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A. अनुच्छेद 189 (1) में विधानसभाध्यक्ष/सभापति के निर्णायक मत का उल्लेख है।

B. सामान्यतः अध्यक्ष/सभापति मत नहीं देगा लेकिन जब किसी विधेयक पर मत बराबर हो जाये तो अध्यक्ष / सभापति निर्णायक मत का प्रयोग करेगा। 【Join 📌 @UppscZone】
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अनुच्छेद 163 राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्री परिषद।



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अनुच्छेद 164

अनुच्छेद 164(1)-

मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्री की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत अपने पद धारण करेंगे।


अनुच्छेद 164 (1क)


किसी राज्य की मंत्री परिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी।
15% से अधिक है तो 6 माह के भीतर भीतर 15% की जाएगी।
(कम से कम 12 मंत्री बन सकते हैं)

अनुच्छेद 164(1ख)

किसी राजनीतिक दल का राज्य की विधानमंडल के किसी सदन का कोई, सदस्य दसवीं अनुसूची के पैरा - 2 के अधीन सदन का सदस्य होने के लिए निर्हित (अयोग्य) हैं तो वो मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बन सकता हैं, अर्थात् अगर कोई विधायक राजनीतिक दल का सदस्य है और दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के तहत वह उस सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य है, तो वह मंत्री नहीं बन सकता।

अनुच्छेद 164(2)

मंत्रिपरिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई होगी।

अनुच्छेद 164(3)

किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले राज्यपाल तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूपों के अनुसार उसको पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा।


अनुच्छेद 164(4)

कोई मंत्री जो निरंतर 6 माह की किसी अवधि तक राज्य के विधान मंडल का सदस्य नहीं है, तो उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।

अनुच्छेद 164(5)-

मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो उस राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा समय-समय पर आधारित करें और जब तक उस राज्य का विधानमंडल इस प्रकार अवधारित नहीं करता तब तक ऐसे होंगे जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट है।


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अनुच्छेद 165 - राज्य में महाधिवक्ता पद।



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अनुच्छेद - 166 : राज्य सरकार का कार्य संचालन


अनुच्छेद 166 (1): किसी राज्य की समस्त कार्यपालिका कार्यवाही राज्यपाल के नाम से की जायेगी।

अनुच्छेद 166 (2): राज्यपाल के नाम से किए गए और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा और राज्यपाल द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए और इस प्रकार अधिप्रमाणित आदेश या लिखत की विधि मान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह राज्यपाल द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है।

अनुच्छेद 166 (3): राज्यपाल मंत्रियों में कार्य आवंटन के लिए नियम बनायेगा अर्थात राज्य सरकार के कार्य संचालन के लिए नियम बनाता है।


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अनुच्छेद - 167 : राज्यपाल को जानकारी (सूचना) देने के संबंध में मुख्यमंत्री का कर्त्तव्य -

राज्यपाल, मुख्यमंत्री से सूचना माँग सकता है।
मुख्यमंत्री का कर्त्तव्य बनता है कि वह राज्यपाल को सूचना दे माँगने पर या बिना माँगे।
निम्न मामलो में : -
(क) राज्य के कार्यों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संस्चित करें।
(ख) राज्य के कायों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं ससंबंधी जो जानकारी राज्यपाल मांगे, वह दे।
(ग) किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है, किन्तु मंत्रिपरिषद् ने विचार नहीं किया है, राज्यपाल द्वारा अपेक्षा किए जाने पर मंत्रिपरिषद् के समक्ष विचार के लिए रखे।


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अनुच्छेद 168 राज्य के विधान मंडलों का गठन

168(1) प्रत्येक राज्य के लिए एक विधान मंडल का प्रावधान करता है जो राज्यपाल और एक अथवा दो सदनों से मिलकर बनेगा।
168(2) जहां किसी राज्य के विधान मंडल के दो सदन हैं वहां एक का नाम विधानसभा और एक का नाम विधान परिषद होगा और जहां केवल एक सदन है वहां उसका नाम विधानसभा होगा।

अनुच्छेद 169
राज्यों के विधान परिषदों का सर्जन


169(1) अनुच्छेद 168 में किसी बात के होते हुए भी संसद विधि द्वारा किसी विधान परिषद वाले राज्य में विधान परिषद के सर्जन के लिए उपबंध कर सकेगी यदि उस राज्य की विधानसभा ने इस आशय का संकल्प विधान सभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों की संख्या का कम से कम दो- तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर दिया है।

169(2) यदि संसद साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित कर दे तो वह गठन का मार्ग खुल जाता है।
169(3) पूर्वोक्त प्रकार की कोई विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन नहीं समझी जाएगी।


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अनुच्छेद 170 : विधानसभा की संरचना

इसमें विधानसभा की संरचना का उल्लेख मिलता है।

अनुच्छेद 170 (1):
किसी भी राज्य की अधिकतम विधानसभा सीटें 500 तथा न्यूनतम सीटें 60 निर्धारित की गई है। अपवाद-गोवा (40), मिजोरम् (40), सिक्किम (32), पुडुचेरी (30)। इनकी विधानसभा सीटें 60 से कम है।
सर्वाधिक विधानसभा सीटें उत्तर प्रदेश (403) की है।

अनुच्छेद 170 (2):
भौगोलिक आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्र इस आधार पर बनाये गये है कि जनसंख्या का अनुपात सभी निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग समान रहे। विधानसभा में अनुसूचित जाति व जनजाति के आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 332 में है।
वर्तमान में कुल 200 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें अनुसूचित जाति व 25 सीटें अनुसचित जनजाति के लिए आरक्षित है।

अनुच्छेद 170(3)
84 वें संविधान संशोधन 2001 के अनुसार राज्य विधानसभा के लिए आवंटित सीटें वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद पुनः निर्धारित की जाएगी।



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अनुच्छेद 171 : विधानपरिषद की संरचना

171 (1)-विधान परिषद् में अधिकतम सीटें, उस राज्य की कुल विधानसभा सीटों के 1/3 से अधिक नहीं हो सकती तथा न्यूनतम सीटें 40 से कम नहीं हो सकती। यदि राजस्थान में विधान परिषद् बनती है तो अधिकतम सीटें 66 होगी।

171 (2)-जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करें तब तक किसी राज्य की विधानपरिषद की संरचना 171(3) में उपबंधित रीति से होगी।

171 (3)-विधान परिषद् के सदस्यों का निर्वाचन, निर्वाचक मण्डल द्वारा होगा।विधान परिषद् के 1/6सदस्यों का मनोनयन तथा 5/6 सदस्यों का निर्वाचन होता है।
Note - मनोनीत सदस्य राज्य का मूल निवासी हो।
अनु.171(4): विधानपरिषद के सदस्यों का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है।

अनु.171 (5): राज्यपाल, विधानपरिषद में 1/6 सदस्यों को निम्न आधार पर मनोनीत (नामनिर्देशित) करता है:- साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा।
भारत के 6 राज्यों में द्विसदनात्मक विधानमण्डल (राज्यपाल विधानसभा विधान परिषद्)है।
विधान परिषद वाले राज्य - उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र बिहार कर्नाटक आंध्र प्रदेश तेलंगाना
अनुच्छेद 172 राज्यों के विधान मण्डलों की अवधि

अनु.172 (1): विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, राष्ट्रीय आपातकाल के समय संसद विधि निर्माण द्वारा विधानसभा का कार्यकाल एक बार मे एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है।

अनु.172 (2): विधान परिषद् एक स्थायी सदन है, इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक 2 वर्ष बाद सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते है और उनके स्थान पर नए सदस्य आ जाते है।

अनु.173 विधान मण्डल के सदस्यों की अर्हता/योग्यता

विधानसभा के सदस्यों के लिए योग्यताएँ :
वह भारत का नागरिक हो।
निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ ली हो।
वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
वह किसी लाभ के पद पर कार्यरत न हो तथा संसद द्वारा निर्धारित की गई अन्य शर्तों को पूर्ण करता हो।

विधान परिषद् के सदस्यों के लिए अर्हताएँ :
वह भारत का नागरिक हो।
निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ ली हो।
वह कम से कम 30 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
कोई ऐसा व्यक्ति सदस्य नहीं बन सकेगा, जिसे संसद के कानून द्वारा अयोग्य घोषित किया गया हो।
कोई भी व्यक्ति विधान मण्डल के दोनों सदनों का एक साथ सदस्य नहीं हो सकता।
अनुच्छेद 181, 182,


अनुच्छेद 181 जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।

अनुच्छेद 181 (1): विधानासभा को किसी बैठक में, जब अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष/उपाध्यक्ष उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा।

अनुच्छेद 181 (2): जब विधानसभा अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधानसभा में विचाराधीन है तब उसको विधानसभा में बोलने और उसको कार्यवाहियों में भाग लेने, मत देने का अधिकार होगा (विधानसभा सदस्य के रूप में) लेकिन निर्णायक मत का अधिकार नहीं होगा।

अनुच्छेद 182 इसमें विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति के पद का उल्लेख मिलता है।


विधानपरिषद् के सदस्यों में से ही सभापति व उपसभापति को चुना जाता है।
अतः विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति का कार्यकाल पद ग्रहण से 6 वर्ष होता है।
अनुच्छेद 174 राज्यपाल विधान मण्डल का सत्राहूत, सत्रावसान व विधानसभा को भंग (विघटित) कर सकता है।


अनुच्छेद 174 (1):
राज्यपाल, विधानमण्डल के एक सदन या दोनों सदनों का सत्र बुला सकता है अर्थात विधानमण्डल का सत्राहृत कर सकता है। राज्यपाल द्वारा बुलाए गए सत्र की सूचना सचिव प्रत्येक सदस्य को नियत तारीख से 21 दिन पूर्व देगा।
राज्यपाल ऐसे समय और स्थान पर जो वह ठीक समझे विधानमण्डल का सत्र आहूत कर सकता है। प्रथम सत्र की अंतिम बैठक एवं द्वितीय सत्र की प्रथम बैठक के मध्य अधिकतम 6 माह का समय हो सकता है।

अनुच्छेद 174 (2) क :
राज्यपाल, विधानमण्डल के एक सदन या दोनों सदनों का सत्रावसान अर्थात सत्र समाप्त कर सकता है।

अनुच्छेद 174 (2) ख:
राज्यपाल, विधानसभा को विघटित (भंग) कर सकता है।

Imortant fact:
राज्यपाल विधान सभा का सत्र राज्यपाल बुलाता है, लेकिन अध्यक्षता विधान सभा अध्यक्ष करता है।
विधान सभा का सत्र समाप्त (सत्रावसान) राज्यपाल करता है लेकिन विधान सभा की बैठक को स्थगित विधान सभा अध्यक्ष करता है।
सामान्यतः राज्यपाल मुख्यमंत्री/मंत्रिमण्डल की सलाह पर विधानसभा का सत्र बुलाता है लेकिन राज्यपाल कुछ परिस्थितियों में मुख्यमंत्री की सलाह के विरुद्ध भी विधानसभा का सत्र बुला सकता है (स्वविवेक से)।

एक कैलेंडर वर्ष में समस्त सत्रों की बैठकों की कुल संख्या 60 से कम नहीं होगी।

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अनुच्छेद 175 सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार
राज्यपाल के अभिभाषण एवं संदेश भेजने का अधिकार।


अनुच्छेद 175 (1): राज्यपाल विधानमण्डल के किस एक सदन में या एक साथ सम्वेत दोनों सदनों में अभिभाषण कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थिति की अपेक्षा कर सकेगा।

अनुच्छेद 175 (2) : राज्यपाल राज्य के विधान मण्डल में लंबित किसों विधेयक के संबंध में दोनों सदनों या एक सदन को संदेश भेज सकता है कि अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्रता से विचार करे।

अनुच्छेद 176 राज्यपाल का विशेष अभिभाषण

अनुच्छेद 176 (1): राज्यपाल, विधानमण्डल के दोनों सदनों को संयुक्त रूप से समवेत काके अभिभाषित (संबोधित) कर सकता है और विधानमण्डल को उसके आह्वान का कारण बताएगा।
राज्यपाल विशेष अभिभाषण, आम (साधारण) निर्वाचन के बाद प्रथम सत्र के प्रारम्भ में तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र (बजट सत्र) के प्रारम्भ में करता है।

अनुच्छेद 176 (2): सदन या प्रत्येक सदन की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों द्वारा ऐसे अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों पर चर्चा के लिए समय नियत करने के लिए उपबंध किया जाएगा।


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अनुच्छेद 177 सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार



महाधिवक्ता विधानमण्डल की बैठकों में भाग ले सकता है, बोल सकता है, चर्चा कर सकता है लेकिन मतदान नहीं कर सकता है क्योंकि वह विधानमण्डल का सदस्य नहीं होता।
महाधिवक्ता को विधानमण्डल को किसी भी समिति का सदस्य बनाया जा सकता है।

अनुच्छेद 178 इसमें विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के पद का उल्लेख मिलता है।


विधानसभा सदस्यों में से (सत्ता पक्ष के) एक सदस्य को अध्यक्ष व एक को उपाध्यक्ष चुना जाता है।
विधानसभा अध्यक्ष का निर्वाचन उस तिथि को होगा जो राज्यपाल निश्चित करे और सचिव प्रत्येक सदस्य को उस तिथि की सूचना देगा।
विधानसभा उपाध्यक्ष का निर्वाचन उस तिथि को होगा जो अध्यक्ष निश्च्ति करे।
सदन के प्रारम्भ पर या समय-समय पर जैसी भी स्थिति हो, अध्यक्ष सदस्यों में से अधिक से अधिक चार सभापतियों की एक तालिका मनोनीत करेगा, जिनमें से कोई एक अध्यक्ष या उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में पीठासीन हो सकेगा।

विधानसभा अध्यक्ष के कार्य -
1.विधानसभा अध्यक्ष विधानमंडल के विशेष अधिकारों का संरक्षक होता हैं।
2. वह सदन की कार्यवाही संचालित करता है, कार्यवाही के दौरान शांति व सामंजस्य बनाए रखता है।
3. विधानसभा के नियमों की व्याख्या का अधिकार भी विधानसभा अध्यक्ष को ही प्राप्त है।
4. कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं इसका अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष करता है।
5. यदि किसी विधेयक पर मतदान के दौरान पक्ष एवं विपक्ष के मत बराबर हो जाये तो ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष निर्णायक मत का प्रयोग करता है।
6. दल-बदल के आधार पर किसी विधानसभा सदस्य को अयोग्य विधानसभा अध्यक्ष घोषित करता है।
7. कोरम (गणपूर्ति) पूरा नहीं होने पर विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा की बैठक को स्थगित निलंबित कर सकता है।
8. विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा की सभी समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है और उनके कार्यों का पर्यवेक्षण करता है।
वह स्वयं कार्य सलाहकार समिति, नियम समिति व सामान्य प्रयोजन समिति का अध्यक्ष होता है। विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, पद ग्रहण से। सामान्यतः विधानसभा अध्यक्ष 5 वर्ष के कार्यकाल के बाद भी तब तक पद पर बना रहता है जब तक कि अगला विधानसभा का अध्यक्ष पद ग्रहण ना कर ले।
9. समय से पूर्व विधानसभा भंग होने पर भी विधानसभा अध्यक्ष अपने पद पर बना रहता है।
10. राजस्थान विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल द्वारा पुनर्विचार हेतु लौटाए जाने पर, विधानसभा अध्यक्ष इस विधेयक को सदन के सम्मुख पुनः रखने के लिए अधिकृत है।

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अनुच्छेद 179


विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का पद निम्न परिस्थितियों में रिक्त हो सकता है: -
यदि अध्यक्ष व उपाध्यक्ष विधानसभा के सदस्य न रहे।
यदि विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष स्वयं त्याग पत्र दे दे।
विधानसभा साधारण बहुमत (उपस्थित सदस्यों का 50% से अधिक) से प्रस्ताव पारित करके उन्हें हटा सकती है।
विधानसभा अध्यक्ष अपना त्याग पत्र, उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्याग पत्र अध्यक्ष को देता है।
विधानसभा के सदस्यों द्वारा सामान्य बहुमत से प्रस्ताव पारित करके विधानसभा अध्यक्ष को पद से हटाया जा सकता है लेकिन यह संकल्प सदन में प्रस्तावित करने से 14 दिन पूर्व विधानसभा अध्यक्ष को सूचित करना आवश्यक होता है।
जब कभी विधानसभा का विघटन (भंग) किया जाता है तो विघटन के पश्चात होने वाले विधानसभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पहले तक अध्यक्ष अपने पद को रिक्त नहीं करेगा।


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अनुच्छेद 180- अध्यक्ष के पद के कर्त्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति।


अनुच्छेद 180 (1): जब विधानसभा अध्यक्ष का पद रिक्त है तब उपाध्यक्ष और यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है तो विधानसभा का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा।

अनुच्छेद 180 (2): विधानसभा की किसी बैठक में अध्यक्ष अनुपस्थित हो उस स्थिति में उपाध्यक्ष और यदि उपाध्यक्ष भी अनुपस्थित हो तो ऐसा व्यक्ति जो विधानसभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति जो विधानसभा द्वारा अवधारित किया जाए, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा।


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अनुच्छेद 181, 182,


अनुच्छेद 181 जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।


अनुच्छेद 181 (1): विधानासभा को किसी बैठक में, जब अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष/उपाध्यक्ष उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा।

अनुच्छेद 181 (2): जब विधानसभा अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधानसभा में विचाराधीन है तब उसको विधानसभा में बोलने और उसको कार्यवाहियों में भाग लेने, मत देने का अधिकार होगा (विधानसभा सदस्य के रूप में) लेकिन निर्णायक मत का अधिकार नहीं होगा।

अनुच्छेद 182 इसमें विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति के पद का उल्लेख मिलता है।

विधानपरिषद् के सदस्यों में से ही सभापति व उपसभापति को चुना जाता है।
अतः विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति का कार्यकाल पद ग्रहण से 6 वर्ष होता है।


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अनुच्छेद 183

विधानपरिषद् के सभापति और उपसभापति के पद का रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना।

विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति का पद निम्न परिस्थितियों में रिक्त हो सकता है:-
(1) यदि विधानपरिषद् के सदस्य नहीं रहते है तो अपना पद रिक्त कर देंगे।
(2) त्याग पत्र देने पर विधानपरिषद् का सभापति अपना त्याग पत्र उपसभापति को और उपसभापति अपना त्याग पत्र सभापति को देता है।
(3) विधानपरिषद् साधारण बहुमत (50%) से प्रस्ताव पारित करके, सभापति व उपसभापति को हटा सकती है लेकिन यह संकल्प सदन में प्रस्तावित करने से 14 दिन पूर्व सभापति व उपसभापति को सूचित करना आवश्यक होता है।

अनुच्छेद 184 सभापति के पद के कत्र्त्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति :


अनुच्छेद 184 (1): जब विधानपरिषद् के सभापति का पद रिक्त है तब उपसभापति और यदि उपसभापति का भी पद रिक्त है तो विधानपरिषद् का ऐसा सदस्य जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कत्र्तव्यों का पालन करेगा।

अनुच्छेद 184 (2): विधानपरिषद की किसी बैठक में सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति और उपसभापति भी अनुपस्थित हो तो ऐसा व्यक्ति जो विधानपरिषद की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति जो विधानपरिषद द्वारा अवधारित किया जाए, सभापति के रूप में कार्य करंगा।


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अनुच्छेद 185 जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।


अनुच्छेद 185 (1): विधानपरिषद् की किसी बैठक में जब सभापति/उपसभापति का उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब सभापति उपसभापति उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा।

अनुच्छेद 185 (2): जब सभापति को उसके पद से हटाने का संकल्प विधानपरिषद् में विचाराधीन है तब उसको विधानपरिषद् में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में भाग लेने, मत देने का अधिकार होगा (सदस्य के रूप में) लेकिन निर्णायक मत का अधिकार नहीं होगा।

अनुच्छेद 186 विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष तथा विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति के वेतन- भत्तों का उल्लेख मिलता है।
इनके वेतन-भत्तों का निर्धारण राज्य विधानमण्डल करता है।
इनके वेतन-भत्ते राज्य को संचित निधि में से दिये जाते है।
उनके वेतन भत्तों का उल्लेख अनुसूची 2 में मिलता है।
वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष का वेतन 70000 तथा उपाध्यक्ष का 65000 है।


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अनुच्छेद 187

इसमें राज्य के विधानमण्डल के सचिवालय का उल्लेख मिलता है।
अनुच्छेद 187 (1): राज्य विधानमण्डल के सदन का या प्रत्येक सदन का पृथक सचिवीय कर्मवारिवृन्द होगा।
अनुच्छेद 187 (2): राज्य विधानमण्डल विधि द्वारा, सचिवीय कर्मचारिवृन्द में भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन कर सकेगा।
अनुच्छेद 187 (3): जब राज्य विधानमण्डल विधि द्वारा उपबंध नहीं करता है तब राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष या विधानपरिषद के सभापति से परामर्श करने के पश्चात सचिवीय कर्मचारिवृन्द में भर्ती के और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा-शर्तों के विनियमन हेतु नियम बना सकेगा।

अनुच्छेद 188

विधानमण्डल के सदस्यों की शपथ/प्रतिज्ञान का उल्लेख विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को राज्यपाल या राज्यपाल द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है। (पद ग्रहण से पूर्व)
इनकी शपथ का प्रारूप तीसरी अनुसूची में मिलता है।


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