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अनुच्छेद 62:- राष्ट्रपति पद की रिक्ति पर चुनाव व उसकी पदावधि। 62(1): राष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा। (2): राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण…
अनुच्छेद 63:-

भारत का उपराष्ट्रपति।
(भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।)

अनुच्छेद 64:-

★उपराष्ट्रपति का राज्य सभा का पदेन सभापति होना।
★उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा:
परंतु जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनुच्छेद 65 के अधीन राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस अवधि के दौरान वह राज्य
सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा और वह अनुच्छेद 97 के अधीन राज्य सभा के सभापति को संदेय वेतन या भत्ते का हकदार नहीं होगा।

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अनुच्छेद 63:- भारत का उपराष्ट्रपति। (भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।) अनुच्छेद 64:- ★उपराष्ट्रपति का राज्य सभा का पदेन सभापति होना। ★उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा: परंतु जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति…
अनुच्छेद 65:-

राष्ट्रपति पद की आकस्मिक रिक्ति या अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति का कार्य करना।



65(1) राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में उपराष्ट्रपति उस तारीख तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार निर्वाचित नया राष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करता है।

(2) जब राष्ट्रपति अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब उपराष्ट्रपति उस तारीख तक उसके कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है।

(3) उपराष्ट्रपति को उस अवधि के दौरान और उस अवधि के संबंध में, जब वह राष्ट्रपति के रूप में इस प्रकार कार्य कर रहा है या उसके कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ होंगी तथा वह ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे, और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा।

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अनुच्छेद 65:- राष्ट्रपति पद की आकस्मिक रिक्ति या अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति का कार्य करना। 65(1) राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में उपराष्ट्रपति उस तारीख तक राष्ट्रपति के…
अनुच्छेद 66:-

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन व पात्रता।

66(1) उपराष्ट्रपति का निर्वाचन [संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों]* द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा।

(2) उपराष्ट्रपति संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा और यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का कोई सदस्य उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।

(3) कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र तभी होगा जब वह--
(क) भारत का नागरिक है, (ख) पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, और
(ग) राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित है।

(4) कोई व्यक्ति, जो भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा।
स्पष्टीकरण--इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए, कोई व्यक्ति केवल इस कारण कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल** है अथवा संघ का या किसी राज्य का मंत्री है।

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अनुच्छेद 66:- उपराष्ट्रपति का निर्वाचन व पात्रता। 66(1) उपराष्ट्रपति का निर्वाचन [संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों]* द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान…
अनुच्छेद 67:-

उपराष्ट्रपति की पदावधि व महाभियोग।


67(1) उपराष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा: परंतु--
(क) उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा;
(ख) उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोकसभा सहमत है; किंतु इस खंड के प्रयोजन के लिए कई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो;
(ग) उपराष्ट्रपति, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है।

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अनुच्छेद 67:- उपराष्ट्रपति की पदावधि व महाभियोग। 67(1) उपराष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा: परंतु-- (क) उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; (ख) उपराष्ट्रपति, राज्य…
अनुच्छेद 68:-

उपराष्ट्रपति की पद रिक्ति व आकस्मिक रिक्ति के बाद चुनाव व उसकी पदावधि।

68(1) उपराष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा।
(2) उपराष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से हुई उसके पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, रिक्ति होने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र किया जाएगा और रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति, अनुच्छेद 67 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपने पद ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष की पूरी अवधि तक पद धारण करने का हकदार होगा।

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अनुच्छेद 68:- उपराष्ट्रपति की पद रिक्ति व आकस्मिक रिक्ति के बाद चुनाव व उसकी पदावधि। 68(1) उपराष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा। (2) उपराष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद…
🌀अनुच्छेद 69:-
उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ व प्रतिज्ञान


प्रत्येक उपराष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष निम्नलिखित प्रारूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात्‌: --
ईश्वर की शपथ लेता हूँ

"मैं, अमुक ---------------------------------कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ, श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूँगा।"

🌀अनुच्छेद 70:-

अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन।


संसद, ऐसी किसी आकस्मिकता में जो इस अध्याय में उपबंधित नहीं है, राष्ट्रपति के कृत्यों के निर्वहन के लिए ऐसा उपबंध कर सकेगी जो वह ठीक समझे।

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🌀अनुच्छेद 69:- उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ व प्रतिज्ञान प्रत्येक उपराष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष निम्नलिखित प्रारूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात्‌:…
अनुच्छेद 71:-
राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बंधित विवादित विषय।


71(1) राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न या संसक्त सभी शंकाओं और विवादों की जांच और विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा।
(2) यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया जाता है तो उसके द्वारा, यथास्थिति, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन में उच्चतम न्यायालय के विनिश्चय की तारीख को या उससे पहले किए गए कार्य उस घोषणा के कारण ‍अधिमान्य नहीं होंगे।

(3) इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित या संसक्त किसी विषय का विनियमन संसद विधि द्वारा कर सकेगी।
(4) राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में किसी व्यक्ति के निर्वाचन को उसे निर्वाचित करने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों में किसी भी कारण से विद्यमान किसी रिक्ति के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।

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उपर्युक्त अनुच्छेद को पढ़ने में महज एक मिनट लगेगा इसीलिए एक मिनट का समय निकालकर उसे जरूर पढ़ें और एक्जाम में अपने एक से दो अंक सुनिश्चित करें।
एक एक करके पढ़ेंगे तो धीरे धीरे सब याद हो जाएगा नहीं तो एक साथ पढ़ने पर कन्फ्यूजन और डिप्रेशन ही होगा।🎯💐
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571 लोग हो गए हैं इसीलिए 71 अनुच्छेद करा दिया गया है जैसे जैसे ये संख्या बढ़ती रहेगी वैसे वैसे और भी अनुच्छेद कराते रहेंगे और आप लोग दोहराते रहिएगा ठीक है 🎯♥️
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स्वराज पार्टी का गठन

स्वराज पार्टी ब्रिटिश भारत में स्वतंत्रता संग्राम के समय बना एक प्रमुख राजनीतिक दल था। इस दल ने भारतीयों के लिये अधिक से अधिक स्व-शासन तथा राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिये कार्य किया था। स्वराज पार्टी को उत्तर भारत के सम्पन्न वकीलों में से एक मोतीलाल नेहरू (1861-1931 ई.) ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर से शुरू किया था। 'स्वराज' शब्द का वास्तविक अर्थ है- 'अपना स्वयं का शासन'।

🌀मोतीलाल नेहरू के साथ-साथ बंगाल के चितरंजन दास (1870-1925 ई.) ने भी इस पार्टी के नेतृत्व में भागीदारी की।

🌀1923 ई. में स्वराज पार्टी ने 'केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली' का चुनाव लड़ा।

🌀पार्टी ने परिषद में रहकर सरकार विरोधी आन्दोलन के ज़रिये सरकारी नीति में बाधा डालने और ब्रिटिश शासन को पटरी से उतारने का लक्ष्य बनाया।

🌀हालाँकि गाँधीजी का असहयोग आन्दोलन ही कांग्रेस की प्राथमिक रणनीति बना रहा।

🌀कांग्रेस असहयोग आन्दोलन को वापस लेना नहीं चाहती थी, क्योंकि इस आन्दोलन को भारी सफलता प्राप्त हो रही थी।

🌀विश्वयुद्ध के बाद के सुधारों में वास्तविक आंशिक सहयोग उन कांग्रेस नेताओं की वैकल्पिक नीति बन गया, जो कम रूढ़िवादी हिन्दू या अधिक धर्मनिरपेक्ष विचाराधारा के थे।

🌀1923 ई. में 'केन्द्रीय लेजिस्लेटिव एसेंबली' में स्वराजियों ने 40 से अधिक सीटें जीतीं। इतनी सीटें जीतने पर भी उनकी संख्या कभी भी

🌀इतनी नहीं रही कि वे अंग्रेज़ों को ऐसा विधेयक पारित करने से रोक सकते, जिसे अंग्रेज़ आन्तरिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए ज़रूरी समझते थे।

#History #Revision

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साइमन कमीशन

🌀साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी। इस कमीशन में सात सदस्य थे, जो सभी ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सदस्य थे। यही कारण था कि इसे 'श्वेत कमीशन' कहा गया।

🌀साइमन कमीशन की घोषणा 8 नवम्बर, 1927 ई. को की गई। कमीशन को इस बात की जाँच करनी थी कि क्या भारत इस लायक़ हो गया है कि यहाँ लोगों को संवैधानिक अधिकार दिये जाएँ।

🌀इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका बहुत ही तीव्र विरोध हुआ।

🌀आयोग के विरोध के कारण लखनऊ में जवाहर लाल नेहरू, गोविन्द बल्लभ पंत आदि ने लाठियों खाई। लाहौर में लाठी की गहरी चोट के कारण लाला लाजपत राय की 1928 ई. में मृत्यु हो गई।

🌀मरने से पहले लाला लाजपत राय का यह कथन ऐतिहासिक सिद्ध हुआ कि "मेरे ऊपर जो लाठियों के प्रहार किये गए हैं, वही एक दिन ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत (शवपेटी) की आखिरी कील सावित होगा।"

🌀 'साइमन कमीशन ने 27 मई, 1930 ई. को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसकी सिफारिशें इस प्रकार हैं-

»1919 ई. के 'भारत सरकार अधिनियम' के तहत लागू की गई द्वैध शासन व्यवस्था को समाप्त कर उत्तरदायी शासन की स्थाना हो।

»भारत के लिए संघीय संविधान होना चाहिए।

»केन्द्र में भारतीयों के लिए संघीय संविधान होना चाहिए।

»केन्द्र में कोई भी उत्तरदायित्व न प्रदान किया जाए।

»उच्च न्यायालय को भारत सरकार के नियंत्रण में कर दिया जाए।

»वर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से विलग किया जाए तथा उड़ीसा एवं सिंध को अलग प्रदेश का दर्जा दिया जाए।

»प्रान्तीय विधानमण्डलों में सदस्यों की संख्या को बढ़ाया जाए।

»गवर्नर व गवर्नर जनरल अल्पसंख्यक जातियों के हितों के प्रति विशेष ध्यान रखें।

»प्रत्येक 10 वर्ष बाद पुनरीक्षण के लिए एक संविधान आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए तथा भारत के लिए एक ऐसा लचीला संविधान बनाया जाए जो स्वयं से विकसित हो।



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बी आर गवई ने 52वें भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली

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न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के स्थान पर न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई ने आधिकारिक रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश का पदभार संभाल लिया है।

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में न्यायमूर्ति गवई को शपथ दिलाई।
उनका कार्यकाल 23 नवम्बर 2025 तक रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत, ए.जी. मसीह, पी.एस. नरसिम्हा, बी.वी. नागरत्ना, बेला त्रिवेदी आदि भी समारोह में उपस्थित थे।
भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में उत्तराधिकार संभालने के बाद, न्यायमूर्ति गवई अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले दूसरे मुख्य न्यायाधीश बने हैं।
इससे पहले न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन 2010 में सेवानिवृत्त हुए थे।
इसके साथ ही वे देश के पहले बौद्ध मुख्य न्यायाधीश भी बन गए हैं।
उन्हें 24 मई 2019 को बॉम्बे हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया था।

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CJI की नियुक्ति हेतु संवैधानिक प्रावधान

संविधान में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट नहीं किया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा जिसमें भारत के एक मुख्य न्यायाधीश सहित अन्य न्यायाधीश होंगे।

संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
इसके लिये राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श कर सकता है जिन्हें राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिये आवश्यक समझे। 
इस प्रकार स्पष्ट संवैधानिक प्रावधानों के अभाव में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति प्रक्रिया में परंपरा का पालन किया जाता है।
क्या है परम्परा

परंपरानुसार निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश अपने उत्तराधिकारी की सिफारिश वरिष्ठता के आधार पर करते हैं।
यह सिफारिश केंद्रीय कानून मंत्री के माध्यम से प्रधानमंत्री को भेजी जाती है, जो राष्ट्रपति को सलाह देते हैं।
वरिष्ठता को आयु के बजाए सेवा वर्षों (कार्यकाल) के आधार पर परिभाषित किया जाता है।
मुख्य न्यायाधीश की सेवानिवृत्त आयु 65 वर्ष है। 

1950 में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना के बाद से अब तक परम्परा का उल्लंघन मात्र दो बार हुआ -

वर्ष 1973 में न्यायमूर्ति ए.एन. रे को वरिष्ठता क्रम में चौथे स्थान पर होने के बावजूद सी.जे.आई. नियुक्त किया गया।

वर्ष 1977 में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना के वरिष्ठ न्यायाधीश होने के बावजूद न्यायमूर्ति एम.एच. बेग को सी.जे.आई. नियुक्त किया गया था।

शपथ:

प्रत्येक नियुक्त न्यायाधीश को राष्ट्रपति या इस कार्य के लिये नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होती है और उस पर हस्ताक्षर करने होते हैं।
शपथ में भारत के संविधान, संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखने तथा भय या पक्षपात के बिना कर्त्तव्यों का पालन करने की प्रतिबद्धता शामिल है।

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भारत का सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति को किस अनुच्छेद के तहत परामर्श प्रदान करता है -

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अनुच्छेद 32
71%
अनुच्छेद 143
12%
अनुच्छेद 137
17%
अनुच्छेद 124‌‌
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🌀PET 2025 के लिए फॉर्म भरना शुरू हो गया है।

https://upsssc.gov.in/Online_App/IsApplyInPrevious.aspx
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