क्या बुद्ध के समय यज्ञ नहीं हुआ करते थे ?
सुत्तपीटक , खुद्दनिकाय , सुत्तनिपात , महावग्ग के माघसुत्त के अनुसार माघ नामक दानी व्यक्ति बुद्ध से पूछता है कि यज्ञ , दान , इत्यादि कार्य में व्यय किए हुए कर्म तथा धन सफल कैसे होते हैं ?
यहां बुद्ध तुलनात्मक भाव में भी यज्ञ की प्रशंसा कर रहे हैं ।
अतः सिद्ध होता है कि बुद्ध के समय यज्ञ बहुत हुआ करते थे तथा बुद्ध भी उन अध्वर यज्ञों की प्रशंसा किया करते थे जैसा इस प्रकरण से स्पष्ट है।
सुत्तपीटक , खुद्दनिकाय , सुत्तनिपात , महावग्ग के माघसुत्त के अनुसार माघ नामक दानी व्यक्ति बुद्ध से पूछता है कि यज्ञ , दान , इत्यादि कार्य में व्यय किए हुए कर्म तथा धन सफल कैसे होते हैं ?
बुद्ध कहते हैं कि यज्ञ , दान इत्यादि करने वाला तथा परोपकारी व्यक्ति अपने जीवन में आत्मविश्वास , समृद्धि और चराचर में सबके लिए प्रेम को प्राप्त होता है । यज्ञभूमि या यज्ञस्थल वह जगह है जहां यजमान अपने सभी दोषों का शमन कर काम क्रोध मद आदि विकारों से मुक्त हो जाता है तथा सृष्टि में प्रेम का प्रचार करता है ।
तदनंतर इस प्रकार के आचरण से वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है । दीघनिकाय ५.१४ मैं इसके ऊपर टीका करते हुए बुद्ध कहते हैं कि अगर वह बुद्ध , धम्म तथा संघ की शरण में जाकर ज्ञान की प्राप्ति करे तो भी वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है क्योंकि यह भी उसके लिए यज्ञ के समान पवित्र होते हैं ।
यहां बुद्ध तुलनात्मक भाव में भी यज्ञ की प्रशंसा कर रहे हैं ।
अतः सिद्ध होता है कि बुद्ध के समय यज्ञ बहुत हुआ करते थे तथा बुद्ध भी उन अध्वर यज्ञों की प्रशंसा किया करते थे जैसा इस प्रकरण से स्पष्ट है।
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कर्म जनित वर्ण व्यवस्था का पतन कब शुरू हुआ ?
भारत युद्ध के कुछ समय पूर्व से ही हमें वैदिक संस्कृति के मूल सिद्धातों में हेराफेरी होने अर्थात् स्वार्थी धूर्तों द्वारा प्रचारित यज्ञादि में मांसाहार , बलि इत्यादि देखने को मिलती हैं जिनका महाभारत में बहुत ज्यादा खंडन है तथा वेद विरुद्ध होने से ऋषियों ने उन्हें निंदनीय कहा है।
यहां हम लोग देख सकते हैं कि वर्ण व्यवस्था कहीं न कहीं जन्म पर भी आश्रित बताई जा रही है जो वैदिक सिद्धांतों के अनुसार उचित नहीं है।
वर्ण व्यवस्था कर्म से होती थी और कर्म से ही होगी।
त्रुटियों को क्षमा कीजिएगा 🙏
भारत युद्ध के कुछ समय पूर्व से ही हमें वैदिक संस्कृति के मूल सिद्धातों में हेराफेरी होने अर्थात् स्वार्थी धूर्तों द्वारा प्रचारित यज्ञादि में मांसाहार , बलि इत्यादि देखने को मिलती हैं जिनका महाभारत में बहुत ज्यादा खंडन है तथा वेद विरुद्ध होने से ऋषियों ने उन्हें निंदनीय कहा है।
उसी प्रकार कर्मणा वर्ण व्यवस्था का मुख्य रूप से ह्वास उत्तर वैदिक काल के पश्चात हो रहा था जिसका प्रमाण हमें त्रिपिटक के अंगुत्तर निकाय , ब्राह्मणवग्ग के तिकण्णसुत्त में देखने को मिलता है।
बुद्ध ने तिकण्ण से पूछा कि ब्राह्मणों के अनुसार वेदपाठी ब्राह्मण की पहचान क्या होती है ?
प्रत्युत्तर में तिकण्ण ने कहा कि जिस ब्राह्मण का जन्म सात पीढ़ी से ब्राह्मण रहे माता-पिता के गर्भ से हो , तदोपरांत संस्कार, वेद षड्वेदांग , मंत्र आदि में पारंगत होने के बाद वह वेदपाठी ब्राह्मण कहा जाता है ।
यहां हम लोग देख सकते हैं कि वर्ण व्यवस्था कहीं न कहीं जन्म पर भी आश्रित बताई जा रही है जो वैदिक सिद्धांतों के अनुसार उचित नहीं है।
वर्ण व्यवस्था कर्म से होती थी और कर्म से ही होगी।
त्रुटियों को क्षमा कीजिएगा 🙏
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An inscription from the reign of Kushana king 'Vasishka' mentions the Brahmins of Bharadwaja Gotra who were experts of the Chhandogya section of 'Samaveda'
And they performed a Yajna of 12 Nights in the summer of the 24th year of Vasishka's reign
सत्रेण द्वादशरात्रेण
© chaitanya
See not just Vedas and Shakhas , but Upanishads were also flourishing in the reign of Kushana as we can see the Upanishads in Spitzer Manuscript too.
And they performed a Yajna of 12 Nights in the summer of the 24th year of Vasishka's reign
सत्रेण द्वादशरात्रेण
© chaitanya
See not just Vedas and Shakhas , but Upanishads were also flourishing in the reign of Kushana as we can see the Upanishads in Spitzer Manuscript too.
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यह अभिलेख 2000 साल पुराना है और इसमें वेद की छांदोग शाखा के द्वारा यज्ञ करने का उल्लेख है|
Credit to @manuvadii
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
यह अभिलेख 2000 साल पुराना है और इसमें वेद की छांदोग शाखा के द्वारा यज्ञ करने का उल्लेख है| Credit to @manuvadii
iske pahle jo mene inscription di thi na , kushana pperiod chhandogya ki
uska Museum me description ye raha jo iska primary source bhi hai
uska Museum me description ye raha jo iska primary source bhi hai
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The Bower's Manuscript Chapter 6
Now let's see Part 5 Plate 53 Leaf 1 Obverse
Line 1 : नमस्यामिलोकनाथंजनार्दनः येनसत्यदृष्टदिव्य
Line 2 & 3 : सुखं दुखंजीवितंमरणंतथाइहसर्वे मनुष्याणांमरुद्भिसमुदीरितम् ऋषभनि मेरूवासंप्रयोजिता इमाविद्यांततःस्तेषांहृष्टावैमारुतादवः
Possibly pointing toward Vedas because
1. Vedas are called Apaurusheya because they aren't "created" by Men , God is called here as Janardana , from whom Hymns of Divinity have been emerged.
2. Veda Mantra has Drusta Rishi who works on them.
3. Those who worship Ishwar with Vedic hymn , He is blessed by the Ishvar.
4. Deva are said to be live on Meru.
Next part soon 🙏
Now let's see Part 5 Plate 53 Leaf 1 Obverse
Line 1 : नमस्यामिलोकनाथंजनार्दनः येनसत्यदृष्टदिव्य
I bow to Lord Janardana (Vishnu) who is the lord of whole world and From where the Great hymns of Divine have emerged.
Line 2 & 3 : सुखं दुखंजीवितंमरणंतथाइहसर्वे मनुष्याणांमरुद्भिसमुदीरितम् ऋषभनि मेरूवासंप्रयोजिता इमाविद्यांततःस्तेषांहृष्टावैमारुतादवः
In short , All that can happens to men is in the Art of Divinity , Declared by Maruts , composed by Rishis and fit to be used by all those who reside on Mount Meru (i.e. Devas). Those who use it , Maruts and Other (Devas) bless him and are favourable to him.
Possibly pointing toward Vedas because
1. Vedas are called Apaurusheya because they aren't "created" by Men , God is called here as Janardana , from whom Hymns of Divinity have been emerged.
2. Veda Mantra has Drusta Rishi who works on them.
3. Those who worship Ishwar with Vedic hymn , He is blessed by the Ishvar.
4. Deva are said to be live on Meru.
Next part soon 🙏
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क्या श्रीकृष्ण हमेशा कर्ण की तारीफ करते थे ?
अक्सर आपने टीवी सीरियल्स में तथा कर्ण भक्तों के मुख से यह जरूर सुना होगा श्रीकृष्ण तो बस कर्ण की ही तारीफ करते थे और कारण बड़ा शूरवीर था । आईए इसका सच महाभारत से जानते हैं ।
ये है महाभारत का कर्ण ; छल-कपट , कायरता और द्वेष की मूर्ति । इतिहास से सीखें टीवी सीरियल्स से नहीं ।
कृष्णं वंदे जगतगुरुं 🙏
अक्सर आपने टीवी सीरियल्स में तथा कर्ण भक्तों के मुख से यह जरूर सुना होगा श्रीकृष्ण तो बस कर्ण की ही तारीफ करते थे और कारण बड़ा शूरवीर था । आईए इसका सच महाभारत से जानते हैं ।
महाभारत के कर्णपर्व के कर्णवधपर्व अध्याय ५० में श्रीकृष्ण कहते हैं कि दुर्योधन के सारे पापों की जड़ कर्ण ही है । द्रौपदी को अपमानित करने के पीछे भी उसी का हाथ था ।
अध्याय ५१ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अभिमन्यु ने कर्ण को बहुत बुरी तरीके से परास्त किया था । और तो और भगवान श्रीकृष्ण अपने कर्ण को युद्ध से भाग जाने में उत्साह रखने वाला भी बताया 😂 ।
श्लोक ४२ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्ण अभिमन्यु से द्वेष रखता था तथा अभिमन्यु के सामने खड़े होने की शक्ति भी कर्ण में नहीं थी । अभिमन्यु द्वारा घायल किए जाने पर कर्ण युद्ध विमुख हो जाता है।
ये है महाभारत का कर्ण ; छल-कपट , कायरता और द्वेष की मूर्ति । इतिहास से सीखें टीवी सीरियल्स से नहीं ।
कृष्णं वंदे जगतगुरुं 🙏
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देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र : भाग 1
क्या इन्द्रदेव कामी एवं बलात्कारी थे ?
अक्सर इंद्रदेव के ऊपर या प्रश्न उठाया जाता है कि वह कामी थे जो सदैव भोग विलास आदि में डूबे रहते थे । आइए देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र जानते हैं ।
अतः सिद्ध होता है कि देवराज इंद्र अखंड ब्रह्मचारी तथा आत्मतत्व के जिज्ञासु थे जिनमें राग द्वेष काम क्रोध इत्यादि विकार नहीं थे ।
अगले भाग में हम आयुर्वेदाचार्य देवराज इंद्र की चर्चा करेंगें ।
सः जनासः इंद्रः 🙏🙏
क्या इन्द्रदेव कामी एवं बलात्कारी थे ?
अक्सर इंद्रदेव के ऊपर या प्रश्न उठाया जाता है कि वह कामी थे जो सदैव भोग विलास आदि में डूबे रहते थे । आइए देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र जानते हैं ।
छान्दोग्य उपनिषद् ८.११.३ के अनुसार इंद्रदेव ने प्रजापति से आत्मतत्व तथा उसके स्वरूप की शिक्षा ग्रहण करने हेतु १०१ वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन किया था ।
एक ब्रह्मचारी को विकारों से मुक्त होना चाहिए जिनमें काम तथा वासनाएं भी शामिल हैं । और इतने वर्षों तक ब्रह्मचर्य धारण कर आत्मस्वरुप की जिज्ञासा रखने वाले देवराज आखिर क्यों कामवासना का शिकार होंगे ? चरक संहिता सूत्रस्थान १.४ व १.२३ में देवराज को आयुर्वेद का एक प्रमुख प्रवर्तक बताया गया है । तो क्या देवराज यह भी नहीं जानते थे कि काम क्रोध इत्यादि मानसिक दोष कहे गए हैं ? ( अष्टांगहृदय सूत्रस्थान आयुष्कामीअध्याय सूत्र २१ )
अतः सिद्ध होता है कि देवराज इंद्र अखंड ब्रह्मचारी तथा आत्मतत्व के जिज्ञासु थे जिनमें राग द्वेष काम क्रोध इत्यादि विकार नहीं थे ।
अगले भाग में हम आयुर्वेदाचार्य देवराज इंद्र की चर्चा करेंगें ।
सः जनासः इंद्रः 🙏🙏
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