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अनुच्छेद 189 सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों को कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति।

अनुच्छेद 189 (1): इस अनुच्छेद में विधानसभाध्यक्ष/सभापति के निर्णायक मत का उल्लेख है।
सामान्यतः अध्यक्ष/सभापति मत नहीं देगा लेकिन जब किसी विधेयक पर मत बराबर हो जाये तो अध्यक्ष / सभापति निर्णायक मत का प्रयोग करेगा।

अनुच्छेद 189 (2): राज्य विधानमण्डल के किसी सदन की सदस्यता में कोई रिक्ती होने पर भी, उस सदन को कार्य करने की शक्ति होगी और यदि बाद में यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति, जो ऐसा करने का हकदार नहीं था, कार्यवाहियों में उपस्थित रहा है या उसने मत दिया है या अन्यथा भाग लिया है तो भी राज्य विधानमण्डल की कार्यवाही विधि मान्य होगी।

अनुच्छेद 189 (3): इस अनुच्छेद में राज्य विधानमण्डल के अधिवेशन के लिए आवश्यक गणपूर्ति (कोरम) का उल्लेख है। बैठक के लिए कोरम कुल विधानसभा सदस्यों का 1/10 या न्यूनतम 10 सदस्य इन दोनों में से जो भी अधिक हो बैठक/अधिवेशन के लिए आवश्यक है।

अनुच्छेद 189 (4): यदि राज्य की विधानसभा/विधानपरिषद् के अधिवेशन के समय गणपूर्ति 1/10 पूरी नहीं है तो अध्यक्ष/सभापति का कर्त्तव्य बनता है कि वह सदन को स्थगित कर दे या अधिवेशन को तब तक के लिए निलंबित कर दे जब तक गणपूर्ति नहीं हो जाती है।


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अनुच्छेद 190 स्थानों का रिक्त होना

अनुच्छेद 190 (1): कोई व्यक्ति एक ही समय में राज्य विधानमण्डल के दोनों सदनों का सदस्य नहीं होगा और जो व्यक्ति दोनों सदनों का सदस्य चुन लिया जाता है तो उसे 10 दिन की अवधि में किसी एक सदन की सदस्यता त्याग करनी होगी।
यदि वह अपने एक सदन की सदस्यता त्याग नहीं करता या इस प्रकार की कोई सूचना नहीं देता है तो उसका उस सदन में खाली स्थान माना जायेगा जिसका कि वह पहले सदस्य था।

अनुच्छेद 190 (2): कोई व्यक्ति दो या अधिक राज्यों के विधानमण्डलों का सदस्य नहीं होगा।

अनुच्छेद 190 (3) : यदि विधानमण्डल सदस्य अध्यक्ष या सभापति को अपना त्याग पत्र देता है तो ऐसा होने पर उसका स्थान रिक्त हो जायेगा।
अध्यक्ष के त्यागपत्र स्वीकार करने से पूर्व सदस्य कभी भी अपना त्यागपत्र वापस ले सकता है परन्तु अध्यक्ष या सभापति को यह समाधान हो जाता है कि ऐसा त्यागपत्र स्वैच्छिक या असली नहीं है तो वह ऐसे त्यागपत्र को स्वीकार नहीं करेगा।

अनुच्छेद 190 (4): राज्य विधानमण्डल के किसी सदन का सदस्य लगातार 60 दिन तक सदन को बिना सूचित किए सदन के अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है, तो उसका स्थान रिक्त घोषित हो जायेगा अर्थात् उससे अयोग्य घोषित कर दिया जायेगा।
इन 60 दिनों में उन दिनों को शामिल नहीं किया जायेगा जिस दौरान सदन सत्रावसित या निरंतर 4 से अधिक दिनों के लिए स्थगित रहता है।

Note -
यदि किसी विधानमण्डल सदस्य का न्यायालय द्वारा उसके निर्वाचन को अमान्य ठहरा दिया जाये, उसे सदन से निष्कासित कर दिया जाये, वह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व राज्यपाल पद पर निर्वाचित हो जाए तो उसका स्थान रिक्त हो जायेगा।


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अनुच्छेद 191

विधानमण्डल के सदस्यों के लिए निरर्हताएँ

अनुच्छेद 191 (1)-किसी व्यक्ति को राज्य की विधानसभा या विधानपरिषद् का सदस्य चुने जाने के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा :
(क) यदि वह कोई लाभ का पद धारण करता है (भारत सरकार के या पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य की सरकार के अधीन)
(ख) यदि वह विकृतचित्त है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है।
(ग) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है।
(घ) यदि वह भारत का नागरिक नहीं है या उसने स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर ली है।
(ङ) यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन निम्न प्रकार से निरर्हित कर दिया जाता है :
(अ) वह चुनाव में किसी प्रकार के भ्रष्ट आचरण अथवा चुनावी अपराध का दोषी पाया गया
हो।
(ब) उसे किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो, जिसमें उसे 2 वर्ष या अधिक वर्षों की कैद की सजा मिली हो।

(स) वह भ्रष्टाचार अथया सरकार के प्रति विश्वासघात के कारण सरकारी सेवा से हटाया गया हो।
(द) वह निर्धारित समय सीमा के अंदर चुनावी खर्च संबंधित विवरण प्रस्तुत करने में विफल रहा हो।
(य) उसे अस्पृश्यता, दहेज तथा सती प्रथा इत्यादि जैसे सामाजिक अपराधों में संलिप्तता अथवा इन्हें बढ़ावा देने के लिए दण्डित किया गया हो।

अनुच्छेद 191 (2)-किसी व्यक्ति को राज्य की विधानसभा या विधानपरिषद् का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा, यदि वह दसवीं अनुसूची (दल-बदल) के तहत अयोग्य है। दल-बदल के आधार पर राज्य विधानसभा के सदस्यों को अयोग्य विधानसभा अध्यक्ष घोषित करता है।

अनुच्छेद 192-

विधानमण्डल सदस्यों की निरर्हताओं (अयोग्यता) से संबंधित प्रश्नों पर विनिश्चय

अनुच्छेद 192 (1): यदि यह प्रश्न उठता है कि राज्य विधानमण्डल के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 191 (1) में वर्णित/उल्लेखित अयोग्यता से ग्रस्त है या नहीं तो इसका अंतिम निर्णय राज्यपाल द्वारा किया जाएगा।

अनुच्छेद 192 (2): ऐसे किसी प्रश्न पर निर्णय देने से पहले, राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय लेगा और ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा।


अनुच्छेद 193

यदि कोई सदस्य बिना शपथ लिए विधानमण्डल की बैठक में भाग लेता है तो उसके लिए सजा का प्रावधान है।
या
अनुच्छेद 188 के तहत शपथ लेने से पहले, यदि कोई व्यक्ति विधानसभा या विधानपरिषद् के सदस्य के रूप में विधानमण्डल में बैठता है या मतदान करता है या अयोग्य घोषित किए जाने के बाद भी विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेता है तो पांच सौ रुपए के जुर्माना का भागी होगा जो राज्य को देय ऋण के रूप में वसूला जाएगा।


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अनुच्छेद 194 राज्य विधानमण्डल के सदनों, इसकी समितियों और इसके सदस्यों को मिलने वाले विशेष अधिकार, उन्मुक्तियाँ और छूट।

विधानमण्डल सदस्यों के विशेषाधिकार :
अनुच्छेद 194 (1): इस संविधान के उपबंधों के और विधानमण्डल की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों और स्थायी आदेशों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक राज्य के विधानमण्डल में वाक स्वातंत्र्य होगा।

अनुच्छेद 194 (2): राज्य के विधानमण्डल में या उसकी किसी समिति में विधानमण्डल के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।

अनुच्छेद 194 (3): राज्य विधानमण्डल के किसी सदन के सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ ऐसी होगी जो राज्य विधानमण्डल, समय-समय पर विधि द्वारा परिनिश्चित करें।
उन्हें सदन शुरु होने से 40 दिन पूर्व और 40 दिन बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता सिविल मामलों में, लेकिन यह छूट आपराधिक या प्रतिबंधिक निषेध मामलों में नहीं है।
जब सदन चल रहा हो तब वह साक्ष्य देने या किसी मामलें में बतौर गवाह न्यायालय में उपस्थित होने से मना कर सकते है।

अनुच्छेद 194 (4): विधानमण्डल सदस्यों, समितियों की तरह राज्य महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) एवं मंत्रियों को भी, राज्य विधानमण्डल के विशेषाधिकार प्राप्त है।


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अनुच्छेद 196


विधेयकों को पुरःस्थापन और पारित किए जाने के संबंध में उपबंध साधारण विधेयक के संबंध में:
(1) धन विधेयकों और अन्य वित्त विधेयकों के संबंध में अनुच्छेद 198 और अनुच्छेद 207 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई विधेयक विधानपरिषद् वाले राज्य के विधानमण्डल के किसी भी सदन में आरंभ हो सकेगा।
ऐसा कोई विधेयक या तो मंत्री द्वारा या किसी अन्य सदस्य द्वारा पुरःस्थापित किया जाएगा।
प्रत्येक विधेयक सदन में तीन स्तरों से गुजरता है- प्रथम, द्वितीय, तृतीय वाचन।

(2) अनुच्छेद 197 और 198 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई विधेयक, विधानपरिषद् वाले राज्य के विधानमण्डल के सदनों द्वारा तब तक पारित किया गया नहीं समझा जाएगा जब तक संशोधन के बिना या केवल ऐसे संशोधनों सहित, जिन पर दोनों सदन सहमत हो गए है, उस पर दोनों सदन सहमत नहीं हो जाते है।

(3) किसी राज्य विधानमण्डल में लम्बित विधेयक उसके एक सदन या दोनों सदनों के सत्रावसान (सत्र समाप्त) होने के कारण व्यपगत (समाप्त) नहीं होगा।
(4) किसी राज्य की विधानपरिषद् में लम्बित विधेयक, जिसको विधानसभा ने पारित नहीं किया है, विधानसभा के विघटन (भंग) होने पर व्यपगत (समाप्त) नहीं होगा।
(5) कोई विधेयक, जो किसी राज्य की विधानसभा में लम्बित है या जो विधानसभा द्वारा पारित कर दिया गया है और विधानपरिषद् में लम्बित है, विधानसभा के विघटन पर व्यपगत हो जाएगा।


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अनुच्छेद 197 धन विधेयकों से भिन्न विधेयकों के बारे में विधानपरिषद् की शक्तियों पर निर्बंधन
अनुच्छेद 197 (1) साधारण विधेयक : साधारण विधेयक राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन (विधानसभा/विधानपरिषद्) में रखा जा सकता है।
यह विधेयक विधानसभा से पारित होने के पश्चात विधानपरिषद् में जाता है। विधानपरिषद् साधारण विधेयक को अस्वीकार कर सकती है, या उसमें ऐसा कोई संशोधन कर देती है जिससे विधानसभा सहमत नहीं है तो विधेयक पुनः विधानसभा में जाता है।
साधारण विधेयक विधानसभा द्वारा पारित होने के पश्चात विधानपरिषद् में जाता है जिसे वह 3 माह तक पारित नहीं करे तो विधेयक पुनः विधानसभा में जाता है।

अनुच्छेद 197 (2):
यदि विधानसभा संशोधन सहित/रहित इसी विधेयक को पुनः पारित करके दुबारा विधानपरिषद् में भेजती है तो विधानपरिषद् इसे एक माह के लिए रोके अथवा अस्वीकृत करे तो भी यह विधेयक विधानसभा द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें वह विधानसभा द्वारा दुबारा पारित किया गया था।

नोट :
1. साधारण विधेयक पारित करने के संदर्भ में विधानसभा की शक्ति, विधानपरिषद् के मुकाबले अधिक है।

2. विधानपरिषद् साधारण विधेयक को अधिकतम 4 माह (प्रथम बार 3 माह व दूसरी बार 1 माह) तक रोक सकती है।

3. साधारण विधेयक पर दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है क्योंकि 4 माह वाद स्वतः विधानपरिषद् से पारित समझा जाता है।
4. कोई विधेयक सर्वप्रथम विधानपरिषद् से पारित होकर विधानसभा में आता है और विधानसभा उस विधेयक को अस्वीकृत कर दे तो वह विधेयक वही समाप्त हो जाता
।

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अनुच्छेद 198 धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया
अनुच्छेद 198 (1): धन विधेयक विधानपरिषद् में पुरःस्थापित नहीं किया जाएगा।
धन विधेयक, राज्यपाल की पूर्वानुमति से सर्वप्रथम विधानसभा में पुरःस्थापित किया जाता है।

अनुच्छेद 198 (2): विधानपरिषद्, धन विधेयक को अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है उसके बाद स्वतः पारित मान लिया जाता है।
विधानपरिषद् धन विधेयक में न तो संशोधन कर सकती और न ही इसे अस्वीकार कर सकती है केवल सिफारिशें कर सकती है, सिफारिशों को स्वीकार करना या न करना विधानसभा पर निर्भर करता है।
अनुच्छेद 198 (3): यदि विधानसभा, विधानपरिषद् की किसी सिफारिश को स्वीकार का लेती है तो धन विधेयक विधानपरिषद् द्वारा सिफारिश किए गए और विधानसभा द्वारा स्वीकार किए गए संशोधनों सहित दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया समझा जाएगा।

अनुच्छेद 198 (4): यदि विधानसभा, विधानपरिषद् की किसी भी सिफारिश को स्वीकार नहीं करती है तो धन विधेयक विधानपरिषद् द्वारा सिफारिश किए गए किसी संशोधन के बिना दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
यदि विधानसभा द्वारा पारित और विधानपरिषद् को उसकी सिफारिशों के लिए पारेषित धन विधेयक उक्त 14 दिन की अवधि के भीतर विधानसभा को नहीं लौटाया जाता है तो, वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिस रूप में विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
धन विधेयक विधानमण्डल के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल इसे स्वीकृति दे सकता है, इसे रोक सकता है, राष्ट्रपत्ति के लिए आरक्षित रख सकता है लेकिन राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकते हैं।

NOTE - धन विधेयक पर संयुक्त अधिवेशन नहीं बुलाया जा सकता है, क्योंकि 14 दिन बाद स्वतः विधानपरिषद् से पारित मान लिया जाता है।
कोई विधेयक, धन विधेयक है या नहीं इसका निर्णय राज्य विधानसभा अध्यक्ष करता है।
धन विधेयक, सरकारी विधेयक होता है और यह सिर्फ एक मंत्री द्वारा ही पुरःस्थापित किया जा सकता है।

धन विधेयक के मामले में विधानपरिषद् के मुकाबले विधानसभा ज्यादा शक्तिशाली होती है।
धन विधेयक सर्वप्रथम राज्य विधानसभा में रखा जाता है, विधानपरिषद् में नहीं।


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अनुच्छेद 199
धन विधेयक की परिभाषा।

(1) कोई विधेयक धन विधेयक समझा जाएगा, यदि उसमें केवल निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों से संबंधित उपबन्ध हैं, अर्थात् :
(क) किसी कर अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन।
(ख) राज्य द्वारा धन उधार लेने का वा कोई प्रत्याभूति देने का विनियमन अथवा राज्य द्वारा अपने ऊपर ली गयी या ली जाने वाली किन्हों वितीय बाध्यताओं से संबंधित विधि का संशोधन।
(ग) राज्य की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, ऐसे किसी निधि में धर जमा करना या उसमें से धन निकालना।
(घ) राज्य की संचित निधि में से धन का विनियोग।
(ङ) किसी व्यय को राज्य को संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी व्यय की रकम को बढ़ाना।
(च) राज्य को संचित निधि या राज्य के लोक लेखे मधे धन प्राप्त करना अथवा ऐसे धन की अभिरक्षा या उसका निर्गमन, या
(छ) उपखण्ड 105 (क) से उपखण्ड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय का आनुषंगिक कोई विषय।

(2) कोई विधेयक केवल इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा, कि वह जुर्माना या अन्य स्थानीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञतियों के लिए फीसों की या की गयी सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उनके संदाय का उपवन्ध करता है अथवा इस कारण धन विधेयक नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपवन्ध करता है।

(3) यदि यह प्रश्न उठता है कि विधानपरिषद वाले किसी राज्य के विधानमण्डल में पुरःस्थापित कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर उस राज्य की विधानसभा के अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा।

(4) जब धन विधेयक अनुच्छेद 198 के अधीन विधानपरिषद को पारेषित किया जाता है और जब यह अनुच्छेद 200 के अधीन अनुमति के लिए राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तब प्रत्येक धन विधेयक पर विधानसभा के अध्यक्ष के हस्ताक्षर सहित यह प्रमाण पृष्ठांकित किया जाएगा कि वह धन विधेयक है।

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🔰अनुच्छेद 200 राज्यपाल की विधि/कानून बनाने की शक्ति।

राज्यपाल की वीटो शक्ति जब कोई विधेयक विधानमण्डल से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है तो राज्यपाल के पास 3 विकल्प होते हैं:
(1) राज्यपाल, अनुमति दे सकता है (कानून बनाने की शक्ति)
(2) राज्यपाल, अनुमति रोक सकता है (वीटो पॉवर)
(3) राज्यपाल, विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।

(1) अनुमति (मंजूरी दे सकता है -
जब किसी विधेयक पर राज्यपाल की मंजूरी मिल जाती है तो वह कानून या अधिनियम का रूप ले लेता है अर्थात कोई विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही कानून या अधिनियम का रूप लेता है।

(2) अनुमति रोक सकता है अर्थात वीटो का प्रयोग कर सकता है:-
वीटो लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'निषेध' (मना करना)
राज्यपाल के पास 2 प्रकार का वीटो पॉवर (निषेधाधिकार) है:
(A) निलम्बनकारी वीटो
(B) आत्यांत्तिक वीटो

(A) निलम्बनकारी वीटो :

जब राज्यपाल किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटा देता है तो उसे निलम्बनकारी वीटो कहा जाता है।
राज्यपाल किसी विधेयक को एक बार पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है, यदि राज्य विधानमण्डल पुनः उस विधेयक को संशोधन सहित या संशोधन रहित, राज्यपाल के पास भेजती है तो राज्यपाल उस पर अनुमति देने के लिए बाध्य है।

Note - राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता अर्थात उस पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है।
Note - राज्यपाल, वित्त विधेयक एवं साधारण विधेयक पर निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग कर सकता है।

(B) आत्त्यातिक वीटो :

जब राज्यपाल किसी विधेयक को अनुमति देने से पूर्णतः मना कर देता है तो उसे आत्यांतिक बीटो कहा जाता है। सामान्यतः गैर-सरकारी विधेयकों पर आत्यातिक वीटो का प्रयोग किया जाता है।

(3) राज्यपाल, किसी विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।
राज्यपाल निम्न विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूों हेतु रख सकता है : -
(1) ऐसा कोई विधेयक जो उच्च न्यायालय (HC) की शक्तियों में कमी (अल्पीकरण) करता हो।
(2) ऐसा कोई विधेयक जो नीति निर्देशक तत्वों के विरुद्ध हो।
(3) ऐसा कोई विधेयक जो अनुच्छेद 31 (C) के तहत सम्पत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण से संबंधित हो।
(4) ऐसा कोई विधेयक जो राष्ट्रीय महत्व का हो।
(5) ऐसा कोई विधेयक जो संविधान के उपबंधों के विरुद्ध हो।
(6) ऐसा कोई विधेयक जो देश के व्यापक हित के विरुद्ध हो।
(7) वित्तीय आपात के समय राज्य विधान मण्डल द्वारा पारित धन विधेयक।


🔰राज्यपाल जब किसी विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित रखता है तो उसके बाद उस विधेयक पर राज्यपाल की भूमिका समाप्त हो जाती है अर्थात अब उस पर राज्यपाल की स्वीकृति को आवश्यकता नहीं रहती है।

जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति के पास निम्न विकल्प होते है :- (1) राष्ट्रपति उस विधेयक को स्वीकृति दे सकता है।
(2) राष्ट्रपत्ति, विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है अर्थात स्वीकृति देने से मना कर सकता है।
(3) राष्ट्रपति, विधेयक को राज्य विधान मण्डल के पास पुनर्विचार हेतु भेज सकता है। अर्थात राष्ट्रपति, राज्यपाल को यह निर्देश दे सकेगा कि वह विधेयक को सदन को लौटा दे (अनुच्छेद 201)।
यदि राज्य विधान मण्डल 6 माह के भीतर पुनः संशोधन सहित या रहित विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजता है तो राष्ट्रपति इसे स्वीकृति दे भी सकता है और नहीं भी अर्थात राष्ट्रपति स्वीकृति देने के लिए बाध्य नहीं है। अर्थात जेबी वीटो का प्रयोग कर सकता है।
राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधान मण्डल के पास पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता हैं।


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अनुच्छेद 201 राष्ट्रपति के लिये विचार के लिए आरक्षित विधेयक पर कार्यवाही

जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि यह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है। जहां विधेयक धन विधेयक नहीं है यहां राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निर्देश दे सकेगा कि वह विधेयक को, यथास्थिति, राज्य के विधानमण्डल के सदन या सदनों को ऐसे सन्देश के साथ, जो अनुच्छेद 200 के पहले परन्तुक में वर्णित है, लौटा दे।
जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब ऐसा सन्देश मिलने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर सदन या सदनों द्वारा उस पर तदनुसार पुनर्विचार किया जाएगा और यदि वह सदन या सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से प्रस्तुत किया जाएगा।
पुनर्विचार के बाद भी राष्ट्रपति उस विधेयक पर स्वीकृति दे सकता एवं नहीं भी दे सकता है।
राष्ट्रपति धन विधेयक को राज्य विधानमण्डल में पुनर्विचार हेतु नहीं भेज सकता है।


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अनुच्छेद 202

इसमें राज्य के वार्षिक वित्तीय विवरण का उल्लेख है

1. राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में राज्य के विधानमण्डल के सदनों के समक्ष उस राज्य का उस वर्ष के लिए अनुमानित (प्राक्कलित) प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग में 'वार्षिक वित्तीय विवरण' कहा गया।

2. वार्षिक वित्तीय विवरण में दिए हुए व्यय के प्राक्कलनों (अनुमानों) में :
(क) इस संविधान में राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय के रूप में वर्णित व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां।

(ख) राज्य की संचित निधि में से किए जाने के लिए प्रस्तावित अन्य व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां, अन्य व्यय से राजस्व खाते पर व्यय को अलग करेगा।

3. निम्नलिखित व्यय प्रत्येक राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय होगा :
(क) राज्यपाल की परिलब्धियां और भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय।
(ख) विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा विधानपरिषद् के सभापति और उपसभापति के भी वेतन और भत्ते।
(ग) ऐसे ऋण भार जिनका दायित्व राज्य पर है, जिनके अंतर्गत व्याज, निक्षेप निधिभार, मोचन शुल्क तथा उधार लेने, ऋण सेवा और ऋण मोचन से संबंधित अन्य व्यय है।
(घ) किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों के संबंध में व्यय।
(ङ) किसी भी अदालत या मध्यस्थ न्यायाधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट की तुष्टि के लिए आवश्यक रकम।
(च) कोई अन्य व्यय जो इस संविधान द्वारा या राज्य के विधानमण्डल द्वारा, इस प्रकार भारित घोषित किया जाता है।

Note - संविधान में बजट शब्द का उल्लेख ना होकर 'वार्षिक वित्तीय विवरण' शब्द का उल्लेख मिलता है।
बजट प्रत्येक वर्ष वित्त मंत्री पेश करता है। अशोक गहलोत एवं वसुंधरा राजे ने वित्त मंत्री के रूप में 10-10 बार बजट पेश किया है अब तक।


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इन सब अनुच्छेद से संबंधित प्रश्न जल्द ही प्रेषित किए जाएंगे
बने रहिए
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चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा गाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े, जिसे आगे चलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) नाम दिया गया।


चंद्रशेखर आज़ाद ने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। 1925 का काकोरी कांड, सांडर्स की हत्या (1928), और दिल्ली असेम्बली बम कांड (1929) जैसी घटनाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

शहीद दिवस: 27 फरवरी 1931

27 फरवरी 1931 को अंग्रेज़ पुलिस ने मुखबिरी के कारण इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में उन्हें घेर लिया। उन्होंने वीरता से अंग्रेज़ों का सामना किया और कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया। जब उनके पास अंतिम गोली बची, तो उन्होंने गुलामी की बेड़ियों में बंधने के बजाय खुद को गोली मारकर मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिया।

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🙏2
उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक जिला बुलंदशहर है।

उत्तर प्रदेश के टॉप 5 दुग्ध उत्पादन करने वाले जिले– बुलन्दशहर, मेरठ, आगरा, अलीगढ़, और सहारनपुर

#UP_SPECIAL
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👍3
'जरी जरदोजी' निम्नलिखित जिलों में से किस जिले के लिए 'एक जनपद एक उत्पाद' के तहत सूचीबद्ध नहीं है?

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Anonymous Quiz
12%
बदायूं
22%
कासगंज
17%
बरेली
20%
चंदौली
29%
अयोध्या
👍2
👍2
एक वक्त के बाद सब ठीक हो जाता है सब शिकन,दरारे, शिकस्त सब भर जाती हैं, बहुत सारा दुःख एक दिन बहुत कम हो जाता है,पर उस दिन के आने से पहले हमें चाहिए बहुत सारी हिम्मत और बहुत सारा इत्मिनान,एक दिन देखना तुम उठोगे नई सुबह को अपनी कोमल बाहों में भर कर और पाओगे कि सब कुछ ठीक ही तो है...!

पढ़ते रहिए
👌6
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यदि यह प्रश्न उठता है कि विधानपरिषद वाले किसी राज्य के विधानमण्डल में पुरःस्थापित कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर निम्न में से किसका विनिश्चय अन्तिम होगा?
Anonymous Quiz
7%
उस राज्य के राज्यपाल
67%
उस राज्य के विधानसभा के अध्यक्ष
20%
भारत के राष्ट्रपति
7%
उस राज्य के विधानसभा के उपसभापति
जब कोई विधेयक विधानमण्डल से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है तो राज्यपाल के पास निम्न विकल्प होता हैं-
Anonymous Quiz
0%
राज्यपाल, अनुमति दे सकता है (कानून बनाने की शक्ति)
38%
राज्यपाल, अनुमति रोक सकता है (वीटो पॉवर)
6%
राज्यपाल, विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रख सकता है।
56%
उपरोक्त सभी