प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

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Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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क्या पारस्कर गृह्यसूत्र १/३/२९-३० में गौहत्या है ?


जी हां आपने सही सुना । आजकल हमारे ग्रंथों पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं । जानकर और दुख होता है किया आरोप लगाने वाले कुछ हिंदू ही हैं ।

यह अतिथि सत्कार प्रकरण है जहां पर गवालभन् किया जा रहा है ।

आलभन शब्द का अर्थ मैं पहले ही समझा चुका हूं , कि इसकी धातु लभ् स्पर्श तथा प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाई जाती है ।


इसी प्रकार यहां पर गौ का स्पर्श किया जाता है । यहां तक तो फिर भी सब ठीक है , परंतु अचानक से सूत्र २९-३० आते ही हमें मांसाहार प्रकरण दिखता है , और वो भी गौ का ।

अब आपको एक चीज बताता हूं ।

खुद इस पारस्कर गृह्यसूत्र के भाष्याकार हरिहर तथा गदाधर ने खुद इस चीज को गलत , वेदविरुद्ध , स्मृतिविरुद्ध , तथा अप्रमाण्य माना है ।


आचार्य गदाधर , आचार्य जयराम का मत उद्धरित करते हुए बोलते हैं कि गोवध करने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मधुपर्क के साथ अजालभन् कर उसके दूध का पायस ( खीर ) देना चाहिए ।

इसके अलावा याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षराटीका १/१५६ में भी इसका स्पष्ट खंडन आता है :
मधुपर्के गोवधादिकम् नाचरेत्

ये सर्वकालिक धर्मविरुद्ध कार्य है ।

क्रमशः ।।
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इसके अलावा एक अजीब चीज हमें देखने को मिलती है ।
इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था ।

इस मंत्र में स्पष्ट रूप से गांव के खिलाफ की जाने वाली हर प्रकार की हिंसा का निषेध किया गया है ।


सायणाचार्य ने भी इसके अर्थ में कहा है कि हे मनुष्यो ! मेरी इस बात को सुनो और समझो । गौ अघन्या-अदिति है , देवी व मातृतुल्य है , न तो उसका वध किया जाना चाहिए और न ही उसके प्रति कोई भी हिंसा की जानी चाहिए ।

यही प्रमाण देते हुए गदाधर जी ने भी गौहत्या का खंडन किया है ।

अगर हम ध्यान दें , तो गोवध में गौरक्षा का मंत्र पढ़ने का कोई औचित्य नहीं होता । अतः स्पष्ट है कि गौहत्या नहीं होती ।

इसके अलावा पराशर स्मृति का उद्धरण देते हुए आचार्य गदाधर कहते हैं कि गवालभन् ( यहां हनन संबंधी ) हर क्रिया , काल , परिस्थितियों में निषिद्ध है ।

फिर सवाल उठता है कि वास्तविकता क्या है ?

तो इसका वास्तविक अर्थ हमें पाणिनि अष्टाध्यायी ३/४/७३ की काशिका वृत्ति में मिलता है : जहां गो का दाश करने की बात की गई है । आगे भ्वादिगण का उदाहरण देकर समझते हुए का कहा गया है :
दाशृ दाने
अर्थात दश् का अर्थ होता है दान करना । आगे इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब भी कोई अतिथि आता है तो अर्घ्य के साथ उसे गो का दान किया जाना , तथा अतिथि द्वारा उसको प्राप्त करना , ही इसका वास्तविक अर्थ है । इसके आगे तो उन्होंने स्पष्ट यह भी कह दिया की गोहनन बिल्कुल असत्य है ।

अतः यहां से निष्कर्ष निकालते हैं :-


१. अर्घ्य में गोवध नहीं किया जाता और ना ही मांस दिया जाता है ।
२. अतिथि को गोदान किया जाता है ।
३. पूर्वाचार्यों की अस्वीकृति तथा इसे अप्रामाण्य , शास्त्रविरुद्ध तथा श्रुतिस्मृतिविरोधी बोलने से यही सिद्ध होता है कि यह बाद के किसी धर्मविरोधी का कार्य है ।
भला जब आगे सूत्र २८ में ही गो को जीवित छोड़ने की बात आ गई , तो काट कर उसका मांस खिलाने की बात कहां से युक्तिसंगत हो सकती है ?

अतः वेदादि आर्ष ग्रन्थों के विपरीत , पूर्वाचार्यों के मत , भाष्याकारों की अस्वीकृति से सिद्ध होता है की वैदिक धर्म पर गौहिंसा तथा गौमांस भक्षण पर लगने वाले आप बिल्कुल ही निराधार , तर्कहीन और गपोड़ें हैं ।

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वाल्मिकी रामायण अयोध्याकाण्ड 54/18 अनुसार वैदिक ऋषि भरद्वाजजी, जो स्वयं ऋग्वेद के 6/28 अर्थात् गौसूक्त का मंत्रदृष्टा हैं ; उन्होंने भी भगवान श्री राम को अर्घ्य देने के साथ गौ समर्पित की थी, गोमांस नहीं ।

इसी प्रकार श्रीमद्भागवत पुराण 10/39/38-39 के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और भगवान बलराम जी ने भी अक्रूरजी को मधुपर्क और अर्घ्य के साथ गौ समर्पित की थी, न कि गोमांस।

इस प्रकार मेरा प्रमाण ऐतिहासिक रूप से भी प्रबल है और इसे वेद-वेदांगों द्वारा भी समर्थन प्राप्त है।

इति अधर्ममतः सर्वस्व खण्डनम्..


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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
इसके अलावा एक अजीब चीज हमें देखने को मिलती है । इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था । इस मंत्र में स्पष्ट रूप से गांव के खिलाफ की जाने वाली हर प्रकार की हिंसा का निषेध…
मैंने यहां पर सर्वकालिक गौहिंसा का निषेध दिखाया है , फिर भी कुछ लोगों को जबरदस्ती चुल्ल मची हुई है कि कहीं से भी इसको सामान्य परिस्थिति का दिखाकर आपातकालीन स्थिति को हटा दिया जाए ; ताकि आपातकाल में गोहिंसा का समर्थन किया जा सके ।

मैं समझ नहीं पा रहा मधुपर्क तथा अर्घ्य में इन्हें किस प्रकार का आपातकाल दिखाई पड़ रहा है ?


क्या यह अपने ही आचार्यों के विरुद्ध , स्मृति तथा वेद के विरुद्ध जाना चाहते हैं ?

इसके अलावा यह लोग सोम यज्ञ में बारंबार अर्घ्य दिए जाने को लेकर बारंबार मांसाहार का भी समर्थन करते दिख रहे हैं ।
अरे भाई जब मांसाहार का खंडन पहले ही हो गया , तो जबरदस्ती का उसे इतना लीपने का क्या औचित्य रहा ?

बार-बार अर्घ्य दिया जाना व बार-बार मांसाहार करना यह दो अलग-अलग बातें हैं । बारंबार अर्घ्य देना जिसमें गोदान शामिल है , ये वेद-वेदांगों द्वारा समर्थित होने से प्रमाण माना जाता है ।

परंतु जब गवालभन् करते समय ही गौ रक्षा का मंत्र पढ़ा जा रहा है , तो मांसाहार का विषय तो वैसे ही खंडित हो जाता है ।


आशा करता हूं उन्हें मेरा यह संदेश मिल जाए और वे इस बात को जल्द से जल्द समझ जाएं । बाकी उनके आगे के प्रमाणों का भी जल्द ही खंडन होगा ।

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During the period of Muslim Invaders Tughlaqs , Bharat faced a lot of hurdles to propagate/express its ancient thoughts and knowledge of Natural Sciences.

Zia Ad-din Barni , an important political writer ( A radical believer that nothing is scientific except Qur'an and was non-believer of other thoughts ) tells us that :-

" During the rule of Tughlaqs , maximum preached thing was Qur'an and it's commentaries. Sciences which were contradictory to it or was not like " the words of prophet and Allah " were banned. "

Huhh Scientific temperament of 🅱️uslims 😂😂😂

Source : Science and the Indian Tradition :- by David L Gosling


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Debunking Aryan Dravidian Narratives !!


As per Historians , North Indians ( so called Aryans ) were given a warm welcome by the Cultured and Vigorous Tamils and they had very good relationships in Pre Christian Millennium era..

बेटियार बाबा का मोये मोये 😂😂😂


Source :- The Sacred Kural by HA Popley

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गौ और वृषभ की हत्या का सर्वकालिक निषेध :-


निरुक्त 11/43
में गौ को अघन्या कहा है। इसकी व्याख्या करते हुए दुर्गवृत्ति कहती है, वो जिसकी हिंसा सभी के द्वारा निषेधित है।

महाभारत शांति पर्व 263
के अनुसार गौ और वृषभ की हत्या करने वाला महापापी होता है। तुलाधार कहते हैं कि गौ को श्रुति द्वारा अघन्या शब्द से सम्बोधित किया गया है तो उसकी हत्या कैसे की जा सकती है??
इसके अलावा उसी अध्याय के आख्यान अनुसार राजा नहुष के गौ और वृषभ की हत्या किये जाने पर उनको भ्रुणहत्या का महापाप लगा था। इसके अलावा ऋषियों ने व्यथित होकर उनका यज्ञानुष्ठान भी नहीं करवाया था।

अत: गौ और वृषभ दोनों की हिंसा शास्त्र सम्मत नहीं है।


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महाभारत में गणेश
Analysis of Bori vol 86, 1/4
डॉ मेहंदळे, जो की विद्वान और भंडारकर इंस्टीट्यूट में महाभारत क्रिटिकल एडिशन पर काम कर चुके हैं, ने स्पष्ट रूप से बताया है कि गणपति का आगमन तथा ग्रंथ लेखन महाभारत में प्रक्षिप्त है। केवल देवनागरी पांडुलिपियों में यह उपलब्ध है। उत्तर भारतके मैथिली, बांग्ला, शारदा आदि प्राचीन पांडुलिपियों में कहीं पर भी उपलब्ध नहीं है।
इतना ही नहीं, दक्षिण भारत में भी यह प्रकरण नहीं था। पांडुलिपियों की लिखावट देकर स्पष्ट होता है कि दक्षिण भारत में भी इसको जानबूझकर घुसाया गया है।
ग्रंथ की शुरुआत में गणेश जी का आगमन एक बहुत बड़ी घटना थी जो लगभग हर पांडुलिपि में होनी चाहिए थी।
स्पष्ट है कि बाद में इसको मिलाया गया है। इसके पीछे आलोचनात्मक तथा भाषावैज्ञानिक कारण है।
इतना ध्यान रहे की शारदा लिपि की पांडुलिपियां देवनागरी से प्राचीन होती है। वाल्मीकि रामायण की सबसे पुरानी पांडुलिपि भी जो लगभग 1000 साल पुरानी मिलती है शारदा में लिखी गई है।

इस प्रकरण में पौराणिक सूंड धारी गणेश जी अपना एक डांट तोड़कर महाभारत लिखते हैं। तार्किक और वैज्ञानिक रूप से भी ऐसा करना संभव नहीं है।
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Animal Sacrifices & Meat Eating In Vedic Dharma Debunke

Must read 👇👇

Link :- https://www.instagram.com/p/C_ukwrHpohN/?igsh=Z3c0YzhucWhhbjhv
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हर बार पशु बलि पर पिटाई खा खा कर भी नहीं सुधरे बूढ़उ अधर्म विनाशक ( चुनिल ) और ममता बनर्जी के संतान जिशान बनर्जी 😂😂😂

Animal Sacrifices In Vedic Dharma Debunke

अवश्य पढें 👇👇
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वेद ने दिया है सब मनुष्यों को समान स्थान से जल पीने का और अन्न खाने का अधिकार सारे मनुष्य समान ही है ।😎🔥

लेकिन कुछ लोग बोलते हैं उनको 2500 साल से कुएं से पानी नहीं पीना दिया गया 😂🤣🤣
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महर्षी दयानंद जी अपने ग्रंथ ऋग्वेदादीभाष्य भूमिका में वेद में पृथ्वी के भ्रमण सिद्धि के लिए यजुर्वेद (३/६) का मंत्र "
आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒द

"
उपस्थित किए है।

जिसपे पौराणिकों के करपात्री ने आपत्ति उठा कर अपने किताब वेदार्थ पारिजात में लिखते हैं की इसमें पृथ्वी घूमने की बात नहीं है अपितु सूर्य घूमती है पृथ्वी के चारों ओर यह लिखा है।

सायद करपात्री ने इस मंत्र पर जैमिनीय ब्राह्मण का व्याख्या नहीं पढ़ा था 🤣 और अपने सायण के भाष्य उठा के चेप दिया। 😂

सायण ने अपने ऋग्वेद (१०/१८९/१) में आए यही आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒द वाला मंत्र के भाष्य में में गौः शब्द तथा पृश्निः को सूर्य के विशेषण में व्याख्या किया है।

जब की जैमिनीय ब्राह्मण (३/३०४) में आयं गौः पृश्निः का व्याख्या कुछ इस प्रकार आया है की "इयं पृथिवी पृश्निं वर्णम्" अर्थात यहां पृथ्वी की परिपेक्ष में व्याख्या किया जा सकता है। स्वामी दयानंद जी का मत ब्राह्मण ग्रंथों से सिद्ध है।

और इसी मंत्र में आगे पृथ्वी के लिए अक्रमीत् शब्द भी आया है जिसका अर्थ है गमनशील

इसपर मेरा ब्लाग आर्टिकल अवश्य पढ़ें।
👇👇😎
https://vedkabhedexposse.blogspot.com/2024/08/36.html?m=1
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इस जाहिल थोर ने वेद में पृथ्वी को स्थिर साबित करने के लिए ऋग्वेद (२/१२/२) का सायण भाष्य से प्रमाण दिया की आचार्य सायण ने वहां पृथ्वी को दृढ़ का अर्थ स्थिर किया हुआ है। 😂😂

जब की आचार्य सायण ने ऋग्वेद (२/१२/२) में दृढ़ का अर्थ करते हुए लिखते हैं "शर्करादिभिर्दृढामकरोत्" जिसका अर्थ है परमात्मा ने भूमि को सुखा कर पाषाण बना के दृढ़ ( ठोस) किया। जैसा कि धरती के नीचे के लावा ऊपर आने से वह सुख कर पाषाण बन जाती है उस से भूमि ठोस बनती है।

तैत्तिरीयब्राह्मण (१/१/३/६-७) में भी यही बात लिखा है "तां शर्कराभिः अदूंहत्" अर्थात उस पृथ्वी को प्रजापति ने पाषाण आदि से दृढ़ (ठोस) बनाया ।

इस जाहिल Thor ने ढंग से आचार्य सायण के भाष्य भी नही पढ़ा और जो मन में आया वही चेप दी। 😂😂
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