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“कृषि में डीप-टेक क्रांति को आकार देना” शीर्षक से एक रिपोर्ट किस संस्थान ने जारी की?★Secure Pcs
1.कृषि खाद्य संगठन 2.विश्व बैंक 3.विश्व आर्थिक मंच (WEF)
1.कृषि खाद्य संगठन 2.विश्व बैंक 3.विश्व आर्थिक मंच (WEF)
विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने “कृषि में डीप-टेक क्रांति को आकार देना” शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की
यह रिपोर्ट WEF एआई फॉर एग्रीकल्चर इनिशिएटिव (AI4AI) ने जारी की है।
AI4AI कृषि प्रौद्योगिकी संबंधी समाधानों को आगे बढ़ाने और वैश्विक खाद्य प्रणालियों के रूपांतरण में तेजी लाने के लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रक के भागीदारों को एक साथ लाता है।
कृषि क्षेत्रक में मुख्य चुनौतियां
कृषि क्षेत्रक के कार्यबल में गिरावट: इसके लिए जिम्मेदार कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं-
गाँव से शहरों की ओर प्रवास करना तथा वृद्ध होती किसान आबादी के कारण श्रम की उपलब्धता में कमी।
जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाएं:
यदि उत्सर्जन में कटौती नहीं की जाती है, तो वर्ष 2100 तक प्रमुख खाद्य फसलों से वैश्विक कैलोरी उत्पादन में 24% तक की कमी आ सकती है।
प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण:
ताजा जल का 70 प्रतिशत तक कृषि में उपयोग होता है। इसके अतिरिक्त, 71 प्रतिशत जलभृत (aquifers) रिक्त हो चुके हैं।
कुल मृदा में से एक-तिहाई मृदा निम्नीकृत हो चुकी है। साथ ही, 2050 तक 90 प्रतिशत उपरिमृदा (topsoil) का क्षरण होने की संभावना है।
रिपोर्ट में रेखांकित किए गए ‘कृषि में डीप टेक के प्रमुख उपयोग’ के मामले
इंटेलो लैब्स (Intello Labs) का AI और कंप्यूटर विज़न-आधारित समाधान ‘फ्रूटसॉर्ट’: यह एडवांस्ड कैमरों और मशीन लर्निंग का उपयोग करके ताजा उपज का तेजी से विश्लेषण करता है और दोषों की पहचान करता है।
प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): यह दक्षतापूर्ण फसल बीमा के लिए रिमोट सेंसिंग (उपग्रह इमेजरी) के साथ-साथ उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले ड्रोन्स और एक समर्पित मोबाइल ऐप का उपयोग करता है।
इंफोसिस का "5G.NATURAL" कार्यक्रम: यह विशेष रूप से फसल कटाई के लिए स्वचालित हार्वेस्टिंग मशीनों का एक ऐसा तंत्र बनाने पर केंद्रित है, जिसकी-
क्षमता में वृद्धि की जा सके,
जिसके घटकों को आसानी से असेम्बल किया जा सके तथा
जो बुद्धिमत्तापूर्ण रूप से कार्य कर सके।
URVARA/उर्वरा परियोजना: बूममित्रा ने कार्बन की निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) के लिए वाइटल एग्रीकल्चर रीजेनेरेशन एंड एडेप्टेशन (URVARA/उर्वरा) परियोजना शुरू की है।
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किस संस्थान ने ‘वित्तीय क्षेत्रक मूल्यांकन कार्यक्रम (FSAP)’ रिपोर्ट जारी की है?★Secure Pcs
Anonymous Quiz
14%
विश्व आर्थिक मंच
27%
विश्व बैंक
43%
वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन
16%
उपर्युक्त सभी
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विश्व बैंक ने ‘वित्तीय क्षेत्रक मूल्यांकन कार्यक्रम (FSAP)’ रिपोर्ट जारी की है
FSAP रिपोर्ट में भारत से आग्रह किया गया है कि वह अपने वित्तीय क्षेत्रक में सुधारों को तेज करे ताकि वह 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु;
वित्तीय प्रणाली मजबूत है: रिपोर्ट के अनुसार भारत की वित्तीय प्रणाली अब और अधिक मजबूत और विविधतापूर्ण हो गई है।
पिछली FSAP रिपोर्ट के बाद से भारत का पूंजी बाजार (इक्विटी, सरकारी बॉन्ड और कॉर्पोरेट बॉण्ड) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 144 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 175 प्रतिशत हो गया है।
इस वृद्धि में राज्य की प्रमुख भूमिका बनी हुई है।
डिजिटल प्रौद्योगिकी की बड़ी भूमिका: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) ने वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता, कार्यकुशलता और वित्तीय समावेशन में व्यापक सुधार किया है।
विनियामक व्यवस्था में सुधार: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा किए गए सुधारों से पर्यवेक्षण में सुधार हुआ है।
हालांकि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की कार्य-प्रणाली की निगरानी और वित्तीय संकट से निपटने के स्तर पर चुनौतियां बनी हुई हैं।
सहकारी बैंकों को भी विनियामक संस्थाओं के पर्यवेक्षण के
अधिकार-क्षेत्र में लाया गया है। साथ ही, वित्तीय बाजारों की सुरक्षा और विनियमन से जुड़े नियमों को सख्त बनाया गया है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में इन सभी उपायों की प्रशंसा की गई है।
वित्तीय बाजार का विकास: कॉरपोरेट बॉण्ड और अवसंरचनाओं के वित्तपोषण से संबंधित वित्तीय बाज़ार अब भी परिपक्व नहीं हुए हैं। निवेशक अभी भी सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश को ही प्राथमिकता देते हैं।
कर लगाने में असमानताएं: ऋण (debt) लिखतों और इक्विटी के बीच असमान कर-प्रणाली से बॉण्ड बाजार में निवेश हतोत्साहित होती है।
गौरतलब है कि भारत में इक्विटी (शेयरों) से होने वाले मुनाफे पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (Long-term capital gains: LTCG) कर आम तौर पर बॉण्ड या अन्य निवेशों की तुलना में कम है।
निम्नलिखित सुधार किए जाने चाहिए:
निजी क्षेत्र से पूंजी जुटाने पर बल देना चाहिए: लंबी अवधि के निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बॉण्ड और प्रतिभूतिकरण (securitisation) बाजारों को मजबूत करना चाहिए।
NBFCs के विनियमन में सुधार करना चाहिए: NBFCs के वर्गीकरण वाले स्केल-आधारित फ्रेमवर्क में आवश्यक सुधार करके इन्हें बेहतर वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए।
डिजिटल और वित्तीय सुधारों का एकीकरण करना चाहिए: फिनटेक यानी वित्तीय प्रौद्योगिकी से जुड़े नवाचारों को वित्तीय समावेशन के व्यापक लक्ष्यों की प्राप्ति से जोड़कर देखना चाहिए।
सुधारों की गति जारी रखनी चाहिए: वित्तीय क्षेत्रक की विनियामक संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाना चाहिए ताकि वित्तीय बाज़ार की स्थिरता और विकास सुनिश्चित हो सके।
हरित क्षेत्रक की परियोजनाओं में वित्तपोषण (Green Finance) को बढ़ावा देना चाहिए: निम्न-कार्बन उत्सर्जन वाली परियोजनाओं में वित्त पोषण बढ़ाने और निवेशकों के जोखिम को कम करने के लिए विकास वित्त संस्थानों (Development Finance Institutions – DFIs) का उपयोग करना चाहिए।
वित्तीय क्षेत्रक मूल्यांकन कार्यक्रम (FSAP) के बारे में
#Current #Fact #CurrentAffairs
FSAP रिपोर्ट में भारत से आग्रह किया गया है कि वह अपने वित्तीय क्षेत्रक में सुधारों को तेज करे ताकि वह 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु;
वित्तीय प्रणाली मजबूत है: रिपोर्ट के अनुसार भारत की वित्तीय प्रणाली अब और अधिक मजबूत और विविधतापूर्ण हो गई है।
पिछली FSAP रिपोर्ट के बाद से भारत का पूंजी बाजार (इक्विटी, सरकारी बॉन्ड और कॉर्पोरेट बॉण्ड) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 144 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 175 प्रतिशत हो गया है।
इस वृद्धि में राज्य की प्रमुख भूमिका बनी हुई है।
डिजिटल प्रौद्योगिकी की बड़ी भूमिका: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) ने वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता, कार्यकुशलता और वित्तीय समावेशन में व्यापक सुधार किया है।
विनियामक व्यवस्था में सुधार: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा किए गए सुधारों से पर्यवेक्षण में सुधार हुआ है।
हालांकि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की कार्य-प्रणाली की निगरानी और वित्तीय संकट से निपटने के स्तर पर चुनौतियां बनी हुई हैं।
सहकारी बैंकों को भी विनियामक संस्थाओं के पर्यवेक्षण के
अधिकार-क्षेत्र में लाया गया है। साथ ही, वित्तीय बाजारों की सुरक्षा और विनियमन से जुड़े नियमों को सख्त बनाया गया है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में इन सभी उपायों की प्रशंसा की गई है।
वित्तीय बाजार का विकास: कॉरपोरेट बॉण्ड और अवसंरचनाओं के वित्तपोषण से संबंधित वित्तीय बाज़ार अब भी परिपक्व नहीं हुए हैं। निवेशक अभी भी सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश को ही प्राथमिकता देते हैं।
कर लगाने में असमानताएं: ऋण (debt) लिखतों और इक्विटी के बीच असमान कर-प्रणाली से बॉण्ड बाजार में निवेश हतोत्साहित होती है।
गौरतलब है कि भारत में इक्विटी (शेयरों) से होने वाले मुनाफे पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (Long-term capital gains: LTCG) कर आम तौर पर बॉण्ड या अन्य निवेशों की तुलना में कम है।
निम्नलिखित सुधार किए जाने चाहिए:
निजी क्षेत्र से पूंजी जुटाने पर बल देना चाहिए: लंबी अवधि के निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बॉण्ड और प्रतिभूतिकरण (securitisation) बाजारों को मजबूत करना चाहिए।
NBFCs के विनियमन में सुधार करना चाहिए: NBFCs के वर्गीकरण वाले स्केल-आधारित फ्रेमवर्क में आवश्यक सुधार करके इन्हें बेहतर वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए।
डिजिटल और वित्तीय सुधारों का एकीकरण करना चाहिए: फिनटेक यानी वित्तीय प्रौद्योगिकी से जुड़े नवाचारों को वित्तीय समावेशन के व्यापक लक्ष्यों की प्राप्ति से जोड़कर देखना चाहिए।
सुधारों की गति जारी रखनी चाहिए: वित्तीय क्षेत्रक की विनियामक संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाना चाहिए ताकि वित्तीय बाज़ार की स्थिरता और विकास सुनिश्चित हो सके।
हरित क्षेत्रक की परियोजनाओं में वित्तपोषण (Green Finance) को बढ़ावा देना चाहिए: निम्न-कार्बन उत्सर्जन वाली परियोजनाओं में वित्त पोषण बढ़ाने और निवेशकों के जोखिम को कम करने के लिए विकास वित्त संस्थानों (Development Finance Institutions – DFIs) का उपयोग करना चाहिए।
वित्तीय क्षेत्रक मूल्यांकन कार्यक्रम (FSAP) के बारे में
शुरुआत: FSAP की शुरुआत 1999 में हुई थी। यह विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का संयुक्त कार्यक्रम है।
संचालन: विकसित अर्थव्यवस्थाओं में FSAP का संचालन IMF द्वारा किया जाता है, जबकि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में इसे विश्व बैंक और IMF द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया जाता है।
भारत का पिछला FSAP वर्ष 2017 में किया गया था।
#Current #Fact #CurrentAffairs
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भारत ट्रॉपिकल फ़ॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी (TFFF) में एक पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होने के लिए तैयार है
ट्रॉपिकल फ़ॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी (Tropical Forests Forever Facility: TFFF) क्या है?
शुरुआत: इस पहल को ब्राजील ने शुरू किया है।
परिचय: यह ब्राजील के बेलेम में COP-30 के अवसर पर स्थापित एक वैश्विक कोष है। इसका गठन वन संरक्षण को एक व्यवहार्य आर्थिक मॉडल बनाने के लिए दीर्घकालिक वित्त प्रदान करने हेतु किया गया है।
उद्देश्य: उष्णकटिबंधीय वन वाले देशों (TFCs) को उनके मौजूदा वनों को बनाए रखने के लिए वार्षिक भुगतान करना। इससे वन संरक्षण और विस्तार को प्रोत्साहित किया जा सकेगा।
वित्त-पोषण तंत्र: यह कोष सार्वजनिक और निजी निवेश के मिश्रण के माध्यम से लगभग 125 बिलियन डॉलर जुटाने का प्रयास करेगा।
इन निवेशों से उत्पन्न प्रतिफलों का उपयोग उन राष्ट्रों को भुगतान करने के लिए किया जाएगा, जो अपने वनों का सफलतापूर्वक संरक्षण कर रहे हैं।
20-25% तक सार्वजनिक निवेश और 70-80% तक निजी निवेश जुटाया जाएगा।
पात्रता: TFFF उष्णकटिबंधीय वन वाले 70 से अधिक देशों का समर्थन कर सकता है। इन्हें कुछ मानदंडों को पूरा करना होगा, जैसे:
वनों की कटाई दर वार्षिक रूप से 0.5% से कम होनी चाहिए;
देशज लोगों और स्थानीय समुदायों को संसाधनों का उचित आवंटन किया जाना चाहिए, आदि।
वन संरक्षण का महत्त्व
जलवायु विनियमन: ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार, सामूहिक रूप से वन प्रति वर्ष लगभग 7.6 बिलियन टन CO₂ अवशोषित करते हैं। इससे वैश्विक तापन को धीमा करने में मदद मिलती है।
जैव विविधता हॉटस्पॉट: WWF के अनुसार, उष्णकटिबंधीय वन पृथ्वी की सतह के केवल 7% हिस्से पर फैले हुए हैं, लेकिन इनमें विश्व की 50% जैव विविधता मौजूद है।
मृदा संरक्षण: वन मृदा अपरदन को कम करते हैं और ढलानों को स्थिर करके बाढ़ की तीव्रता को रोकते हैं।
अन्य: वनों से लकड़ी, रबड़ आदि के व्यापार के जरिए आर्थिक मूल्य प्राप्त होता है; वन आजीविका संबंधी और सांस्कृतिक समर्थन प्रदान करते हैं; ये औषधीय संसाधन उपलब्ध कराते हैं; वर्षा व जल विज्ञान चक्र बनाए रखने में मदद करते हैं आदि।
वन संरक्षण हेतु अन्य वैश्विक पहलें
जैव विविधता अभिसमय (1992): यह पारिस्थितिक-तंत्रों के संरक्षण व सतत उपयोग और लाभों के न्यायसंगत बंटवारे को प्रोत्साहित करता है।
संयुक्त राष्ट्र REDD+ (2008): यह वनों की कटाई को कम करने और कार्बन भंडारण-क्षमता बढ़ाने के लिए विकासशील देशों को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करता है।
बॉन चैलेंज (2011): इसके तहत वर्ष 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर निम्नीकृत वनों को पुनर्स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
पेरिस समझौता (2015): यह वनों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के प्रमुख साधन के रूप में मान्यता देता है।
#Current #Fact
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उच्चतम न्यायालय ने प्रमुख सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने पर निर्देश जारी किए
उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देश
शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, परिवहन केंद्र जैसे प्रत्येक परिसर के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करें। ये अधिकारी इन परिसरों के रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी संभालेंगे।
जिला मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि ऐसे परिसरों में पर्याप्त बाड़बंदी व चारदीवारी हो और इनमें गेट लगे हों। इससे इन परिसरों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
स्थानीय नगर निकाय और पंचायतें नियमित रूप से या प्रत्येक तीन महीने में कम-से-कम एक बार इन परिसरों का निरीक्षण करेंगे।
सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन और इम्युनोग्लोब्युलिन का पर्याप्त भंडार हर समय अनिवार्य रूप से उपलब्ध होना चाहिए।
अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े नियमों को सख्ती से लागू करें ताकि बचा हुआ भोजन या अपशिष्ट जानवरों को आकर्षित न करे।
भारत में आवारा कुत्तों से जुड़ी समस्याएं
कुल संख्या: 2019 की पशुधन गणना के अनुसार भारत में लगभग 1.5 करोड़ आवारा कुत्ते हैं।
कुत्तों के काटने के मामले: राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के अनुसार 2024 में कुत्तों के काटने के लगभग 37 लाख मामले दर्ज किए गए थे।
रेबीज संक्रमण: विश्व में रेबीज से होने वाली कुल मौतों में 36% भारत में दर्ज की जाती हैं।
रेबीज से मृत्यु का मामला: भारत में रेबीज से होने वाली लगभग 96% मौतें कुत्तों के काटने से होती हैं।
भारत में आवारा कुत्तों से निपटने से संबंधित प्रावधान और उठाए गए कदम
संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 243(W) के अनुसार, नगरपालिकाओं का दायित्व है कि वे आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करें।
अनुच्छेद 51A (g) के तहत नागरिकों का मूल कर्तव्य है कि वे “प्राणीमात्र के प्रति दया भाव रखें।”
पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम, 1960 के तहत ‘पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023’ जारी किए गए हैं। इन नियमों में आवारा कुत्तों को “पकड़ो–बधियाकरण करो–टीकाकरण करो–और छोड़ दो” (Capture–Sterilize–Vaccinate–Release, CSVR) मॉडल अपनाया गया है।
वर्ष 2030 तक भारत में ‘कुत्तों के काटने से रेबीज संक्रमण उन्मूलन पर राष्ट्रीय कार्य-योजना (NAPRE)’ लागू की गई है।
यह कार्य-योजना केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की पहल है।
#Current #Fact #CurrentAffairs #uppcsmains
हाल ही में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कई प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं बार-बार घटित हो रही हैं। इस तरह की घटनाएं केवल लोक-स्वास्थ्य की समस्या भर नहीं हैं, बल्कि ये संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत इंसान की सुरक्षा से जुड़ा विषय भी हैं।
उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देश
शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, परिवहन केंद्र जैसे प्रत्येक परिसर के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करें। ये अधिकारी इन परिसरों के रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी संभालेंगे।
जिला मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि ऐसे परिसरों में पर्याप्त बाड़बंदी व चारदीवारी हो और इनमें गेट लगे हों। इससे इन परिसरों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
स्थानीय नगर निकाय और पंचायतें नियमित रूप से या प्रत्येक तीन महीने में कम-से-कम एक बार इन परिसरों का निरीक्षण करेंगे।
सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन और इम्युनोग्लोब्युलिन का पर्याप्त भंडार हर समय अनिवार्य रूप से उपलब्ध होना चाहिए।
अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े नियमों को सख्ती से लागू करें ताकि बचा हुआ भोजन या अपशिष्ट जानवरों को आकर्षित न करे।
भारत में आवारा कुत्तों से जुड़ी समस्याएं
कुल संख्या: 2019 की पशुधन गणना के अनुसार भारत में लगभग 1.5 करोड़ आवारा कुत्ते हैं।
कुत्तों के काटने के मामले: राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के अनुसार 2024 में कुत्तों के काटने के लगभग 37 लाख मामले दर्ज किए गए थे।
रेबीज संक्रमण: विश्व में रेबीज से होने वाली कुल मौतों में 36% भारत में दर्ज की जाती हैं।
रेबीज से मृत्यु का मामला: भारत में रेबीज से होने वाली लगभग 96% मौतें कुत्तों के काटने से होती हैं।
भारत में आवारा कुत्तों से निपटने से संबंधित प्रावधान और उठाए गए कदम
संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 243(W) के अनुसार, नगरपालिकाओं का दायित्व है कि वे आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करें।
अनुच्छेद 51A (g) के तहत नागरिकों का मूल कर्तव्य है कि वे “प्राणीमात्र के प्रति दया भाव रखें।”
पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम, 1960 के तहत ‘पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023’ जारी किए गए हैं। इन नियमों में आवारा कुत्तों को “पकड़ो–बधियाकरण करो–टीकाकरण करो–और छोड़ दो” (Capture–Sterilize–Vaccinate–Release, CSVR) मॉडल अपनाया गया है।
वर्ष 2030 तक भारत में ‘कुत्तों के काटने से रेबीज संक्रमण उन्मूलन पर राष्ट्रीय कार्य-योजना (NAPRE)’ लागू की गई है।
यह कार्य-योजना केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की पहल है।
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ज्वालामुखी बिजली
हाल ही में, ज्वालामुखीय तड़ित सुर्ख़ियों में रही।
ज्वालामुखीय तड़ित क्या है?
महत्त्व: ज्वालामुखीय तड़ित भविष्य के उद्गारों की एक प्राकृतिक पूर्व-चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करती है।
#Current #Fact #CurrentAffairs
हाल ही में, ज्वालामुखीय तड़ित सुर्ख़ियों में रही।
ज्वालामुखीय तड़ित क्या है?
यह एक शक्तिशाली विद्युत विसर्जन (Discharge) है, जो किसी सामान्य तड़ित झंझा (thunderstorm) की बजाय ज्वालामुखी उद्गार के कारण होता है।उत्पत्ति का कारण: इसका मुख्य कारण ज्वालामुखी के गुबार में राख के कणों (भूमि के निकट) या बर्फ के कणों (ऊपर) का आपस में टकराना व रगड़ना है। इससे स्थैतिक विद्युत उत्पन्न होती है और विद्युत आवेश सृजित होते हैं।
महत्त्व: ज्वालामुखीय तड़ित भविष्य के उद्गारों की एक प्राकृतिक पूर्व-चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करती है।
#Current #Fact #CurrentAffairs
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ब्रेन (BRAIN) इनिशिएटिव सेल एटलस नेटवर्क (BICAN)
यह शोध अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के ब्रेन (BRAIN) इनिशिएटिव सेल एटलस नेटवर्क (BICAN) का हिस्सा है।
शोध के मुख्य निष्कर्षों पर एक नजर
वैज्ञानिकों ने यह चार्ट तैयार किया कि विभिन्न प्रकार की मस्तिष्क कोशिकाएं प्रारंभिक भ्रूण अवस्था (embryonic) और शैशवावस्था (foetal stages) से लेकर वयस्कता तक कैसे उभरती व परिपक्व होती हैं।
ये निष्कर्ष ऑटिज्म और सिज़ोफ्रेनिया जैसे कुछ मस्तिष्क संबंधी रोगों से निपटने में मदद कर सकते हैं।
BICAN के बारे में
यह मानव मस्तिष्क का एक व्यापक व मुक्त पहुंच वाला एटलस बनाने के लिए तंत्रिका वैज्ञानिकों, कम्प्यूटेशनल जीवविज्ञानियों और सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास है
#Current #Fact #CurrentAffairs #Current_affairs
शोधकर्ताओं ने विकासशील मानव मस्तिष्क के एटलस का पहला मसौदा तैयार किया।
यह शोध अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के ब्रेन (BRAIN) इनिशिएटिव सेल एटलस नेटवर्क (BICAN) का हिस्सा है।
शोध के मुख्य निष्कर्षों पर एक नजर
वैज्ञानिकों ने यह चार्ट तैयार किया कि विभिन्न प्रकार की मस्तिष्क कोशिकाएं प्रारंभिक भ्रूण अवस्था (embryonic) और शैशवावस्था (foetal stages) से लेकर वयस्कता तक कैसे उभरती व परिपक्व होती हैं।
ये निष्कर्ष ऑटिज्म और सिज़ोफ्रेनिया जैसे कुछ मस्तिष्क संबंधी रोगों से निपटने में मदद कर सकते हैं।
BICAN के बारे में
यह मानव मस्तिष्क का एक व्यापक व मुक्त पहुंच वाला एटलस बनाने के लिए तंत्रिका वैज्ञानिकों, कम्प्यूटेशनल जीवविज्ञानियों और सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास है
#Current #Fact #CurrentAffairs #Current_affairs
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डेनमार्क (राजधानी: कोपेनहेगन)
भौगोलिक अवस्थिति:
यह उत्तरी यूरोप में स्थित है और एक स्कैंडिनेवियाई देश है।
इसमें फ़रो द्वीप समूह और ग्रीनलैंड द्वीप भी शामिल हैं। ये दोनों द्वीप उत्तरी अटलांटिक महासागर में स्थित हैं।
स्थलीय सीमा: जर्मनी (दक्षिण)।
निकटवर्ती जल निकाय: पश्चिम में उत्तरी सागर और पूर्व में बाल्टिक सागर स्थित है।
भौगोलिक विशेषताएं
यह जूटलैंड प्रायद्वीप और 400 से अधिक द्वीपों से बना है।
ज़ीलैंड सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप है।
सबसे लंबी नदी: गुडेना।
जलवायु: गर्म गल्फस्ट्रीम (उत्तरी अटलांटिक धारा) जलवायु को नियंत्रित करती है और वर्ष भर वर्षा होती रहती है।
#Current #Fact #Geography #Imp
डेनमार्क 15 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति की सोशल मीडिया तक पहुंच पर प्रतिबंध लगाएगा।
भौगोलिक अवस्थिति:
यह उत्तरी यूरोप में स्थित है और एक स्कैंडिनेवियाई देश है।
इसमें फ़रो द्वीप समूह और ग्रीनलैंड द्वीप भी शामिल हैं। ये दोनों द्वीप उत्तरी अटलांटिक महासागर में स्थित हैं।
स्थलीय सीमा: जर्मनी (दक्षिण)।
निकटवर्ती जल निकाय: पश्चिम में उत्तरी सागर और पूर्व में बाल्टिक सागर स्थित है।
भौगोलिक विशेषताएं
यह जूटलैंड प्रायद्वीप और 400 से अधिक द्वीपों से बना है।
ज़ीलैंड सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप है।
सबसे लंबी नदी: गुडेना।
जलवायु: गर्म गल्फस्ट्रीम (उत्तरी अटलांटिक धारा) जलवायु को नियंत्रित करती है और वर्ष भर वर्षा होती रहती है।
#Current #Fact #Geography #Imp
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क्रिसमस द्वीप
क्रिसमस द्वीप के बारे में
अवस्थिति: हिंद महासागर में तथा ऑस्ट्रेलियाई मुख्य भूमि से 1500 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में।
इसे "हिंद महासागर का गैलापागोस" भी कहा जाता है।
यह 135 वर्ग किलोमीटर में फैला एक द्वीप है। यह लाखों लाल केकड़ों, समुद्री पक्षियों, व्हेल शार्क आदि के वार्षिक प्रवास और भव्य प्रवाल भित्तियों के लिए प्रसिद्ध है।
क्रिसमस द्वीप सुंडा जलडमरूमध्य, लोम्बोक जलडमरूमध्य और मलक्का जलडमरूमध्य की निगरानी के लिए उत्तम स्थिति में है।
#Current #Fact #Geography #CurrentAffairs
गूगल, ऑस्ट्रेलिया के क्रिसमस द्वीप पर एक विशाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) डेटा केंद्र बनाने की योजना बना रहा है।
क्रिसमस द्वीप के बारे में
अवस्थिति: हिंद महासागर में तथा ऑस्ट्रेलियाई मुख्य भूमि से 1500 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में।
इसे "हिंद महासागर का गैलापागोस" भी कहा जाता है।
यह 135 वर्ग किलोमीटर में फैला एक द्वीप है। यह लाखों लाल केकड़ों, समुद्री पक्षियों, व्हेल शार्क आदि के वार्षिक प्रवास और भव्य प्रवाल भित्तियों के लिए प्रसिद्ध है।
क्रिसमस द्वीप सुंडा जलडमरूमध्य, लोम्बोक जलडमरूमध्य और मलक्का जलडमरूमध्य की निगरानी के लिए उत्तम स्थिति में है।
#Current #Fact #Geography #CurrentAffairs
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लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धाराएं- 33 से 36
प्रमुख प्रावधान (RPA, 1951- धाराएं 33-36):
धारा 33 (नामांकन दाखिल करना): उम्मीदवार स्वयं और प्रस्तावकों द्वारा हस्ताक्षरित नामांकन पत्र जमा करेंगे। किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के मामले में एक और निर्दलीय के लिए दस प्रस्तावक होंगे।
धारा 33A (प्रकटीकरण): उम्मीदवार द्वारा आपराधिक मामलों, संपत्ति, देनदारियों और शिक्षा की अनिवार्य घोषणा।
धारा 33B (सीमा): धारा 33A में निर्धारित जानकारी के अतिरिक्त जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है।
धारा 34 (जमानत राशि): ₹25,000 (लोक सभा) या ₹10,000 (विधान सभा)। कुल मतों के छठे हिस्से से कम मत मिलने पर जमानत जब्त हो जाएगी (धारा 158)।
धारा 35 (अधिसूचना): रिटर्निंग ऑफिसर (RO) नामांकन, संवीक्षा और नाम वापसी (यानी उम्मीदवारी वापस लेने) के लिए समय व स्थान की घोषणा करेगा।
धारा 36 (संवीक्षा): RO दोषपूर्ण कागजात की जांच करेगा और उसे अस्वीकार कर सकेगा।
#imp #Current #CurrentAffairs #uppcsmains
नामांकन पत्रों की अस्वीकृति पर हालिया बहस ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 के तहत भारत की चुनावी नामांकन प्रक्रिया में सुधार की मांग को फिर से प्रकट किया है।
प्रमुख प्रावधान (RPA, 1951- धाराएं 33-36):
धारा 33 (नामांकन दाखिल करना): उम्मीदवार स्वयं और प्रस्तावकों द्वारा हस्ताक्षरित नामांकन पत्र जमा करेंगे। किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के मामले में एक और निर्दलीय के लिए दस प्रस्तावक होंगे।
धारा 33A (प्रकटीकरण): उम्मीदवार द्वारा आपराधिक मामलों, संपत्ति, देनदारियों और शिक्षा की अनिवार्य घोषणा।
धारा 33B (सीमा): धारा 33A में निर्धारित जानकारी के अतिरिक्त जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है।
धारा 34 (जमानत राशि): ₹25,000 (लोक सभा) या ₹10,000 (विधान सभा)। कुल मतों के छठे हिस्से से कम मत मिलने पर जमानत जब्त हो जाएगी (धारा 158)।
धारा 35 (अधिसूचना): रिटर्निंग ऑफिसर (RO) नामांकन, संवीक्षा और नाम वापसी (यानी उम्मीदवारी वापस लेने) के लिए समय व स्थान की घोषणा करेगा।
धारा 36 (संवीक्षा): RO दोषपूर्ण कागजात की जांच करेगा और उसे अस्वीकार कर सकेगा।
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फार्मा और मेडटेक में अनुसंधान और नवाचार को संवर्धन (पीआरआईपी) योजना
PRIP योजना के बारे में
#Current #CurrentAffairs #uppcsmains #Current_affairs
केंद्र ने फार्मा एवं मेडटेक में अनुसंधान एवं नवाचार को संवर्धन (PRIP) योजना के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि बढ़ा दी।
PRIP योजना के बारे में
प्रारंभकर्ता: रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के तहत औषध विभाग।
वित्तीय परिव्यय: 5000 करोड़ रुपये।
उद्देश्य: फार्मा और मेडटेक क्षेत्रक में अनुसंधान एवं विकास के लिए भारत को एक वैश्विक केंद्र बनाना।
विशेषताएं:
घटक A: राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (NIPERs) में उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना करके अनुसंधान से संबंधित अवसंरचना को मजबूत करना।
घटक B: फार्मा और मेडटेक क्षेत्रक में अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देना।
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रीसस मकाक
इससे इसे अवैध रूप से अपने पास रखने और क्रूरता के विरुद्ध इसकी वैधानिक सुरक्षा बहाल होगी।
रीसस मकैक के बारे में
वैज्ञानिक नाम: मकाका मूलाटा।
मूल पर्यावास: मुख्य भूमि एशिया।
ये गैर-मानव प्राइमेट हैं, जो मनुष्यों के साथ लगभग 93% आनुवंशिक अनुक्रम समानता साझा करते हैं।
आहार: सर्वाहारी।
विशेषताएं: ये वृक्षों और स्थल दोनों पर रह सकते हैं।
संरक्षण स्थिति: लीस्ट कंसर्न (IUCN)।
#Current #uppcsmains #CurrentAffairs #Prelims_Special
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने रीसस मकैक को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची II में फिर से शामिल करने की सिफ़ारिश की है।
इससे इसे अवैध रूप से अपने पास रखने और क्रूरता के विरुद्ध इसकी वैधानिक सुरक्षा बहाल होगी।
रीसस मकैक के बारे में
वैज्ञानिक नाम: मकाका मूलाटा।
मूल पर्यावास: मुख्य भूमि एशिया।
ये गैर-मानव प्राइमेट हैं, जो मनुष्यों के साथ लगभग 93% आनुवंशिक अनुक्रम समानता साझा करते हैं।
आहार: सर्वाहारी।
विशेषताएं: ये वृक्षों और स्थल दोनों पर रह सकते हैं।
संरक्षण स्थिति: लीस्ट कंसर्न (IUCN)।
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आज के महत्वपूर्ण करेंट अफेयर्स
कंटेंट पसंद आ रहा हो तो और भी लोगों को इस मंच से जोड़ते रहें।
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डीएनए की संरचना (Structure Of DNA) की खोज करने वाले अमेरिकी नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक जेम्स वॉटसन का 97 साल की आयु में निधन हो गया है. 20वीं सदी की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खोजों में से एक के रूप में, उन्होंने 1953 में ब्रिटिश वैज्ञानिक फ्रांसिस क्रिक के साथ मिलकर डीएनए की डबल हेलिक्स (double-helix structure) संरचना की पहचान की थी।
#Current #Fact #CurrentAffairs #Personality
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Essay Questions:
सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता
GS Question
झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग 250 शब्द)
सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता
GS Question
झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग 250 शब्द)
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Essay Questions: सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता GS Question झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग…
जो भी बहन भाई मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन कर रहे हैं या करना चाहते हैं उन्हें इस मंच से जरूर जोड़िए
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Essay Questions: सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता GS Question झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग…
सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता
प्रस्तावना
वायु प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या है, लेकिन इसका प्रकोप समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट, "सांसों का आपातकाल" का चौथा अध्याय स्पष्ट करता है कि वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा बोझ झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रह रहे गरीब समुदायों को उठाना पड़ता है। यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जो गरीबी और असमानता की खाई को और गहरा कर रहा है।
हाशिये के लोगों पर दोहरी मार
शहरीकरण की तीव्र गति के साथ अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार तेजी से हुआ है। 2001 से 2011 के बीच, जहां शहरी आबादी में 32% की वृद्धि हुई, वहीं झुग्गी बस्तियों की आबादी में 131% की चौंका देने वाली वृद्धि दर्ज की गई। भारत में हर छह शहरी भारतीयों में से कम से कम एक इन बस्तियों में रहता है।
इन समुदायों पर वायु प्रदूषण की दोहरी मार पड़ती है। पहला, वे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं, और दूसरा, उनके पास प्रदूषण जनित बीमारियों से लड़ने के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ और पोषण नहीं होता। जनगणना 2011 के आँकड़ों के अनुसार, इन बस्तियों में रहने वाले 10 में से 6 लोग गंदे नालों के पास रहते हैं, और हर छठा व्यक्ति पीने के साफ पानी से वंचित है। मूलभूत सुविधाओं की यह कमी उनके स्वास्थ्य को और भी अधिक असुरक्षित बना देती है।
प्रदूषण के हॉटस्पॉट और झुग्गी बस्तियों का गठजोड़
अध्ययन बताते हैं कि झुग्गी या अनौपचारिक बस्तियाँ अक्सर उन स्थानों पर स्थित होती हैं, जिन्हें वायु प्रदूषण का हॉटस्पॉट माना जाता है। ये स्थान आमतौर पर कचरा डंपिंग स्थल, खुले में कचरा जलाने की जगहें, अत्यधिक ट्रैफिक वाले इलाके, छोटे निर्माण स्थल और असंगठित औद्योगिक इकाइयों के पास होते हैं। जयपुर और कोलकाता जैसे शहरों में किए गए "वल्नरेबिलिटी मैपिंग" में यह पाया गया है कि प्रदूषण के हॉटस्पॉट, हीट वेव हॉटस्पॉट और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र अक्सर झुग्गी बस्तियों के स्थान से मेल खाते हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
चूंकि ये बस्तियाँ अक्सर शहर के बाहरी और उपेक्षित हिस्सों में होती हैं, इसलिए वे नगर निगम की सेवाओं, परिवहन, सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के दायरे से बाहर रह जाती हैं। आवास नीति का ऐतिहासिक फोकस भी इन्हें शहर से बाहर विस्थापित करने पर रहा है, जिससे इन समुदायों की मुश्किलें और बढ़ी हैं। हालाँकि, हाल की नीतियों में "इन-सीटू डेवलपमेंट" (मौके पर ही बुनियादी सुविधाएं देना) जैसे सुधार शुरू हुए हैं।
व्यावसायिक जोखिम और स्वास्थ्य पर प्रभाव
गरीब और हाशिये पर रहने वाले लोग, विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर, व्यावसायिक जोखिम के कारण सबसे ज्यादा जहरीली हवा के संपर्क में आते हैं। कचरा बीनने वाले, नगर निगम के सफाई कर्मचारी और निर्माण मजदूर लगातार प्रदूषण पैदा करने वाली गतिविधियों के बहुत करीब काम करते हैं।
दिल्ली में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कचरा बीनने वालों में 86% बीमारियों का कारण वायु प्रदूषण था, और उनके फेफड़ों की क्षमता अन्य समूहों की तुलना में काफी कम पाई गई। इन कामगारों में सांस लेने में रुकावट और फेफड़ों में क्षति की गंभीरता 57% तक देखी गई। महिला सफाईकर्मियों में सांस की बीमारियों का खतरा पुरुषों की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक पाया गया, जो लैंगिक असमानता को भी दर्शाता है। निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, जो सिलिका और एस्बेस्टस जैसी घातक धूल के संपर्क में आते हैं, उन्हें फेफड़ों का कैंसर, सिलिकोसिस और अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा होता है।
निष्कर्ष
वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता का यह खतरनाक गठजोड़ 'सांसों का आपातकाल' पैदा कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भले ही वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है, लेकिन इसका स्वास्थ्य बोझ गरीब और हाशिये पर रह रहे लोगों पर असंगत रूप से अधिक पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए केवल प्रदूषण कम करने की नीतियां पर्याप्त नहीं हैं। हमें "इन-सीटू डेवलपमेंट" पर जोर देने, अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए बेहतर व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा लागू करने, और प्रदूषित हॉटस्पॉट के पास रहने वाले समुदायों को मूलभूत स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सेवाएँ प्रदान करने की आवश्यकता है। एक न्यायसंगत और स्वस्थ समाज के लिए, वायु प्रदूषण के विरुद्ध लड़ाई में सामाजिक न्याय को केंद्र में रखना अपरिहार्य है।
प्रस्तावना
वायु प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या है, लेकिन इसका प्रकोप समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट, "सांसों का आपातकाल" का चौथा अध्याय स्पष्ट करता है कि वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा बोझ झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रह रहे गरीब समुदायों को उठाना पड़ता है। यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जो गरीबी और असमानता की खाई को और गहरा कर रहा है।
हाशिये के लोगों पर दोहरी मार
शहरीकरण की तीव्र गति के साथ अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार तेजी से हुआ है। 2001 से 2011 के बीच, जहां शहरी आबादी में 32% की वृद्धि हुई, वहीं झुग्गी बस्तियों की आबादी में 131% की चौंका देने वाली वृद्धि दर्ज की गई। भारत में हर छह शहरी भारतीयों में से कम से कम एक इन बस्तियों में रहता है।
इन समुदायों पर वायु प्रदूषण की दोहरी मार पड़ती है। पहला, वे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं, और दूसरा, उनके पास प्रदूषण जनित बीमारियों से लड़ने के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ और पोषण नहीं होता। जनगणना 2011 के आँकड़ों के अनुसार, इन बस्तियों में रहने वाले 10 में से 6 लोग गंदे नालों के पास रहते हैं, और हर छठा व्यक्ति पीने के साफ पानी से वंचित है। मूलभूत सुविधाओं की यह कमी उनके स्वास्थ्य को और भी अधिक असुरक्षित बना देती है।
प्रदूषण के हॉटस्पॉट और झुग्गी बस्तियों का गठजोड़
अध्ययन बताते हैं कि झुग्गी या अनौपचारिक बस्तियाँ अक्सर उन स्थानों पर स्थित होती हैं, जिन्हें वायु प्रदूषण का हॉटस्पॉट माना जाता है। ये स्थान आमतौर पर कचरा डंपिंग स्थल, खुले में कचरा जलाने की जगहें, अत्यधिक ट्रैफिक वाले इलाके, छोटे निर्माण स्थल और असंगठित औद्योगिक इकाइयों के पास होते हैं। जयपुर और कोलकाता जैसे शहरों में किए गए "वल्नरेबिलिटी मैपिंग" में यह पाया गया है कि प्रदूषण के हॉटस्पॉट, हीट वेव हॉटस्पॉट और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र अक्सर झुग्गी बस्तियों के स्थान से मेल खाते हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
चूंकि ये बस्तियाँ अक्सर शहर के बाहरी और उपेक्षित हिस्सों में होती हैं, इसलिए वे नगर निगम की सेवाओं, परिवहन, सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के दायरे से बाहर रह जाती हैं। आवास नीति का ऐतिहासिक फोकस भी इन्हें शहर से बाहर विस्थापित करने पर रहा है, जिससे इन समुदायों की मुश्किलें और बढ़ी हैं। हालाँकि, हाल की नीतियों में "इन-सीटू डेवलपमेंट" (मौके पर ही बुनियादी सुविधाएं देना) जैसे सुधार शुरू हुए हैं।
व्यावसायिक जोखिम और स्वास्थ्य पर प्रभाव
गरीब और हाशिये पर रहने वाले लोग, विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर, व्यावसायिक जोखिम के कारण सबसे ज्यादा जहरीली हवा के संपर्क में आते हैं। कचरा बीनने वाले, नगर निगम के सफाई कर्मचारी और निर्माण मजदूर लगातार प्रदूषण पैदा करने वाली गतिविधियों के बहुत करीब काम करते हैं।
दिल्ली में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कचरा बीनने वालों में 86% बीमारियों का कारण वायु प्रदूषण था, और उनके फेफड़ों की क्षमता अन्य समूहों की तुलना में काफी कम पाई गई। इन कामगारों में सांस लेने में रुकावट और फेफड़ों में क्षति की गंभीरता 57% तक देखी गई। महिला सफाईकर्मियों में सांस की बीमारियों का खतरा पुरुषों की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक पाया गया, जो लैंगिक असमानता को भी दर्शाता है। निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, जो सिलिका और एस्बेस्टस जैसी घातक धूल के संपर्क में आते हैं, उन्हें फेफड़ों का कैंसर, सिलिकोसिस और अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा होता है।
निष्कर्ष
वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता का यह खतरनाक गठजोड़ 'सांसों का आपातकाल' पैदा कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भले ही वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है, लेकिन इसका स्वास्थ्य बोझ गरीब और हाशिये पर रह रहे लोगों पर असंगत रूप से अधिक पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए केवल प्रदूषण कम करने की नीतियां पर्याप्त नहीं हैं। हमें "इन-सीटू डेवलपमेंट" पर जोर देने, अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए बेहतर व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा लागू करने, और प्रदूषित हॉटस्पॉट के पास रहने वाले समुदायों को मूलभूत स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सेवाएँ प्रदान करने की आवश्यकता है। एक न्यायसंगत और स्वस्थ समाज के लिए, वायु प्रदूषण के विरुद्ध लड़ाई में सामाजिक न्याय को केंद्र में रखना अपरिहार्य है।
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Essay Questions: सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानता GS Question झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग…
झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण एक बड़ा खतरा क्यों है? इस समस्या के शमन (Mitigation) हेतु सरकारी नीतियों में किन सुधारों की आवश्यकता है? (लगभग 250 शब्द)
वायु प्रदूषण का संकट भारत में सामाजिक-आर्थिक असमानता का स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ इसका सबसे अधिक और गंभीर प्रभाव झुग्गी बस्तियों और हाशिये पर रह रहे गरीब समुदायों पर पड़ता है। यह खतरा निम्नलिखित कारणों से बढ़ जाता है:
प्रदूषण हॉटस्पॉट के निकट निवास: झुग्गी बस्तियाँ अक्सर अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों, जैसे कचरा डंपिंग स्थल, खुले में कचरा जलाने की जगह, निर्माण स्थल और असंगठित औद्योगिक इकाइयों के पास स्थित होती हैं। 'वल्नरेबिलिटी मैपिंग' में पाया गया है कि ये क्षेत्र बाढ़ और हीट वेव हॉटस्पॉट से भी मेल खाते हैं, जिससे दोहरी मार पड़ती है।
व्यावसायिक जोखिम: अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर (जैसे कचरा बीनने वाले, सफाई कर्मचारी, निर्माण मजदूर) अपने काम के कारण लगातार जहरीली हवा के संपर्क में रहते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि इन कामगारों, विशेषकर महिलाओं, के फेफड़ों की कार्यक्षमता सामान्य से काफी कम होती है और उनमें श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा अधिक होता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव: इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के पास बीमारी से उबरने के लिए पर्याप्त पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ और स्वच्छता सुविधाओं (जैसे पीने का साफ पानी) की कमी होती है, जिससे प्रदूषण जनित बीमारियों की गंभीरता बढ़ जाती है।
नीतिगत सुधार:
'इन-सीटू' विकास पर जोर: आवास नीति का ध्यान झुग्गियों को शहर से बाहर विस्थापित करने के बजाय "इन-सीटू डेवलपमेंट" (जहाँ लोग हैं, वहीं बुनियादी सुविधाएं और बेहतर आवास देना) पर केंद्रित होना चाहिए।
व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा: अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए विशेष व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा नियम लागू किए जाने चाहिए, जिनमें कार्यस्थल पर प्रदूषण-रोधी उपकरण और नियमित स्वास्थ्य जाँच शामिल हों।
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार: प्रदूषण हॉटस्पॉट के आस-पास प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना और मुफ्त श्वसन संबंधी उपचार उपलब्ध कराना आवश्यक है।
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