सई नदी का उद्गम होता है
Anonymous Quiz
20%
कीठम झील
40%
पार्वती अरगा झील
35%
भिजवान झील
5%
इनमें से कोई नहीं
👍1
प्रथम मुख्यमंत्री= पंडित गोविंद बल्लभ पंत
प्रथम उपमुख्यमंत्री= चौधरी नारायण सिंह
प्रथम विधानसभा अध्यक्ष= पुरुषोत्तम दास टंडन
प्रथम विधानपरिषद अध्यक्ष= श्री चंद्रभाल
#UP_SPECIAL
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प्रथम उपमुख्यमंत्री= चौधरी नारायण सिंह
प्रथम विधानसभा अध्यक्ष= पुरुषोत्तम दास टंडन
प्रथम विधानपरिषद अध्यक्ष= श्री चंद्रभाल
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👍3
महत्वपूर्ण तथ्य -
● भारत में कृषि जलवायु क्षेत्र - 15
● भारत मे कृषि पारिस्थितिक क्षेत्र (AEZs) - 20
● भारत मे कृषि पारिस्थितिक उप क्षेत्र - 60
● उत्तर प्रदेश में कृषि जलवायु क्षेत्र - 9
● उत्तर प्रदेश में कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्र - 20
● उत्तर प्रदेश में कुल मृदा समूह क्षेत्र - 6 (कुछ बुक में 8)
भारतीय मिट्टियाँ औऱ उनके विस्तृत क्षेत्र (प्रतिशत)
● जलोढ़ मिट्टी - 33.5%
● लाल मिट्टी - 26.8%
● काली मिट्टी - 16.6%
● लैटेराइट मिट्टी - 3.7%
● क्रम (बढ़ते से घटते क्रम में) - जलोढ़ > लाल > काली > लैटेराइट
उत्तर प्रदेश की मिट्टियाँ औऱ उनके विस्तृत क्षेत्र (प्रतिशत)
● जलोढ़ मृदायें - 76.36%
● बुंदेलखंडीय मृदायें - 12.21%
● विंध्याचल मृदाएं - 5.46%
● तराई मृदायें - 5.37%
#geography
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● भारत में कृषि जलवायु क्षेत्र - 15
● भारत मे कृषि पारिस्थितिक क्षेत्र (AEZs) - 20
● भारत मे कृषि पारिस्थितिक उप क्षेत्र - 60
● उत्तर प्रदेश में कृषि जलवायु क्षेत्र - 9
● उत्तर प्रदेश में कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्र - 20
● उत्तर प्रदेश में कुल मृदा समूह क्षेत्र - 6 (कुछ बुक में 8)
भारतीय मिट्टियाँ औऱ उनके विस्तृत क्षेत्र (प्रतिशत)
● जलोढ़ मिट्टी - 33.5%
● लाल मिट्टी - 26.8%
● काली मिट्टी - 16.6%
● लैटेराइट मिट्टी - 3.7%
● क्रम (बढ़ते से घटते क्रम में) - जलोढ़ > लाल > काली > लैटेराइट
उत्तर प्रदेश की मिट्टियाँ औऱ उनके विस्तृत क्षेत्र (प्रतिशत)
● जलोढ़ मृदायें - 76.36%
● बुंदेलखंडीय मृदायें - 12.21%
● विंध्याचल मृदाएं - 5.46%
● तराई मृदायें - 5.37%
#geography
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👌3
1.विधानमण्डल के सदस्यों की शपथ का उल्लेख अनुच्छेद 188 है।
2.विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को राज्यपाल द्वारा पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है। 3.इनकी शपथ का प्रारूप तीसरी अनुसूची में मिलता है।
2.विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को राज्यपाल द्वारा पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है। 3.इनकी शपथ का प्रारूप तीसरी अनुसूची में मिलता है।
Anonymous Quiz
0%
केवल 1, 2 सही हैं।
33%
केवल 2, 3 सही हैं।
13%
केवल 1, 3 सही हैं।
53%
1, 2, 3 सही है।
👍2
A. अनुच्छेद 189 (1) में विधानसभाध्यक्ष/सभापति के निर्णायक मत का उल्लेख है।
B. सामान्यतः अध्यक्ष/सभापति मत नहीं देगा लेकिन जब किसी विधेयक पर मत बराबर हो जाये तो अध्यक्ष / सभापति निर्णायक मत का प्रयोग करेगा। 【Join 📌 @UppscZone】
B. सामान्यतः अध्यक्ष/सभापति मत नहीं देगा लेकिन जब किसी विधेयक पर मत बराबर हो जाये तो अध्यक्ष / सभापति निर्णायक मत का प्रयोग करेगा। 【Join 📌 @UppscZone】
Anonymous Quiz
0%
केवल A सही है।
18%
केवल B सही है।
82%
दोनों सही है
0%
दोनों गलत है।
👍2
अनुच्छेद 164
मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्री की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत अपने पद धारण करेंगे।
किसी राज्य की मंत्री परिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी।
15% से अधिक है तो 6 माह के भीतर भीतर 15% की जाएगी।
(कम से कम 12 मंत्री बन सकते हैं)
किसी राजनीतिक दल का राज्य की विधानमंडल के किसी सदन का कोई, सदस्य दसवीं अनुसूची के पैरा - 2 के अधीन सदन का सदस्य होने के लिए निर्हित (अयोग्य) हैं तो वो मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बन सकता हैं, अर्थात् अगर कोई विधायक राजनीतिक दल का सदस्य है और दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के तहत वह उस सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य है, तो वह मंत्री नहीं बन सकता।
मंत्रिपरिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई होगी।
किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले राज्यपाल तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूपों के अनुसार उसको पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा।
कोई मंत्री जो निरंतर 6 माह की किसी अवधि तक राज्य के विधान मंडल का सदस्य नहीं है, तो उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।
मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो उस राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा समय-समय पर आधारित करें और जब तक उस राज्य का विधानमंडल इस प्रकार अवधारित नहीं करता तब तक ऐसे होंगे जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट है।
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अनुच्छेद 164(1)-
मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्री की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत अपने पद धारण करेंगे।
अनुच्छेद 164 (1क)
किसी राज्य की मंत्री परिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी।
15% से अधिक है तो 6 माह के भीतर भीतर 15% की जाएगी।
(कम से कम 12 मंत्री बन सकते हैं)
अनुच्छेद 164(1ख)
किसी राजनीतिक दल का राज्य की विधानमंडल के किसी सदन का कोई, सदस्य दसवीं अनुसूची के पैरा - 2 के अधीन सदन का सदस्य होने के लिए निर्हित (अयोग्य) हैं तो वो मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बन सकता हैं, अर्थात् अगर कोई विधायक राजनीतिक दल का सदस्य है और दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के तहत वह उस सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य है, तो वह मंत्री नहीं बन सकता।
अनुच्छेद 164(2)
मंत्रिपरिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई होगी।
अनुच्छेद 164(3)
किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले राज्यपाल तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूपों के अनुसार उसको पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा।
अनुच्छेद 164(4)
कोई मंत्री जो निरंतर 6 माह की किसी अवधि तक राज्य के विधान मंडल का सदस्य नहीं है, तो उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।
अनुच्छेद 164(5)-
मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो उस राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा समय-समय पर आधारित करें और जब तक उस राज्य का विधानमंडल इस प्रकार अवधारित नहीं करता तब तक ऐसे होंगे जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट है।
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अनुच्छेद - 166 : राज्य सरकार का कार्य संचालन
अनुच्छेद 166 (1): किसी राज्य की समस्त कार्यपालिका कार्यवाही राज्यपाल के नाम से की जायेगी।
अनुच्छेद 166 (2): राज्यपाल के नाम से किए गए और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा और राज्यपाल द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए और इस प्रकार अधिप्रमाणित आदेश या लिखत की विधि मान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह राज्यपाल द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है।
अनुच्छेद 166 (3): राज्यपाल मंत्रियों में कार्य आवंटन के लिए नियम बनायेगा अर्थात राज्य सरकार के कार्य संचालन के लिए नियम बनाता है।
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अनुच्छेद - 167 : राज्यपाल को जानकारी (सूचना) देने के संबंध में मुख्यमंत्री का कर्त्तव्य -
राज्यपाल, मुख्यमंत्री से सूचना माँग सकता है।
मुख्यमंत्री का कर्त्तव्य बनता है कि वह राज्यपाल को सूचना दे माँगने पर या बिना माँगे।
निम्न मामलो में : -
(क) राज्य के कार्यों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संस्चित करें।
(ख) राज्य के कायों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं ससंबंधी जो जानकारी राज्यपाल मांगे, वह दे।
(ग) किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है, किन्तु मंत्रिपरिषद् ने विचार नहीं किया है, राज्यपाल द्वारा अपेक्षा किए जाने पर मंत्रिपरिषद् के समक्ष विचार के लिए रखे।
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अनुच्छेद 168 राज्य के विधान मंडलों का गठन
168(1) प्रत्येक राज्य के लिए एक विधान मंडल का प्रावधान करता है जो राज्यपाल और एक अथवा दो सदनों से मिलकर बनेगा।
168(2) जहां किसी राज्य के विधान मंडल के दो सदन हैं वहां एक का नाम विधानसभा और एक का नाम विधान परिषद होगा और जहां केवल एक सदन है वहां उसका नाम विधानसभा होगा।
अनुच्छेद 169
राज्यों के विधान परिषदों का सर्जन
169(1) अनुच्छेद 168 में किसी बात के होते हुए भी संसद विधि द्वारा किसी विधान परिषद वाले राज्य में विधान परिषद के सर्जन के लिए उपबंध कर सकेगी यदि उस राज्य की विधानसभा ने इस आशय का संकल्प विधान सभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों की संख्या का कम से कम दो- तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर दिया है।
169(2) यदि संसद साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित कर दे तो वह गठन का मार्ग खुल जाता है।
169(3) पूर्वोक्त प्रकार की कोई विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन नहीं समझी जाएगी।
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अनुच्छेद 170 : विधानसभा की संरचना
इसमें विधानसभा की संरचना का उल्लेख मिलता है।
अनुच्छेद 170 (1):
किसी भी राज्य की अधिकतम विधानसभा सीटें 500 तथा न्यूनतम सीटें 60 निर्धारित की गई है। अपवाद-गोवा (40), मिजोरम् (40), सिक्किम (32), पुडुचेरी (30)। इनकी विधानसभा सीटें 60 से कम है।
सर्वाधिक विधानसभा सीटें उत्तर प्रदेश (403) की है।
अनुच्छेद 170 (2):
भौगोलिक आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्र इस आधार पर बनाये गये है कि जनसंख्या का अनुपात सभी निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग समान रहे। विधानसभा में अनुसूचित जाति व जनजाति के आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 332 में है।
वर्तमान में कुल 200 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें अनुसूचित जाति व 25 सीटें अनुसचित जनजाति के लिए आरक्षित है।
अनुच्छेद 170(3)
84 वें संविधान संशोधन 2001 के अनुसार राज्य विधानसभा के लिए आवंटित सीटें वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद पुनः निर्धारित की जाएगी।
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अनुच्छेद 171 : विधानपरिषद की संरचना
171 (1)-विधान परिषद् में अधिकतम सीटें, उस राज्य की कुल विधानसभा सीटों के 1/3 से अधिक नहीं हो सकती तथा न्यूनतम सीटें 40 से कम नहीं हो सकती। यदि राजस्थान में विधान परिषद् बनती है तो अधिकतम सीटें 66 होगी।
171 (2)-जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करें तब तक किसी राज्य की विधानपरिषद की संरचना 171(3) में उपबंधित रीति से होगी।
171 (3)-विधान परिषद् के सदस्यों का निर्वाचन, निर्वाचक मण्डल द्वारा होगा।विधान परिषद् के 1/6सदस्यों का मनोनयन तथा 5/6 सदस्यों का निर्वाचन होता है।
Note - मनोनीत सदस्य राज्य का मूल निवासी हो।
अनु.171(4): विधानपरिषद के सदस्यों का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
अनु.171 (5): राज्यपाल, विधानपरिषद में 1/6 सदस्यों को निम्न आधार पर मनोनीत (नामनिर्देशित) करता है:- साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा।
भारत के 6 राज्यों में द्विसदनात्मक विधानमण्डल (राज्यपाल विधानसभा विधान परिषद्)है।
विधान परिषद वाले राज्य - उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र बिहार कर्नाटक आंध्र प्रदेश तेलंगाना
अनुच्छेद 172 राज्यों के विधान मण्डलों की अवधि
अनु.172 (1): विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, राष्ट्रीय आपातकाल के समय संसद विधि निर्माण द्वारा विधानसभा का कार्यकाल एक बार मे एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है।
अनु.172 (2): विधान परिषद् एक स्थायी सदन है, इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक 2 वर्ष बाद सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते है और उनके स्थान पर नए सदस्य आ जाते है।
अनु.173 विधान मण्डल के सदस्यों की अर्हता/योग्यता
विधानसभा के सदस्यों के लिए योग्यताएँ :
वह भारत का नागरिक हो।
निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ ली हो।
वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
वह किसी लाभ के पद पर कार्यरत न हो तथा संसद द्वारा निर्धारित की गई अन्य शर्तों को पूर्ण करता हो।
विधान परिषद् के सदस्यों के लिए अर्हताएँ :
वह भारत का नागरिक हो।
निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ ली हो।
वह कम से कम 30 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
कोई ऐसा व्यक्ति सदस्य नहीं बन सकेगा, जिसे संसद के कानून द्वारा अयोग्य घोषित किया गया हो।
कोई भी व्यक्ति विधान मण्डल के दोनों सदनों का एक साथ सदस्य नहीं हो सकता।
अनुच्छेद 181, 182,
अनुच्छेद 181 जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।
अनुच्छेद 181 (1): विधानासभा को किसी बैठक में, जब अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष/उपाध्यक्ष उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा।
अनुच्छेद 181 (2): जब विधानसभा अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधानसभा में विचाराधीन है तब उसको विधानसभा में बोलने और उसको कार्यवाहियों में भाग लेने, मत देने का अधिकार होगा (विधानसभा सदस्य के रूप में) लेकिन निर्णायक मत का अधिकार नहीं होगा।
अनुच्छेद 182 इसमें विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति के पद का उल्लेख मिलता है।
विधानपरिषद् के सदस्यों में से ही सभापति व उपसभापति को चुना जाता है।
अतः विधानपरिषद् के सभापति व उपसभापति का कार्यकाल पद ग्रहण से 6 वर्ष होता है।
अनुच्छेद 174 राज्यपाल विधान मण्डल का सत्राहूत, सत्रावसान व विधानसभा को भंग (विघटित) कर सकता है।
अनुच्छेद 174 (1):
राज्यपाल, विधानमण्डल के एक सदन या दोनों सदनों का सत्र बुला सकता है अर्थात विधानमण्डल का सत्राहृत कर सकता है। राज्यपाल द्वारा बुलाए गए सत्र की सूचना सचिव प्रत्येक सदस्य को नियत तारीख से 21 दिन पूर्व देगा।
राज्यपाल ऐसे समय और स्थान पर जो वह ठीक समझे विधानमण्डल का सत्र आहूत कर सकता है। प्रथम सत्र की अंतिम बैठक एवं द्वितीय सत्र की प्रथम बैठक के मध्य अधिकतम 6 माह का समय हो सकता है।
अनुच्छेद 174 (2) क :
राज्यपाल, विधानमण्डल के एक सदन या दोनों सदनों का सत्रावसान अर्थात सत्र समाप्त कर सकता है।
अनुच्छेद 174 (2) ख:
राज्यपाल, विधानसभा को विघटित (भंग) कर सकता है।
Imortant fact:
राज्यपाल विधान सभा का सत्र राज्यपाल बुलाता है, लेकिन अध्यक्षता विधान सभा अध्यक्ष करता है।
विधान सभा का सत्र समाप्त (सत्रावसान) राज्यपाल करता है लेकिन विधान सभा की बैठक को स्थगित विधान सभा अध्यक्ष करता है।
सामान्यतः राज्यपाल मुख्यमंत्री/मंत्रिमण्डल की सलाह पर विधानसभा का सत्र बुलाता है लेकिन राज्यपाल कुछ परिस्थितियों में मुख्यमंत्री की सलाह के विरुद्ध भी विधानसभा का सत्र बुला सकता है (स्वविवेक से)।
एक कैलेंडर वर्ष में समस्त सत्रों की बैठकों की कुल संख्या 60 से कम नहीं होगी।
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अनुच्छेद 175 सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार
राज्यपाल के अभिभाषण एवं संदेश भेजने का अधिकार।
अनुच्छेद 175 (1): राज्यपाल विधानमण्डल के किस एक सदन में या एक साथ सम्वेत दोनों सदनों में अभिभाषण कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थिति की अपेक्षा कर सकेगा।
अनुच्छेद 175 (2) : राज्यपाल राज्य के विधान मण्डल में लंबित किसों विधेयक के संबंध में दोनों सदनों या एक सदन को संदेश भेज सकता है कि अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्रता से विचार करे।
अनुच्छेद 176 राज्यपाल का विशेष अभिभाषण
अनुच्छेद 176 (1): राज्यपाल, विधानमण्डल के दोनों सदनों को संयुक्त रूप से समवेत काके अभिभाषित (संबोधित) कर सकता है और विधानमण्डल को उसके आह्वान का कारण बताएगा।
राज्यपाल विशेष अभिभाषण, आम (साधारण) निर्वाचन के बाद प्रथम सत्र के प्रारम्भ में तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र (बजट सत्र) के प्रारम्भ में करता है।
अनुच्छेद 176 (2): सदन या प्रत्येक सदन की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों द्वारा ऐसे अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों पर चर्चा के लिए समय नियत करने के लिए उपबंध किया जाएगा।
#ARTICLES #POLITY #PRELIMS
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अनुच्छेद 177 सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार
महाधिवक्ता विधानमण्डल की बैठकों में भाग ले सकता है, बोल सकता है, चर्चा कर सकता है लेकिन मतदान नहीं कर सकता है क्योंकि वह विधानमण्डल का सदस्य नहीं होता।
महाधिवक्ता को विधानमण्डल को किसी भी समिति का सदस्य बनाया जा सकता है।
अनुच्छेद 178 इसमें विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के पद का उल्लेख मिलता है।
विधानसभा सदस्यों में से (सत्ता पक्ष के) एक सदस्य को अध्यक्ष व एक को उपाध्यक्ष चुना जाता है।
विधानसभा अध्यक्ष का निर्वाचन उस तिथि को होगा जो राज्यपाल निश्चित करे और सचिव प्रत्येक सदस्य को उस तिथि की सूचना देगा।
विधानसभा उपाध्यक्ष का निर्वाचन उस तिथि को होगा जो अध्यक्ष निश्च्ति करे।
सदन के प्रारम्भ पर या समय-समय पर जैसी भी स्थिति हो, अध्यक्ष सदस्यों में से अधिक से अधिक चार सभापतियों की एक तालिका मनोनीत करेगा, जिनमें से कोई एक अध्यक्ष या उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में पीठासीन हो सकेगा।
विधानसभा अध्यक्ष के कार्य -
1.विधानसभा अध्यक्ष विधानमंडल के विशेष अधिकारों का संरक्षक होता हैं।
2. वह सदन की कार्यवाही संचालित करता है, कार्यवाही के दौरान शांति व सामंजस्य बनाए रखता है।
3. विधानसभा के नियमों की व्याख्या का अधिकार भी विधानसभा अध्यक्ष को ही प्राप्त है।
4. कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं इसका अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष करता है।
5. यदि किसी विधेयक पर मतदान के दौरान पक्ष एवं विपक्ष के मत बराबर हो जाये तो ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष निर्णायक मत का प्रयोग करता है।
6. दल-बदल के आधार पर किसी विधानसभा सदस्य को अयोग्य विधानसभा अध्यक्ष घोषित करता है।
7. कोरम (गणपूर्ति) पूरा नहीं होने पर विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा की बैठक को स्थगित निलंबित कर सकता है।
8. विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा की सभी समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है और उनके कार्यों का पर्यवेक्षण करता है।
वह स्वयं कार्य सलाहकार समिति, नियम समिति व सामान्य प्रयोजन समिति का अध्यक्ष होता है। विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, पद ग्रहण से। सामान्यतः विधानसभा अध्यक्ष 5 वर्ष के कार्यकाल के बाद भी तब तक पद पर बना रहता है जब तक कि अगला विधानसभा का अध्यक्ष पद ग्रहण ना कर ले।
9. समय से पूर्व विधानसभा भंग होने पर भी विधानसभा अध्यक्ष अपने पद पर बना रहता है।
10. राजस्थान विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल द्वारा पुनर्विचार हेतु लौटाए जाने पर, विधानसभा अध्यक्ष इस विधेयक को सदन के सम्मुख पुनः रखने के लिए अधिकृत है।
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