Exposing Neo Buddhists lie on Devi Shashti ( Devasena ) !!
Neo Buddhist : Maya Devi died 6 days after the birth of Buddha. Hence she was called as Devi Shashti and baman copied her after the 12th century.
Me : Any evidence ?
Neo : umm 🧐🤔
Me : Scholars and Buddhist literature holds that Devi Maya died 7 days after the birth of Lord Buddha. So your claim is already baseless.
Neo : Doesn't matter 😭 ! You stole Your Goddess from her only..
There is no evidence of Devi Shashti before 12th century peee poo 💩.
Me : here , what about this Gupta period Sculpture ??
Neo ( crying inside ) : Manuwadi 😡 She is a Buddhist goddess.
Me : 🤣 Then why she is mentioned with Vedic Gods in Bower's Manuscript Part 4 , Leaf 1 , Reverse 😂😂
Neo Buddhist : ham mulnivasio ka Chochan ho gyaa 😭😭😭😭
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Neo Buddhist : Maya Devi died 6 days after the birth of Buddha. Hence she was called as Devi Shashti and baman copied her after the 12th century.
Me : Any evidence ?
Neo : umm 🧐🤔
Me : Scholars and Buddhist literature holds that Devi Maya died 7 days after the birth of Lord Buddha. So your claim is already baseless.
Neo : Doesn't matter 😭 ! You stole Your Goddess from her only..
There is no evidence of Devi Shashti before 12th century peee poo 💩.
Me : here , what about this Gupta period Sculpture ??
Neo ( crying inside ) : Manuwadi 😡 She is a Buddhist goddess.
Me : 🤣 Then why she is mentioned with Vedic Gods in Bower's Manuscript Part 4 , Leaf 1 , Reverse 😂😂
Neo Buddhist : ham mulnivasio ka Chochan ho gyaa 😭😭😭😭
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A Copper Inscription of 6th CE from A king named Madhavavarman of VIshnu Kundina dynasty
Second Plate first side says :
The Sanatana Dharma which is detailed well in Shrutis and Smritis.
Epigraphia Indica Volume 27 , Page 315
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Second Plate first side says :
श्रुतिस्मृतिविहितसनातनधर्मक निरतय
The Sanatana Dharma which is detailed well in Shrutis and Smritis.
Epigraphia Indica Volume 27 , Page 315
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पांडा बाबू 🐼 v/s उनके पुराण भाग 1
अक्सर आपने पांडा बाबू को यह कहते सुना होगा कि स्त्री को वेद पाठ करने का अधिकार नहीं है ।
परंतु शायद इन्होंने अपने ही ग्रंथों को ठीक से नहीं पढ़ा ।
सीखिए सीखिए पांडा बाबू 🐼 कम से कम अपने पुराणों से ही कुछ सीखिए ।
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अक्सर आपने पांडा बाबू को यह कहते सुना होगा कि स्त्री को वेद पाठ करने का अधिकार नहीं है ।
परंतु शायद इन्होंने अपने ही ग्रंथों को ठीक से नहीं पढ़ा ।
ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय १४ के श्लोक ६४ के अनुसार कुशध्वज की पुत्री को वेदवती इस कारण कहा जाता था क्योंकि वह चारों वेदों की ज्ञाता थी । वेद मंत्र सदैव उसकी जिह्वा पर निवास करते थे ।
सीखिए सीखिए पांडा बाबू 🐼 कम से कम अपने पुराणों से ही कुछ सीखिए ।
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नवबौद्धों के नीले ख़्वाब पार्ट 4
ब्राह्मणों को नवबौद्ध एक बहुत ही गलत ढंग से पेश करते हैं । परंतु भगवान बुद्ध ने त्रिपिटक में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है ।
ब्राह्मण सुत्त , उदान
ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान्श्रावस्ती में के जेतवनाराम में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान् सारिपुत्र, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन, आयुष्मान् महाकाश्यप, आयुष्मान् महाकात्यायन, आयुष्मान् महाकोट्ठित, आयुष्मान् महाकप्पिन, आयुष्मान् महाचुन्द, आयुष्मन् अनुरुद्ध, आयुष्मान् रेवत, और आयुष्मान् नन्द, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये।
भगवान् ने उन आयुष्मानों को दूर ही से आते देखा, देखकर, भिक्षुओं को आमन्त्रित किया - "भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं; भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं।"
ऐसा कहने पर किसी ब्राह्मण जाति के भिक्षु ने भगवान् से पूछा- "भन्ते, किन बातों के होने से कोई ब्राह्मण होता है? ब्राह्मण बनाने वाले धर्म कौनसे हैं?"
उदान १.५, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
अर्थात भगवान बुद्ध भी यही मानते थे कि कोई भी व्यक्ति कर्म से ब्राह्मण होता है ।
नवबौद्धों से यही निवेदन है कि भगवान बुद्ध के वास्तविक चरित्र को जाने जो त्रिपिटक में है ।
A lot of thanks to Fu Ji Yun ( a real Buddhist ) for this reference.
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ब्राह्मणों को नवबौद्ध एक बहुत ही गलत ढंग से पेश करते हैं । परंतु भगवान बुद्ध ने त्रिपिटक में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है ।
ब्राह्मण सुत्त , उदान
ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान्श्रावस्ती में के जेतवनाराम में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान् सारिपुत्र, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन, आयुष्मान् महाकाश्यप, आयुष्मान् महाकात्यायन, आयुष्मान् महाकोट्ठित, आयुष्मान् महाकप्पिन, आयुष्मान् महाचुन्द, आयुष्मन् अनुरुद्ध, आयुष्मान् रेवत, और आयुष्मान् नन्द, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये।
भगवान् ने उन आयुष्मानों को दूर ही से आते देखा, देखकर, भिक्षुओं को आमन्त्रित किया - "भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं; भिक्षुओं! ये ब्राह्मण आ रहे हैं।"
ऐसा कहने पर किसी ब्राह्मण जाति के भिक्षु ने भगवान् से पूछा- "भन्ते, किन बातों के होने से कोई ब्राह्मण होता है? ब्राह्मण बनाने वाले धर्म कौनसे हैं?"
इसे जानकर, उस समय भगवान् ने इस उदान को उदाना
“बाहित्वा पापके धम्मे, ये चरन्ति सदा सता।
खीणसंयोजना बुद्धा, ते वे लोकस्मि ब्राह्मणा”ति॥
"पाप-धर्मों को बाहर कर जो सदा स्मृतिमान् रहते हैं, सभी संयोजनों के क्षीण हो जाने से जो बुद्ध हो गए हैं, लोक में वही ब्राह्मण कहे जाते हैं।"
उदान १.५, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
अर्थात भगवान बुद्ध भी यही मानते थे कि कोई भी व्यक्ति कर्म से ब्राह्मण होता है ।
नवबौद्धों से यही निवेदन है कि भगवान बुद्ध के वास्तविक चरित्र को जाने जो त्रिपिटक में है ।
A lot of thanks to Fu Ji Yun ( a real Buddhist ) for this reference.
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❤4
मेरा यशु यशु भाग 5
क्या दस्यु शब्द का अर्थ गुलाम/slave है ??
दस्यु या दास शब्द की धातु दस् होती है जिसका अर्थ कष्ट पहुंचाना या विनाश करना होता है ।
मूर्खता की हद तो तब हो जाती है जब ये व्यक्ति स्वयं महर्षि दयानंद सरस्वती जी के भाष्य का उदाहरण देते हुए वेदों में ग़ुलामी प्रथा को सिद्ध करने की कोशिश करता है , और अतिआत्मविश्वास में आकर पूरा भाष्य पढ़े बिना ही किसी भी संस्कृत शब्दकोश से दस्यु का अर्थ गुलाम सिद्ध कर सकने की चेष्टा करता है ।
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क्या दस्यु शब्द का अर्थ गुलाम/slave है ??
दस्यु या दास शब्द की धातु दस् होती है जिसका अर्थ कष्ट पहुंचाना या विनाश करना होता है ।
आप्टे और मोनियर विलियम्स दोनों ने ही लौकिक संस्कृत में दस्यु का अर्थ दुष्ट , मानवता के शत्रु अत्याचारी का अर्थ ग्रहण किया है ।
वैदिक संस्कृत में भाष्याकार सायणाचार्य तथा वेंकट ने इसका अर्थ कपटी धूर्त शत्रु लिया है ।
स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भी इसके भाष्य में दस्यु का अर्थ दुष्ट स्वभाव के मनुष्य से ग्रहण किया है ।
मूर्खता की हद तो तब हो जाती है जब ये व्यक्ति स्वयं महर्षि दयानंद सरस्वती जी के भाष्य का उदाहरण देते हुए वेदों में ग़ुलामी प्रथा को सिद्ध करने की कोशिश करता है , और अतिआत्मविश्वास में आकर पूरा भाष्य पढ़े बिना ही किसी भी संस्कृत शब्दकोश से दस्यु का अर्थ गुलाम सिद्ध कर सकने की चेष्टा करता है ।
परंतु जिनके यहां खुद गुलाम खरीदने की प्रथा हो ( Leviticus 25. 44 - 46 ) , स्वयं अपनी पुत्री को गुलाम बनाने की बात हो ( Exodus 21.7 -8 )
वो लोग सनातन धर्म पर उंगली उठाते अच्छे नहीं लगते ।
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🔥6😁2👍1
1st Century BCE evidence of Mahabharata's Lineage !!!
Interestingly Yauddheyas are said to be the Heirs of the Son of Yudhisthira from Mahabharata , whose name was Yodheya ( Mahabharat Sabha parva , Adhyaya 95 , shlok 46 )
Reference : Jharni certified Alexander Cunningham's 🤓☝️ Book : Coins of Ancient India.
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A Karshpana Coin ( Punch marked or Purana ) from Taxila , Shows a warrior from a clan , whom Alexander Cunningham told as warriors Yauddheyas.
Interestingly Yauddheyas are said to be the Heirs of the Son of Yudhisthira from Mahabharata , whose name was Yodheya ( Mahabharat Sabha parva , Adhyaya 95 , shlok 46 )
Reference : Jharni certified Alexander Cunningham's 🤓☝️ Book : Coins of Ancient India.
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देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र भाग 4
वेद और ब्राह्मण ग्रंथ से इंद्रदेव की संक्षिप्त महिमा
परमात्मा का एक नाम इंद्र भी है और इंद्र एक देवपद भी है । उत्तम गुणों का आश्रय लेने वाले लोग इस पद को प्राप्त करते हैं और ब्रह्मचर्य इस पद को प्राप्त करने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम बताया जाता है ।
ऐसे परम ब्रह्मचारी इंद्रदेव को मेरा प्रणाम । 🙏
ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ।।
- ऋग्वेद 9/63/5.
वेद और ब्राह्मण ग्रंथ से इंद्रदेव की संक्षिप्त महिमा
परमात्मा का एक नाम इंद्र भी है और इंद्र एक देवपद भी है । उत्तम गुणों का आश्रय लेने वाले लोग इस पद को प्राप्त करते हैं और ब्रह्मचर्य इस पद को प्राप्त करने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम बताया जाता है ।
अथर्ववेद ११.७.१६ के अनुसार ब्रह्मचारी व्यक्ति ही इंद्र पद पर प्रतिष्ठित होकर प्रजापति तथा विराट् को वश में करने वाला होता है ।
अथर्ववेद ११.७.१९ ब्रह्मचर्य रूप तप का पालन कर देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की तथा इसी ब्रह्मचर्य के कारण देवराज इंद्र समस्त देवताओं को सुख/स्वर्ग/तेज पहुंचाने में समर्थ हुए ।
ऐतरेय ब्राह्मण ७.१६ के अनुसार इंद्र समस्त देवों में सबसे पराक्रमी , ओजस्वी , बलवान , सहिष्णु , सत्यवादी एवं प्रभावशाली है ।
इसी रूप में इंद्र की स्तुति यहां की गई है ।
विश्वेदेवों ने इंद्र की स्तुति में उन्हें सत्याचारिन् से संबोधित किया अर्थात् इंद्रदेव सदैव सत्य का आचरण करते थे ।
ऐसे परम ब्रह्मचारी इंद्रदेव को मेरा प्रणाम । 🙏
ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ।।
- ऋग्वेद 9/63/5.
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