नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम ।
पाणौ महासायकचारूचापं ,
नमामि रामं रघुवंशनाथम ॥
श्रीराम नवमी तथा नवरात्रि के नवम दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।
भगवान श्रीराम तथा मां सिद्धिदात्री सबका कल्याण करें । 🙏
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पाणौ महासायकचारूचापं ,
नमामि रामं रघुवंशनाथम ॥
श्रीराम नवमी तथा नवरात्रि के नवम दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।
भगवान श्रीराम तथा मां सिद्धिदात्री सबका कल्याण करें । 🙏
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पशुबन्ध यज्ञों का सांकेतिक निरूपण :-
पुरुषमेध, अश्वमेध और गौमेध मनस , प्राण और वाक् के अनुरूप तीन प्रमुख रूप हैं। इस ऋग्वैदिक भाषा को केवल स्पष्ट शब्दों और अर्थों के शाब्दिक सांचे की तरह नहीं खोजा जाना चाहिए। द्रष्टा रहस्यपूर्ण बातें करते हैं, क्योंकि देवता गूढार्थ पसंद करते हैं।
~ VS Agrawala , the well-known historian and Sanskrit Scholar
It's ridiculous to believe that they actually consist literal things like "human , cow and horse sacrifices."
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पर्दा कुप्रथा एवं नारीवाद :- मेरा दृष्टिकोण
आज स्त्रियाँ पर्दा करती हैं , क्योंकि ऐसा न करना निर्लज्जता का प्रतीक माना जाता है | कई बार इसी कारण तथाकथित नारीवादी नामक एलियन अक्सर इसको लेकर धर्मनिन्दा करने से बाज़ नहीं आते |
परन्तु हमारे संपूर्ण वैदिक वांग्मय में परदे का कोई प्रमाण नहीं मिलता | महर्षि पतंजलि के महाभाष्य में भी हमें पर्दा जैसी चीज़ का कोई उल्लेख प्राप्त नही होता | शुंगकालीन नारी इनके बिना भी पूर्ण थी , सक्षम थी , क्योंकि वो स्वयं समाज का एक ऐसा अंग थी जो उसे दिशा दिखाती थी ।
वह माता बन संस्कारदायिनी , भगिनी बन चरित्रदायिनी , उपाध्याया बन विद्यादायिनी , वीरांगना बन राष्ट्रवादिनी, संक्षेप में कहें तो , उसने अपने इन नामों को सार्थक तथा पदों को गौरवान्वित करते हुए अपने तथा समस्त नारी जाति को मणि की भांति अलंकृत किया ।
आज भी स्त्रियों को भी वैसा बनने की जरूरत है , न कि कुछ मूर्खाओं के बहकावे सोशल मीडिया तथा समाज में भी अश्लीलता तथा सूडो-फेमिनिज्म का बाण चलाने की । आप देवी सुनना चाहती हो , परंतु देवी बनना नहीं चाहती , यह दोहरापन क्यों ? जब कोई बिना योग्यता किये वैज्ञानिक नहीं बन सकता , ये तो फिर भी बहुत बड़ी बात है ।
नीतिशास्त्रविशारद आचार्य चाणक्य के अनुसार स्त्री का सुन्दर चरित्र और लज्जा , यही उसके कवच होते हैं |
मेरे विचार में तो संस्कारों के अभाव में चारदीवारी में बंद स्त्रियाँ भी चरित्रहीन बन सकतीं हैं | वैसे यहां पूरी गलती स्त्रियों की भी नहीं है । तुम शारीरिक रूप से तो उन्हें रोक सकते हो , परंतु मानसिक , वैचारिक और भावनात्मक रूप से कैसे रोकोगे ?
पुरुषों को भी अपना योगदान देना चाहिए , क्योंकि आज नारी पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है । पुरुषों को भी यह समझना होगा कि स्त्रियां उनसे छोटी नहीं है और उनसे सहायता लेना या उनसे विनम्र होना उन्हें छोटा नहीं , अपितु और सहज बनाता है । आज के समय पुरुष कुछ चरित्रहीन नारियों को देखकर सोचते हैं कि इन्हें बंद रखना ज्यादा उचित था , नारी नरक का द्वार आदि...
परंतु हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या उन कुछ नारियों के कारण हमें समूची नारीजाति को ही गलत बोलना चाहिए ? उन कुछ स्त्रियों का पाप संपूर्ण स्त्री जाति क्यों भुगते ?
पुरुषों को भी अपनी सोच विस्तृत करने की आवश्यकता है , तो साथ ही साथ स्त्रियों को भी अपने चरित्र को उज्जवल बनाने की आवश्यकता है ।
अतः हे नारियों !! अपना चरित्र सुन्दर बनाओ , स्वयं को इतना सशक्त बनाओ कि आने वाले समय में न सिर्फ तुम स्वयं की अपितु समाज के हर नर-नारी , बच्चे-बूढ़े की रक्षा कर सको !
और इंटरनेट की स्वघोषित विदुषियों से ४ कदम दूरी बनाना ही उचित होगा ! अगर ये चाहती हैं कि हम बेबात के इन्हें हम देवी पद से संबोधित करें , तो यह उनकी कल्पना में भी नहीं होने वाला ।
देवी की भांति कार्य करो , तो विद्वानजन तुम्हें स्वयं देवी कहेंगे , क्योंकि सम्मान महिषासुरमर्दिनी का होता है , पूतनाओं का तो बस मर्दन होता है !!!
~ वैनतेय गरुड़ 🦅
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सांख्याचार्य महर्षि पंचशिख द्वारा "वैदिकी हिंसा , हिंसा न भवति" आदि कुतर्कों का खंडन एवं अहिंसा का प्रतिपादन...
महर्षि पंचशिख , भगवान् परमर्षि कपिल के शिष्य आसुरि जी के शिष्य थे | महाभारत के शांतिपर्व में उनके दिए गये उपदेश तथा उनका इतिहास संगृहित हैं | महाराज जनदेव जनक उनके शिष्य थे |
महर्षि पंचशिख , भगवान् परमर्षि कपिल के शिष्य आसुरि जी के शिष्य थे | महाभारत के शांतिपर्व में उनके दिए गये उपदेश तथा उनका इतिहास संगृहित हैं | महाराज जनदेव जनक उनके शिष्य थे |
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There are some annexations between sites like Dholavira and the Rigvedic verses , like the Puras (पुर) with hundred (here; many) walls.
Courtesy :- It's time to rethink , Dr. BB Lal (former director of ASI)
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हमने आज तक सुना होगा कि सिर्फ एक औषधि संजीवनी से लक्ष्मणजी को पूर्ण स्वस्थ किया गया था | परन्तु ये अधूरा सत्य है |
वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब इन्द्रजित के ब्रह्मास्त्र से संपूर्ण वानरसेना पीड़ित थी , तब जाम्बवान जी ने हनुमान जी को ४ औषधियों को लेन का आदेश दिया था | उनके नाम हैं , मृतसंजीवनी , विशल्यकरणी . सुवर्णकरणी तथा संधानी |
ये औषधियां उत्तर में कैलाशपर्वत और ऋषभपर्वत के मध्य के पर्वतशिखर पर मिलती थी | इनके प्रभाव का वर्णन पूर्वाचार्यों की टीका में कुछ इस प्रकार है :-
सन्दर्भ :- युद्धकाण्ड , अध्याय ७४ (पूर्वाचार्यों की टीका)
वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब इन्द्रजित के ब्रह्मास्त्र से संपूर्ण वानरसेना पीड़ित थी , तब जाम्बवान जी ने हनुमान जी को ४ औषधियों को लेन का आदेश दिया था | उनके नाम हैं , मृतसंजीवनी , विशल्यकरणी . सुवर्णकरणी तथा संधानी |
ये औषधियां उत्तर में कैलाशपर्वत और ऋषभपर्वत के मध्य के पर्वतशिखर पर मिलती थी | इनके प्रभाव का वर्णन पूर्वाचार्यों की टीका में कुछ इस प्रकार है :-
१. मृतसंजीवनी = चेतनादायिनी औषधि
२. विशल्यकरणी = शल्यकर्म में प्रयुक्त , व्रण तथा अन्य गहरे घावों के उपचार हेतु लेन वाली
३. सुवर्णकरणी = विषादि से मंद हुई कांति को वापस लाने वाली
४. संधानी = अस्थि व छिन्नभिन्न हुई शिराओं को जोड़ने वाली
सन्दर्भ :- युद्धकाण्ड , अध्याय ७४ (पूर्वाचार्यों की टीका)
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भारतवर्ष में स्त्री-राज्य :-
हवेंत्सांग जो 7th century में भारत आया था , उसने ब्रह्मपुर क्षेत्र से उत्तर में स्थित हिमालय के अंचल में बसे सुवर्णगोत्र देश (वर्त्तमान समय में गढ़वाल-कुमाउनी क्षेत्र) का उल्लेख करता है , जिस राज्य की शासिका सदियों से स्त्रियाँ ही रही हैं | इस देश को प्राच्यस्त्रीराज्य भी कहा जाता है |
वहां पर राजा अवश्य होता है , परन्तु राज्य में उसकी कोई भूमिका नहीं होती (सिर्फ नाम का राजा होता है) | इस देश में वर्णित सामाजिक व्यवस्था का विवरण हमें गरुड़पुराण व 11th century के बिल्हणकृत विक्रमांकदेवचरित में देखने को मिलता हैं |
मेगस्थेनीस व अर्रियन कृत इंडिका में भी पांड्यराज्य में स्त्री-शासन होने का विवरण मिलता है | इसका स्थान भारत के दक्षिण भाग में स्थित मालाबार है , जो सदा से मातृसत्तात्मक रहा है |
इस प्रकार प्राचीन भारत में स्त्री-राज्य का विवरण हमें मौर्य काल से लेकर चालुक्यवंश तक मिलता है | इनके मध्यकाल में आने वाले अन्य स्त्री-राज्यों की बात हम अगली पोस्ट में करेंगे |
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आज कुछ कौवे देवी दुर्गा को काल्पनिक कहते हैं | कारण, देवी के नाम पर फैला हुआ पाखंड और स्ववैचारिक द्वेष से बढ़कर कुछ नही |
वास्तविक दक्षिणमार्गी (वैदिक) शाक्त मत में ये सभी उपासनाएं वर्जित हैं |
प्रश्न : फिर देव्योपासना करते कैसे हैं ?
उत्तर : सात्विक | जैसे कांस्य/ताम्रपात्र में मधु/नारिकेलजल समर्पित करना , जिसको वाममार्गियों ने मदिरा बताया |
इसकी प्रमाणिकता ये है कि ये ग्रंथ लगभग 9 प्राचीन व पारंपरिक आगमों का समन्वित रूप है | आचार्य मुलर खुद नंदीपरम्परा से हैं , जो शैवों में अत्यंत उत्कृष्ट मानी जाती है |
मनुष्यकृत्यों की अतिप्रसक्ति करना व प्रमाणहीन होकर देवीमाँ को काल्पनिक बोलना बंद करें |
वास्तविक दक्षिणमार्गी (वैदिक) शाक्त मत में ये सभी उपासनाएं वर्जित हैं |
प्रश्न : फिर देव्योपासना करते कैसे हैं ?
उत्तर : सात्विक | जैसे कांस्य/ताम्रपात्र में मधु/नारिकेलजल समर्पित करना , जिसको वाममार्गियों ने मदिरा बताया |
2nd century BCE में लिखे ग्रन्थ तिरुमंदिरम में आचार्य तिरुमुलर बताते हैं :-
जो लोग माता पराशक्ति की उपासना के नाम पर मांस-मदिरा-मैथुनरत रहते हैं, पशुबलि देते हैं उनका कभी कल्याण नही होता | इनका जीवन व्यर्थ है | वाममार्ग से हटकर ये दक्षिणमार्गी आचार्य अहिंसा को बढ़ावा देते हैं तथा योगमार्ग, यज्ञ, यंत्रपूज, बीजमन्त्र आदि के द्वारा ही देव्योपासन को सर्वोचित मानते हैं | इनके विचार वेदान्त तथा योग से मिलते हैं |
इसकी प्रमाणिकता ये है कि ये ग्रंथ लगभग 9 प्राचीन व पारंपरिक आगमों का समन्वित रूप है | आचार्य मुलर खुद नंदीपरम्परा से हैं , जो शैवों में अत्यंत उत्कृष्ट मानी जाती है |
मनुष्यकृत्यों की अतिप्रसक्ति करना व प्रमाणहीन होकर देवीमाँ को काल्पनिक बोलना बंद करें |
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Divided by caste and religion , United by Temples :-
Sangam Buddhist Text Manimekalai of 2nd-3rd century CE , mentions a temple of Devi Kali in Southern India , worshipped there as Goddess Champapati.
It was open for everyone and every sect in the society. The Nāyika of the text, Manimekalai was herself a Buddhist Bhikshuni. She also used to visit the temple to worship Devi. In fact , She used to feed thousands of hungry people in the temple , daily. Legend says it was due to Devi's bestowing , the Akshaya Patra.
The temple is said to be an Asylum for all the suffering people. It was a place where the अशरणशरणद line was literally in effect.
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हमारे कौवा माफ़ कीजिये कवन जी को कही भूलने की बीमारी तो नहीं लग गया ?😨
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The first Indian epigraphical evidence of Halley's comet is recently found in a 15th century Inscription in Mallikarjuna Jyotirlinga temple , Srisailam , Andhrapradesh !!
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You can read the entire report here !!
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क्या यज्ञ बौद्धों से अर्वाचीन हैं ?
नव-बौद्ध अक्सर बोलते हैं कि यज्ञ आदि ब्राह्मणों ने 10वीं शताब्दी के बाद करना शुरू किया | परन्तु क्या आप जानते हैं ?
2nd century CE में लिखे मूलश्रावस्तिवाद बौद्धों के प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ दिव्यावदान में यूप का उल्लेख आता है , जिसकी व्याख्या हमें शतपथादि ब्राह्मण ग्रंथों में मिल जाती है | इतना ही नहीं , अपितु दिव्यावदान यूप को धर्मंचिह्न की भी उपाधि देता है |
संभवतः , इसी धर्मंचिह्न से धर्मस्तम्भ की उत्पत्ति हुई थी | इसका एक और उदाहरण हमें वृषभचिह्न के रूप में भी मिलता है , जिसको अशोक ने रामपुरवा में बनवाया था | पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार धर्मग्रंथों में वर्णित धर्मंरुपी वृषभ ही इस धर्मचिह्न का आधार है |
Courtesy :- Indian arts . VS Agrawala
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