्ट कंसर्न (IUCN)।
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आज के महत्वपूर्ण करेंट अफेयर्स
कंटेंट पसंद आ रहा हो तो और भी लोगों को इस मंच से जोड़ते रहें।
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डीएनए की संरचना (Structure Of DNA) की खोज करने वाले अमेरिकी नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक जेम्स वॉटसन का 97 साल की आयु में निधन हो गया है. 20वीं सदी की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खोजों में से एक के रूप में, उन्होंने 1953 में ब्रिटिश वैज्ञानिक फ्रांसिस क्रिक के साथ मिलकर डीएनए की डबल हेलिक्स (double-helix structure) संरचना की पहचान की थी।
#Current #Fact #CurrentAffairs #Personality
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Essay Questions:
सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता
GS Question
झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग 250 शब्द)
सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता
GS Question
झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग 250 शब्द)
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Essay Questions: सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता GS Question झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग…
जो भी बहन भाई मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन कर रहे हैं या करना चाहते हैं उन्हें इस मंच से जरूर जोड़िए
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Essay Questions: सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता GS Question झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग…
सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता
प्रस्तावना
वायु प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या है, लेकिन इसका प्रकोप समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट, "सांसों का आपातकाल" का चौथा अध्याय स्पष्ट करता है कि वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा बोझ झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रह रहे गरीब समुदायों को उठाना पड़ता है। यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जो गरीबी और असमानता की खाई को और गहरा कर रहा है।
हाशिये के लोगों पर दोहरी मार
शहरीकरण की तीव्र गति के साथ अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार तेजी से हुआ है। 2001 से 2011 के बीच, जहां शहरी आबादी में 32% की वृद्धि हुई, वहीं झुग्गी बस्तियों की आबादी में 131% की चौंका देने वाली वृद्धि दर्ज की गई। भारत में हर छह शहरी भारतीयों में से कम से कम एक इन बस्तियों में रहता है।
इन समुदायों पर वायु प्रदूषण की दोहरी मार पड़ती है। पहला, वे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं, और दूसरा, उनके पास प्रदूषण जनित बीमारियों से लड़ने के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ और पोषण नहीं होता। जनगणना 2011 के आँकड़ों के अनुसार, इन बस्तियों में रहने वाले 10 में से 6 लोग गंदे नालों के पास रहते हैं, और हर छठा व्यक्ति पीने के साफ पानी से वंचित है। मूलभूत सुविधाओं की यह कमी उनके स्वास्थ्य को और भी अधिक असुरक्षित बना देती है।
प्रदूषण के हॉटस्पॉट और झुग्गी बस्तियों का गठजोड़
अध्ययन बताते हैं कि झुग्गी या अनौपचारिक बस्तियाँ अक्सर उन स्थानों पर स्थित होती हैं, जिन्हें वायु प्रदूषण का हॉटस्पॉट माना जाता है। ये स्थान आमतौर पर कचरा डंपिंग स्थल, खुले में कचरा जलाने की जगहें, अत्यधिक ट्रैफिक वाले इलाके, छोटे निर्माण स्थल और असंगठित औद्योगिक इकाइयों के पास होते हैं। जयपुर और कोलकाता जैसे शहरों में किए गए "वल्नरेबिलिटी मैपिंग" में यह पाया गया है कि प्रदूषण के हॉटस्पॉट, हीट वेव हॉटस्पॉट और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र अक्सर झुग्गी बस्तियों के स्थान से मेल खाते हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
चूंकि ये बस्तियाँ अक्सर शहर के बाहरी और उपेक्षित हिस्सों में होती हैं, इसलिए वे नगर निगम की सेवाओं, परिवहन, सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के दायरे से बाहर रह जाती हैं। आवास नीति का ऐतिहासिक फोकस भी इन्हें शहर से बाहर विस्थापित करने पर रहा है, जिससे इन समुदायों की मुश्किलें और बढ़ी हैं। हालाँकि, हाल की नीतियों में "इन-सीटू डेवलपमेंट" (मौके पर ही बुनियादी सुविधाएं देना) जैसे सुधार शुरू हुए हैं।
व्यावसायिक जोखिम और स्वास्थ्य पर प्रभाव
गरीब और हाशिये पर रहने वाले लोग, विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर, व्यावसायिक जोखिम के कारण सबसे ज्यादा जहरीली हवा के संपर्क में आते हैं। कचरा बीनने वाले, नगर निगम के सफाई कर्मचारी और निर्माण मजदूर लगातार प्रदूषण पैदा करने वाली गतिविधियों के बहुत करीब काम करते हैं।
दिल्ली में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कचरा बीनने वालों में 86% बीमारियों का कारण वायु प्रदूषण था, और उनके फेफड़ों की क्षमता अन्य समूहों की तुलना में काफी कम पाई गई। इन कामगारों में सांस लेने में रुकावट और फेफड़ों में क्षति की गंभीरता 57% तक देखी गई। महिला सफाईकर्मियों में सांस की बीमारियों का खतरा पुरुषों की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक पाया गया, जो लैंगिक असमानता को भी दर्शाता है। निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, जो सिलिका और एस्बेस्टस जैसी घातक धूल के संपर्क में आते हैं, उन्हें फेफड़ों का कैंसर, सिलिकोसिस और अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा होता है।
निष्कर्ष
वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता का यह खतरनाक गठजोड़ 'सांसों का आपातकाल' पैदा कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भले ही वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है, लेकिन इसका स्वास्थ्य बोझ गरीब और हाशिये पर रह रहे लोगों पर असंगत रूप से अधिक पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए केवल प्रदूषण कम करने की नीतियां पर्याप्त नहीं हैं। हमें "इन-सीटू डेवलपमेंट" पर जोर देने, अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए बेहतर व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा लागू करने, और प्रदूषित हॉटस्पॉट के पास रहने वाले समुदायों को मूलभूत स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सेवाएँ प्रदान करने की आवश्यकता है। एक न्यायसंगत और स्वस्थ समाज के लिए, वायु प्रदूषण के विरुद्ध लड़ाई में सामाजिक न्याय को केंद्र में रखना अपरिहार्य है।
प्रस्तावना
वायु प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या है, लेकिन इसका प्रकोप समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट, "सांसों का आपातकाल" का चौथा अध्याय स्पष्ट करता है कि वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा बोझ झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रह रहे गरीब समुदायों को उठाना पड़ता है। यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जो गरीबी और असमानता की खाई को और गहरा कर रहा है।
हाशिये के लोगों पर दोहरी मार
शहरीकरण की तीव्र गति के साथ अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार तेजी से हुआ है। 2001 से 2011 के बीच, जहां शहरी आबादी में 32% की वृद्धि हुई, वहीं झुग्गी बस्तियों की आबादी में 131% की चौंका देने वाली वृद्धि दर्ज की गई। भारत में हर छह शहरी भारतीयों में से कम से कम एक इन बस्तियों में रहता है।
इन समुदायों पर वायु प्रदूषण की दोहरी मार पड़ती है। पहला, वे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं, और दूसरा, उनके पास प्रदूषण जनित बीमारियों से लड़ने के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ और पोषण नहीं होता। जनगणना 2011 के आँकड़ों के अनुसार, इन बस्तियों में रहने वाले 10 में से 6 लोग गंदे नालों के पास रहते हैं, और हर छठा व्यक्ति पीने के साफ पानी से वंचित है। मूलभूत सुविधाओं की यह कमी उनके स्वास्थ्य को और भी अधिक असुरक्षित बना देती है।
प्रदूषण के हॉटस्पॉट और झुग्गी बस्तियों का गठजोड़
अध्ययन बताते हैं कि झुग्गी या अनौपचारिक बस्तियाँ अक्सर उन स्थानों पर स्थित होती हैं, जिन्हें वायु प्रदूषण का हॉटस्पॉट माना जाता है। ये स्थान आमतौर पर कचरा डंपिंग स्थल, खुले में कचरा जलाने की जगहें, अत्यधिक ट्रैफिक वाले इलाके, छोटे निर्माण स्थल और असंगठित औद्योगिक इकाइयों के पास होते हैं। जयपुर और कोलकाता जैसे शहरों में किए गए "वल्नरेबिलिटी मैपिंग" में यह पाया गया है कि प्रदूषण के हॉटस्पॉट, हीट वेव हॉटस्पॉट और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र अक्सर झुग्गी बस्तियों के स्थान से मेल खाते हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
चूंकि ये बस्तियाँ अक्सर शहर के बाहरी और उपेक्षित हिस्सों में होती हैं, इसलिए वे नगर निगम की सेवाओं, परिवहन, सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के दायरे से बाहर रह जाती हैं। आवास नीति का ऐतिहासिक फोकस भी इन्हें शहर से बाहर विस्थापित करने पर रहा है, जिससे इन समुदायों की मुश्किलें और बढ़ी हैं। हालाँकि, हाल की नीतियों में "इन-सीटू डेवलपमेंट" (मौके पर ही बुनियादी सुविधाएं देना) जैसे सुधार शुरू हुए हैं।
व्यावसायिक जोखिम और स्वास्थ्य पर प्रभाव
गरीब और हाशिये पर रहने वाले लोग, विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर, व्यावसायिक जोखिम के कारण सबसे ज्यादा जहरीली हवा के संपर्क में आते हैं। कचरा बीनने वाले, नगर निगम के सफाई कर्मचारी और निर्माण मजदूर लगातार प्रदूषण पैदा करने वाली गतिविधियों के बहुत करीब काम करते हैं।
दिल्ली में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कचरा बीनने वालों में 86% बीमारियों का कारण वायु प्रदूषण था, और उनके फेफड़ों की क्षमता अन्य समूहों की तुलना में काफी कम पाई गई। इन कामगारों में सांस लेने में रुकावट और फेफड़ों में क्षति की गंभीरता 57% तक देखी गई। महिला सफाईकर्मियों में सांस की बीमारियों का खतरा पुरुषों की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक पाया गया, जो लैंगिक असमानता को भी दर्शाता है। निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, जो सिलिका और एस्बेस्टस जैसी घातक धूल के संपर्क में आते हैं, उन्हें फेफड़ों का कैंसर, सिलिकोसिस और अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा होता है।
निष्कर्ष
वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता का यह खतरनाक गठजोड़ 'सांसों का आपातकाल' पैदा कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भले ही वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है, लेकिन इसका स्वास्थ्य बोझ गरीब और हाशिये पर रह रहे लोगों पर असंगत रूप से अधिक पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए केवल प्रदूषण कम करने की नीतियां पर्याप्त नहीं हैं। हमें "इन-सीटू डेवलपमेंट" पर जोर देने, अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए बेहतर व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा लागू करने, और प्रदूषित हॉटस्पॉट के पास रहने वाले समुदायों को मूलभूत स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सेवाएँ प्रदान करने की आवश्यकता है। एक न्यायसंगत और स्वस्थ समाज के लिए, वायु प्रदूषण के विरुद्ध लड़ाई में सामाजिक न्याय को केंद्र में रखना अपरिहार्य है।
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Essay Questions: सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता GS Question झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग…
झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग 250 शब्द)
वायु प्रदूषण का संकट भारत में सामाजिक-आर्थिक असमानता का स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ इसका सबसे अधिक और गंभीर प्रभाव झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रह रहे गरीब समुदायों पर पड़ता है। यह खतरा निम्नलिखित कारणों से बढ़ जाता है:
प्रदूषण हॉटस्पॉट के निकट निवास: झुग्गी बस्तियाँ अक्सर अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों, जैसे कचरा डंपिंग स्थल, खुले में कचरा जलाने की जगह, निर्माण स्थल और असंगठित औद्योगिक इकाइयों के पास स्थित होती हैं। 'वल्नरेबिलिटी मैपिंग' में पाया गया है कि ये क्षेत्र बाढ़ और हीट वेव हॉटस्पॉट से भी मेल खाते हैं, जिससे दोहरी मार पड़ती है।
व्यावसायिक जोखिम: अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर (जैसे कचरा बीनने वाले, सफाई कर्मचारी, निर्माण मजदूर) अपने काम के कारण लगातार जहरीली हवा के संपर्क में रहते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि इन कामगारों, विशेषकर महिलाओं, के फेफड़ों की कार्यक्षमता सामान्य से काफी कम होती है और उनमें श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा अधिक होता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव: इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के पास बीमारी से उबरने के लिए पर्याप्त पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ और स्वच्छता सुविधाओं (जैसे पीने का साफ पानी) की कमी होती है, जिससे प्रदूषण जनित बीमारियों की गंभीरता बढ़ जाती है।
नीतिगत सुधार:
'इन-सीटू' विकास पर जोर: आवास नीति का ध्यान झुग्गियों को शहर से बाहर विस्थापित करने के बजाय "इन-सीटू डेवलपमेंट" (जहाँ लोग हैं, वहीं बुनियादी सुविधाएं और बेहतर आवास देना) पर केंद्रित होना चाहिए।
व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा: अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए विशेष व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा नियम लागू किए जाने चाहिए, जिनमें कार्यस्थल पर प्रदूषण-रोधी उपकरण और नियमित स्वास्थ्य जाँच शामिल हों।
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार: प्रदूषण हॉटस्पॉट के आस-पास प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना और मुफ्त श्वसन संबंधी उपचार उपलब्ध कराना आवश्यक है।
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हाईकोर्ट में 274 नये पद सृजित ARO - 60 post RO - 149 post अनुभाग अधिकारी 40 post सहायक निबंधक 14 post
Ahc Ro aro ki bharti October me aane wali thi ab December me aane wali
Dekhiye kab tak aati hai ye.
Source: guptsutra
Dekhiye kab tak aati hai ye.
Source: guptsutra
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वन रक्षक आंसर key.....
https://drive.google.com/file/d/1_INSKHsIbnagSwU5IyFWdUD9DDUkJsrZ/view @SecurePcs
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दो देशों अंगोला और बोत्सवाना की यात्रा पर
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 8 से 13 नवंबर तक अंगोला और बोत्सवाना की राजकीय यात्रा पर रहेंगी। यह किसी भारतीय राष्ट्राध्यक्ष की इन दो अफ्रीकी देशों की पहली यात्रा है।
8 से 11 नवंबर तक की यात्रा के पहले चरण में, राष्ट्रपति अपने समकक्ष जोआओ लौरेंको के निमंत्रण पर अंगोला में रहेंगी। वह अंगोला के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगी और अंगोला की संसद को भी संबोधित करेंगी। स्टडी फॉर सिविल सर्विसेज
11 नवंबर को, राष्ट्रपति मुर्मू अंगोला की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ समारोह में शामिल होंगी
अंगोला की राजधानी – लुआंडा
मुद्रा - New Kwanza
बोत्सवाना की राजधानी – गैब्रोन
मुद्रा - Botswana Pula
#current_affairs #Current #Fact
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 8 से 13 नवंबर तक अंगोला और बोत्सवाना की राजकीय यात्रा पर रहेंगी। यह किसी भारतीय राष्ट्राध्यक्ष की इन दो अफ्रीकी देशों की पहली यात्रा है।
8 से 11 नवंबर तक की यात्रा के पहले चरण में, राष्ट्रपति अपने समकक्ष जोआओ लौरेंको के निमंत्रण पर अंगोला में रहेंगी। वह अंगोला के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगी और अंगोला की संसद को भी संबोधित करेंगी। स्टडी फॉर सिविल सर्विसेज
11 नवंबर को, राष्ट्रपति मुर्मू अंगोला की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ समारोह में शामिल होंगी
अंगोला की राजधानी – लुआंडा
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बोत्सवाना की राजधानी – गैब्रोन
मुद्रा - Botswana Pula
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दो देशों अंगोला और बोत्सवाना की यात्रा पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 8 से 13 नवंबर तक अंगोला और बोत्सवाना की राजकीय यात्रा पर रहेंगी। यह किसी भारतीय राष्ट्राध्यक्ष की इन दो अफ्रीकी देशों की पहली यात्रा है। 8 से 11 नवंबर तक की यात्रा…
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