प्रशन 17. पंचायती राज के बारे में कौन सा कथन सत्य है?
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21%
पंचायत समिति और जिला परिषद का गठन प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाना चाहिए।
33%
पंचायत स्तर पर चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए
39%
पंचायती राज संस्थाओं का चुनाव राज्य चुनाव आयोग के मार्गदर्शन में आयोजित किया जाता है।
6%
पंचायतों की वित्तीय समीक्षा के लिए 6 वर्ष बाद राज्य वित्त आयोग की स्थापना की जाती है
जिला परिषद की बैठक कितने समय में एक बार होना अनिवार्य है
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0%
15 दिन में
3%
1 माह में
94%
3 माह में
3%
30 दिन में
जिला परिषद के सदस्य तथा उप जिलाप्रमुख अपना इस्तीफा जिला प्रमुख को देते हैं तो जिला प्रमुख अपना इस्तीफा किसे देता है
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35%
उप जिला प्रमुख को
6%
बीडीओ को
55%
मुख्य कार्यकारी अधिकारी को
3%
संभागीय आयुक्त को
किसी जिले में जिला परिषद का गठन किया जाता है
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3%
किसी जिले की 4 लाख जनसंख्या पर
18%
किसी जिले की 4 लाख ग्रामीण जनसंख्या पर
48%
किसी जिले की 5 लाख ग्रामीण जनसंख्या को
30%
किसी जिले की 5 लाख जनसंख्या पर
वार्ड पंच अपना इस्तीफा किसे देते हैं
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9%
उपसरपंच
59%
सरपंच
18%
BDO को
15%
मुख्य कार्यकारी अधिकारी
उपसरपंच अपना इस्तीफा किसे देता है
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37%
सरपंच
40%
BDO को
17%
प्रधान को
6%
जिला प्रमुख को
स्थानीय स्वशासन किस सूची का विषय है -
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68%
राज्य सूची
27%
समवर्ती सूची
5%
संघ सूची
0%
इनमें से कोई नहीं
प्रशन 28. 73वें संविधान संशोधन 1992 के द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया, इस संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा गया था-
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6%
भाग - 9
41%
अनुच्छेद 243-243(O)
13%
11वीं अनुसूची
39%
उपरोक्त सभी
भारत का पहला राज्य जहां पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव हुए -
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75%
राजस्थान
20%
आंध्र प्रदेश
5%
महाराष्ट्र
0%
गुजरात
❤1
व्याख्या
बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश पर सर्वप्रथम 2 अक्टूबर 1959 में नागौर जिले के बगदरी गांव (राजस्थान) से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंभ किया, और 11 अक्टूबर 1959 को आंध्र प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया, इस प्रकार पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने वाला प्रथम राज्य राजस्थान तथा दूसरा आंध्र प्रदेश बना था, जबकि 11 अक्टूबर 1959 को आंध्रप्रदेश भारत का पहला राज्य बना जहां पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव हुए।
❤2
Q. 30 निम्न में से किस समिति ने त्रि- स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की जगह द्वि- स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश की थी -
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34%
बलवंत राय मेहता समिति
57%
अशोक मेहता समिति
3%
Gvk राव समिति
6%
M l सिंघवी समिति
अशोक मेहता समिति की सिफारिशें -
जिसमें जिला स्तर पर जिला परिषद तथा इसके नीचे मंडल पंचायत का प्रावधान था।
मंडल पंचायत 15- 20 हजार जनसंख्या वाले ग्राम समूह से मिलकर बनने का प्रावधान था।
पंचायत चुनाव में सभी स्तरों पर राजनीतिक पार्टियों की आधिकारिक भागीदारी हो।
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को जनसंख्या के अनुपात आरक्षण।
राज्य मंत्रीपरिषद में एक पंचायतराज मंत्री हो।
न्याय पंचायत की स्थापना की जाए।
केंद्र सरकार ने अशोक मेहता समिति की सिफारिशो को मंजूर नहीं किया परंतु तीन राज्यों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल सरकार ने मेहता समिति की सिफारिशो को लागू किया था।
❤2
Q.31 सर्वप्रथम किस समिति की अनुशंसा पर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने हेतु विधेयक तैयार किए थे-
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6%
गॉड गिल समिति
20%
पीके थूगन समिति 1989
46%
Ml सिंघवी समिति
29%
अशोक मेहता समिति
व्याख्या
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राजीव गांधी की सरकार द्वारा 1989 में पंचायती राज संस्थाओं और नगर पालिकाओं को संवैधानिक दर्जा देने हेतु क्रमशः 64वा और 65 वा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लाया गया था, परन्तु यह विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद उनकी संघीय व्यवस्था में केंद्र सरकार के बढ़ते दखल के मुद्दे पर यह राज्यसभा में पारित नहीं हो पाया।
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❤2
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अनुच्छेद 71:- राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बंधित विवादित विषय। 71(1) राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न या संसक्त सभी शंकाओं और विवादों की जांच और विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा। (2) यदि…
अनुच्छेद 72:-
72(1) राष्ट्रपति को, किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की--
(क) उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश सेना न्यायालय ने दिया है,
(ख) उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है जिस विषय तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है,
(ग) उन सभी मामलों में, जिनमें दंडादेश, मृत्यु दंडादेश है, शक्ति होगी।
(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात संघ के सशस्त्र बलों के किसी आफिसर की सेना न्यायालय द्वारा पारित दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
(3) खंड (1) के उपखंड (ग) की कोई बात तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी राज्य के राज्यपाल* द्वारा प्रयोक्तव्य मृत्यु दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
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राष्ट्रपति की क्षमादान आदि की शक्ति।
72(1) राष्ट्रपति को, किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की--
(क) उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश सेना न्यायालय ने दिया है,
(ख) उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है जिस विषय तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है,
(ग) उन सभी मामलों में, जिनमें दंडादेश, मृत्यु दंडादेश है, शक्ति होगी।
(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात संघ के सशस्त्र बलों के किसी आफिसर की सेना न्यायालय द्वारा पारित दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
(3) खंड (1) के उपखंड (ग) की कोई बात तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी राज्य के राज्यपाल* द्वारा प्रयोक्तव्य मृत्यु दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
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अनुच्छेद 72:- राष्ट्रपति की क्षमादान आदि की शक्ति। 72(1) राष्ट्रपति को, किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की-- (क) उन सभी मामलों में, जिनमें…
अनुच्छेद 73:-
73(1) इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार--
(क) जिन विषयों के संबंध में संसद को विधि बनाने की शक्ति है उन तक, और
(ख) किसी संधि या करार के आधार पर भारत सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य अधिकारों, प्राधिकार और के प्रयोग तक होगा;
परंतु इस संविधान में या संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि में अभिव्यक्त रूप से यथा उपबंधित के सिवाय, उपखंड (क) में निर्दिष्ट कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य में ऐसे विषयों तक नहीं होगा जिनके संबंध में उस राज्य के विधान-मंडल को भी विधि बनाने की शक्ति है।
(2) जब तक संसद अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, कोई राज्य और राज्य का कोई अधिकारी या प्राधिकारी उन विषयों में, जिनके संबंध में संसद को उस राज्य के लिए विधि बनाने की शक्ति है, ऐसी कार्यपालिका शक्ति का या कृत्यों का प्रयोग कर सकेगा जिनका प्रयोग वह राज्य या उसका अधिकारी या प्राधिकारी इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले कर सकता था।
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संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार।
73(1) इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार--
(क) जिन विषयों के संबंध में संसद को विधि बनाने की शक्ति है उन तक, और
(ख) किसी संधि या करार के आधार पर भारत सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य अधिकारों, प्राधिकार और के प्रयोग तक होगा;
परंतु इस संविधान में या संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि में अभिव्यक्त रूप से यथा उपबंधित के सिवाय, उपखंड (क) में निर्दिष्ट कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य में ऐसे विषयों तक नहीं होगा जिनके संबंध में उस राज्य के विधान-मंडल को भी विधि बनाने की शक्ति है।
(2) जब तक संसद अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, कोई राज्य और राज्य का कोई अधिकारी या प्राधिकारी उन विषयों में, जिनके संबंध में संसद को उस राज्य के लिए विधि बनाने की शक्ति है, ऐसी कार्यपालिका शक्ति का या कृत्यों का प्रयोग कर सकेगा जिनका प्रयोग वह राज्य या उसका अधिकारी या प्राधिकारी इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले कर सकता था।
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कल मूल अधिकार(PYQ) रिवीजन चलेगा 【Join 📌 @UppscZone】
📚मूल अधिकार:-
🎯भाग:-3 {अनुच्छेद12-35}
🎯संख्या:- मूल संविधान में 7
🎯वर्तमान में संख्या:- 6 [संपत्ति का मूल अधिकार 44 वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा मौलिक अधिकार के रूप में समाप्त] (अनुच्छेद 31)
🎯प्रकृति:- नकारात्मक।(व्यक्तिवादी)
🎯प्रभावित:- अमेरिका के संविधान से।
🎯संशोधन:- संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत बिना मूल ढांचे में परिवर्तन किए।
🎯संरक्षण या सुरक्षा:-
➖सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32
➖उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226
🌀समानता का अधिकार:-
[अनुच्छेद 14-18]
इसमें कानून के समक्ष समानता, धर्म, वंश, जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध तथा रोज़गार के संबंध में समान अवसर शामिल है।
🌀स्वतंत्रता का अधिकार:-
[अनुच्छेद 19-22]
भाषा और विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता का अधिकार, एकत्र होने संघ या यूनियन बनाने, आने-जाने, निवास करने और कोई भी जीविकोपार्जन एवं व्यवसाय करने की स्वतंत्रता का अधिकार (इनमें से कुछ अधिकार राज्य की सुरक्षा, विदेशों के साथ भिन्नतापूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता के तहत दिये जाते हैं)।
🌀शोषण के विरुद्ध अधिकार:-
[अनुच्छेद 23-24]
इसमें बेगार, बाल श्रम और मनुष्यों के व्यापार का निषेध किया गया है।
🌀धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार:
[अनुच्छेद 25-28]
आस्था एवं अंत:करण की स्वतंत्रता, किसी भी धर्म का अनुयायी बनना, उस पर विश्वास करना एवं धर्म का प्रचार करना इसमें शामिल हैं।
🌀सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार:
[अनुच्छेद 29-30]
किसी भी वर्ग के नागरिकों को अपनी संस्कृति सुरक्षित रखने, भाषा या लिपि बचाए रखने और अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद की शैक्षिक संस्थाएँ चलाने का अधिकार।
🌀संवैधानिक उपचारों का अधिकार:
[अनुच्छेद 32]
मौलिक अधिकार के प्रवर्तन के लिये संवैधानिक उपचार का अधिकार।
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🎯भाग:-3 {अनुच्छेद12-35}
🎯संख्या:- मूल संविधान में 7
🎯वर्तमान में संख्या:- 6 [संपत्ति का मूल अधिकार 44 वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा मौलिक अधिकार के रूप में समाप्त] (अनुच्छेद 31)
🎯प्रकृति:- नकारात्मक।(व्यक्तिवादी)
🎯प्रभावित:- अमेरिका के संविधान से।
🎯संशोधन:- संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत बिना मूल ढांचे में परिवर्तन किए।
🎯संरक्षण या सुरक्षा:-
➖सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32
➖उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226
🌟छ्ह मौलिक अधिकार:-
🌀समानता का अधिकार:-
[अनुच्छेद 14-18]
इसमें कानून के समक्ष समानता, धर्म, वंश, जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध तथा रोज़गार के संबंध में समान अवसर शामिल है।
🌀स्वतंत्रता का अधिकार:-
[अनुच्छेद 19-22]
भाषा और विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता का अधिकार, एकत्र होने संघ या यूनियन बनाने, आने-जाने, निवास करने और कोई भी जीविकोपार्जन एवं व्यवसाय करने की स्वतंत्रता का अधिकार (इनमें से कुछ अधिकार राज्य की सुरक्षा, विदेशों के साथ भिन्नतापूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता के तहत दिये जाते हैं)।
🌀शोषण के विरुद्ध अधिकार:-
[अनुच्छेद 23-24]
इसमें बेगार, बाल श्रम और मनुष्यों के व्यापार का निषेध किया गया है।
🌀धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार:
[अनुच्छेद 25-28]
आस्था एवं अंत:करण की स्वतंत्रता, किसी भी धर्म का अनुयायी बनना, उस पर विश्वास करना एवं धर्म का प्रचार करना इसमें शामिल हैं।
🌀सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार:
[अनुच्छेद 29-30]
किसी भी वर्ग के नागरिकों को अपनी संस्कृति सुरक्षित रखने, भाषा या लिपि बचाए रखने और अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद की शैक्षिक संस्थाएँ चलाने का अधिकार।
🌀संवैधानिक उपचारों का अधिकार:
[अनुच्छेद 32]
मौलिक अधिकार के प्रवर्तन के लिये संवैधानिक उपचार का अधिकार।
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