संगम ग्रंथ में वर्णित एकादश दैवीय नृत्य :-
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Written by :- Mystical Garuda 🦅
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परिवार में सहस्त्र लोग जुड़ गए हैं । सभी को सहृदय धन्यवाद 😼🙏
आप सभी के सहयोग के बिना ये मुश्किल था ।
मैं अपने अपने अग्रज कार्तिक जी , आशीष जी , आर्य बोस भैया , प्रिय मित्र पुष्यमित्र , भ्राता रौक्सी व श्रुतिका दीदी का विशेष धन्यवाद करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे रोज कुछ न कुछ नया सीखने का अवसर प्रदान किया ।
बाकी आप लोग जुड़े रहें , आगे भी अनोखी पोस्ट आएंगी ।
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देवी जयति दानवदारणतीक्ष्णशूलः
सिंहोग्रयुक्तरथं आसीत् चण्डवेगः 🙏🙏
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यदि ब्राह्मण धर्म 12वीं शताब्दी के बाद आया, तो ये देवता कहाँ से आये ? उस काल में तो महायान का विकास नहीं हुआ था और न ही अशोक महायानी था। आगे तो इंसानों के स्वर्ग जाने की भी चर्चा आई है।
महान वैज्ञानिक नवबौद्धों से निवेदन है कि कृपया इसे समझाएं।
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और हाँ, यह अशोक का रूपनाथ लघु शिलालेख (Ashoka's Minor Rock Edict Roopnath) है।
महान वैज्ञानिक नवबौद्धों से निवेदन है कि कृपया इसे समझाएं।
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Forwarded from पुराण प्रवचन
क्या वैदिक धर्म में पृथ्वी को चपटी कहा गया है?
सामवेद के ब्राह्मण ग्रंथ जैमिनीय ब्राह्मण (१/२५७) में आया है की-
अर्थात - सूर्य गोल है, चंद्रमा गोल है, द्यौलोक गोल है,आकाश (वायु मंडल) गोल है तथा यह पृथ्वी भी गोल है।
यहां पृथ्वी के लिए स्पष्ट परिमण्डल शब्द आया है जिसका अर्थ आप्टे संस्कृत शब्दकोश में Spherical दिया हुआ है।
इस से सिद्ध हुआ की वैदिक धर्म में जैसे सूर्य चंद्र आदि ग्रहों को गोल माना गया हैं उसी प्रकार पृथ्वी को भी गोल माना गया है।😎😎
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सामवेद के ब्राह्मण ग्रंथ जैमिनीय ब्राह्मण (१/२५७) में आया है की-
"परिमण्डल आदित्यः परिमण्डलश्चन्द्रमाः परिमण्डला द्यौः परिमण्डलमन्तरिक्षं परिमण्डलेयं पृथिवी"
अर्थात - सूर्य गोल है, चंद्रमा गोल है, द्यौलोक गोल है,आकाश (वायु मंडल) गोल है तथा यह पृथ्वी भी गोल है।
यहां पृथ्वी के लिए स्पष्ट परिमण्डल शब्द आया है जिसका अर्थ आप्टे संस्कृत शब्दकोश में Spherical दिया हुआ है।
इस से सिद्ध हुआ की वैदिक धर्म में जैसे सूर्य चंद्र आदि ग्रहों को गोल माना गया हैं उसी प्रकार पृथ्वी को भी गोल माना गया है।😎😎
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Forwarded from 🕉꧁सत्य अनुसन्धान केंद्र ꧂🕉
वर्ष 1941. 16 जनवरी की मध्य रात्रि। यह कहा जा सकता है कि वह 17 जनवरी थी। उस समय पूरा देश सो रहा था। अँधेरा छंटने और सुबह होने से पहले उसे शहर छोड़ना पड़ा। क्योंकि उसे एक नई सुबह की तलाश में विभिन्न देशों की यात्रा करनी होगी। पराधीनता का यह अंधकार कब तक रहेगा? इसका बहुत समय हो गया! कितने आंदोलन, कितने शहीद हुए। उसे इस अंधकार पर विजय पाना होगा। उन्हें यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी अवश्य लेनी चाहिए। कांग्रेस के आंदोलन से कुछ नहीं होगा. उसे देश से बाहर जाना होगा. आज से 84 वर्ष पहले, सुभाष ने भारत के उन लोगों के अधिकारों को बहाल करने का बीड़ा उठाया, जो उस रात चैन की नींद सो रहे थे। दण्ड प्रताप ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। हाँ, आज ही है महान निष्क्रमण दिवस। जिस प्रकार युगपराक्रमी महाराजा छत्रपति शिवाजी औरंगजेब को चकमा देकर उनके सामने से निकल गए थे, शायद महाराज शिवाजी फिरसे देश को अंग्रेजों से बचाने के लिए सुभाष के रूप में वापस आए थे।
घर में नजरबंद सुभाष ने अंग्रेजों को मूर्ख बनाया और काबुल की ओर चल पड़े। इससे पहले भी कई बार वह अपना घर छोड़कर अंग्रेजों को मूर्ख बना चुके हैं। लेकिन इसकी तुलना इस समय से नहीं की जा सकती। एक लबादा पहने हुए. एक ही ठोड़ी. सिर पर पगड़ी. बीमा एजेंट का बेस भूसा। नाम : जियाउद्दीन. यह योजना दीर्घकालिक है। अंग्रेजों को उन्हें जेल से रिहा करने, भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए मजबूर करना, उन्हें घर में नजरबंद रखना, सब कुछ योजना के अनुसार हुआ। उत्तम योजना. जिनके पीछे भैया शरत चंद्र बोस हैं। कई अन्य लोग भी जानते थे। कुछ ज़्यादा, कुछ कम. हालाँकि, कई लोगों को संदेह था कि कुछ होने वाला है। लेकिन उस दिन किसी को अंदाजा भी नहीं था कि सुभाष ने इतना बड़ा फैसला ले लिया है। क्योंकि उस समय घर में नजरबंद सुभाष ने मौन व्रत धारण कर रखा था। उन्होंने अपना भोजन भी कम कर दिया है। कई लोग सोचते हैं कि वह संत बन जायेगा। दादाजी को सच्चाई पता थी, और दो अन्य लोगों को भी। आपमें से बहुत से लोग नेताजी की कठिन यात्रा से कमोबेश परिचित होंगे। आपने कितने भेष बदले हैं, कितने कठिन रास्तों पर चले हैं, कितने देशों की यात्रा की है, कितने लोगों से मिले हैं? उस रात के बाद, उन्होंने कभी कोलकाता के आकाश में सूरज नहीं देखा, न ही अपनी मां का चेहरा देखा। वह अपने प्रियजनों से नहीं मिल सका। नेताजी को शायद उस समय यह पता नहीं था कि उनके कार्य का भविष्य क्या होगा। फिर भी वह कभी भी युद्ध का मैदान छोड़ने को तैयार नहीं था। (एक बार एक पठान, जिसकी मदद नेताजी ने काबुल जाने के लिए पेशावर में ली थी, ने कहा था... "हम इस गर्म, रेतीली भूमि में पैदा हुए हैं, हम इसके आदी हैं। लेकिन भक्तराम तलवार और मैं इसके साथ नहीं रह सके।" सुभाष बाबू के साथ। हम बैठे-बैठे हांफ रहे थे। लेकिन मैंने सुभाष बाबू की आंखों में कोई थकान नहीं देखी। वह बस यही कह रहे थे कि मैं रुक नहीं सकता, मुझे जल्द से जल्द अफगानिस्तान पार करना है। ओह, शेर का बच्चा था, बंगाल का शेर".....)
घर में नजरबंद सुभाष ने अंग्रेजों को मूर्ख बनाया और काबुल की ओर चल पड़े। इससे पहले भी कई बार वह अपना घर छोड़कर अंग्रेजों को मूर्ख बना चुके हैं। लेकिन इसकी तुलना इस समय से नहीं की जा सकती। एक लबादा पहने हुए. एक ही ठोड़ी. सिर पर पगड़ी. बीमा एजेंट का बेस भूसा। नाम : जियाउद्दीन. यह योजना दीर्घकालिक है। अंग्रेजों को उन्हें जेल से रिहा करने, भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए मजबूर करना, उन्हें घर में नजरबंद रखना, सब कुछ योजना के अनुसार हुआ। उत्तम योजना. जिनके पीछे भैया शरत चंद्र बोस हैं। कई अन्य लोग भी जानते थे। कुछ ज़्यादा, कुछ कम. हालाँकि, कई लोगों को संदेह था कि कुछ होने वाला है। लेकिन उस दिन किसी को अंदाजा भी नहीं था कि सुभाष ने इतना बड़ा फैसला ले लिया है। क्योंकि उस समय घर में नजरबंद सुभाष ने मौन व्रत धारण कर रखा था। उन्होंने अपना भोजन भी कम कर दिया है। कई लोग सोचते हैं कि वह संत बन जायेगा। दादाजी को सच्चाई पता थी, और दो अन्य लोगों को भी। आपमें से बहुत से लोग नेताजी की कठिन यात्रा से कमोबेश परिचित होंगे। आपने कितने भेष बदले हैं, कितने कठिन रास्तों पर चले हैं, कितने देशों की यात्रा की है, कितने लोगों से मिले हैं? उस रात के बाद, उन्होंने कभी कोलकाता के आकाश में सूरज नहीं देखा, न ही अपनी मां का चेहरा देखा। वह अपने प्रियजनों से नहीं मिल सका। नेताजी को शायद उस समय यह पता नहीं था कि उनके कार्य का भविष्य क्या होगा। फिर भी वह कभी भी युद्ध का मैदान छोड़ने को तैयार नहीं था। (एक बार एक पठान, जिसकी मदद नेताजी ने काबुल जाने के लिए पेशावर में ली थी, ने कहा था... "हम इस गर्म, रेतीली भूमि में पैदा हुए हैं, हम इसके आदी हैं। लेकिन भक्तराम तलवार और मैं इसके साथ नहीं रह सके।" सुभाष बाबू के साथ। हम बैठे-बैठे हांफ रहे थे। लेकिन मैंने सुभाष बाबू की आंखों में कोई थकान नहीं देखी। वह बस यही कह रहे थे कि मैं रुक नहीं सकता, मुझे जल्द से जल्द अफगानिस्तान पार करना है। ओह, शेर का बच्चा था, बंगाल का शेर".....)
ऐसा आदमी आज हमारे लिए न केवल आदर्श है, बल्कि ईश्वर से मिलन भी है। जिसने इस देश के लिए अपना सारा सुख-चैन त्याग दिया, और उस देश के कुछ स्वार्थी लोगों ने उसे क्या दिया? हम क्या दे सकते थे? माफ़ करना 'नेताजी'।"फिरता रहा मैं देश देश, मन में उसे बसाए...उसके इर्द-गिर्द जीवन के लम्हे मिटाए, बनाए" - Bose the forgotten hero, P-142
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🕉꧁सत्य अनुसन्धान केंद्र ꧂🕉
वर्ष 1941. 16 जनवरी की मध्य रात्रि। यह कहा जा सकता है कि वह 17 जनवरी थी। उस समय पूरा देश सो रहा था। अँधेरा छंटने और सुबह होने से पहले उसे शहर छोड़ना पड़ा। क्योंकि उसे एक नई सुबह की तलाश में विभिन्न देशों की यात्रा करनी होगी। पराधीनता का यह अंधकार कब तक रहेगा?…
Credit :- Arya Bose Bhaiya 🙏🙏
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राजर्षी उपरिचर के हिंसा रहित अश्वमेध यज्ञ।
महाभारत के शान्तिपर्व में हमे राजर्षी उपरिचर के द्वारा आयोजित अश्वमेध यज्ञ के वर्णन मिलता है।
उस यज्ञ में भाग लिए कुछ प्रशिद्ध ऋषि: उस यज्ञ में ऋषि श्रेष्ठ कपिल, तांड्य ब्राह्मण के रचयिता महर्षी तांड्य, तैत्तिरीयब्राह्मण के रचयिता महर्षी तैत्तिर, यजुर्वेद के काण्व शाखा के प्रणेता महर्षि काण्व तथा उनके पुत्र महर्षी मेधातिथि उपस्थित थे।
अश्वमेध यज्ञ का हिंसा रहित विधि: इतने बड़े बड़े ऋषियों के उपस्थिति में उस यज्ञ में किसी भी पशु की हिंसा नहीं हुई तथा उस यज्ञ में फल आदि से बने पुरोडाश के द्वारा ही यज्ञ हुआ जिस से प्रसन्न होकर स्वयं परमात्मा ने अद्रुस्य में राजर्षी को प्रत्यक्ष दर्शन दिया। तथा हिंसा रहित उस यज्ञ का भाग ग्रहण किया।
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महाभारत के शान्तिपर्व में हमे राजर्षी उपरिचर के द्वारा आयोजित अश्वमेध यज्ञ के वर्णन मिलता है।
उस यज्ञ में भाग लिए कुछ प्रशिद्ध ऋषि: उस यज्ञ में ऋषि श्रेष्ठ कपिल, तांड्य ब्राह्मण के रचयिता महर्षी तांड्य, तैत्तिरीयब्राह्मण के रचयिता महर्षी तैत्तिर, यजुर्वेद के काण्व शाखा के प्रणेता महर्षि काण्व तथा उनके पुत्र महर्षी मेधातिथि उपस्थित थे।
अश्वमेध यज्ञ का हिंसा रहित विधि: इतने बड़े बड़े ऋषियों के उपस्थिति में उस यज्ञ में किसी भी पशु की हिंसा नहीं हुई तथा उस यज्ञ में फल आदि से बने पुरोडाश के द्वारा ही यज्ञ हुआ जिस से प्रसन्न होकर स्वयं परमात्मा ने अद्रुस्य में राजर्षी को प्रत्यक्ष दर्शन दिया। तथा हिंसा रहित उस यज्ञ का भाग ग्रहण किया।
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Close your eyes , plug in and tap into the world of Divine ❤️❤️
Chant :- Gajendra Moksha ( Hindi translation )
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Chant :- Gajendra Moksha ( Hindi translation )
Devoted to the Nishkala form of Lord Vishnu.... 🙏🙏
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ब्राह्मणत्व की प्राप्ति का हेतु :
विद्वानों के अनुसार ब्रह्मयोनि के 2 हेतु होते हैं:-
1. तपस्या
2. पुण्य कर्म यानि अच्छे कर्मों का अनुष्ठान।
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विद्वानों के अनुसार ब्रह्मयोनि के 2 हेतु होते हैं:-
1. तपस्या
2. पुण्य कर्म यानि अच्छे कर्मों का अनुष्ठान।
~ अनुगीता ; भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ब्रह्माजी के मत का प्रतिपादन
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आजाद हिंद फौज के महान नेतृत्व , महान क्रांतिकारी , भारत माता के वीर सपूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अमर रहें
उसकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन 🙏
( the Kambal Kutai of Wooten , Incident of Presidency College , Kolkata , credit :- Arya bose bhaiya )
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उसकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन 🙏
( the Kambal Kutai of Wooten , Incident of Presidency College , Kolkata , credit :- Arya bose bhaiya )
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Association of Devi Lakshmi with Owl ( Uluka ) :-
हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि उलूक/उल्लू को अक्सर देवी लक्ष्मी के वाहन के रूप में जोड़ा जाता है। लेकिन क्या आपको पता है ये रिश्ता कितना पुराना है??
यहां अमरावती का एक स्लैब है, जो दूसरी-पहली शताब्दी ईसापूर्व (2nd-1st century BCE) का है। यहां देवी लक्ष्मी को कमल के पुष्प पर बैठे हुए दिखाया गया है। स्लैब के अनुभागीय मुख पर उल्लू उसके पास है।
इस प्रकार हम उलूक/उल्लू के साथ देवी लक्ष्मी की पूजा की प्राचीनता को स्थापित करते हैं।
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मोहान्धकार-भरिते हृदये मदीये
मातः सदैव कुरु वासमुदारभावे।
स्वीयाखिलावयव-निर्मलसुप्रभाभिः
शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥
मां सरस्वती हम सभी पर करुणा और विद्या की कृपा करें ।
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मातः सदैव कुरु वासमुदारभावे।
स्वीयाखिलावयव-निर्मलसुप्रभाभिः
शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥
मां सरस्वती हम सभी पर करुणा और विद्या की कृपा करें ।
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सीरियल्स के विपरीत , महाभारत में ऋषि नारद की महिमा को दर्शाया गया है। वे " शरारती " या " कलहप्रिय " नहीं थे , जैसा कि टीवी में दिखाया जाता है ; अपितु वे चपलतादि दोषों से रहित थे । वे समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहते और स्वाध्यायशील थे ।
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~ शान्तिपर्वांतरगत श्रीकृष्ण-उद्धव संवाद
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👍10🔥2🤡1
Forwarded from Modern Sāṃkhyavādin (Mystical Garuda 🦅)
Some guys :- Evolution is fake. It is against the notion of Vedas 😢😢.
Avg. Satkāryavādin :- Nahh it isn't. It is an explainable fact , whose essence doesn't even go against Sāṃkhya's basic principle of Satkāryavāda.
Source :- Jyotiṣmatī Vyākhyā of Sāṃkhyatattva-kaumudī
Avg. Satkāryavādin :- Nahh it isn't. It is an explainable fact , whose essence doesn't even go against Sāṃkhya's basic principle of Satkāryavāda.
Source :- Jyotiṣmatī Vyākhyā of Sāṃkhyatattva-kaumudī
Follow us at :- @Kapila_Samkhya
👍11🤣8🔥3🤡2
अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः ।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥
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त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥
Credit :- Dark Sanatan ji
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आरजी भंडारकर ने अपना मत सिद्ध करने क चक्कर में वेदार्थ का जो विनाश किया ; वह प्रकरण, अलंकार और उनकी अज्ञता सिद्ध करते हुए कल्पना से अधिक कुछ नहीं |
आर्य-द्रविड़ विभाजन करने के चक्कर में वेदार्थ का विनाश करना ; कहाँ तक उचित है ?
क्या वो पूर्वाचार्यों से ज्यादा वेद को समझते हैं ?
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आर्य-द्रविड़ विभाजन करने के चक्कर में वेदार्थ का विनाश करना ; कहाँ तक उचित है ?
क्या वो पूर्वाचार्यों से ज्यादा वेद को समझते हैं ?
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क्या वैदिक धर्म में बाल-विवाह की अनुमति है ?
गृह्यसूत्रों के पूर्वाचार्यों का कथन है कि विवाहोपरांत , ३ दिनों के ब्रह्मचर्य के बाद चौथी रात्रि में प्रथम बार गर्भाधान करना चाहिए | आचार्य गोभिल का कथन है कि स्त्री के पति के घर में आने के पश्चात् जब ऋतुमती (गर्भधारण की क्षमता से युक्त) होने के बाद ही समागम करना चाहिए |
~ गोभिल गृह्यसूत्र २/५/७-८
शंका :- बाल-विवाह के कुछ वर्ष उपरांत भी गर्भाधान किया जा सकता है ; तो इससे बाल विवाह का खंडन कैसे होता है ?
उत्तर :- आश्वलायन , आपस्तम्ब , कात्यायन प्रभृति आदि आचार्यों के मत में भी विवाह की चतुर्थ रात्रि में गर्भाधान किया जा सकता है | इसके हिसाब से गर्भाधान के ३ मास बाद पुंसवन होगा , जो गर्भावस्था का सूचक माना जाता है |
१६-१७ से कम आयु की कन्या सफल गर्भ धारण नहीं करती ; न ही आयुर्वेद में १६ वर्ष से कम आयु में इसकी अनुमति है |
परमर्षि कपिल के अनुसार भी :-
अपनी स्त्री से समागम तभी करें जब वह ऋतुस्नान कर चुकी हो | ऐसा करने से ही उपस्थ द्वार की रक्षा होती है |
~ महाभारत , शांतिपर्व
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