प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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मेरा येशु येशु 🤡 भाग 3

चावल की बोरी वाले अब मनुस्मृति ५.३० से मांसाहार सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं । आएं अब इसकी समीक्षा करते हैं ।

1. मनुस्मृति ५.४५-४९ तथा ६.१३-१४ के अनुसार मांस भक्षण कदापि नहीं करना चाहिए ।
2. अथर्ववेद ८.६.२९ , १०.१.२३ के अनुसार क्रमशः मांस भक्षण करने वाला हत्यारा होता है तथा गौ , पुरुष (मनुष्य) , तथा अश्व इत्यादि की हत्या नहीं करनी चाहिए ।
3. वाल्मीकि रामायण किष्किंधाकांड १७.३८ तथा सुंदरकांड ३६.४१ प्रभु श्रीराम ने कभी भी मांस भक्षण नहीं किया था । तो उनका अनुगमन करने वाले हम सब कैसे मांस भक्षण कर सकते हैं ?
4. महाभारत अनुशासन पर्व , दान धर्म पर्व अध्याय ११५ , पूर्णतः मांसभक्षण के विरोध में ही लिखा गया है ।
6. मनुस्मृति ६.११ में वर्णित बलिवैश्वदेव नामक पंचमहायज्ञ जिसे आमतौर पर बलि से जोड़ा जाता है तथा उसमें भी चावल आदि अन्न से निर्मित पुरोडाश और चरु का प्रयोग होता है न कि पशु मांस का ।


अतः यहां से सिद्ध होता है की प्राचीन वैदिक लोग अहिंसा में विश्वास रखते थे और आमिष भोजी नहीं थे । यहां से मांसाहार का आक्षेप भी खत्म हो जाता है। बाकी मधुपर्क में मांस का खंडन पहले ही कर चुका हूं ।
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Logic ham sharminda hain
Tere qatil jinda hain 🌚
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शङ्कराचार्य का एक शिष्य था ब्रह्मचारी मुकुन्द।

उसने हुमायुँ के घर पुत्ररूप में जन्म लिया। उसका नाम रखा गया - अकबर।

उनके विविध शिष्य थे जिनके नाम थे - श्रीधर, श्रीपति, शम्भु, वरेण्य आदि अनेक। यह सब ने भी जन्म ग्रहण करके अकबर के दरबारमें मन्त्रीपद प्राप्त किया।

और अकबरने सुखपूर्वक राज्य करके वैकुण्ठ गमन किया।

आपने यह जो भी पढा, वह गप्प नहीं है - भविष्यपुराण के वचन है। सन्दर्भ भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व अध्याय २२।

अब क्या ही बोले?
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Bro has Beautiful dreams 🌚🌚
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पांडा 🐼 का पोपट पार्ट 6

अक्सर अपने पौराणिकों को बलि प्रथा का समर्थन करते हुए देखा होगा । इनके अनुसार यज्ञ में पशु बलि देनी चाहिए तथा यज्ञपशु का मांस खाना चाहिए । यह‌ कितना सत्य है आइए इसकी समीक्षा करते हैं।

ऐतरेय ब्राह्मण की द्वितीय पंचिका के प्रथम अध्याय के अष्टम एवं नवम खंड के अनुसार देवों ने सर्वप्रथम मनुष्य को अपना यज्ञपशु बनाया । किंतु आलम्भन के समय मेध्य इनमें से निकल कर क्रमशः अश्व गाय भेड़ और बकरी और अंततः पृथ्वी में समाहित हो गया जो व्रीहि (धान) के रूप में पृथ्वी से बाहर आया। इन पशुओं से मेध्य निकल जाने के कारण देवों ने इनका यज्ञपशुरूप में प्रयोग बंद कर व्रीहि के पुरोडाश से यजन किया । अतः इनका मांस भी वर्जित है ।
यही कथा शतपथ ब्राह्मण १.२.३ में भी आती है ।


सायणाचार्य अपने खंड ९ के भाष्य में कहते हैं कि पुरोडाश समस्त पशुओं का सार होता है अतः पुरोडाश से ही यज्ञ करना चाहिए ।

यहां आप पूरी कथा पढ़ सकते हैं।

अतः स्पष्ट है कि यज्ञ में पशुबलि नहीं देनी चाहिए जो निरुक्त वेदांग १.८ से भी सिद्ध होता है।

Note : आलम्भन शब्द के अर्थ हेतु मैंने आचार्य रामानंद जी के शतपथ पथेयम का संदर्भ लिया है ।
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