आएं अब इन महाशय के दिए गए कुतर्कों का खंडन करते हैं :
चरक संहिता अग्निवेश की संहिता ( लुप्त ) जो कि आत्रेय पुनर्वसु जी के सबसे अच्छे शिष्य थे , उनसे ही ली गई थी तो इसका काल इतना प्राचीन तो होगा ही कि उस समय पर अग्निवेश संहिता उपलब्ध होगी ।
यह काल कम से कम 1000 ईसा पूर्व तक तो चला ही जाता है क्योंकि अग्निवेश संहिता की सबसे नवीन काल गणना भी करीब 1500 ईसा पूर्व तक चली जाती है।
जहां तक बात करें महाभारत की तो पुरातात्विक प्रमाणों से भी यह सिद्ध हो चुका है की महाभारत आज से करीब 5000 - 5500 साल पहले हो चुकी थी ।
दूसरी बात यह की चरक संहिता में वर्णित इस प्रसंग की प्रमाणिकता इसी बात से सिद्ध होती है कि उसमें आने वाले महर्षि आत्रेय पुनर्वसु का उल्लेख आयुर्वेद के इतिहास को बताते समय महर्षि सुश्रुत भी करते हैं । ऊपर से किसी का वचन के उद्धरण करने से कोई भी ग्रंथ नवीन सिद्ध नहीं हो जाता ।
साथ ही हमें चरक और उनके शिष्यों के पुरातात्विक प्रमाण कुशाण पूर्व भी मिल चुके हैं । अतः आपका यह तर्क भी खंडित हो जाता है ।
आयुर्वेद का पारंपरिक इतिहास चरक को एक महान ऋषि की तरह बताता है तथा चरक संहिता की प्रमाणिकता उससे भी सिद्ध होती है ।
इसलिए ही कहते हैं कि कृपया तर्क पर बात करें। अंग्रेजी विद्वानों की चाटुकारी करने से सृष्टि मात्र 6000 साल पहले बनी यही समझ में आता है ।
चरक संहिता अग्निवेश की संहिता ( लुप्त ) जो कि आत्रेय पुनर्वसु जी के सबसे अच्छे शिष्य थे , उनसे ही ली गई थी तो इसका काल इतना प्राचीन तो होगा ही कि उस समय पर अग्निवेश संहिता उपलब्ध होगी ।
यह काल कम से कम 1000 ईसा पूर्व तक तो चला ही जाता है क्योंकि अग्निवेश संहिता की सबसे नवीन काल गणना भी करीब 1500 ईसा पूर्व तक चली जाती है।
जहां तक बात करें महाभारत की तो पुरातात्विक प्रमाणों से भी यह सिद्ध हो चुका है की महाभारत आज से करीब 5000 - 5500 साल पहले हो चुकी थी ।
दूसरी बात यह की चरक संहिता में वर्णित इस प्रसंग की प्रमाणिकता इसी बात से सिद्ध होती है कि उसमें आने वाले महर्षि आत्रेय पुनर्वसु का उल्लेख आयुर्वेद के इतिहास को बताते समय महर्षि सुश्रुत भी करते हैं । ऊपर से किसी का वचन के उद्धरण करने से कोई भी ग्रंथ नवीन सिद्ध नहीं हो जाता ।
साथ ही हमें चरक और उनके शिष्यों के पुरातात्विक प्रमाण कुशाण पूर्व भी मिल चुके हैं । अतः आपका यह तर्क भी खंडित हो जाता है ।
आयुर्वेद का पारंपरिक इतिहास चरक को एक महान ऋषि की तरह बताता है तथा चरक संहिता की प्रमाणिकता उससे भी सिद्ध होती है ।
इसलिए ही कहते हैं कि कृपया तर्क पर बात करें। अंग्रेजी विद्वानों की चाटुकारी करने से सृष्टि मात्र 6000 साल पहले बनी यही समझ में आता है ।
The oldest proof of maharishi proof of charaka and his Followers, around 2100 years
back !!!
In satvahan period ( Circa Late 2nd century BCE - early 3rd century )
Nasik cave Inscription cave no 10
Epigraphia Indica Volume 8 , page 78
back !!!
In satvahan period ( Circa Late 2nd century BCE - early 3rd century )
Nasik cave Inscription cave no 10
Epigraphia Indica Volume 8 , page 78
महाशय के सस्ते नशे करने की आदत अभी तक गई नहीं है ।
चलिए हम इस आदत को खत्म करने की कोशिश करते हैं ।
मैंने पहले ही कई जगह सायण भाष्य , श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य , शतपथ भाष्य , और निरुक्त से साबित कर दिया है कि अग्निहोत्र इत्यादि सभी यज्ञ अध्वर होते हैं ।
बात करें सायण भाष्य की , तो अगर हम उसको भी देख रहे हैं तो उसमें भी हमें कई जगह पर यज्ञ को अध्वर अर्थात अहिंसात्मक तरीके करने की बात कही गई है।
ऋग्वेद के छठे मंडल के गौ सूक्त के ऋषि भारद्वाज ब्राहस्पत्य और उनके शिष्य महान आयुर्वेदाचार्य आत्रेय पुनर्वसु दोनों ने ही गौ को अखंडनीय अदिति माना है ।
अथर्ववेद का ब्रह्मगवी सूक्त भी गौ की हिंसा करने वाले को मृत्यु दंड देने का आग्रह करता है ।
और जहां तक
इसका सवाल है तो सायण के भाष्य के इस अंश का इस खंडन हमें योग दर्शन ब्रह्म सूत्र तथा योग दर्शन व्यास भाष्य में देखने को मिल जाता है ।
और जहां तक च.सं व महाभारत की ऐतिहासिक प्रमाणिकता की बात है तो हमारा आग्रह है की इतिहास को बक्श दो ।
चलिए हम इस आदत को खत्म करने की कोशिश करते हैं ।
मैंने पहले ही कई जगह सायण भाष्य , श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य , शतपथ भाष्य , और निरुक्त से साबित कर दिया है कि अग्निहोत्र इत्यादि सभी यज्ञ अध्वर होते हैं ।
बात करें सायण भाष्य की , तो अगर हम उसको भी देख रहे हैं तो उसमें भी हमें कई जगह पर यज्ञ को अध्वर अर्थात अहिंसात्मक तरीके करने की बात कही गई है।
ऋग्वेद के छठे मंडल के गौ सूक्त के ऋषि भारद्वाज ब्राहस्पत्य और उनके शिष्य महान आयुर्वेदाचार्य आत्रेय पुनर्वसु दोनों ने ही गौ को अखंडनीय अदिति माना है ।
अथर्ववेद का ब्रह्मगवी सूक्त भी गौ की हिंसा करने वाले को मृत्यु दंड देने का आग्रह करता है ।
और जहां तक
वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति
इसका सवाल है तो सायण के भाष्य के इस अंश का इस खंडन हमें योग दर्शन ब्रह्म सूत्र तथा योग दर्शन व्यास भाष्य में देखने को मिल जाता है ।
नोट : यह चीज बस सायण भाष्य में है इसको वेद मंत्र से जोड़कर कृपया अपनी कुत्सित बुद्धि का प्रदर्शन न करें ।
और जहां तक च.सं व महाभारत की ऐतिहासिक प्रमाणिकता की बात है तो हमारा आग्रह है की इतिहास को बक्श दो ।
🥱3❤2
या तो यह सीधा-सीधा यह कहते कि महर्षि पतंजलि , महर्षि व्यास , महर्षि याज्ञवल्क्य , महर्षि भारद्वाज ब्राहस्पत्य , महर्षि आत्रेय पुनर्वसु , इत्यादि लोगों में ज्ञान शून्यता थी और सायण में ही सबसे अधिक ज्ञान भरा पड़ा था ।
अगर सायण भाष्य सच है तो
१. कितने ऋषियों ने अपनी पुत्री के साथ समागम किया ?
२. इनमें से कितने ही ऋषियों ने बलि प्रथा का समर्थन किया ?
३. कितने ही ऋषियों ने अश्व शिश्न लेने को कहा ?
४. कितने ही ऋषियों ने गौ मांस खाने को कहा ?
५. कितने ऋषियों ने कहा कि वैदिकी हिंसा , हिंसा नहीं होती ?
जवाब है एक ने भी नहीं ।
कृपया सायण की गलतियों को वैदिक ऋषियों के ऊपर तथा वेद मंत्रों के ऊपर थोपने की कोशिश ना करें ।
आप या आपके सायन निरुक्तकार महर्षि यास्क से अधिक नहीं जानते ।
आपकी बात से चला जाए तो कल्प और निरुक्त , श्रुति और श्रुति मैं ही परस्पर विरोध देखने को मिलता है जो कि तर्क से पूर्णतः विपरीत है और अन्य ग्रंथों के अनुसार भी आपकी बातें पूर्ण रूप से निरर्थक साबित होती हैं ।
अगर सायण भाष्य सच है तो
१. कितने ऋषियों ने अपनी पुत्री के साथ समागम किया ?
२. इनमें से कितने ही ऋषियों ने बलि प्रथा का समर्थन किया ?
३. कितने ही ऋषियों ने अश्व शिश्न लेने को कहा ?
४. कितने ही ऋषियों ने गौ मांस खाने को कहा ?
५. कितने ऋषियों ने कहा कि वैदिकी हिंसा , हिंसा नहीं होती ?
जवाब है एक ने भी नहीं ।
कृपया सायण की गलतियों को वैदिक ऋषियों के ऊपर तथा वेद मंत्रों के ऊपर थोपने की कोशिश ना करें ।
आप या आपके सायन निरुक्तकार महर्षि यास्क से अधिक नहीं जानते ।
आपकी बात से चला जाए तो कल्प और निरुक्त , श्रुति और श्रुति मैं ही परस्पर विरोध देखने को मिलता है जो कि तर्क से पूर्णतः विपरीत है और अन्य ग्रंथों के अनुसार भी आपकी बातें पूर्ण रूप से निरर्थक साबित होती हैं ।
साथ ही आपको बुद्ध वचन कुछ ज्यादा ही पसंद आ रहे हैं तो आपको चलिए बुद्ध वचनों से ही यज्ञ का आधार होना सिद्ध करते हैं फिर देखते हैं आपने बुद्ध के बारे में सही मायने में कितना पढ़ा है ??
👍2❤1
@Fogiesmhd67 and @Manuvadii
Aaj hi Tum dono log timing and topic decide kar lo
Sunday ko debate hogi
Islam v/s Sanatana dharma
Aaj hi Tum dono log timing and topic decide kar lo
Sunday ko debate hogi
Islam v/s Sanatana dharma
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शीर्षक: भगवान कृष्ण का पुनरावृत्ति: गीता जयंती का उत्सव
गीता जयंती, जिसे लाखों हिन्दुओं द्वारा मनाया जाता है, भगवद गीता के जन्मोत्सव के रूप में होता है, जो भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर अर्जुन को दिए गए गहन शिक्षाओं का समर्थन करता है। पारंपरिक कथाओं के परे, गीता जयंती हमें भगवान कृष्ण के चरित्र के नांसूची पहलुओं में गहराई से जानने का अवसर प्रदान करती है, विशेषकर उस धारात्म्यपूर्ण किरदार को छोड़कर, जो उसे केवल एक शरारती "माखन चोर" (मक्खन चुराने वाला) मानते हैं।
कृष्ण के खेलनेवाले छवि के विरुद्ध, गीता जयंती हमें उसे एक दुर्दम योद्धा के रूप में स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के क्षेत्र के रूप में यह स्थान का कारण बनता है, जहां भगवान कृष्ण अर्जुन के रथचालक के रूप में उपस्थित होते हैं। यह स्थिति कृष्ण की रणनीतिक कुशलता और महायुद्ध में उसकी सक्रिय भागीदारी को सार्थक बनाती है, जिससे साफ होता है कि वह केवल एक दिव्य शैतान नहीं बल्कि एक कुशल सैन्य नेता भी थे।
भगवद गीता में, भगवान कृष्ण अर्जुन को अमृतलिपि बुद्धिमत्ता और नेतृत्व की भूमिका में अनमोल ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इस पिवटल शास्त्र में, कृष्ण का बोध विवेकीता और आध्यात्मिक ज्ञान का शिक्षानिष्ठ योगी के रूप में साक्षात्कार कराता है। महान दार्शनिक और आध्यात्मिक नेता स्वामी दयानंद, ने भगवान कृष्ण को एक गहन योगी के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो उन सामान्यवादी छवियों से दूर थी जोने उसकी छवि को कुछ बनाए रखा था।
भगवद गीता के उपदेश धर्म (कर्तव्य) और योग (एकता) के सिद्धांतों पर जोर देते हैं, जो आध्यात्मिक जागरूकता और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। भगवान कृष्ण का वाक्य व्यक्तियों को जीवन की चुनौतियों का सामना शान्ति से करने और स्वार्थहीनता से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है, व्यक्ति को बड़े ब्रह्मांडीय अनुक्रमण के साथ समर्थित करने की दिशा में।
इस प्रकार, गीता जयंती हमें भगवान कृष्ण के बहुपक्षीय स्वभाव को पुनः देखने और मूल्यांकन करने का मौका प्रदान करती है। उन्हें केवल एक दिव्य प्रतिमा के रूप में ही नहीं बल्कि एक बुद्धिमत्ता से भरपूर योद्धा और सच्चे योगी के रूप में मान्यता देकर, हम उन सरल चित्रणों से पार पा सकते हैं जोने भगवद गीता में समर्थित उदाहरणों को कमजोर कर दिया हैं। जब हम गीता जयंती को मनाते हैं, तो हमें भगवान कृष्ण के चरित्र की सार को पुनः खोजने और उस अविरल ज्ञान को ग्रहण करने का अवसर है जो साधकों को उनके आध्यात्मिक यात्रा पर मार्गदर्शन करना जारी रखता है।भगवद गीता के उपदेश धर्म (कर्तव्य) और योग (एकता) के सिद्धांतों पर जोर देते हैं, जो आध्यात्मिक जागरूकता और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। भगवान कृष्ण का वाक्य व्यक्तियों को जीवन की चुनौतियों का सामना शान्ति से करने और स्वार्थहीनता से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है, व्यक्ति को बड़े ब्रह्मांडीय अनुक्रमण के साथ समर्थित करने की दिशा में।
इस प्रकार, गीता जयंती हमें भगवान कृष्ण के बहुपक्षीय स्वभाव को पुनः देखने और मूल्यांकन करने का मौका प्रदान करती है। उन्हें केवल एक दिव्य प्रतिमा के रूप में ही नहीं बल्कि एक बुद्धिमत्ता से भरपूर योद्धा और सच्चे योगी के रूप में मान्यता देकर, हम उन सरल चित्रणों से पार पा सकते हैं जोने भगवद गीता में समर्थित उदाहरणों को कमजोर कर दिया हैं। जब हम गीता जयंती को मनाते हैं, तो हमें भगवान कृष्ण के चरित्र की सार को पुनः खोजने और उस अविरल ज्ञान को ग्रहण करने का अवसर है जो साधकों को उनके आध्यात्मिक यात्रा पर मार्गदर्शन करना जारी रखता है।
धन्यवाद सहित
सन्दीपन राय
गीता जयंती, जिसे लाखों हिन्दुओं द्वारा मनाया जाता है, भगवद गीता के जन्मोत्सव के रूप में होता है, जो भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर अर्जुन को दिए गए गहन शिक्षाओं का समर्थन करता है। पारंपरिक कथाओं के परे, गीता जयंती हमें भगवान कृष्ण के चरित्र के नांसूची पहलुओं में गहराई से जानने का अवसर प्रदान करती है, विशेषकर उस धारात्म्यपूर्ण किरदार को छोड़कर, जो उसे केवल एक शरारती "माखन चोर" (मक्खन चुराने वाला) मानते हैं।
कृष्ण के खेलनेवाले छवि के विरुद्ध, गीता जयंती हमें उसे एक दुर्दम योद्धा के रूप में स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के क्षेत्र के रूप में यह स्थान का कारण बनता है, जहां भगवान कृष्ण अर्जुन के रथचालक के रूप में उपस्थित होते हैं। यह स्थिति कृष्ण की रणनीतिक कुशलता और महायुद्ध में उसकी सक्रिय भागीदारी को सार्थक बनाती है, जिससे साफ होता है कि वह केवल एक दिव्य शैतान नहीं बल्कि एक कुशल सैन्य नेता भी थे।
भगवद गीता में, भगवान कृष्ण अर्जुन को अमृतलिपि बुद्धिमत्ता और नेतृत्व की भूमिका में अनमोल ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इस पिवटल शास्त्र में, कृष्ण का बोध विवेकीता और आध्यात्मिक ज्ञान का शिक्षानिष्ठ योगी के रूप में साक्षात्कार कराता है। महान दार्शनिक और आध्यात्मिक नेता स्वामी दयानंद, ने भगवान कृष्ण को एक गहन योगी के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो उन सामान्यवादी छवियों से दूर थी जोने उसकी छवि को कुछ बनाए रखा था।
भगवद गीता के उपदेश धर्म (कर्तव्य) और योग (एकता) के सिद्धांतों पर जोर देते हैं, जो आध्यात्मिक जागरूकता और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। भगवान कृष्ण का वाक्य व्यक्तियों को जीवन की चुनौतियों का सामना शान्ति से करने और स्वार्थहीनता से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है, व्यक्ति को बड़े ब्रह्मांडीय अनुक्रमण के साथ समर्थित करने की दिशा में।
इस प्रकार, गीता जयंती हमें भगवान कृष्ण के बहुपक्षीय स्वभाव को पुनः देखने और मूल्यांकन करने का मौका प्रदान करती है। उन्हें केवल एक दिव्य प्रतिमा के रूप में ही नहीं बल्कि एक बुद्धिमत्ता से भरपूर योद्धा और सच्चे योगी के रूप में मान्यता देकर, हम उन सरल चित्रणों से पार पा सकते हैं जोने भगवद गीता में समर्थित उदाहरणों को कमजोर कर दिया हैं। जब हम गीता जयंती को मनाते हैं, तो हमें भगवान कृष्ण के चरित्र की सार को पुनः खोजने और उस अविरल ज्ञान को ग्रहण करने का अवसर है जो साधकों को उनके आध्यात्मिक यात्रा पर मार्गदर्शन करना जारी रखता है।भगवद गीता के उपदेश धर्म (कर्तव्य) और योग (एकता) के सिद्धांतों पर जोर देते हैं, जो आध्यात्मिक जागरूकता और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। भगवान कृष्ण का वाक्य व्यक्तियों को जीवन की चुनौतियों का सामना शान्ति से करने और स्वार्थहीनता से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है, व्यक्ति को बड़े ब्रह्मांडीय अनुक्रमण के साथ समर्थित करने की दिशा में।
इस प्रकार, गीता जयंती हमें भगवान कृष्ण के बहुपक्षीय स्वभाव को पुनः देखने और मूल्यांकन करने का मौका प्रदान करती है। उन्हें केवल एक दिव्य प्रतिमा के रूप में ही नहीं बल्कि एक बुद्धिमत्ता से भरपूर योद्धा और सच्चे योगी के रूप में मान्यता देकर, हम उन सरल चित्रणों से पार पा सकते हैं जोने भगवद गीता में समर्थित उदाहरणों को कमजोर कर दिया हैं। जब हम गीता जयंती को मनाते हैं, तो हमें भगवान कृष्ण के चरित्र की सार को पुनः खोजने और उस अविरल ज्ञान को ग्रहण करने का अवसर है जो साधकों को उनके आध्यात्मिक यात्रा पर मार्गदर्शन करना जारी रखता है।
धन्यवाद सहित
सन्दीपन राय
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सुत्त पीटक , खुद्दकनिकाय , मिलिंदपाठ , बहिर कथा में एक व्यक्ति का जिक्र आता है जिसका नाम मिलिंद था । वह बुद्धिमान , योग्य , शिक्षित , ज्ञानी , वाद विवाद में प्रवीण तथा जिज्ञासु था ।
साथ ही उसे श्रुति , स्मृति , पुराण , इतिहास , छह वेदांग सांख्य , योग , न्याय और वैशेषिक दर्शन , चार वेद , चार उपवेद इत्यादि सभी शास्त्रों का विशेष रूप से ज्ञान था ।
सवाल उठता है कि अगर ब्राह्मण दसवीं सदी के बाद आए तो त्रिपिटक मैं यह सब क्यों मिल रहा है ? अगर कहो ब्राह्मणों की बाद में की गई मिलावट है , तो यह त्रिपिटक के विविध रूपों में देखने को क्यों मिलता है ??
और क्या ब्राह्मणों के पास इतना समय था कि दसवीं सदी के बाद आने के बाद भी वह किसी और के शास्त्र में मिलावट कर सकें जबकि वह अपने ही शास्त्र को मिलावट से न बचा सके ??
साथ ही उसे श्रुति , स्मृति , पुराण , इतिहास , छह वेदांग सांख्य , योग , न्याय और वैशेषिक दर्शन , चार वेद , चार उपवेद इत्यादि सभी शास्त्रों का विशेष रूप से ज्ञान था ।
सवाल उठता है कि अगर ब्राह्मण दसवीं सदी के बाद आए तो त्रिपिटक मैं यह सब क्यों मिल रहा है ? अगर कहो ब्राह्मणों की बाद में की गई मिलावट है , तो यह त्रिपिटक के विविध रूपों में देखने को क्यों मिलता है ??
और क्या ब्राह्मणों के पास इतना समय था कि दसवीं सदी के बाद आने के बाद भी वह किसी और के शास्त्र में मिलावट कर सकें जबकि वह अपने ही शास्त्र को मिलावट से न बचा सके ??
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Tulsi divas ki hardik shubhkamnaye 🙏
And Illogical Christianity se dur hi rahe
Bharatvarsha k indigenous culture ko conserve kare
Tulsi ka charak samhita me bahut bada role hai jaha pe Aupsargic ( contagious) diseases k treatment me uska use hota hai
We were much more advanced than the remaining world even thousands of years ago
And Illogical Christianity se dur hi rahe
Bharatvarsha k indigenous culture ko conserve kare
Tulsi ka charak samhita me bahut bada role hai jaha pe Aupsargic ( contagious) diseases k treatment me uska use hota hai
We were much more advanced than the remaining world even thousands of years ago
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Le panda babu 🐼🐼 after doing saste nashe 🥴🥴
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