पांडा 🐼 का पोपट पार्ट 6
अक्सर अपने पौराणिकों को बलि प्रथा का समर्थन करते हुए देखा होगा । इनके अनुसार यज्ञ में पशु बलि देनी चाहिए तथा यज्ञपशु का मांस खाना चाहिए । यह कितना सत्य है आइए इसकी समीक्षा करते हैं।
यहां आप पूरी कथा पढ़ सकते हैं।
अतः स्पष्ट है कि यज्ञ में पशुबलि नहीं देनी चाहिए जो निरुक्त वेदांग १.८ से भी सिद्ध होता है।
Note : आलम्भन शब्द के अर्थ हेतु मैंने आचार्य रामानंद जी के शतपथ पथेयम का संदर्भ लिया है ।
अक्सर अपने पौराणिकों को बलि प्रथा का समर्थन करते हुए देखा होगा । इनके अनुसार यज्ञ में पशु बलि देनी चाहिए तथा यज्ञपशु का मांस खाना चाहिए । यह कितना सत्य है आइए इसकी समीक्षा करते हैं।
ऐतरेय ब्राह्मण की द्वितीय पंचिका के प्रथम अध्याय के अष्टम एवं नवम खंड के अनुसार देवों ने सर्वप्रथम मनुष्य को अपना यज्ञपशु बनाया । किंतु आलम्भन के समय मेध्य इनमें से निकल कर क्रमशः अश्व गाय भेड़ और बकरी और अंततः पृथ्वी में समाहित हो गया जो व्रीहि (धान) के रूप में पृथ्वी से बाहर आया। इन पशुओं से मेध्य निकल जाने के कारण देवों ने इनका यज्ञपशुरूप में प्रयोग बंद कर व्रीहि के पुरोडाश से यजन किया । अतः इनका मांस भी वर्जित है ।
यही कथा शतपथ ब्राह्मण १.२.३ में भी आती है ।
सायणाचार्य अपने खंड ९ के भाष्य में कहते हैं कि पुरोडाश समस्त पशुओं का सार होता है अतः पुरोडाश से ही यज्ञ करना चाहिए ।
यहां आप पूरी कथा पढ़ सकते हैं।
अतः स्पष्ट है कि यज्ञ में पशुबलि नहीं देनी चाहिए जो निरुक्त वेदांग १.८ से भी सिद्ध होता है।
Note : आलम्भन शब्द के अर्थ हेतु मैंने आचार्य रामानंद जी के शतपथ पथेयम का संदर्भ लिया है ।
😈3❤1👍1
22nd January ko Babri Masjid and Ram Mandir k upar ek post aayegi
Bahut important hai dekhna jarur ❤️❤️
Jai Siya Ram 🙏🚩
Bahut important hai dekhna jarur ❤️❤️
Jai Siya Ram 🙏🚩
नवबौद्धों के नीले ख़्वाब पार्ट 1
महान नवबौद्ध साइंस झर्नी ने अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करते हुए आप्टे संस्कृत हिंदी शब्दकोश में देवानांप्रिय शब्द के अर्थ को केवल मलिन बताकर संस्कृत भाषा को पुनः चुनौती दी है । आईए अब इनकी भी समीक्षा कर लेते हैं ।
।
वैसे झरनी जी किस देवानांप्रिय राजा के ऊपर आने वाले शब्द से भड़क गए ?? 😁😁
क्योंकि देवानांप्रिय शब्द से खुद को संबोधित करने वाले अनेकों राजा हुए हैं ।
मेगास्थनीज की इंडिका पर भी इन्होंने काफी झूठ बोले हैं तो उनकी पोल भी बहुत जल्दी ही खोलेंगे ।
महान नवबौद्ध साइंस झर्नी ने अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करते हुए आप्टे संस्कृत हिंदी शब्दकोश में देवानांप्रिय शब्द के अर्थ को केवल मलिन बताकर संस्कृत भाषा को पुनः चुनौती दी है । आईए अब इनकी भी समीक्षा कर लेते हैं ।
देवानांप्रिय शब्द का अर्थ होता है देवताओं का प्रिय
यहां आप्टे जी ने भी देव में प्रिय जोड़ने से बनने वाले शब्द को देवों का प्रिय या भगवान शिव का विशेषण माना है जैसा आप रेखांकित पद में देख सकते हैं ।
फिर उन्होंने उसे शब्द का समास करते हुए उसे देवानांप्रिय बताया है तथा पुनः उसके अन्य अर्थो की विवेचना की है ।
यहां तक कि झर्नी की हार्ड कॉपी मैं भी वही अर्थ आया है पर शायद पढ़ना भूल गए होंगे या फिर जानबूझकर नहीं पड़ा । 🌚
झर्नी जी को यह समझना चाहिए कि संस्कृत में तो क्या हिंदी में भी एक शब्द के अनेकों अर्थ होते हैं
।
वैसे झरनी जी किस देवानांप्रिय राजा के ऊपर आने वाले शब्द से भड़क गए ?? 😁😁
क्योंकि देवानांप्रिय शब्द से खुद को संबोधित करने वाले अनेकों राजा हुए हैं ।
मेगास्थनीज की इंडिका पर भी इन्होंने काफी झूठ बोले हैं तो उनकी पोल भी बहुत जल्दी ही खोलेंगे ।
🔥3