प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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Glory to Vedic Women :- Part 3 !!

क्या माता सीता का बालविवाह हुआ था ?

अक्सर विधर्मी व कथावाचक यह कहते नजर आते हैं की माता सीता का बाल विवाह हुआ था ।
आइए , रामायण के एक प्रकरण द्वारा इसकी समीक्षा करते हैं ।

अयोध्या कांड सर्ग ११८ में माता सीता व अनसूयाजी का संवाद मिलता है । अनसूया जी के मां सीता के विवाह के विषय में जिज्ञासा प्रकट करने पर माता सीता उन्हें बताती हैं :-

" जब मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गई , तो मेरे पिता को इसकी चिंता हुई । "


श्लोक में वर्णित पतिसंयोगसुलभं शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य गोविंदराज वाल्मीकि रामायण की भूषण टीका में लिखते हैं :-

माता सीता विवाह के पहले ही यौवनावस्था में प्रवेश कर चुकी थीं ।


अतः जो लोग यह कहते हैं , कि उनके बाल विवाह हुआ था यह तो स्वतः ही खंडित है ।

अतः कथावाचकों तथा विधर्मियों की बातों में ना आए ; अपने ग्रंथों का अध्ययन कर सत्य का अन्वेषण करें ।

रामो विग्रहवान धर्मः 🙏🙏

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ऋग्वेद (१०/९५) में आए उर्वशी पुरुरवा संवाद सूक्त को कुछ मूर्ख लोग मानवीय इतिहास समझ रहे हैं इस भ्रांति के समाधान पर हमारे यह लेख अवश्य पढ़ें। 🙏🙏👇👇
https://vedkabhedexposse.blogspot.com/2024/11/blog-post.html?m=1
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आजकल इंटरनेट पर " वैदिक विज्ञान " को लेकर बड़ी बहस चल रही है।
एक स्वघोषित विद्वान तो स्पष्ट वर्णित प्राकृतिक विज्ञान को भी अस्वीकार कर रहे हैं ।

आज हम उनके एक दावे का विश्लेषण करेंगे:- वैदिक वाङ्गमय के अनुसार चंद्रमा की प्रभा के लिए सूर्य की किरणें उत्तरदायी हैं : सत्य या असत्य ??

निरुक्त 2/6 के अनुसार चंद्रज्योत्स्ना हेतु सूर्यरश्मि सुषुम्णा ही उत्तरदायी है। दुर्गवृत्ति इसका व्याख्या कुछ इस प्रकार करती है :-

" किरणों का एक समूह, जिसे सुषुम्णा नाम से जाना जाता है , जिसका स्रोत आदित्य (सूर्य) है , वही चंद्रमा की चमक के लिए जिम्मेदार है । यह सूर्य ही है, जिसके सौजन्य से चन्द्रमण्डल चमकता है; और इससे सारी दिशाएँ प्रकाशित होती हैं। "


यही बात यजुर्वेद 18/40 के उवट्टभाष्य और महीधरभाष्य में क्रमशः इस प्रकार से मौजूद है :-

सुषुम्णः सूर्यरश्मिः । यः सुषुम्णः सुयज्ञियः । सूर्यस्येव हि चन्द्रमसो रश्मयः ।


"सूर्यरश्मिः सूर्यस्येव रश्मयः किरणा यस्य । सुषुम्ण इति सुयज्ञिय इत्येतत् सूर्यरश्मिरिति सूर्यस्येव हि चन्द्रमसो रश्मयः' ।"


बाकी आप स्वयं विचार करें ।

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क्या देवी सरस्वती ब्रह्माजी की पुत्री हैं :- भाग 3

कई विधर्मियों ( नीलग्रह मूलनिवासी व ईसाईयों ) का दावा है कि सरस्वती ब्रह्माजी की बेटी थीं , लेकिन यह सच नहीं है ।
इसका खंडन हम श्रुति ग्रन्थों से पहले ही कर चुके हैं , जिसको आप यहां से पढ़ सकते हैं :-
१. प्रथम प्रमाण
२. द्वितीय प्रमाण

आईए इसी श्रृंखला में आगे पूर्वाचार्यों के मत द्वारा इनका खंडन करते हैं ।

आदि शंकराचार्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि देवी आद्यापराशक्ति के तीन रूप हैं - सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की पत्नी सरस्वती, पालनकर्ता श्रीहरि की पत्नी श्रीलक्ष्मी और संहारक भगवान शिव की पत्नी पार्वती।

इससे यह सिद्ध हो गया कि देवी सरस्वती भगवान ब्रह्मा की पत्नी हैं, उनकी पुत्री नहीं।

स्रोत:-आदिशंकराचार्यकृत सौन्दर्यलहरी, 97वाँ श्लोक


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Did Rishi Yajnavalkya ate beef...pdf
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A detailed analysis of the entire allegations and their refutation !!

और इस विशेष प्रजाति के पूर्वपक्षियों से यही कहूंगा कि
कम से कम पूर्वाचार्यों को तो मान लिया करो रे 😭😂😂
संस्कृत व्याकरण की तो वैसे ही तुम लोगों ने ऐसी तैसी कर रखी है , तुम लोगों से उसकी तो उम्मीद करना ही बेकार है ।

Written by : Mystical Garuda 🦅


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कर्ण के अंधभक्त कमेंट में विलाप कर सकते हैं , चाहे तो विमर्श भी 😂

जय हो सोनीपुत्र कोरोना ❌ महावीर सूर्यपुत्र कर्ण की 🙈🙈

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नवबौद्धों के नीले सपने : भाग 12

क्या वेंकटेश्वर मंदिर वास्तव में बौद्ध है ??


कई नवबौद्धों का दावा है कि आंध्र प्रदेश की तिरुपति की पहाड़ियों पर वेंकटेश्वर रूप में जो भगवान विष्णु की मूर्ति व मंदिर है ; वह वास्तव में भगवान बुद्ध की है।

लेकिन तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं ।

दूसरी शताब्दी के संगम साहित्य सिलप्पादिकारम् में कोवलन और एक ब्राह्मण के बीच बातचीत का उल्लेख है। जब कोवलन ने उस क्षेत्र का दौरा करने का उद्देश्य पूछा, तो उसने बताया कि वह उन भगवान विष्णु की सुंदरता को देखने आया है, जो वेंकटम् अर्थात् तिरुपति पहाड़ी पर निवास करते हैं, जो झरने आदि जैसे सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से घिरा हुआ है।
उन्होंने विष्णु के वक्षःस्थल पर रहने वाली श्रीलक्ष्मी और उनकी शैय्या के रूप में आदिशेष का भी उल्लेख किया है।

मैं नवबौद्धों से ये पूछना चाहता हूं कि इस विषय पर इनके पास क्या 2nd century CE से ज्यादा प्राचीन प्रमाण है या नहीं ? 😂
अगर नहीं, तो मंदिर पर दावा करना छोड़ दो।

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वेदों_में_चंद्र_प्रकाश_का_विज्ञान_.pdf
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Debunking the Allegations of Nāstikas on the Vedas !!

Written by : Ashish Bhaiya 🗿


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Glory to Vedic Women.pdf
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Understanding Vedic Women in Short :-
From an historical perspective.

Made by : Mystical Garuda 🦅


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Gracias y'all , my family 💗🙏 for supporting me , or atleast listening to my ideology.

Sadly , I am turning off my Id for a long time , due to my academic activities. I won't be able to post during the period..
The 2nd admin of the channel will take care of the posts.

Kindly forgive me.

~ Mystical Garuda 🦅


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If you want to learn more about Philosophies of Bharat ; especially the Samkhya System ...

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वेदों_में_स्त्री_की_बुद्धि।.pdf
5.8 MB
🌺 वेदों में स्त्री की बुद्धि कम या श्रेष्ठ?

🌺 ऋगवेद (8/33/17) पर विधर्मियों के द्वारा लगाए गए आक्षेपों का संपूर्ण खण्डन।

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Forwarded from Modern Sāṃkhyavādin (Shrutika)
प्रश्न :- क्या " सीमित कर्म का सीमित फल " का सिद्धांत पुरुष पर लागू होकर उसके मोक्षकाल को सीमित करता है ??


उत्तर :- नहीं , पुरुष अकर्ता तथा प्रकृतित्व से निर्लिप्त भाव में स्थित होता है । यह कर्मों का साक्षी है , न कि भोक्ता ।
यदि कहो कि वह भोक्ता है , तो यह सही नहीं है क्योंकि पुरुष का पंचज्ञानेन्द्रियों , पंचकर्मेंद्रियों तथा मन से साक्षात् संबंध नहीं होता । चूंकि भोक्तृत्व का गुण इंन्द्रियाधिन होता है , पुरुष का दृष्टा भाव में स्थित होना ही सत्य है । पुरुष का साक्षात् संबंध बुद्धि ( महान्/महत् ) से होता है ।

यदि कहो कि पुरुष सुख-दुख का अनुभव करता है तो यह भी उचित नहीं क्योंकि सुख-दुख आदि प्रकृतिजन्य गुण हैं और पुरुष प्रकृतित्व से रहित अपरिवर्तित सत्ता है ।

यदि दुःख को जीव का स्वाभाविक गुण मानो , तो यह भी दोष है क्योंकि पुरुष अविकारी है और दुःखादि गुण विकृतियां हैं । यदि दुर्जनतोषन्याय से हम पूर्वपक्ष को स्वीकार करें , तो पुरुष की अत्यंतनिवृत्ति होना कदापि संभव नहीं क्योंकि दुःख को आपने जीव का स्वाभाविक गुण मान लिया है । जिस प्रकार अविनाशी आत्मा का स्वाभाविक गुण होने से किसी परिस्थिति में भी आत्मा का नाश नहीं होता , उसी प्रकार पुरुष भी कभी दुःखहान को प्राप्त नहीं कर सकता । अतः हेतु से भी पुरुष का अकर्तृत्व सिद्ध होता है ।

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Christmas is incomplete without this legendary song 🗿🗿

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क्या वेद में इतिहास अनित्य है?

कुछ मूर्ख लोग जिनको न वेद का पता है ना ही व्याकरण और प्रकरण का ऐसे लोग आज वेद में अनित्य इतिहास दिखाने को कोशिश करते हैं।

इन गधों को समझ नहीं आता की जब निरुक्त (१/१२) में निरुक्तकार ने नाम पदों को धातूज माना है जिनका यौगिक अर्थ संभव है लेकिन रूढ़ अर्थ नहीं। जब की लौकिक अनित्य इतिहास में रूढ़ अर्थ होता है धातुज अर्थ नहीं।

इसका एक उदाहरण देता हूं शतपथ ब्राह्मण (१/७/४) में "प्राशित्रं आख्यान" आता है जिसको प्रजापति उषा आख्यान भी बोलते हैं। अब इसमें कुछ मूर्ख इतिहास दिखाने को कोशिश करते हैं लेकिन आचार्य हरिस्वामी और सायण भाष्य में भी इसको आख्यान ही बोला है इतिहास नहीं।

हरिस्वामी और सायणने इसमें जो उषा नामपद आया है उसका अर्थ अनेक प्रकार से किया है जैसे लोकात्म रूप से द्युलोक, प्राणपिण्डात्म रूप से रोहिणी नाम नक्षत्र, कालात्म रूप से उषा तथा यज्ञात्म रूप से वाणी अर्थात यहां उषा नाम से किसी व्यक्तिवाचक रूढ़ अर्थ नही लिया गया वल्कि यौगिक,याज्ञीक और आधिदैविक अर्थ ही ग्रहण किया है उसी प्रकार प्रजापति का भी अर्थ बनेगा। तो यहां कोई दो व्यक्ति का इतिहास नहीं है क्यू की शब्द धातूज है।
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