22nd January ko Babri Masjid and Ram Mandir k upar ek post aayegi
Bahut important hai dekhna jarur ❤️❤️
Jai Siya Ram 🙏🚩
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नवबौद्धों के नीले ख़्वाब पार्ट 1
महान नवबौद्ध साइंस झर्नी ने अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करते हुए आप्टे संस्कृत हिंदी शब्दकोश में देवानांप्रिय शब्द के अर्थ को केवल मलिन बताकर संस्कृत भाषा को पुनः चुनौती दी है । आईए अब इनकी भी समीक्षा कर लेते हैं ।
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वैसे झरनी जी किस देवानांप्रिय राजा के ऊपर आने वाले शब्द से भड़क गए ?? 😁😁
क्योंकि देवानांप्रिय शब्द से खुद को संबोधित करने वाले अनेकों राजा हुए हैं ।
मेगास्थनीज की इंडिका पर भी इन्होंने काफी झूठ बोले हैं तो उनकी पोल भी बहुत जल्दी ही खोलेंगे ।
महान नवबौद्ध साइंस झर्नी ने अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करते हुए आप्टे संस्कृत हिंदी शब्दकोश में देवानांप्रिय शब्द के अर्थ को केवल मलिन बताकर संस्कृत भाषा को पुनः चुनौती दी है । आईए अब इनकी भी समीक्षा कर लेते हैं ।
देवानांप्रिय शब्द का अर्थ होता है देवताओं का प्रिय
यहां आप्टे जी ने भी देव में प्रिय जोड़ने से बनने वाले शब्द को देवों का प्रिय या भगवान शिव का विशेषण माना है जैसा आप रेखांकित पद में देख सकते हैं ।
फिर उन्होंने उसे शब्द का समास करते हुए उसे देवानांप्रिय बताया है तथा पुनः उसके अन्य अर्थो की विवेचना की है ।
यहां तक कि झर्नी की हार्ड कॉपी मैं भी वही अर्थ आया है पर शायद पढ़ना भूल गए होंगे या फिर जानबूझकर नहीं पड़ा । 🌚
झर्नी जी को यह समझना चाहिए कि संस्कृत में तो क्या हिंदी में भी एक शब्द के अनेकों अर्थ होते हैं
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वैसे झरनी जी किस देवानांप्रिय राजा के ऊपर आने वाले शब्द से भड़क गए ?? 😁😁
क्योंकि देवानांप्रिय शब्द से खुद को संबोधित करने वाले अनेकों राजा हुए हैं ।
मेगास्थनीज की इंडिका पर भी इन्होंने काफी झूठ बोले हैं तो उनकी पोल भी बहुत जल्दी ही खोलेंगे ।
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नवबौद्धों के नीले ख़्वाब पार्ट 2
झर्नी जी ने मेगास्थनीज की इंडिका में आए ब्राच्छमन को बौद्ध बताकर पुनः अपनी मूर्खता दिखा दी। आईए इनका प्रमाण सहित खंडन करते हैं।
शायद उन्होंने अपनी ही फोटो को ध्यान से नहीं देखा। वहां पर साफ लिखा है कि
यहां तक कि translator JC Mccrindle ने भी इन्हें वेदांती व वैदिक बताया है जैसा आप देख सकते हैं । वे शब्द ब्रह्म ॐ की उपासना किया करते थे।
आईए अब वेदांत दर्शन से तथा गायत्री मंत्र के विभिन्न भाष्यों से क्रमशः हम जीव तथा शरीर के संबंध और ईश्वर के प्रकाशमय रूप की विवेचना करते हैं।
अतः यहां से सिद्ध होता है कि वे सनातनी थे।
झर्नी जी ने मेगास्थनीज की इंडिका में आए ब्राच्छमन को बौद्ध बताकर पुनः अपनी मूर्खता दिखा दी। आईए इनका प्रमाण सहित खंडन करते हैं।
शायद उन्होंने अपनी ही फोटो को ध्यान से नहीं देखा। वहां पर साफ लिखा है कि
ब्राच्छमन
1. ईश्वर में विश्वास रखते थे।
2. शरीर को मात्र जीवात्मा का निवासस्थान मानते थे।
3. ईश्वर को प्रकाश और शब्द रूप में देखते थे।
4. ईश्वर की उपासना विविध प्रकार के छंदों से युक्त मंत्रों द्वारा करते थे।
5. वे साकार ईश्वर तथा अवतार में भी विश्वास रखते थे।
यहां तक कि translator JC Mccrindle ने भी इन्हें वेदांती व वैदिक बताया है जैसा आप देख सकते हैं । वे शब्द ब्रह्म ॐ की उपासना किया करते थे।
आईए अब वेदांत दर्शन से तथा गायत्री मंत्र के विभिन्न भाष्यों से क्रमशः हम जीव तथा शरीर के संबंध और ईश्वर के प्रकाशमय रूप की विवेचना करते हैं।
ऋग्वेद ३.६२.१० के भाष्य में वेंकट सायण तथा दयानंद सरस्वती जी ने ईश्वर को प्रकाशमय बताया है।
वहीं वेदांत दर्शन ब्रह्मसूत्र २.४.१६-१७ एवं ३.१.१ में जीव को नित्य तथा शरीर को उसका निवासस्थान बताया गया है।
अतः यहां से सिद्ध होता है कि वे सनातनी थे।
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
नवबौद्धों के नीले ख़्वाब पार्ट 2 झर्नी जी ने मेगास्थनीज की इंडिका में आए ब्राच्छमन को बौद्ध बताकर पुनः अपनी मूर्खता दिखा दी। आईए इनका प्रमाण सहित खंडन करते हैं। शायद उन्होंने अपनी ही फोटो को ध्यान से नहीं देखा। वहां पर साफ लिखा है कि ब्राच्छमन 1. ईश्वर में…
अब झर्नी जी से मेरा यही सवाल है कि ईश्वर , उसे शब्द तथा प्रकाश रूप में देखना , विविध प्रकार के मंत्र तथा छंदो द्वारा उसकी स्तुति , साकारवाद तथा अवतारवाद इत्यादि विचारधाराएं बौद्ध मत में कहां है ??
आप लोग तो ईश्वर में यकीन भी नहीं रखते फिर ईश्वरवादी लोगों को बौद्ध बताते हुए आपको शर्म नहीं आती ??
असल में मुझे आपकी मति पर क्रोध नहीं , तरस आता है ।
आप लोग तो ईश्वर में यकीन भी नहीं रखते फिर ईश्वरवादी लोगों को बौद्ध बताते हुए आपको शर्म नहीं आती ??
असल में मुझे आपकी मति पर क्रोध नहीं , तरस आता है ।
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