" भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं है जो भगवान श्रीकृष्ण के तेज से परास्त ना हुआ हो । भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं जो उन्हें जीत सके ।
वेद-वेदांग आदि का ज्ञान , क्षमा दृष्टि पुष्टि धृति योग सांख्य यश शौर्य बल कीर्ति आदि सभी गुण भगवान श्रीकृष्ण में सर्वोच्च रूप में प्रतिष्ठित हैं । त्रैलोक्य के में कोई इनकी समानता नहीं कर सकता । "
- महाभारत सभापर्व अध्याय ३८ , भीष्म पितामह का मंतव्य
भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की भांति हमें भी श्रेष्ठ बनना चाहिए , वह योद्धा , गुरु , स्वयं नारायण , धर्मरक्षक तथा सत्यचरित्र थे ; छलिया , रणछोड़ तथा विलासी नहीं ।
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वेद-वेदांग आदि का ज्ञान , क्षमा दृष्टि पुष्टि धृति योग सांख्य यश शौर्य बल कीर्ति आदि सभी गुण भगवान श्रीकृष्ण में सर्वोच्च रूप में प्रतिष्ठित हैं । त्रैलोक्य के में कोई इनकी समानता नहीं कर सकता । "
- महाभारत सभापर्व अध्याय ३८ , भीष्म पितामह का मंतव्य
भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की भांति हमें भी श्रेष्ठ बनना चाहिए , वह योद्धा , गुरु , स्वयं नारायण , धर्मरक्षक तथा सत्यचरित्र थे ; छलिया , रणछोड़ तथा विलासी नहीं ।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं ।
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जो भरोसा आज आपने मुझ पर दिखाया है , आशा करता हूं वह भरोसा आगे तक चलेगा ।
हमारे समूह से 500 लोग जुड़ चुके हैं । उनमें से हर एक को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं , क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूं , आपके साथ के कारण हूं ।
मैं अपने अग्रज कार्तिक जी , आशीष जी , आर्यबोस जी और प्रिय मित्र पुष्यमित्र का भी आभार व्यक्त करता हूं , जिन्होंने हमेशा ही मेरी सहायता की ।
जयतु भारतम् जयतु संस्कृतम्
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्
जयतु देवी 🙏🙏
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वामपंथी तथा नवबौद्धों द्वारा गायत्री मंत्र पर लगाए गए अश्लीलता के आरोप का खण्डन पर हमारा यह लेख जरूर पढ़े। 🙏🙏👇👇
https://vedkabhedexposse.blogspot.com/2024/08/blog-post_28.html?m=1
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Written by : Ashish Bhai 🗿🤝
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क्या पारस्कर गृह्यसूत्र १/३/२९-३० में गौहत्या है ?
जी हां आपने सही सुना । आजकल हमारे ग्रंथों पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं । जानकर और दुख होता है किया आरोप लगाने वाले कुछ हिंदू ही हैं ।
यह अतिथि सत्कार प्रकरण है जहां पर गवालभन् किया जा रहा है ।
आलभन शब्द का अर्थ मैं पहले ही समझा चुका हूं , कि इसकी धातु लभ् स्पर्श तथा प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाई जाती है ।
इसी प्रकार यहां पर गौ का स्पर्श किया जाता है । यहां तक तो फिर भी सब ठीक है , परंतु अचानक से सूत्र २९-३० आते ही हमें मांसाहार प्रकरण दिखता है , और वो भी गौ का ।
अब आपको एक चीज बताता हूं ।
खुद इस पारस्कर गृह्यसूत्र के भाष्याकार हरिहर तथा गदाधर ने खुद इस चीज को गलत , वेदविरुद्ध , स्मृतिविरुद्ध , तथा अप्रमाण्य माना है ।
आचार्य गदाधर , आचार्य जयराम का मत उद्धरित करते हुए बोलते हैं कि गोवध करने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मधुपर्क के साथ अजालभन् कर उसके दूध का पायस ( खीर ) देना चाहिए ।
इसके अलावा याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षराटीका १/१५६ में भी इसका स्पष्ट खंडन आता है :
मधुपर्के गोवधादिकम् नाचरेत्
ये सर्वकालिक धर्मविरुद्ध कार्य है ।
क्रमशः ।।
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इसके अलावा एक अजीब चीज हमें देखने को मिलती है ।
इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था ।
सायणाचार्य ने भी इसके अर्थ में कहा है कि हे मनुष्यो ! मेरी इस बात को सुनो और समझो । गौ अघन्या-अदिति है , देवी व मातृतुल्य है , न तो उसका वध किया जाना चाहिए और न ही उसके प्रति कोई भी हिंसा की जानी चाहिए ।
यही प्रमाण देते हुए गदाधर जी ने भी गौहत्या का खंडन किया है ।
अगर हम ध्यान दें , तो गोवध में गौरक्षा का मंत्र पढ़ने का कोई औचित्य नहीं होता । अतः स्पष्ट है कि गौहत्या नहीं होती ।
फिर सवाल उठता है कि वास्तविकता क्या है ?
तो इसका वास्तविक अर्थ हमें पाणिनि अष्टाध्यायी ३/४/७३ की काशिका वृत्ति में मिलता है : जहां गो का दाश करने की बात की गई है । आगे भ्वादिगण का उदाहरण देकर समझते हुए का कहा गया है :
दाशृ दाने
अर्थात दश् का अर्थ होता है दान करना । आगे इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब भी कोई अतिथि आता है तो अर्घ्य के साथ उसे गो का दान किया जाना , तथा अतिथि द्वारा उसको प्राप्त करना , ही इसका वास्तविक अर्थ है । इसके आगे तो उन्होंने स्पष्ट यह भी कह दिया की गोहनन बिल्कुल असत्य है ।
१. अर्घ्य में गोवध नहीं किया जाता और ना ही मांस दिया जाता है ।
२. अतिथि को गोदान किया जाता है ।
३. पूर्वाचार्यों की अस्वीकृति तथा इसे अप्रामाण्य , शास्त्रविरुद्ध तथा श्रुतिस्मृतिविरोधी बोलने से यही सिद्ध होता है कि यह बाद के किसी धर्मविरोधी का कार्य है ।
भला जब आगे सूत्र २८ में ही गो को जीवित छोड़ने की बात आ गई , तो काट कर उसका मांस खिलाने की बात कहां से युक्तिसंगत हो सकती है ?
अतः वेदादि आर्ष ग्रन्थों के विपरीत , पूर्वाचार्यों के मत , भाष्याकारों की अस्वीकृति से सिद्ध होता है की वैदिक धर्म पर गौहिंसा तथा गौमांस भक्षण पर लगने वाले आप बिल्कुल ही निराधार , तर्कहीन और गपोड़ें हैं ।
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इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था ।
इस मंत्र में स्पष्ट रूप से गांव के खिलाफ की जाने वाली हर प्रकार की हिंसा का निषेध किया गया है ।
सायणाचार्य ने भी इसके अर्थ में कहा है कि हे मनुष्यो ! मेरी इस बात को सुनो और समझो । गौ अघन्या-अदिति है , देवी व मातृतुल्य है , न तो उसका वध किया जाना चाहिए और न ही उसके प्रति कोई भी हिंसा की जानी चाहिए ।
यही प्रमाण देते हुए गदाधर जी ने भी गौहत्या का खंडन किया है ।
अगर हम ध्यान दें , तो गोवध में गौरक्षा का मंत्र पढ़ने का कोई औचित्य नहीं होता । अतः स्पष्ट है कि गौहत्या नहीं होती ।
इसके अलावा पराशर स्मृति का उद्धरण देते हुए आचार्य गदाधर कहते हैं कि गवालभन् ( यहां हनन संबंधी ) हर क्रिया , काल , परिस्थितियों में निषिद्ध है ।
फिर सवाल उठता है कि वास्तविकता क्या है ?
तो इसका वास्तविक अर्थ हमें पाणिनि अष्टाध्यायी ३/४/७३ की काशिका वृत्ति में मिलता है : जहां गो का दाश करने की बात की गई है । आगे भ्वादिगण का उदाहरण देकर समझते हुए का कहा गया है :
दाशृ दाने
अर्थात दश् का अर्थ होता है दान करना । आगे इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब भी कोई अतिथि आता है तो अर्घ्य के साथ उसे गो का दान किया जाना , तथा अतिथि द्वारा उसको प्राप्त करना , ही इसका वास्तविक अर्थ है । इसके आगे तो उन्होंने स्पष्ट यह भी कह दिया की गोहनन बिल्कुल असत्य है ।
अतः यहां से निष्कर्ष निकालते हैं :-
१. अर्घ्य में गोवध नहीं किया जाता और ना ही मांस दिया जाता है ।
२. अतिथि को गोदान किया जाता है ।
३. पूर्वाचार्यों की अस्वीकृति तथा इसे अप्रामाण्य , शास्त्रविरुद्ध तथा श्रुतिस्मृतिविरोधी बोलने से यही सिद्ध होता है कि यह बाद के किसी धर्मविरोधी का कार्य है ।
भला जब आगे सूत्र २८ में ही गो को जीवित छोड़ने की बात आ गई , तो काट कर उसका मांस खिलाने की बात कहां से युक्तिसंगत हो सकती है ?
अतः वेदादि आर्ष ग्रन्थों के विपरीत , पूर्वाचार्यों के मत , भाष्याकारों की अस्वीकृति से सिद्ध होता है की वैदिक धर्म पर गौहिंसा तथा गौमांस भक्षण पर लगने वाले आप बिल्कुल ही निराधार , तर्कहीन और गपोड़ें हैं ।
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वाल्मिकी रामायण अयोध्याकाण्ड 54/18 अनुसार वैदिक ऋषि भरद्वाजजी, जो स्वयं ऋग्वेद के 6/28 अर्थात् गौसूक्त का मंत्रदृष्टा हैं ; उन्होंने भी भगवान श्री राम को अर्घ्य देने के साथ गौ समर्पित की थी, गोमांस नहीं ।
इसी प्रकार श्रीमद्भागवत पुराण 10/39/38-39 के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और भगवान बलराम जी ने भी अक्रूरजी को मधुपर्क और अर्घ्य के साथ गौ समर्पित की थी, न कि गोमांस।
इस प्रकार मेरा प्रमाण ऐतिहासिक रूप से भी प्रबल है और इसे वेद-वेदांगों द्वारा भी समर्थन प्राप्त है।
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इसी प्रकार श्रीमद्भागवत पुराण 10/39/38-39 के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और भगवान बलराम जी ने भी अक्रूरजी को मधुपर्क और अर्घ्य के साथ गौ समर्पित की थी, न कि गोमांस।
इस प्रकार मेरा प्रमाण ऐतिहासिक रूप से भी प्रबल है और इसे वेद-वेदांगों द्वारा भी समर्थन प्राप्त है।
इति अधर्ममतः सर्वस्व खण्डनम्..
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
इसके अलावा एक अजीब चीज हमें देखने को मिलती है । इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था । इस मंत्र में स्पष्ट रूप से गांव के खिलाफ की जाने वाली हर प्रकार की हिंसा का निषेध…
मैंने यहां पर सर्वकालिक गौहिंसा का निषेध दिखाया है , फिर भी कुछ लोगों को जबरदस्ती चुल्ल मची हुई है कि कहीं से भी इसको सामान्य परिस्थिति का दिखाकर आपातकालीन स्थिति को हटा दिया जाए ; ताकि आपातकाल में गोहिंसा का समर्थन किया जा सके ।
क्या यह अपने ही आचार्यों के विरुद्ध , स्मृति तथा वेद के विरुद्ध जाना चाहते हैं ?
इसके अलावा यह लोग सोम यज्ञ में बारंबार अर्घ्य दिए जाने को लेकर बारंबार मांसाहार का भी समर्थन करते दिख रहे हैं ।
अरे भाई जब मांसाहार का खंडन पहले ही हो गया , तो जबरदस्ती का उसे इतना लीपने का क्या औचित्य रहा ?
बार-बार अर्घ्य दिया जाना व बार-बार मांसाहार करना यह दो अलग-अलग बातें हैं । बारंबार अर्घ्य देना जिसमें गोदान शामिल है , ये वेद-वेदांगों द्वारा समर्थित होने से प्रमाण माना जाता है ।
आशा करता हूं उन्हें मेरा यह संदेश मिल जाए और वे इस बात को जल्द से जल्द समझ जाएं । बाकी उनके आगे के प्रमाणों का भी जल्द ही खंडन होगा ।
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मैं समझ नहीं पा रहा मधुपर्क तथा अर्घ्य में इन्हें किस प्रकार का आपातकाल दिखाई पड़ रहा है ?
क्या यह अपने ही आचार्यों के विरुद्ध , स्मृति तथा वेद के विरुद्ध जाना चाहते हैं ?
इसके अलावा यह लोग सोम यज्ञ में बारंबार अर्घ्य दिए जाने को लेकर बारंबार मांसाहार का भी समर्थन करते दिख रहे हैं ।
अरे भाई जब मांसाहार का खंडन पहले ही हो गया , तो जबरदस्ती का उसे इतना लीपने का क्या औचित्य रहा ?
बार-बार अर्घ्य दिया जाना व बार-बार मांसाहार करना यह दो अलग-अलग बातें हैं । बारंबार अर्घ्य देना जिसमें गोदान शामिल है , ये वेद-वेदांगों द्वारा समर्थित होने से प्रमाण माना जाता है ।
परंतु जब गवालभन् करते समय ही गौ रक्षा का मंत्र पढ़ा जा रहा है , तो मांसाहार का विषय तो वैसे ही खंडित हो जाता है ।
आशा करता हूं उन्हें मेरा यह संदेश मिल जाए और वे इस बात को जल्द से जल्द समझ जाएं । बाकी उनके आगे के प्रमाणों का भी जल्द ही खंडन होगा ।
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👍6
During the period of Muslim Invaders Tughlaqs , Bharat faced a lot of hurdles to propagate/express its ancient thoughts and knowledge of Natural Sciences.
Zia Ad-din Barni , an important political writer ( A radical believer that nothing is scientific except Qur'an and was non-believer of other thoughts ) tells us that :-
" During the rule of Tughlaqs , maximum preached thing was Qur'an and it's commentaries. Sciences which were contradictory to it or was not like " the words of prophet and Allah " were banned. "
Huhh Scientific temperament of 🅱️uslims 😂😂😂
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Zia Ad-din Barni , an important political writer ( A radical believer that nothing is scientific except Qur'an and was non-believer of other thoughts ) tells us that :-
" During the rule of Tughlaqs , maximum preached thing was Qur'an and it's commentaries. Sciences which were contradictory to it or was not like " the words of prophet and Allah " were banned. "
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Source : Science and the Indian Tradition :- by David L Gosling
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Debunking Aryan Dravidian Narratives !!
As per Historians , North Indians ( so called Aryans ) were given a warm welcome by the Cultured and Vigorous Tamils and they had very good relationships in Pre Christian Millennium era..
बेटियार बाबा का मोये मोये 😂😂😂
Source :- The Sacred Kural by HA Popley
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❤7
गौ और वृषभ की हत्या का सर्वकालिक निषेध :-
निरुक्त 11/43 में गौ को अघन्या कहा है। इसकी व्याख्या करते हुए दुर्गवृत्ति कहती है, वो जिसकी हिंसा सभी के द्वारा निषेधित है।
महाभारत शांति पर्व 263 के अनुसार गौ और वृषभ की हत्या करने वाला महापापी होता है। तुलाधार कहते हैं कि गौ को श्रुति द्वारा अघन्या शब्द से सम्बोधित किया गया है तो उसकी हत्या कैसे की जा सकती है??
इसके अलावा उसी अध्याय के आख्यान अनुसार राजा नहुष के गौ और वृषभ की हत्या किये जाने पर उनको भ्रुणहत्या का महापाप लगा था। इसके अलावा ऋषियों ने व्यथित होकर उनका यज्ञानुष्ठान भी नहीं करवाया था।
अत: गौ और वृषभ दोनों की हिंसा शास्त्र सम्मत नहीं है।
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