प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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Forwarded from मनुवादियों का इतिहास पुरातत्त्व 🚩🚩
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Forwarded from Deleted Account
A 9th century (878 AD) manuscript of the original Sushruta Samhita is in the Kesar Library of Nepal,it listed in s.n 699.
पौराणिक का पोपट पार्ट 1


हमारे प्रिय पांडा 🐼 जी वर्ण व्यवस्था को जन्म से सिद्ध करने की नाकाम कोशिश करते हुए पकड़े गए हैं ।
बचने के लिए व्याकरण का सहारा ले रहे हैं । इनके अनुसार सृष्टम शब्द भूतकाल का है तथा वर्तमान में दोहराया नहीं जा सकता ।

पर लौकिक संस्कृत में ही हमें " सृष्ट " धातु नपुंसक लिंग के लट् लकार में प्रथमा एवं द्वितीया विभक्ति के एकवचन रूप में ही सृष्टम शब्द देखने को मिल जाता है । अतः इनका यह फर्जी दावा भी यहीं का यहीं खंडित हो जाता है ।


इनकी जन्मना वर्ण व्यवस्था का भी बहुत जल्दी खंडन किया जाएगा वह भी उनके ही तथा श्रुति स्मृति इत्यादि के प्रमाणों से ।
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मेरा येशु येशु भाग 1

कुछ तथाकथित चावल की बोरी वाले प्रभु श्रीराम के जन्म पर सवाल उठाते हुए कह रहे थे कि किसी यज्ञ और पायस के द्वारा संतान उत्पत्ति पूर्ण रूप से अवैज्ञानिक है । आइए इसकी समीक्षा करते हैं ।

गोपथ ब्राह्मण पूर्वभाग तृतीय प्रपाठक की कंडिका २३ के अनुसार देखिए पुत्रेष्टि यज्ञ किस प्रकार होता है ?
ऋतु स्नान के पश्चात स्त्री को पुंसवन इत्यादि संस्कार के मंत्र द्वारा संस्कारित करके पवित्र दुग्ध आदि का भोजन करें तथा उसके बाद गर्भाधान संस्कार कर पत्नी में वीर्य स्थापना करें। तत्पश्चात उचित समय आने पर संतान की प्राप्ति होती है ।


हमें तो इसमें पूर्ण रूप से विज्ञान ही दिखाई देता है।
गर्भाधान पूर्ण रूप से प्राकृतिक है अतः इसमें अश्लीलता मात्र उन्हीं को दिखेगी जिनके मन में गलत भाव होगा ।

सौजन्य से : @Kartikprakash जी

पायस से संतान उत्पत्ति के ऊपर में पहले ही पोस्ट बना चुका हूं परंतु इनमें इतना भी सामर्थ्य नहीं होगा कि उसका खंडन करके दिखा सकें।

जय श्रीराम 🙏🙏
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मेरा येशु येशु : भाग 2

चावल के बोरी वाले फिर भी नहीं सुधरे और बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.३-४ से ब्रह्मा सरस्वती के पिता पुत्री होने का प्रमाण दे रहे हैं ।
आईए जरा इसे देखते हैं ।

इसके अनुसार सृष्टि के आदि में मात्र पुरुष ही था परंतु वह अकेला था अतः उसका मन नहीं लगा और उसने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किया जिससे एक भाग स्त्री और एक भाग पुरुष उत्पन्न हुए जिन्हें खंड 3 में पति और पत्नी बताया गया है । तदनंतर स्त्री भाग को ऐसा लगा कि मैं इसमें से ही प्रकट हुई हूं मुझे ही अपनी पत्नी मानता है । जिसके कारण वह विभिन्न स्त्री रूपों को धारण करती है उसके साथ ही नर भाग भी विभिन्न पुरुष स्वरूपों को धारण करता है तथा दोनों के मिलन से सृष्टि का विस्तार होता है ।


विवाहित पुरुष का अर्धांग उसकी स्त्री होती है यहां देखने को मिलता है । यहां तक की श्री राम शर्मा आचार्य ने भी अपने उपनिषद भाष्य में स्त्री तथा पुरुष भाग अर्थात पति-पत्नी को शिव-शक्ति , ब्रह्मा-सावित्री तथा पुरुष-प्रकृति कहा है । आप देख सकते हैं न तो आचार्य श्रीराम शर्मा न ही आर्य भाष्यकार ; किसी ने भी पिता पुत्री जैसा अनर्गल अर्थ नहीं लिया ।
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
मेरा येशु येशु : भाग 2 चावल के बोरी वाले फिर भी नहीं सुधरे और बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.३-४ से ब्रह्मा सरस्वती के पिता पुत्री होने का प्रमाण दे रहे हैं । आईए जरा इसे देखते हैं । इसके अनुसार सृष्टि के आदि में मात्र पुरुष ही था परंतु वह अकेला था अतः उसका मन…
ना तो मंत्र में और ना ही भाष्य में पिता पुत्री समागम की बात लिखी है ।

यहां तक की मंत्र में भी " पतिश्च पत्नी चाभवतां " शब्द आया है ।


और जहां तक बात है ब्रह्मा सरस्वती प्रसंग की , तो ब्रह्मा और सरस्वती पति पत्नी है न कि पिता पुत्री ।
परंतु जिनकी कुत्सित बुद्धि मैं ब्रह्मा सरस्वती का पिता पुत्री होने का बेतुका ख्याल बैठ गया है उनका हर जगह यही दिखाई देता है ।

इस पिता पुत्री प्रसंग पर भी मैं बहुत जल्दी पोस्ट डालूंगा जहां पर पुराणों तथा ब्राह्मण
ग्रन्थ से प्रमाण होंगे ।
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पांडा बाबू 🐼 का पोपट : पार्ट 2
जन्म से वर्ण व्यवस्था सिद्ध करने के लिए 🐼 जी ने पुराणों का उदाहरण दिया है ।

परंतु उनके एक बड़े ही प्रसिद्ध ;

माध्वाचार्य अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में यह कहते हैं कि‌ अगर श्रुति और पुराण में टकराव हो तो वेद विरुद्ध होने से पुराण का मत मान्य नहीं होगा ।


यही चीज मनुस्मृति 12.106 भी कहती है।

और शूद्र का वेदाधिकार हमें यजुर्वेद २६.२ में देखने को मिल जाता है ।

यथे॒मां वाचं॑ कल्या॒णीमा॒वदा॑नि॒ जने॑भ्यः। ब्र॒ह्म॒रा॒ज॒न्या᳖भ्या शूद्राय॒ चार्या॑य च॒ स्वाय॒ चार॑णाय च। प्रि॒यो दे॒वानां॒ दक्षि॑णायै दा॒तुरि॒ह भू॑यासम॒यं मे॒ कामः॒ समृ॑ध्यता॒मुप॑ मा॒दो न॑मतु ॥२ ॥

अर्थात् : परमात्मा सब मनुष्यों के प्रति इस उपदेश को करता है कि यह चारों वेदरूप कल्याणकारिणी वाणी सब मनुष्यों के हित के लिए मैंने उपदेश की है, इस में किसी को अनधिकार नहीं है, जैसे मैं पक्षपात को छोड़ के सब मनुष्यों में वर्तमान हुआ पियारा हूँ, वैसे आप भी होओ। ऐसे करने से तुम्हारे सब काम सिद्ध होंगे ॥२ ॥


यहां से इनके पौराणिक मत का भी खंडन हो जाता है । अगली बार इनकी स्मृतियों का खंडन होगा तथा वेद से प्रमाण भी दिए जाएंगे ।
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पांडा का पोपट : पार्ट 3

मांस भक्षण का उदाहरण न सिर्फ पांडा 🐼 अपितु मूर्ख अंग्रेजों ने भी जबरदस्ती वैदिक धर्म में मिलाने की कोशिश की है ।
इनका एक बहुत बड़ा दावा यह है कि आश्वलायन गृह्यसूत्र १.२४.२६ में मधुपर्क में मांस डालकर खाने को कहा गया है ।
पता नहीं इनकी मोटी बुद्धि में यह बात कहां से आ गई कि दधि , क्षीर , मधु , मक्खन इत्यादि से बने अत्यंत पवित्र मधुपर्क में मांस इत्यादि है।


आईए अब इसकी समीक्षा करते हैं ।

आश्वलायन गृह्यसूत्र १.२४.५-६
तंत्रसार परिच्छेद १
शब्द‌ कल्पद्रुम
पारस्कर गृह्यसूत्र विवाह प्रकरण १.३.५
हिरण्यकेशी गृह्यसूत्र १.१२.१०
ब्रह्मेक्त याज्ञवल्क्य संहिता ८.२०२
वराह गृह्यसूत्र १२.४
आपस्तंब धर्मसूत्र २.४.८.८-९
जैमिनीय गृह्यसूत्र १.१९
बौधायन गृह्यसूत्र १.२.९-१०


मधुपर्क किससे बनता है यह इन सूत्रों में काफी अच्छे से बताया गया है ,
बल्कि जिस आ.गृ १.२४.२६ को ये इतना प्रचारित करते हैं प्रसिद्ध पौराणिक आचार्य श्रीराम शर्मा जी ने भी उसका अर्थ मांस से रहित अन्न लिया है ।


और अगर हम मान भी लेते हैं कि वहां पर मांस लेने का वर्णन है तो यह बात श्रुति से विपरीत होने के कारण स्वतः मान्य नहीं होगी ।
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