प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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क्या श्रीकृष्ण हमेशा कर्ण की तारीफ करते थे ?

अक्सर आपने टीवी सीरियल्स में तथा कर्ण भक्तों के मुख से यह जरूर सुना होगा श्रीकृष्ण तो बस कर्ण की ही तारीफ करते थे और कारण बड़ा शूरवीर था । आईए इसका सच महाभारत से जानते हैं ।

महाभारत के कर्णपर्व के कर्णवधपर्व अध्याय ५० में श्रीकृष्ण कहते हैं कि दुर्योधन के सारे पापों की जड़ कर्ण ही है । द्रौपदी को अपमानित करने के पीछे भी उसी का हाथ था ।

अध्याय ५१ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अभिमन्यु ने कर्ण को बहुत बुरी तरीके से परास्त किया था । और तो और भगवान श्रीकृष्ण अपने कर्ण को युद्ध से भाग जाने में उत्साह रखने वाला भी बताया 😂 ।
श्लोक ४२ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्ण अभिमन्यु से द्वेष रखता था तथा अभिमन्यु के सामने खड़े होने की शक्ति भी कर्ण में नहीं थी । अभिमन्यु द्वारा घायल किए जाने पर कर्ण युद्ध विमुख हो जाता है
।



ये है महाभारत का कर्ण ; छल-कपट , कायरता और द्वेष की मूर्ति । इतिहास से सीखें टीवी सीरियल्स से नहीं ।

कृष्णं वंदे जगतगुरुं 🙏
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देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र : भाग 1

क्या इन्द्रदेव कामी एवं बलात्कारी थे ?

अक्सर इंद्रदेव के ऊपर या प्रश्न उठाया जाता है कि वह कामी थे जो सदैव भोग विलास आदि में डूबे रहते थे । आइए देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र जानते हैं ।

छान्दोग्य उपनिषद् ८.११.३ के अनुसार इंद्रदेव ने प्रजापति से आत्मतत्व‌ तथा उसके स्वरूप की शिक्षा ग्रहण करने हेतु १०१ वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन किया था ।

एक ब्रह्मचारी को विकारों से मुक्त होना चाहिए जिनमें काम तथा वासनाएं भी शामिल हैं । और इतने वर्षों तक ब्रह्मचर्य धारण कर आत्मस्वरुप की जिज्ञासा रखने वाले देवराज आखिर क्यों कामवासना का शिकार होंगे ? चरक संहिता सूत्रस्थान १.४ व १.२३ में देवराज को आयुर्वेद का एक प्रमुख प्रवर्तक बताया गया है । तो क्या देवराज यह भी नहीं जानते थे कि काम क्रोध इत्यादि मानसिक दोष कहे गए हैं ? ( अष्टांगहृदय सूत्रस्थान आयुष्कामीअध्याय सूत्र २१ )



अतः सिद्ध होता है कि देवराज इंद्र अखंड ब्रह्मचारी तथा आत्मतत्व के जिज्ञासु थे जिनमें राग द्वेष काम क्रोध इत्यादि विकार नहीं थे ।

अगले भाग में हम आयुर्वेदाचार्य देवराज इंद्र की चर्चा करेंगें ।

सः जनासः इंद्रः 🙏🙏
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Mera Yesu Yesu : Part 4

Deuteronomy 13.6 - 11 ( New king James Version Bible - One of the most authentic )

If your Own brother , son , daughter , Wife or your Best friend asks you to Worship Other Gods , Show them no Mercy. Don't defend them or spare them. You must kill them.
Stone them to death because they tried to take away you from your God.
Set an example such that No one in Israel tries to do the same thing after inspecting or hearing this.


Deuteronomy 13.12 - 18

If anyone in the Town is caught promoting the worship of another god , and after finding if this is true Burn all plunder on middle of Public square and set the whole town to fire. That town should always remain a ruin , never never should be rebuilt again.

Verse 18 says :
You must follow God's command and do only whatever is right in his Eyes.


And they allege us on Sanatana Dharma !!
What a shame 😰
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देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र : भाग 2

क्या देवराज इंद्र ने अहिल्या का बलात्कार किया था ?

आइए इस कथा का वास्तविक स्वरूप जानते हैं।

१. शतपथ ब्राह्मण ३.३.४.१८ के अनुसार इंद्र का एक नाम अहिल्याजार भी है ।

२. निरुक्त ३.१६ अनुसार जार सूर्य का पर्यायवाची है क्योंकि वह अहिल्या ( अहानि लियते ) अर्थात रात्रि को जीर्ण करता है ।

३. महर्षि पाणिनीकृत उणादिकोष २.२९ के अनुसार इंद्र सूर्य का नाम है ।

४. निरुक्त १२.९ के अनुसार इंद्र आदित्य अर्थात् सूर्य का नाम है ।

५. प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिल भट्ट अपने ग्रंथ तंत्रवार्तिक ( प्रथमाध्याय तृतीयपाद चतुर्थ अधिकरण , अंग्रेजी अनुवाद पृष्ठ १८९ ) में लिखते हैं की इंद्र अर्थात सूर्य के प्रकाश के कारण अहिल्या अर्थात् रात्रि का अंधकार दूर हो जाता है अतः यहां किसी स्त्री के साथ देवराज इंद्र का संसर्ग इत्यादि भाव देखना प्रकरण विरुद्ध तथा असिद्धांतिक होगा ।



अतः सिद्ध होता है कि ब्राह्मण ग्रंथों , निरुक्तादि में वर्णित अर्थों को न समझकर मूर्खों ने इसका अर्थ इंद्र अहिल्या संसर्ग इत्यादि कपोल कल्पित अवधारणाएं बनाकर फैला दी ।

सौजन्य से : @Indra_hi_Paramatma_hai
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देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र : भाग 3

आयुर्वेद प्रवर्तक देवराज इन्द्र

जैसा मैंने पहले बताया देवराज इंद्र ने आत्मा का स्वरूप जानने हेतु 101 वर्ष का ब्रह्मचर्य ग्रहण किया था ; आइए देखते हैं यह संभव कैसे था ।

चरक संहिता सूत्रस्थान १.४ के अनुसार इंद्रदेव ने समग्र रूप से अश्विनीकुमारो द्वारा आयुर्वेद पढ़ा । तदनंतर उन्होंने पृथ्वी पर हो रही भयंकर व्याधियों के समाधान हेतु लक्षण , रोग हेतुज्ञान , औषध ज्ञान , त्रिसूत्र सहित संपूर्ण आयुर्वेद ऋषि भरद्वाज को प्रदान किया जिन्होंने अपने शिष्य आत्रेय पुनर्वसु तथा अन्य ऋषियों को इसका ज्ञान प्रदान किया ।


अष्टांगहृदय सूत्रस्थान के सूत्र ३ के अनुसार इंद्र ने आत्रेय पुनर्वसु को भी आयुर्वेद की शिक्षा दी थी जो गुरु शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ती‌ गई ।

अष्टांगहृदय अध्याय २ के सूत्र २९ के अनुसार इंद्रिय निग्रह करना अत्यंत आवश्यक होता है । हमें इन्द्रियों को इस भाव से संचालित करना चाहिए कि न तो इनका क्षय हो और न ही इनमें लिप्त होना चाहिए ।


अतः स्पष्ट है कि देवराज की इतनी लंबी आयु के पीछे उनका आयुर्विज्ञान था । वे आयुर्वेद के महान विशेषज्ञ थे ।

क्रमशः ....
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