A Copper Inscription of 6th CE from A king named Madhavavarman of VIshnu Kundina dynasty
Second Plate first side says :
The Sanatana Dharma which is detailed well in Shrutis and Smritis.
Epigraphia Indica Volume 27 , Page 315
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Second Plate first side says :
श्रुतिस्मृतिविहितसनातनधर्मक निरतय
The Sanatana Dharma which is detailed well in Shrutis and Smritis.
Epigraphia Indica Volume 27 , Page 315
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पांडा बाबू 🐼 v/s उनके पुराण भाग 1
अक्सर आपने पांडा बाबू को यह कहते सुना होगा कि स्त्री को वेद पाठ करने का अधिकार नहीं है ।
परंतु शायद इन्होंने अपने ही ग्रंथों को ठीक से नहीं पढ़ा ।
सीखिए सीखिए पांडा बाबू 🐼 कम से कम अपने पुराणों से ही कुछ सीखिए ।
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अक्सर आपने पांडा बाबू को यह कहते सुना होगा कि स्त्री को वेद पाठ करने का अधिकार नहीं है ।
परंतु शायद इन्होंने अपने ही ग्रंथों को ठीक से नहीं पढ़ा ।
ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय १४ के श्लोक ६४ के अनुसार कुशध्वज की पुत्री को वेदवती इस कारण कहा जाता था क्योंकि वह चारों वेदों की ज्ञाता थी । वेद मंत्र सदैव उसकी जिह्वा पर निवास करते थे ।
सीखिए सीखिए पांडा बाबू 🐼 कम से कम अपने पुराणों से ही कुछ सीखिए ।
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नवबौद्धों के नीले ख़्वाब पार्ट 4
ब्राह्मणों को नवबौद्ध एक बहुत ही गलत ढंग से पेश करते हैं । परंतु भगवान बुद्ध ने त्रिपिटक में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है ।
ब्राह्मण सुत्त , उदान
ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान्श्रावस्ती में के जेतवनाराम में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान् सारिपुत्र, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन, आयुष्मान् महाकाश्यप, आयुष्मान् महाकात्यायन, आयुष्मान् महाकोट्ठित, आयुष्मान् महाकप्पिन, आयुष्मान् महाचुन्द, आयुष्मन् अनुरुद्ध, आयुष्मान् रेवत, और आयुष्मान् नन्द, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये।
भगवान् ने उन आयुष्मानों को दूर ही से आते देखा, देखकर, भिक्षुओं को आमन्त्रित किया - "भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं; भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं।"
ऐसा कहने पर किसी ब्राह्मण जाति के भिक्षु ने भगवान् से पूछा- "भन्ते, किन बातों के होने से कोई ब्राह्मण होता है? ब्राह्मण बनाने वाले धर्म कौनसे हैं?"
उदान १.५, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
अर्थात भगवान बुद्ध भी यही मानते थे कि कोई भी व्यक्ति कर्म से ब्राह्मण होता है ।
नवबौद्धों से यही निवेदन है कि भगवान बुद्ध के वास्तविक चरित्र को जाने जो त्रिपिटक में है ।
A lot of thanks to Fu Ji Yun ( a real Buddhist ) for this reference.
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ब्राह्मणों को नवबौद्ध एक बहुत ही गलत ढंग से पेश करते हैं । परंतु भगवान बुद्ध ने त्रिपिटक में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है ।
ब्राह्मण सुत्त , उदान
ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान्श्रावस्ती में के जेतवनाराम में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान् सारिपुत्र, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन, आयुष्मान् महाकाश्यप, आयुष्मान् महाकात्यायन, आयुष्मान् महाकोट्ठित, आयुष्मान् महाकप्पिन, आयुष्मान् महाचुन्द, आयुष्मन् अनुरुद्ध, आयुष्मान् रेवत, और आयुष्मान् नन्द, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये।
भगवान् ने उन आयुष्मानों को दूर ही से आते देखा, देखकर, भिक्षुओं को आमन्त्रित किया - "भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं; भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं।"
ऐसा कहने पर किसी ब्राह्मण जाति के भिक्षु ने भगवान् से पूछा- "भन्ते, किन बातों के होने से कोई ब्राह्मण होता है? ब्राह्मण बनाने वाले धर्म कौनसे हैं?"
इसे जानकर, उस समय भगवान् ने इस उदान को उदाना
“बाहित्वा पापके धम्मे, ये चरन्ति सदा सता।
खीणसंयोजना बुद्धा, ते वे लोकस्मि ब्राह्मणा”ति॥
"पाप-धर्मों को बाहर कर जो सदा स्मृतिमान् रहते हैं, सभी संयोजनों के क्षीण हो जाने से जो बुद्ध हो गए हैं, लोक में वही ब्राह्मण कहे जाते हैं।"
उदान १.५, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
अर्थात भगवान बुद्ध भी यही मानते थे कि कोई भी व्यक्ति कर्म से ब्राह्मण होता है ।
नवबौद्धों से यही निवेदन है कि भगवान बुद्ध के वास्तविक चरित्र को जाने जो त्रिपिटक में है ।
A lot of thanks to Fu Ji Yun ( a real Buddhist ) for this reference.
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मेरा यशु यशु भाग 5
क्या दस्यु शब्द का अर्थ गुलाम/slave है ??
दस्यु या दास शब्द की धातु दस् होती है जिसका अर्थ कष्ट पहुंचाना या विनाश करना होता है ।
मूर्खता की हद तो तब हो जाती है जब ये व्यक्ति स्वयं महर्षि दयानंद सरस्वती जी के भाष्य का उदाहरण देते हुए वेदों में ग़ुलामी प्रथा को सिद्ध करने की कोशिश करता है , और अतिआत्मविश्वास में आकर पूरा भाष्य पढ़े बिना ही किसी भी संस्कृत शब्दकोश से दस्यु का अर्थ गुलाम सिद्ध कर सकने की चेष्टा करता है ।
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क्या दस्यु शब्द का अर्थ गुलाम/slave है ??
दस्यु या दास शब्द की धातु दस् होती है जिसका अर्थ कष्ट पहुंचाना या विनाश करना होता है ।
आप्टे और मोनियर विलियम्स दोनों ने ही लौकिक संस्कृत में दस्यु का अर्थ दुष्ट , मानवता के शत्रु अत्याचारी का अर्थ ग्रहण किया है ।
वैदिक संस्कृत में भाष्याकार सायणाचार्य तथा वेंकट ने इसका अर्थ कपटी धूर्त शत्रु लिया है ।
स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भी इसके भाष्य में दस्यु का अर्थ दुष्ट स्वभाव के मनुष्य से ग्रहण किया है ।
मूर्खता की हद तो तब हो जाती है जब ये व्यक्ति स्वयं महर्षि दयानंद सरस्वती जी के भाष्य का उदाहरण देते हुए वेदों में ग़ुलामी प्रथा को सिद्ध करने की कोशिश करता है , और अतिआत्मविश्वास में आकर पूरा भाष्य पढ़े बिना ही किसी भी संस्कृत शब्दकोश से दस्यु का अर्थ गुलाम सिद्ध कर सकने की चेष्टा करता है ।
परंतु जिनके यहां खुद गुलाम खरीदने की प्रथा हो ( Leviticus 25. 44 - 46 ) , स्वयं अपनी पुत्री को गुलाम बनाने की बात हो ( Exodus 21.7 -8 )
वो लोग सनातन धर्म पर उंगली उठाते अच्छे नहीं लगते ।
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🔥6😁2👍1
1st Century BCE evidence of Mahabharata's Lineage !!!
Interestingly Yauddheyas are said to be the Heirs of the Son of Yudhisthira from Mahabharata , whose name was Yodheya ( Mahabharat Sabha parva , Adhyaya 95 , shlok 46 )
Reference : Jharni certified Alexander Cunningham's 🤓☝️ Book : Coins of Ancient India.
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A Karshpana Coin ( Punch marked or Purana ) from Taxila , Shows a warrior from a clan , whom Alexander Cunningham told as warriors Yauddheyas.
Interestingly Yauddheyas are said to be the Heirs of the Son of Yudhisthira from Mahabharata , whose name was Yodheya ( Mahabharat Sabha parva , Adhyaya 95 , shlok 46 )
Reference : Jharni certified Alexander Cunningham's 🤓☝️ Book : Coins of Ancient India.
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देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र भाग 4
वेद और ब्राह्मण ग्रंथ से इंद्रदेव की संक्षिप्त महिमा
परमात्मा का एक नाम इंद्र भी है और इंद्र एक देवपद भी है । उत्तम गुणों का आश्रय लेने वाले लोग इस पद को प्राप्त करते हैं और ब्रह्मचर्य इस पद को प्राप्त करने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम बताया जाता है ।
ऐसे परम ब्रह्मचारी इंद्रदेव को मेरा प्रणाम । 🙏
ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ।।
- ऋग्वेद 9/63/5.
वेद और ब्राह्मण ग्रंथ से इंद्रदेव की संक्षिप्त महिमा
परमात्मा का एक नाम इंद्र भी है और इंद्र एक देवपद भी है । उत्तम गुणों का आश्रय लेने वाले लोग इस पद को प्राप्त करते हैं और ब्रह्मचर्य इस पद को प्राप्त करने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम बताया जाता है ।
अथर्ववेद ११.७.१६ के अनुसार ब्रह्मचारी व्यक्ति ही इंद्र पद पर प्रतिष्ठित होकर प्रजापति तथा विराट् को वश में करने वाला होता है ।
अथर्ववेद ११.७.१९ ब्रह्मचर्य रूप तप का पालन कर देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की तथा इसी ब्रह्मचर्य के कारण देवराज इंद्र समस्त देवताओं को सुख/स्वर्ग/तेज पहुंचाने में समर्थ हुए ।
ऐतरेय ब्राह्मण ७.१६ के अनुसार इंद्र समस्त देवों में सबसे पराक्रमी , ओजस्वी , बलवान , सहिष्णु , सत्यवादी एवं प्रभावशाली है ।
इसी रूप में इंद्र की स्तुति यहां की गई है ।
विश्वेदेवों ने इंद्र की स्तुति में उन्हें सत्याचारिन् से संबोधित किया अर्थात् इंद्रदेव सदैव सत्य का आचरण करते थे ।
ऐसे परम ब्रह्मचारी इंद्रदेव को मेरा प्रणाम । 🙏
ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ।।
- ऋग्वेद 9/63/5.
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5th century CE Garuda Pillar from Eran Gupta complex !
Just as Mentioned in Scriptures and Iconography , Garuda is Seen holding a Snake in his hands with Hand folded.
This is again a tight slap on the face of Those who say there is no evidence of Sanatan Dharma before the 12th century.
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Just as Mentioned in Scriptures and Iconography , Garuda is Seen holding a Snake in his hands with Hand folded.
Garuda dhwaja was the Royal Symbol of Guptas so it was very common for them to make such pillars.
These dhwaja stambhas are devoted to Lord Janardana ( Vishnu , Krishna. )
Set up by 2 brothers Matri Vishnu and Dhyana Vishnu , during the reign of Budhgupta.
This is again a tight slap on the face of Those who say there is no evidence of Sanatan Dharma before the 12th century.
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पांडा 🐼 का पोपट : भाग 9
पांडा बाबू 🐼 ने अबकी बार अपने घुटनों में मौजूद मस्तिष्क का 150% इस्तेमाल किया है तब जाकर वह इस निष्कर्ष पर पहुंच पाए हैं की वेद में स्त्री का अधिकार इस कारण से नहीं है क्योंकि वेद में अन्य जीव जंतुओं तथा बच्चों के लिए भी उपदेश किया गया है पर वे वेदाधिकारी नहीं होते । 😂
अगर स्त्री वेद पाठ नहीं कर सकती तो वह वेद मंत्र की ज्ञाता कैसे हुई बताओ ?
पांडा बाबू 🐼 ने अबकी बार अपने घुटनों में मौजूद मस्तिष्क का 150% इस्तेमाल किया है तब जाकर वह इस निष्कर्ष पर पहुंच पाए हैं की वेद में स्त्री का अधिकार इस कारण से नहीं है क्योंकि वेद में अन्य जीव जंतुओं तथा बच्चों के लिए भी उपदेश किया गया है पर वे वेदाधिकारी नहीं होते । 😂
पहली चीज जो इन्होंने वेद में इतिहास ढूंढने की कोशिश की है उसका खंडन महाभाष्य ३.३.३ में महर्षि पतंजलि पहले ही कर चुके हैं की वेदार्थ रुढ़िवादी नहीं होते ।
दूसरा बालक भी उपनयन संस्कार तथा ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश के बाद वेदाधिकारी हो जाते हैं तथा सामवेद ९३८ में आचार्य द्वारा संस्कारित होकर द्विज होने की बात कही है ।
तीसरी चीज वेदवाणी पशुओं को कैसे समझ में आएगी व किस भाषा में आप उन्हें वेद पढ़ाएंगे ? पुराणों में पशुओं से संतान भी उत्पन्न होती है जो वेदज्ञाता होती है ( जैसे भागवतम का गोकर्ण )🌚
शतपथ ब्राह्मण १.९.२.२३ में स्त्री द्वारा यज्ञ में वेद को खोलते समय यजुर्वेद २.२१ के पाठ की बात कही गई है । यह बात स्वयं आपके सायणाचार्य ने भी मानी है ।
अगर स्त्री वेद पाठ नहीं कर सकती तो वह वेद मंत्र की ज्ञाता कैसे हुई बताओ ?
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