मेरा येशु येशु : भाग 2
चावल के बोरी वाले फिर भी नहीं सुधरे और बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.३-४ से ब्रह्मा सरस्वती के पिता पुत्री होने का प्रमाण दे रहे हैं ।
आईए जरा इसे देखते हैं ।
विवाहित पुरुष का अर्धांग उसकी स्त्री होती है यहां देखने को मिलता है । यहां तक की श्री राम शर्मा आचार्य ने भी अपने उपनिषद भाष्य में स्त्री तथा पुरुष भाग अर्थात पति-पत्नी को शिव-शक्ति , ब्रह्मा-सावित्री तथा पुरुष-प्रकृति कहा है । आप देख सकते हैं न तो आचार्य श्रीराम शर्मा न ही आर्य भाष्यकार ; किसी ने भी पिता पुत्री जैसा अनर्गल अर्थ नहीं लिया ।
चावल के बोरी वाले फिर भी नहीं सुधरे और बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.३-४ से ब्रह्मा सरस्वती के पिता पुत्री होने का प्रमाण दे रहे हैं ।
आईए जरा इसे देखते हैं ।
इसके अनुसार सृष्टि के आदि में मात्र पुरुष ही था परंतु वह अकेला था अतः उसका मन नहीं लगा और उसने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किया जिससे एक भाग स्त्री और एक भाग पुरुष उत्पन्न हुए जिन्हें खंड 3 में पति और पत्नी बताया गया है । तदनंतर स्त्री भाग को ऐसा लगा कि मैं इसमें से ही प्रकट हुई हूं मुझे ही अपनी पत्नी मानता है । जिसके कारण वह विभिन्न स्त्री रूपों को धारण करती है उसके साथ ही नर भाग भी विभिन्न पुरुष स्वरूपों को धारण करता है तथा दोनों के मिलन से सृष्टि का विस्तार होता है ।
विवाहित पुरुष का अर्धांग उसकी स्त्री होती है यहां देखने को मिलता है । यहां तक की श्री राम शर्मा आचार्य ने भी अपने उपनिषद भाष्य में स्त्री तथा पुरुष भाग अर्थात पति-पत्नी को शिव-शक्ति , ब्रह्मा-सावित्री तथा पुरुष-प्रकृति कहा है । आप देख सकते हैं न तो आचार्य श्रीराम शर्मा न ही आर्य भाष्यकार ; किसी ने भी पिता पुत्री जैसा अनर्गल अर्थ नहीं लिया ।
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
मेरा येशु येशु : भाग 2 चावल के बोरी वाले फिर भी नहीं सुधरे और बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.३-४ से ब्रह्मा सरस्वती के पिता पुत्री होने का प्रमाण दे रहे हैं । आईए जरा इसे देखते हैं । इसके अनुसार सृष्टि के आदि में मात्र पुरुष ही था परंतु वह अकेला था अतः उसका मन…
ना तो मंत्र में और ना ही भाष्य में पिता पुत्री समागम की बात लिखी है ।
और जहां तक बात है ब्रह्मा सरस्वती प्रसंग की , तो ब्रह्मा और सरस्वती पति पत्नी है न कि पिता पुत्री ।
परंतु जिनकी कुत्सित बुद्धि मैं ब्रह्मा सरस्वती का पिता पुत्री होने का बेतुका ख्याल बैठ गया है उनका हर जगह यही दिखाई देता है ।
इस पिता पुत्री प्रसंग पर भी मैं बहुत जल्दी पोस्ट डालूंगा जहां पर पुराणों तथा ब्राह्मण
ग्रन्थ से प्रमाण होंगे ।
यहां तक की मंत्र में भी " पतिश्च पत्नी चाभवतां " शब्द आया है ।
और जहां तक बात है ब्रह्मा सरस्वती प्रसंग की , तो ब्रह्मा और सरस्वती पति पत्नी है न कि पिता पुत्री ।
परंतु जिनकी कुत्सित बुद्धि मैं ब्रह्मा सरस्वती का पिता पुत्री होने का बेतुका ख्याल बैठ गया है उनका हर जगह यही दिखाई देता है ।
इस पिता पुत्री प्रसंग पर भी मैं बहुत जल्दी पोस्ट डालूंगा जहां पर पुराणों तथा ब्राह्मण
ग्रन्थ से प्रमाण होंगे ।
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पांडा बाबू 🐼 का पोपट : पार्ट 2
जन्म से वर्ण व्यवस्था सिद्ध करने के लिए 🐼 जी ने पुराणों का उदाहरण दिया है ।
परंतु उनके एक बड़े ही प्रसिद्ध ;
यही चीज मनुस्मृति 12.106 भी कहती है।
यहां से इनके पौराणिक मत का भी खंडन हो जाता है । अगली बार इनकी स्मृतियों का खंडन होगा तथा वेद से प्रमाण भी दिए जाएंगे ।
जन्म से वर्ण व्यवस्था सिद्ध करने के लिए 🐼 जी ने पुराणों का उदाहरण दिया है ।
परंतु उनके एक बड़े ही प्रसिद्ध ;
माध्वाचार्य अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में यह कहते हैं कि अगर श्रुति और पुराण में टकराव हो तो वेद विरुद्ध होने से पुराण का मत मान्य नहीं होगा ।
यही चीज मनुस्मृति 12.106 भी कहती है।
और शूद्र का वेदाधिकार हमें यजुर्वेद २६.२ में देखने को मिल जाता है ।
यथे॒मां वाचं॑ कल्या॒णीमा॒वदा॑नि॒ जने॑भ्यः। ब्र॒ह्म॒रा॒ज॒न्या᳖भ्या शूद्राय॒ चार्या॑य च॒ स्वाय॒ चार॑णाय च। प्रि॒यो दे॒वानां॒ दक्षि॑णायै दा॒तुरि॒ह भू॑यासम॒यं मे॒ कामः॒ समृ॑ध्यता॒मुप॑ मा॒दो न॑मतु ॥२ ॥
अर्थात् : परमात्मा सब मनुष्यों के प्रति इस उपदेश को करता है कि यह चारों वेदरूप कल्याणकारिणी वाणी सब मनुष्यों के हित के लिए मैंने उपदेश की है, इस में किसी को अनधिकार नहीं है, जैसे मैं पक्षपात को छोड़ के सब मनुष्यों में वर्तमान हुआ पियारा हूँ, वैसे आप भी होओ। ऐसे करने से तुम्हारे सब काम सिद्ध होंगे ॥२ ॥
यहां से इनके पौराणिक मत का भी खंडन हो जाता है । अगली बार इनकी स्मृतियों का खंडन होगा तथा वेद से प्रमाण भी दिए जाएंगे ।
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पांडा का पोपट : पार्ट 3
मांस भक्षण का उदाहरण न सिर्फ पांडा 🐼 अपितु मूर्ख अंग्रेजों ने भी जबरदस्ती वैदिक धर्म में मिलाने की कोशिश की है ।
आईए अब इसकी समीक्षा करते हैं ।
मधुपर्क किससे बनता है यह इन सूत्रों में काफी अच्छे से बताया गया है ,
और अगर हम मान भी लेते हैं कि वहां पर मांस लेने का वर्णन है तो यह बात श्रुति से विपरीत होने के कारण स्वतः मान्य नहीं होगी ।
मांस भक्षण का उदाहरण न सिर्फ पांडा 🐼 अपितु मूर्ख अंग्रेजों ने भी जबरदस्ती वैदिक धर्म में मिलाने की कोशिश की है ।
इनका एक बहुत बड़ा दावा यह है कि आश्वलायन गृह्यसूत्र १.२४.२६ में मधुपर्क में मांस डालकर खाने को कहा गया है ।
पता नहीं इनकी मोटी बुद्धि में यह बात कहां से आ गई कि दधि , क्षीर , मधु , मक्खन इत्यादि से बने अत्यंत पवित्र मधुपर्क में मांस इत्यादि है।
आईए अब इसकी समीक्षा करते हैं ।
आश्वलायन गृह्यसूत्र १.२४.५-६
तंत्रसार परिच्छेद १
शब्द कल्पद्रुम
पारस्कर गृह्यसूत्र विवाह प्रकरण १.३.५
हिरण्यकेशी गृह्यसूत्र १.१२.१०
ब्रह्मेक्त याज्ञवल्क्य संहिता ८.२०२
वराह गृह्यसूत्र १२.४
आपस्तंब धर्मसूत्र २.४.८.८-९
जैमिनीय गृह्यसूत्र १.१९
बौधायन गृह्यसूत्र १.२.९-१०
मधुपर्क किससे बनता है यह इन सूत्रों में काफी अच्छे से बताया गया है ,
बल्कि जिस आ.गृ १.२४.२६ को ये इतना प्रचारित करते हैं प्रसिद्ध पौराणिक आचार्य श्रीराम शर्मा जी ने भी उसका अर्थ मांस से रहित अन्न लिया है ।
और अगर हम मान भी लेते हैं कि वहां पर मांस लेने का वर्णन है तो यह बात श्रुति से विपरीत होने के कारण स्वतः मान्य नहीं होगी ।
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पांडा 🐼 का पोपट पार्ट 4
आपने पांडा 🐼 जी को अकसर कहते सुना होगा स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं । और तो और पहले कमेंट में पांडा 🐼 जी अपने घुटनों में स्थित अपने मस्तिष्क का पूर्ण उपयोग करने की कोशिश की है । 🤣 जरा इस कथन की भी समीक्षा कर लेते हैं ।
अब ब्राह्मण ग्रंथों में ब्रह्मा पद की महिमा देख लेते हैं ।
यहां से यह सिद्ध होता है कि न सिर्फ स्त्रियां वेद पाठ कर सकती हैं अपितु वह यज्ञ में भी सर्वोच्च ब्रह्मा पद के लिए भी दीक्षित हो सकतीं हैं ।
ॐ परमात्मने नमः 🙏🙏
आपने पांडा 🐼 जी को अकसर कहते सुना होगा स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं । और तो और पहले कमेंट में पांडा 🐼 जी अपने घुटनों में स्थित अपने मस्तिष्क का पूर्ण उपयोग करने की कोशिश की है । 🤣 जरा इस कथन की भी समीक्षा कर लेते हैं ।
ऋग्वेद 8.33.19
दृ॑श॒न्त्स्त्री हि ब्र॒ह्मा ब॒भूवि॑थ ॥
अर्थात् स्त्री ही ब्रह्मा है । सायण ने भी इसके भाष्य में स्त्री को स्तोता अर्थात् मंत्रज्ञा बताया है ।
अब ब्राह्मण ग्रंथों में ब्रह्मा पद की महिमा देख लेते हैं ।
गोपथ ब्राह्मण पूर्वभाग २.२४ के अनुसार ब्रह्मा चतुर्वेदी होता है अर्थात उसे चारों वेदों का ज्ञान होता है ।
उसी गोपथ ब्राह्मण पूर्वभाग ४.२ के अनुसार ब्रह्मा को यज्ञ में सर्वाधिक महत्व प्राप्त होता है क्योंकि वह यज्ञ की सभी औषधीयो तथा सामग्रियों का निर्णायक होता है । इसके अनुसार ब्रह्मा के द्वारा ही यज्ञ यथाविधि संचालित हो सकता है । ब्रह्मा चाहे तो यज्ञ को बना और बिगाड़ दोनों सकता है ।
यहां से यह सिद्ध होता है कि न सिर्फ स्त्रियां वेद पाठ कर सकती हैं अपितु वह यज्ञ में भी सर्वोच्च ब्रह्मा पद के लिए भी दीक्षित हो सकतीं हैं ।
ॐ परमात्मने नमः 🙏🙏
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Aihole Inscription of Pulakeshi 2 (634 CE) mentions the date of Mahabharata (Bharata war)
Hence Mahabharata occured 30+3000+5+700 = 3735 years before the time of the inscription
Full credit : @Manuvadii
3735 + 1389 (from 634 to today) = 5124 yrs (Date of Bharata war)
Very close to the modern dates
Epigraphia Indica vol 6
Hence Mahabharata occured 30+3000+5+700 = 3735 years before the time of the inscription
Full credit : @Manuvadii
3735 + 1389 (from 634 to today) = 5124 yrs (Date of Bharata war)
Very close to the modern dates
Epigraphia Indica vol 6
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मेरा येशु येशु 🤡 भाग 3
चावल की बोरी वाले अब मनुस्मृति ५.३० से मांसाहार सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं । आएं अब इसकी समीक्षा करते हैं ।
अतः यहां से सिद्ध होता है की प्राचीन वैदिक लोग अहिंसा में विश्वास रखते थे और आमिष भोजी नहीं थे । यहां से मांसाहार का आक्षेप भी खत्म हो जाता है। बाकी मधुपर्क में मांस का खंडन पहले ही कर चुका हूं ।
चावल की बोरी वाले अब मनुस्मृति ५.३० से मांसाहार सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं । आएं अब इसकी समीक्षा करते हैं ।
1. मनुस्मृति ५.४५-४९ तथा ६.१३-१४ के अनुसार मांस भक्षण कदापि नहीं करना चाहिए ।
2. अथर्ववेद ८.६.२९ , १०.१.२३ के अनुसार क्रमशः मांस भक्षण करने वाला हत्यारा होता है तथा गौ , पुरुष (मनुष्य) , तथा अश्व इत्यादि की हत्या नहीं करनी चाहिए ।
3. वाल्मीकि रामायण किष्किंधाकांड १७.३८ तथा सुंदरकांड ३६.४१ प्रभु श्रीराम ने कभी भी मांस भक्षण नहीं किया था । तो उनका अनुगमन करने वाले हम सब कैसे मांस भक्षण कर सकते हैं ?
4. महाभारत अनुशासन पर्व , दान धर्म पर्व अध्याय ११५ , पूर्णतः मांसभक्षण के विरोध में ही लिखा गया है ।
6. मनुस्मृति ६.११ में वर्णित बलिवैश्वदेव नामक पंचमहायज्ञ जिसे आमतौर पर बलि से जोड़ा जाता है तथा उसमें भी चावल आदि अन्न से निर्मित पुरोडाश और चरु का प्रयोग होता है न कि पशु मांस का ।
अतः यहां से सिद्ध होता है की प्राचीन वैदिक लोग अहिंसा में विश्वास रखते थे और आमिष भोजी नहीं थे । यहां से मांसाहार का आक्षेप भी खत्म हो जाता है। बाकी मधुपर्क में मांस का खंडन पहले ही कर चुका हूं ।
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