प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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नवबौद्धों के नीले ख़्वाब पार्ट 3

अक्सर आपने साइंस हगनी को केसमुत्तीसुत्त के कलामसुत्त को दिखाकर बौद्ध धर्मग्रंथों को अप्रमाणिक बताते हुए देखा होगा ।

पर शायद यह मूर्ख इस सुत्त को पूरा पढ़ना भूल गया । बुद्ध ने तो यहां पर तर्क पर भी भरोसा करने से मना किया है और यह बात उन्होंने एक बार नहीं अपितु पूरे सुत्त में चार बार कही है :
1. ४.१
2. २५.३
3. २६.१
4. ४१.३


मेरा एक प्रश्न है कि जब बुद्ध ने ग्रंथों एवं पुस्तकों पर विश्वास करने से मना कर दिया है तो खुद त्रिपिटक को झूठ साबित करने के लिए उसी त्रिपिटक के अंगुत्तर निकाय के केसामुत्तिसुत्त कलामसुत्त पर यकीन कैसे कर रहे हो ??

शायद कलामसुत्त पर यकीन रखने के कारण ही आज नवबौद्ध तर्क पर बात नहीं करते । 😁😁
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Ayodhya Mahaprasad ❤️❤️🙏🙏

Jai shree Ram
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यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: |
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम 78

जहाँ योगश्वर श्रीकृष्ण और श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन हैं वहाँ निश्चित रूप से अनन्त ऐश्वर्य, विजय, समृद्धि और नीति होती है, ऐसा मेरा निश्चित मत है।

Karna bhakts can cry in comments
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Cry harder mujeets 😂😂
tumhari babri jinda nahi mar gayi kab ki
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Padma puran shristi khand Adhyaya 36 😂

Baman to katai Heatblast ban Gaya re baba 😂😂
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Gupta period representation of Gajendra Moksha..
Look how beautifully that Naga is carved !!!

From Deoghar fort , Varaha temple
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क्या बुद्ध के समय यज्ञ नहीं हुआ करते थे ?

सुत्तपीटक , खुद्दनिकाय , सुत्तनिपात , महावग्ग के माघसुत्त के अनुसार माघ नामक दानी व्यक्ति बुद्ध से पूछता है कि यज्ञ , दान , इत्यादि कार्य में व्यय किए हुए कर्म तथा धन सफल कैसे होते हैं ?

बुद्ध कहते हैं कि यज्ञ , दान इत्यादि करने वाला तथा परोपकारी व्यक्ति अपने जीवन में आत्मविश्वास , समृद्धि और चराचर में सबके लिए प्रेम को प्राप्त होता है । यज्ञभूमि या यज्ञस्थल वह जगह है जहां यजमान अपने सभी दोषों का शमन कर काम क्रोध मद आदि विकारों से मुक्त हो जाता है तथा सृष्टि में प्रेम का प्रचार करता है ।

तदनंतर इस प्रकार के आचरण से वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है । दीघनिकाय ५.१४ मैं इसके ऊपर टीका करते हुए बुद्ध कहते हैं कि अगर‌‌ वह बुद्ध , धम्म तथा संघ की शरण में जाकर ज्ञान की प्राप्ति करे तो भी वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है क्योंकि यह भी उसके लिए यज्ञ के समान पवित्र होते हैं ।


यहां बुद्ध तुलनात्मक भाव में भी यज्ञ की प्रशंसा कर रहे हैं ।
अतः सिद्ध होता है कि बुद्ध के समय यज्ञ बहुत हुआ करते थे तथा बुद्ध भी उन अध्वर यज्ञों की प्रशंसा किया करते थे जैसा इस प्रकरण से स्पष्ट है।
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कर्म जनित वर्ण व्यवस्था का पतन कब शुरू हुआ ?

भारत युद्ध के कुछ समय पूर्व से ही हमें वैदिक संस्कृति के मूल सिद्धातों में हेराफेरी होने अर्थात् स्वार्थी धूर्तों द्वारा प्रचारित यज्ञादि में मांसाहार , बलि इत्यादि देखने को मिलती हैं जिनका महाभारत में बहुत ज्यादा खंडन है तथा वेद विरुद्ध होने से ऋषियों ने उन्हें निंदनीय कहा है।

उसी प्रकार कर्मणा वर्ण व्यवस्था का मुख्य रूप से ह्वास उत्तर वैदिक काल के पश्चात हो रहा था जिसका प्रमाण हमें त्रिपिटक के अंगुत्तर निकाय , ब्राह्मणवग्ग के तिकण्णसुत्त में देखने को मिलता है।
बुद्ध ने तिकण्ण से पूछा कि ब्राह्मणों के अनुसार वेदपाठी ब्राह्मण की पहचान क्या होती है ?
प्रत्युत्तर में तिकण्ण ने कहा कि जिस ब्राह्मण का जन्म सात पीढ़ी से ब्राह्मण रहे माता-पिता के गर्भ से हो , तदोपरांत संस्कार, वेद षड्वेदांग , मंत्र आदि में पारंगत होने के बाद वह वेदपाठी ब्राह्मण कहा जाता है ।


यहां हम लोग देख सकते हैं कि वर्ण व्यवस्था कहीं न कहीं जन्म पर भी आश्रित बताई जा रही है जो वैदिक सिद्धांतों के अनुसार उचित नहीं है।

वर्ण व्यवस्था कर्म से होती थी और कर्म से ही होगी।

त्रुटियों को क्षमा कीजिएगा 🙏
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An inscription from the reign of Kushana king 'Vasishka' mentions the Brahmins of Bharadwaja Gotra who were experts of the Chhandogya section of 'Samaveda'

And they performed a Yajna of 12 Nights in the summer of the 24th year of Vasishka's reign

सत्रेण द्वादशरात्रेण

© chaitanya


See not just Vedas and Shakhas , but Upanishads were also flourishing in the reign of Kushana as we can see the Upanishads in Spitzer Manuscript too.
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यह अभिलेख 2000 साल पुराना है और इसमें वेद की छांदोग शाखा के द्वारा यज्ञ करने का उल्लेख है|

Credit to @manuvadii
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