अनुच्छेद 198 धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया
अनुच्छेद 198 (1): धन विधेयक विधानपरिषद् में पुरःस्थापित नहीं किया जाएगा।
धन विधेयक, राज्यपाल की पूर्वानुमति से सर्वप्रथम विधानसभा में पुरःस्थापित किया जाता है।
अनुच्छेद 198 (2): विधानपरिषद्, धन विधेयक को अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है उसके बाद स्वतः पारित मान लिया जाता है।
विधानपरिषद् धन विधेयक में न तो संशोधन कर सकती और न ही इसे अस्वीकार कर सकती है केवल सिफारिशें कर सकती है, सिफारिशों को स्वीकार करना या न करना विधानसभा पर निर्भर करता है।
अनुच्छेद 198 (3): यदि विधानसभा, विधानपरिषद् की किसी सिफारिश को स्वीकार का लेती है तो धन विधेयक विधानपरिषद् द्वारा सिफारिश किए गए और विधानसभा द्वारा स्वीकार किए गए संशोधनों सहित दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया समझा जाएगा।
अनुच्छेद 198 (4): यदि विधानसभा, विधानपरिषद् की किसी भी सिफारिश को स्वीकार नहीं करती है तो धन विधेयक विधानपरिषद् द्वारा सिफारिश किए गए किसी संशोधन के बिना दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
यदि विधानसभा द्वारा पारित और विधानपरिषद् को उसकी सिफारिशों के लिए पारेषित धन विधेयक उक्त 14 दिन की अवधि के भीतर विधानसभा को नहीं लौटाया जाता है तो, वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिस रूप में विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
धन विधेयक विधानमण्डल के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल इसे स्वीकृति दे सकता है, इसे रोक सकता है, राष्ट्रपत्ति के लिए आरक्षित रख सकता है लेकिन राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकते हैं।
NOTE - धन विधेयक पर संयुक्त अधिवेशन नहीं बुलाया जा सकता है, क्योंकि 14 दिन बाद स्वतः विधानपरिषद् से पारित मान लिया जाता है।
कोई विधेयक, धन विधेयक है या नहीं इसका निर्णय राज्य विधानसभा अध्यक्ष करता है।
धन विधेयक, सरकारी विधेयक होता है और यह सिर्फ एक मंत्री द्वारा ही पुरःस्थापित किया जा सकता है।
धन विधेयक के मामले में विधानपरिषद् के मुकाबले विधानसभा ज्यादा शक्तिशाली होती है।
धन विधेयक सर्वप्रथम राज्य विधानसभा में रखा जाता है, विधानपरिषद् में नहीं।
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अनुच्छेद 198 (1): धन विधेयक विधानपरिषद् में पुरःस्थापित नहीं किया जाएगा।
धन विधेयक, राज्यपाल की पूर्वानुमति से सर्वप्रथम विधानसभा में पुरःस्थापित किया जाता है।
अनुच्छेद 198 (2): विधानपरिषद्, धन विधेयक को अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है उसके बाद स्वतः पारित मान लिया जाता है।
विधानपरिषद् धन विधेयक में न तो संशोधन कर सकती और न ही इसे अस्वीकार कर सकती है केवल सिफारिशें कर सकती है, सिफारिशों को स्वीकार करना या न करना विधानसभा पर निर्भर करता है।
अनुच्छेद 198 (3): यदि विधानसभा, विधानपरिषद् की किसी सिफारिश को स्वीकार का लेती है तो धन विधेयक विधानपरिषद् द्वारा सिफारिश किए गए और विधानसभा द्वारा स्वीकार किए गए संशोधनों सहित दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया समझा जाएगा।
अनुच्छेद 198 (4): यदि विधानसभा, विधानपरिषद् की किसी भी सिफारिश को स्वीकार नहीं करती है तो धन विधेयक विधानपरिषद् द्वारा सिफारिश किए गए किसी संशोधन के बिना दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
यदि विधानसभा द्वारा पारित और विधानपरिषद् को उसकी सिफारिशों के लिए पारेषित धन विधेयक उक्त 14 दिन की अवधि के भीतर विधानसभा को नहीं लौटाया जाता है तो, वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिस रूप में विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
धन विधेयक विधानमण्डल के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल इसे स्वीकृति दे सकता है, इसे रोक सकता है, राष्ट्रपत्ति के लिए आरक्षित रख सकता है लेकिन राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकते हैं।
NOTE - धन विधेयक पर संयुक्त अधिवेशन नहीं बुलाया जा सकता है, क्योंकि 14 दिन बाद स्वतः विधानपरिषद् से पारित मान लिया जाता है।
कोई विधेयक, धन विधेयक है या नहीं इसका निर्णय राज्य विधानसभा अध्यक्ष करता है।
धन विधेयक, सरकारी विधेयक होता है और यह सिर्फ एक मंत्री द्वारा ही पुरःस्थापित किया जा सकता है।
धन विधेयक के मामले में विधानपरिषद् के मुकाबले विधानसभा ज्यादा शक्तिशाली होती है।
धन विधेयक सर्वप्रथम राज्य विधानसभा में रखा जाता है, विधानपरिषद् में नहीं।
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अनुच्छेद 199
धन विधेयक की परिभाषा।
(1) कोई विधेयक धन विधेयक समझा जाएगा, यदि उसमें केवल निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों से संबंधित उपबन्ध हैं, अर्थात् :
(क) किसी कर अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन।
(ख) राज्य द्वारा धन उधार लेने का वा कोई प्रत्याभूति देने का विनियमन अथवा राज्य द्वारा अपने ऊपर ली गयी या ली जाने वाली किन्हों वितीय बाध्यताओं से संबंधित विधि का संशोधन।
(ग) राज्य की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, ऐसे किसी निधि में धर जमा करना या उसमें से धन निकालना।
(घ) राज्य की संचित निधि में से धन का विनियोग।
(ङ) किसी व्यय को राज्य को संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी व्यय की रकम को बढ़ाना।
(च) राज्य को संचित निधि या राज्य के लोक लेखे मधे धन प्राप्त करना अथवा ऐसे धन की अभिरक्षा या उसका निर्गमन, या
(छ) उपखण्ड 105 (क) से उपखण्ड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय का आनुषंगिक कोई विषय।
(2) कोई विधेयक केवल इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा, कि वह जुर्माना या अन्य स्थानीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञतियों के लिए फीसों की या की गयी सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उनके संदाय का उपवन्ध करता है अथवा इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपवन्ध करता है।
(3) यदि यह प्रश्न उठता है कि विधानपरिषद वाले किसी राज्य के विधानमण्डल में पुरःस्थापित कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर उस राज्य की विधानसभा के अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा।
(4) जब धन विधेयक अनुच्छेद 198 के अधीन विधानपरिषद को पारेषित किया जाता है और जब यह अनुच्छेद 200 के अधीन अनुमति के लिए राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तब प्रत्येक धन विधेयक पर विधानसभा के अध्यक्ष के हस्ताक्षर सहित यह प्रमाण पृष्ठांकित किया जाएगा कि वह धन विधेयक है।
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धन विधेयक की परिभाषा।
(1) कोई विधेयक धन विधेयक समझा जाएगा, यदि उसमें केवल निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों से संबंधित उपबन्ध हैं, अर्थात् :
(क) किसी कर अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन।
(ख) राज्य द्वारा धन उधार लेने का वा कोई प्रत्याभूति देने का विनियमन अथवा राज्य द्वारा अपने ऊपर ली गयी या ली जाने वाली किन्हों वितीय बाध्यताओं से संबंधित विधि का संशोधन।
(ग) राज्य की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, ऐसे किसी निधि में धर जमा करना या उसमें से धन निकालना।
(घ) राज्य की संचित निधि में से धन का विनियोग।
(ङ) किसी व्यय को राज्य को संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी व्यय की रकम को बढ़ाना।
(च) राज्य को संचित निधि या राज्य के लोक लेखे मधे धन प्राप्त करना अथवा ऐसे धन की अभिरक्षा या उसका निर्गमन, या
(छ) उपखण्ड 105 (क) से उपखण्ड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय का आनुषंगिक कोई विषय।
(2) कोई विधेयक केवल इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा, कि वह जुर्माना या अन्य स्थानीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञतियों के लिए फीसों की या की गयी सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उनके संदाय का उपवन्ध करता है अथवा इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपवन्ध करता है।
(3) यदि यह प्रश्न उठता है कि विधानपरिषद वाले किसी राज्य के विधानमण्डल में पुरःस्थापित कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर उस राज्य की विधानसभा के अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा।
(4) जब धन विधेयक अनुच्छेद 198 के अधीन विधानपरिषद को पारेषित किया जाता है और जब यह अनुच्छेद 200 के अधीन अनुमति के लिए राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तब प्रत्येक धन विधेयक पर विधानसभा के अध्यक्ष के हस्ताक्षर सहित यह प्रमाण पृष्ठांकित किया जाएगा कि वह धन विधेयक है।
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🔰अनुच्छेद 200 राज्यपाल की विधि/कानून बनाने की शक्ति।
राज्यपाल की वीटो शक्ति जब कोई विधेयक विधानमण्डल से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है तो राज्यपाल के पास 3 विकल्प होते हैं:
(1) राज्यपाल, अनुमति दे सकता है (कानून बनाने की शक्ति)
(2) राज्यपाल, अनुमति रोक सकता है (वीटो पॉवर)
(3) राज्यपाल, विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।
(1) अनुमति (मंजूरी दे सकता है -
जब किसी विधेयक पर राज्यपाल की मंजूरी मिल जाती है तो वह कानून या अधिनियम का रूप ले लेता है अर्थात कोई विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही कानून या अधिनियम का रूप लेता है।
(2) अनुमति रोक सकता है अर्थात वीटो का प्रयोग कर सकता है:-
वीटो लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'निषेध' (मना करना)
राज्यपाल के पास 2 प्रकार का वीटो पॉवर (निषेधाधिकार) है:
(A) निलम्बनकारी वीटो
(B) आत्यांत्तिक वीटो
जब राज्यपाल किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटा देता है तो उसे निलम्बनकारी वीटो कहा जाता है।
राज्यपाल किसी विधेयक को एक बार पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है, यदि राज्य विधानमण्डल पुनः उस विधेयक को संशोधन सहित या संशोधन रहित, राज्यपाल के पास भेजती है तो राज्यपाल उस पर अनुमति देने के लिए बाध्य है।
Note - राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता अर्थात उस पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है।
Note - राज्यपाल, वित्त विधेयक एवं साधारण विधेयक पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग कर सकता है।
जब राज्यपाल किसी विधेयक को अनुमति देने से पूर्णतः मना कर देता है तो उसे आत्यांतिक बीटो कहा जाता है। सामान्यतः गैर-सरकारी विधेयकों पर आत्यातिक वीटो का प्रयोग किया जाता है।
(3) राज्यपाल, किसी विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।
राज्यपाल निम्न विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूों हेतु रख सकता है : -
(1) ऐसा कोई विधेयक जो उच्च न्यायालय (HC) की शक्तियों में कमी (अल्पीकरण) करता हो।
(2) ऐसा कोई विधेयक जो नीति निर्देशक तत्वों के विरुद्ध हो।
(3) ऐसा कोई विधेयक जो अनुच्छेद 31 (C) के तहत सम्पत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण से संबंधित हो।
(4) ऐसा कोई विधेयक जो राष्ट्रीय महत्व का हो।
(5) ऐसा कोई विधेयक जो संविधान के उपबंधों के विरुद्ध हो।
(6) ऐसा कोई विधेयक जो देश के व्यापक हित के विरुद्ध हो।
(7) वित्तीय आपात के समय राज्य विधान मण्डल द्वारा पारित धन विधेयक।
🔰राज्यपाल जब किसी विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित रखता है तो उसके बाद उस विधेयक पर राज्यपाल की भूमिका समाप्त हो जाती है अर्थात अब उस पर राज्यपाल की स्वीकृति को आवश्यकता नहीं रहती है।
जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति के पास निम्न विकल्प होते है :- (1) राष्ट्रपति उस विधेयक को स्वीकृति दे सकता है।
(2) राष्ट्रपत्ति, विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है अर्थात स्वीकृति देने से मना कर सकता है।
(3) राष्ट्रपति, विधेयक को राज्य विधान मण्डल के पास पुनर्विचार हेतु भेज सकता है। अर्थात राष्ट्रपति, राज्यपाल को यह निर्देश दे सकेगा कि वह विधेयक को सदन को लौटा दे (अनुच्छेद 201)।
यदि राज्य विधान मण्डल 6 माह के भीतर पुनः संशोधन सहित या रहित विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजता है तो राष्ट्रपति इसे स्वीकृति दे भी सकता है और नहीं भी अर्थात राष्ट्रपति स्वीकृति देने के लिए बाध्य नहीं है। अर्थात जेबी वीटो का प्रयोग कर सकता है।
राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधान मण्डल के पास पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता हैं।
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राज्यपाल की वीटो शक्ति जब कोई विधेयक विधानमण्डल से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है तो राज्यपाल के पास 3 विकल्प होते हैं:
(1) राज्यपाल, अनुमति दे सकता है (कानून बनाने की शक्ति)
(2) राज्यपाल, अनुमति रोक सकता है (वीटो पॉवर)
(3) राज्यपाल, विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।
(1) अनुमति (मंजूरी दे सकता है -
जब किसी विधेयक पर राज्यपाल की मंजूरी मिल जाती है तो वह कानून या अधिनियम का रूप ले लेता है अर्थात कोई विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही कानून या अधिनियम का रूप लेता है।
(2) अनुमति रोक सकता है अर्थात वीटो का प्रयोग कर सकता है:-
वीटो लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'निषेध' (मना करना)
राज्यपाल के पास 2 प्रकार का वीटो पॉवर (निषेधाधिकार) है:
(A) निलम्बनकारी वीटो
(B) आत्यांत्तिक वीटो
(A) निलम्बनकारी वीटो :
जब राज्यपाल किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटा देता है तो उसे निलम्बनकारी वीटो कहा जाता है।
राज्यपाल किसी विधेयक को एक बार पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है, यदि राज्य विधानमण्डल पुनः उस विधेयक को संशोधन सहित या संशोधन रहित, राज्यपाल के पास भेजती है तो राज्यपाल उस पर अनुमति देने के लिए बाध्य है।
Note - राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता अर्थात उस पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है।
Note - राज्यपाल, वित्त विधेयक एवं साधारण विधेयक पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग कर सकता है।
(B) आत्त्यातिक वीटो :
जब राज्यपाल किसी विधेयक को अनुमति देने से पूर्णतः मना कर देता है तो उसे आत्यांतिक बीटो कहा जाता है। सामान्यतः गैर-सरकारी विधेयकों पर आत्यातिक वीटो का प्रयोग किया जाता है।
(3) राज्यपाल, किसी विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।
राज्यपाल निम्न विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूों हेतु रख सकता है : -
(1) ऐसा कोई विधेयक जो उच्च न्यायालय (HC) की शक्तियों में कमी (अल्पीकरण) करता हो।
(2) ऐसा कोई विधेयक जो नीति निर्देशक तत्वों के विरुद्ध हो।
(3) ऐसा कोई विधेयक जो अनुच्छेद 31 (C) के तहत सम्पत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण से संबंधित हो।
(4) ऐसा कोई विधेयक जो राष्ट्रीय महत्व का हो।
(5) ऐसा कोई विधेयक जो संविधान के उपबंधों के विरुद्ध हो।
(6) ऐसा कोई विधेयक जो देश के व्यापक हित के विरुद्ध हो।
(7) वित्तीय आपात के समय राज्य विधान मण्डल द्वारा पारित धन विधेयक।
🔰राज्यपाल जब किसी विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित रखता है तो उसके बाद उस विधेयक पर राज्यपाल की भूमिका समाप्त हो जाती है अर्थात अब उस पर राज्यपाल की स्वीकृति को आवश्यकता नहीं रहती है।
जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति के पास निम्न विकल्प होते है :- (1) राष्ट्रपति उस विधेयक को स्वीकृति दे सकता है।
(2) राष्ट्रपत्ति, विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है अर्थात स्वीकृति देने से मना कर सकता है।
(3) राष्ट्रपति, विधेयक को राज्य विधान मण्डल के पास पुनर्विचार हेतु भेज सकता है। अर्थात राष्ट्रपति, राज्यपाल को यह निर्देश दे सकेगा कि वह विधेयक को सदन को लौटा दे (अनुच्छेद 201)।
यदि राज्य विधान मण्डल 6 माह के भीतर पुनः संशोधन सहित या रहित विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजता है तो राष्ट्रपति इसे स्वीकृति दे भी सकता है और नहीं भी अर्थात राष्ट्रपति स्वीकृति देने के लिए बाध्य नहीं है। अर्थात जेबी वीटो का प्रयोग कर सकता है।
राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधान मण्डल के पास पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता हैं।
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अनुच्छेद 201 राष्ट्रपति के लिये विचार के लिए आरक्षित विधेयक पर कार्यवाही
जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि यह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है। जहां विधेयक धन विधेयक नहीं है यहां राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निर्देश दे सकेगा कि वह विधेयक को, यथास्थिति, राज्य के विधानमण्डल के सदन या सदनों को ऐसे सन्देश के साथ, जो अनुच्छेद 200 के पहले परन्तुक में वर्णित है, लौटा दे।
जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब ऐसा सन्देश मिलने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर सदन या सदनों द्वारा उस पर तदनुसार पुनर्विचार किया जाएगा और यदि वह सदन या सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से प्रस्तुत किया जाएगा।
पुनर्विचार के बाद भी राष्ट्रपति उस विधेयक पर स्वीकृति दे सकता एवं नहीं भी दे सकता है।
राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधानमण्डल में पुनर्विचार हेतु नहीं भेज सकता है।
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जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि यह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है। जहां विधेयक धन विधेयक नहीं है यहां राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निर्देश दे सकेगा कि वह विधेयक को, यथास्थिति, राज्य के विधानमण्डल के सदन या सदनों को ऐसे सन्देश के साथ, जो अनुच्छेद 200 के पहले परन्तुक में वर्णित है, लौटा दे।
जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब ऐसा सन्देश मिलने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर सदन या सदनों द्वारा उस पर तदनुसार पुनर्विचार किया जाएगा और यदि वह सदन या सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से प्रस्तुत किया जाएगा।
पुनर्विचार के बाद भी राष्ट्रपति उस विधेयक पर स्वीकृति दे सकता एवं नहीं भी दे सकता है।
राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधानमण्डल में पुनर्विचार हेतु नहीं भेज सकता है।
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अनुच्छेद 202
इसमें राज्य के वार्षिक वित्तीय विवरण का उल्लेख है
1. राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में राज्य के विधानमण्डल के सदनों के समक्ष उस राज्य का उस वर्ष के लिए अनुमानित (प्राक्कलित) प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग में 'वार्षिक वित्तीय विवरण' कहा गया।
2. वार्षिक वित्तीय विवरण में दिए हुए व्यय के प्राक्कलनों (अनुमानों) में :
(क) इस संविधान में राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय के रूप में वर्णित व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां।
(ख) राज्य की संचित निधि में से किए जाने के लिए प्रस्तावित अन्य व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां, अन्य व्यय से राजस्व खाते पर व्यय को अलग करेगा।
3. निम्नलिखित व्यय प्रत्येक राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय होगा :
(क) राज्यपाल की परिलब्धियां और भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय।
(ख) विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा विधानपरिषद् के सभापति और उपसभापति के भी वेतन और भत्ते।
(ग) ऐसे ऋण भार जिनका दायित्व राज्य पर है, जिनके अंतर्गत व्याज, निक्षेप निधिभार, मोचन शुल्क तथा उधार लेने, ऋण सेवा और ऋण मोचन से संबंधित अन्य व्यय है।
(घ) किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों के संबंध में व्यय।
(ङ) किसी भी अदालत या मध्यस्थ न्यायाधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट की तुष्टि के लिए आवश्यक रकम।
(च) कोई अन्य व्यय जो इस संविधान द्वारा या राज्य के विधानमण्डल द्वारा, इस प्रकार भारित घोषित किया जाता है।
Note - संविधान में बजट शब्द का उल्लेख ना होकर 'वार्षिक वित्तीय विवरण' शब्द का उल्लेख मिलता है।
बजट प्रत्येक वर्ष वित्त मंत्री पेश करता है। अशोक गहलोत एवं वसुंधरा राजे ने वित्त मंत्री के रूप में 10-10 बार बजट पेश किया है अब तक।
#ARTICLES #POLITY #PRELIMS
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इन सब अनुच्छेद से संबंधित प्रश्न जल्द ही प्रेषित किए जाएंगे
बने रहिए @UppscZone परिवार के साथ जो रखे आपको सबके आगे। 🌹
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चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा गाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े, जिसे आगे चलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) नाम दिया गया।
चंद्रशेखर आज़ाद ने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। 1925 का काकोरी कांड, सांडर्स की हत्या (1928), और दिल्ली असेम्बली बम कांड (1929) जैसी घटनाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
शहीद दिवस: 27 फरवरी 1931
27 फरवरी 1931 को अंग्रेज़ पुलिस ने मुखबिरी के कारण इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में उन्हें घेर लिया। उन्होंने वीरता से अंग्रेज़ों का सामना किया और कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया। जब उनके पास अंतिम गोली बची, तो उन्होंने गुलामी की बेड़ियों में बंधने के बजाय खुद को गोली मारकर मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिया।
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चंद्रशेखर आज़ाद ने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। 1925 का काकोरी कांड, सांडर्स की हत्या (1928), और दिल्ली असेम्बली बम कांड (1929) जैसी घटनाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
शहीद दिवस: 27 फरवरी 1931
27 फरवरी 1931 को अंग्रेज़ पुलिस ने मुखबिरी के कारण इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में उन्हें घेर लिया। उन्होंने वीरता से अंग्रेज़ों का सामना किया और कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया। जब उनके पास अंतिम गोली बची, तो उन्होंने गुलामी की बेड़ियों में बंधने के बजाय खुद को गोली मारकर मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिया।
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🙏2
उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक जिला बुलंदशहर है।
उत्तर प्रदेश के टॉप 5 दुग्ध उत्पादन करने वाले जिले– बुलन्दशहर, मेरठ, आगरा, अलीगढ़, और सहारनपुर
#UP_SPECIAL
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उत्तर प्रदेश के टॉप 5 दुग्ध उत्पादन करने वाले जिले– बुलन्दशहर, मेरठ, आगरा, अलीगढ़, और सहारनपुर
#UP_SPECIAL
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👍3
'जरी जरदोजी' निम्नलिखित जिलों में से किस जिले के लिए 'एक जनपद एक उत्पाद' के तहत सूचीबद्ध नहीं है?
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Anonymous Quiz
12%
बदायूं
22%
कासगंज
17%
बरेली
20%
चंदौली
29%
अयोध्या
👍2
निम्नलिखित में से किस विकल्प में ‘एक जनपद एक उत्पाद’ और जिलों का मिलान सही सुमेलित नहीं हैं?
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Anonymous Quiz
8%
प्रयागराज,अमेठी– मूंज उत्पाद
9%
कुशीनगर–केला फाइबर उत्पाद।
61%
कानपुर नगर – एल्युमिनियम बर्तन।
13%
कासगंज– जरी जरदोजी
9%
श्रावस्ती,लखीमपुर खीरी–जनजातीय शिल्प।
👍2
एक वक्त के बाद सब ठीक हो जाता है सब शिकन,दरारे, शिकस्त सब भर जाती हैं, बहुत सारा दुःख एक दिन बहुत कम हो जाता है,पर उस दिन के आने से पहले हमें चाहिए बहुत सारी हिम्मत और बहुत सारा इत्मिनान,एक दिन देखना तुम उठोगे नई सुबह को अपनी कोमल बाहों में भर कर और पाओगे कि सब कुछ ठीक ही तो है...!
पढ़ते रहिए
पढ़ते रहिए
👌6
यदि यह प्रश्न उठता है कि विधानपरिषद वाले किसी राज्य के विधानमण्डल में पुरःस्थापित कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर निम्न में से किसका विनिश्चय अन्तिम होगा?
Anonymous Quiz
7%
उस राज्य के राज्यपाल
67%
उस राज्य के विधानसभा के अध्यक्ष
20%
भारत के राष्ट्रपति
7%
उस राज्य के विधानसभा के उपसभापति
जब कोई विधेयक विधानमण्डल से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है तो राज्यपाल के पास निम्न विकल्प होता हैं-
Anonymous Quiz
0%
राज्यपाल, अनुमति दे सकता है (कानून बनाने की शक्ति)
38%
राज्यपाल, अनुमति रोक सकता है (वीटो पॉवर)
6%
राज्यपाल, विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।
56%
उपरोक्त सभी
निम्न में से कौन सा कथन राज्यपाल की वीटो शक्ति के बारे में सही नहीं है -
Anonymous Quiz
20%
जब राज्यपाल किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटा देता है तो उसे आत्यंतिक वीटो कहा जाता है।
27%
राज्यपाल धन विधेयक पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है।
33%
राज्यपाल, वित्त विधेयक पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग कर सकता है।
20%
साधारण विधेयक पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग कर सकता है।
A राज्यपाल किसी विधेयक को एक बार पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है, यदि विधानमण्डल पुनः उस विधेयक को संशोधन सहित या रहित, राज्यपाल के पास भेजती है तो राज्यपाल उस पर अनुमति देने के लिए बाध्य है।
B गैर-सरकारी विधेयकों पर आत्यातिक वीटो का प्रयोग किया जाता है।
B गैर-सरकारी विधेयकों पर आत्यातिक वीटो का प्रयोग किया जाता है।
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0%
केवल A सही है।
14%
केवल B सही है।
86%
A और B दोनों सही हैं।
0%
न तो A सही है, न ही B सही हैं।
A राज्यपाल जब किसी विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित रखता है तो उसके बाद उस विधेयक पर राज्यपाल की भूमिका खत्म हो जाती है
B राज्यपाल की विधि बनाने की शक्ति का प्रावधान अनुच्छेद 200 में है।
B राज्यपाल की विधि बनाने की शक्ति का प्रावधान अनुच्छेद 200 में है।
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7%
केवल A सही है।
14%
केवल B सही हैं।
79%
A और B दोनों सही हैं।
0%
इनमें से कोई नहीं।
निम्नांकित में से किस वाद में भारत के उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि "अनुच्छेद 105 (3) और अनुच्छेद 194 (3) के उपबंध सांविधिक कानून है, संसद या विधानमण्डल द्वारा बनाए गए साधारण कानून नहीं है और इसलिए वे संविधान के भाग III जितने ही सर्वोच्च है?
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0%
एम.एस.एम. शर्मा बनाम श्री कृष्ण सिन्हा वाद
11%
तेज किरण जैन बनाम एन. संजीव रेड्डी वाद
44%
सुरेश चन्द्र बनर्जी बनाम पुनीत गोएला वाद
44%
राजनारायण सिंह बनाम आत्माराम गोविंद खैर वाद
0%
अनुत्तरित प्रश्न।
किसी विधेयक पर संवैधानिक उपबंध के तहत् राज्यपाल की सिफारिश अपेक्षित थी, किन्तु बिना राज्यपाल की सिफारिश उसे राजस्थान विधानसभा में पुरः स्थापित किया गया और उसने पारित करके राज्यपाल को भेज दिया, अब-
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11%
जहाँ राज्यपाल अनुमति देता है तो वह अधिनियम अवधिमान्य नहीं होगा।
44%
राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों के अतिक्रमण के आधार पर अनुमति देने से इंकार कर सकता है।
22%
राज्यपाल ऐसे विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति के लिये भेज देगा।
22%
यदि राज्यपाल अनुमति दे तो न्यायालय सवैधानिक उपबंधों के आधार पर उसे असंवैधानिक घोषित कर देगा
A राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधानमण्डल में पुनर्विचार हेतु नहीं भेज सकता है।
B अनुच्छेद 202 में बजट शब्द का उल्लेख में किया गया है।
B अनुच्छेद 202 में बजट शब्द का उल्लेख में किया गया है।
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25%
केवल A सही
19%
केवल B सही
38%
A और B दोनों सही
19%
A और B दोनों सही नहीं हैं।
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Secure PCS
A राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधानमण्डल में पुनर्विचार हेतु नहीं भेज सकता है।
B अनुच्छेद 202 में बजट शब्द का उल्लेख में किया गया है।
B अनुच्छेद 202 में बजट शब्द का उल्लेख में किया गया है।
व्याख्या -
संविधान में बजट शब्द का उल्लेख ना होकर 'वार्षिक वित्तीय विवरण' शब्द का उल्लेख मिलता है।
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