प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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A REFERENCE OF DIFFERENT SMRITIS like Manu , Yajnavalkya , Vishnu , even Secular political texts like Kautilya arthashastra , Kamandakiya nitisara , Brihadsamhita of Varahamihira etc. have been taken to understand and decode the Core essences of the shlokas written in Fragment 9 of the manuscripts of Bajaur Collection.

NOTE : THIS FRAGMENT 9 HAS NO BUDDHIST TRACES IN IT. ENTIRELY BASED OF SECULAR TEXTS AND SANATAN SMRITIS...


Circa : 140 CE to late 3rd century [ Kushana period ]
भागवत पुराण 10.51.6 के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण एवं कालयवन का सामना हुआ तो भगवान श्रीकृष्ण युद्ध भूमि छोड़कर भाग गए ।
भगवान श्री कृष्ण को रणछोड़ बनाने तथा उनकी वीरता को धूल धूसरित करने में पुराणों की बहुत बड़ी भूमिका है ।

इसके विपरीत महाभारत 7.11.16 -18 के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध भूमि में कालयवन को पराजित कर दिया था तथा लोगों को उसके अत्याचार तथा दासत्व से मुक्ति दिलाई थी ।
अतः इतिहास से शिक्षा ग्रहण करें पुराणों से नहीं ।

जय योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण 🙏🙏
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Demn it !! Ye to shrap de raha hai
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जय भीम नमो बुद्धाय 💙💙
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Forwarded from मनुवादियों का इतिहास पुरातत्त्व 🚩🚩
Oldest manuscript of sushrut samhita (878 CE) from Nepal.
Forwarded from मनुवादियों का इतिहास पुरातत्त्व 🚩🚩
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Forwarded from Deleted Account
A 9th century (878 AD) manuscript of the original Sushruta Samhita is in the Kesar Library of Nepal,it listed in s.n 699.
पौराणिक का पोपट पार्ट 1


हमारे प्रिय पांडा 🐼 जी वर्ण व्यवस्था को जन्म से सिद्ध करने की नाकाम कोशिश करते हुए पकड़े गए हैं ।
बचने के लिए व्याकरण का सहारा ले रहे हैं । इनके अनुसार सृष्टम शब्द भूतकाल का है तथा वर्तमान में दोहराया नहीं जा सकता ।

पर लौकिक संस्कृत में ही हमें " सृष्ट " धातु नपुंसक लिंग के लट् लकार में प्रथमा एवं द्वितीया विभक्ति के एकवचन रूप में ही सृष्टम शब्द देखने को मिल जाता है । अतः इनका यह फर्जी दावा भी यहीं का यहीं खंडित हो जाता है ।


इनकी जन्मना वर्ण व्यवस्था का भी बहुत जल्दी खंडन किया जाएगा वह भी उनके ही तथा श्रुति स्मृति इत्यादि के प्रमाणों से ।
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मेरा येशु येशु भाग 1

कुछ तथाकथित चावल की बोरी वाले प्रभु श्रीराम के जन्म पर सवाल उठाते हुए कह रहे थे कि किसी यज्ञ और पायस के द्वारा संतान उत्पत्ति पूर्ण रूप से अवैज्ञानिक है । आइए इसकी समीक्षा करते हैं ।

गोपथ ब्राह्मण पूर्वभाग तृतीय प्रपाठक की कंडिका २३ के अनुसार देखिए पुत्रेष्टि यज्ञ किस प्रकार होता है ?
ऋतु स्नान के पश्चात स्त्री को पुंसवन इत्यादि संस्कार के मंत्र द्वारा संस्कारित करके पवित्र दुग्ध आदि का भोजन करें तथा उसके बाद गर्भाधान संस्कार कर पत्नी में वीर्य स्थापना करें। तत्पश्चात उचित समय आने पर संतान की प्राप्ति होती है ।


हमें तो इसमें पूर्ण रूप से विज्ञान ही दिखाई देता है।
गर्भाधान पूर्ण रूप से प्राकृतिक है अतः इसमें अश्लीलता मात्र उन्हीं को दिखेगी जिनके मन में गलत भाव होगा ।

सौजन्य से : @Kartikprakash जी

पायस से संतान उत्पत्ति के ऊपर में पहले ही पोस्ट बना चुका हूं परंतु इनमें इतना भी सामर्थ्य नहीं होगा कि उसका खंडन करके दिखा सकें।

जय श्रीराम 🙏🙏
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मेरा येशु येशु : भाग 2

चावल के बोरी वाले फिर भी नहीं सुधरे और बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.३-४ से ब्रह्मा सरस्वती के पिता पुत्री होने का प्रमाण दे रहे हैं ।
आईए जरा इसे देखते हैं ।

इसके अनुसार सृष्टि के आदि में मात्र पुरुष ही था परंतु वह अकेला था अतः उसका मन नहीं लगा और उसने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किया जिससे एक भाग स्त्री और एक भाग पुरुष उत्पन्न हुए जिन्हें खंड 3 में पति और पत्नी बताया गया है । तदनंतर स्त्री भाग को ऐसा लगा कि मैं इसमें से ही प्रकट हुई हूं मुझे ही अपनी पत्नी मानता है । जिसके कारण वह विभिन्न स्त्री रूपों को धारण करती है उसके साथ ही नर भाग भी विभिन्न पुरुष स्वरूपों को धारण करता है तथा दोनों के मिलन से सृष्टि का विस्तार होता है ।


विवाहित पुरुष का अर्धांग उसकी स्त्री होती है यहां देखने को मिलता है । यहां तक की श्री राम शर्मा आचार्य ने भी अपने उपनिषद भाष्य में स्त्री तथा पुरुष भाग अर्थात पति-पत्नी को शिव-शक्ति , ब्रह्मा-सावित्री तथा पुरुष-प्रकृति कहा है । आप देख सकते हैं न तो आचार्य श्रीराम शर्मा न ही आर्य भाष्यकार ; किसी ने भी पिता पुत्री जैसा अनर्गल अर्थ नहीं लिया ।
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