प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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The Weber's Manuscript : Part 4


Let's move forward and talk about some other important Gotras in the manuscript.

1. अग्निवेश्य:- अग्निवेश से, आत्रेय पुनर्वसु के 6 प्राथमिक शिष्यों में से एक।
2.वशिष्ठ
3. कौशिकी : ऋषि कौशिक/विश्वामित्र से
4. कात्यायनी
5. हरितायन: ऋषि हरित से, आत्रेय पुनर्वसु के 6 प्राथमिक शिष्यों में से एक।

तो, यहां वे ऋषि-मुनि हैं, जो मुख्य रूप से प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित स्वदेशी औषधीय प्रणाली आयुर्वेद से जुड़े हैं।

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बौद्ध देवी तारा को हिंदू देवी की अवधारणा से लिया गया है।

सिर्फ उनकी ही नहीं, बल्कि पर्णसाबरी नामक एक अन्य देवी की नकल मां दुर्गा/आर्यादेवी से की गई है, जिसका उल्लेख हरिवंश और महाभारत में किया गया है।

Source : The Sakti Cult and Tara , by Eminent Historian DC Sircar


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" भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं है जो भगवान श्रीकृष्ण के तेज से परास्त ना हुआ हो । भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं जो उन्हें जीत सके ।

वेद-वेदांग आदि का ज्ञान , क्षमा दृष्टि पुष्टि धृति योग सांख्य यश शौर्य बल कीर्ति आदि सभी गुण भगवान श्रीकृष्ण में सर्वोच्च रूप में प्रतिष्ठित हैं । त्रैलोक्य के में कोई इनकी समानता नहीं कर सकता । "

- महाभारत सभापर्व अध्याय ३८ , भीष्म पितामह का मंतव्य

भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की भांति हमें भी श्रेष्ठ बनना चाहिए , वह योद्धा , गुरु , स्वयं नारायण , धर्मरक्षक तथा सत्यचरित्र थे ; छलिया , रणछोड़ तथा विलासी नहीं ।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं ।


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जो भरोसा आज आपने मुझ पर दिखाया है , आशा करता हूं वह भरोसा आगे तक चलेगा ।

हमारे समूह से 500 लोग जुड़ चुके हैं । उनमें से हर एक को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं , क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूं , आपके साथ के कारण हूं ।

मैं अपने अग्रज कार्तिक जी , आशीष जी , आर्यबोस जी और प्रिय मित्र पुष्यमित्र का भी आभार व्यक्त करता हूं , जिन्होंने हमेशा ही मेरी सहायता की ।

जयतु भारतम् जयतु संस्कृतम्
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्
जयतु देवी 🙏🙏

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वामपंथी तथा नवबौद्धों द्वारा गायत्री मंत्र पर लगाए गए अश्लीलता के आरोप का खण्डन पर हमारा यह लेख जरूर पढ़े। 🙏🙏👇👇
https://vedkabhedexposse.blogspot.com/2024/08/blog-post_28.html?m=1

Written by : Ashish Bhai 🗿🤝


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क्या पारस्कर गृह्यसूत्र १/३/२९-३० में गौहत्या है ?


जी हां आपने सही सुना । आजकल हमारे ग्रंथों पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं । जानकर और दुख होता है किया आरोप लगाने वाले कुछ हिंदू ही हैं ।

यह अतिथि सत्कार प्रकरण है जहां पर गवालभन् किया जा रहा है ।

आलभन शब्द का अर्थ मैं पहले ही समझा चुका हूं , कि इसकी धातु लभ् स्पर्श तथा प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाई जाती है ।


इसी प्रकार यहां पर गौ का स्पर्श किया जाता है । यहां तक तो फिर भी सब ठीक है , परंतु अचानक से सूत्र २९-३० आते ही हमें मांसाहार प्रकरण दिखता है , और वो भी गौ का ।

अब आपको एक चीज बताता हूं ।

खुद इस पारस्कर गृह्यसूत्र के भाष्याकार हरिहर तथा गदाधर ने खुद इस चीज को गलत , वेदविरुद्ध , स्मृतिविरुद्ध , तथा अप्रमाण्य माना है ।


आचार्य गदाधर , आचार्य जयराम का मत उद्धरित करते हुए बोलते हैं कि गोवध करने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मधुपर्क के साथ अजालभन् कर उसके दूध का पायस ( खीर ) देना चाहिए ।

इसके अलावा याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षराटीका १/१५६ में भी इसका स्पष्ट खंडन आता है :
मधुपर्के गोवधादिकम् नाचरेत्

ये सर्वकालिक धर्मविरुद्ध कार्य है ।

क्रमशः ।।
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इसके अलावा एक अजीब चीज हमें देखने को मिलती है ।
इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था ।

इस मंत्र में स्पष्ट रूप से गांव के खिलाफ की जाने वाली हर प्रकार की हिंसा का निषेध किया गया है ।


सायणाचार्य ने भी इसके अर्थ में कहा है कि हे मनुष्यो ! मेरी इस बात को सुनो और समझो । गौ अघन्या-अदिति है , देवी व मातृतुल्य है , न तो उसका वध किया जाना चाहिए और न ही उसके प्रति कोई भी हिंसा की जानी चाहिए ।

यही प्रमाण देते हुए गदाधर जी ने भी गौहत्या का खंडन किया है ।

अगर हम ध्यान दें , तो गोवध में गौरक्षा का मंत्र पढ़ने का कोई औचित्य नहीं होता । अतः स्पष्ट है कि गौहत्या नहीं होती ।

इसके अलावा पराशर स्मृति का उद्धरण देते हुए आचार्य गदाधर कहते हैं कि गवालभन् ( यहां हनन संबंधी ) हर क्रिया , काल , परिस्थितियों में निषिद्ध है ।

फिर सवाल उठता है कि वास्तविकता क्या है ?

तो इसका वास्तविक अर्थ हमें पाणिनि अष्टाध्यायी ३/४/७३ की काशिका वृत्ति में मिलता है : जहां गो का दाश करने की बात की गई है । आगे भ्वादिगण का उदाहरण देकर समझते हुए का कहा गया है :
दाशृ दाने
अर्थात दश् का अर्थ होता है दान करना । आगे इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब भी कोई अतिथि आता है तो अर्घ्य के साथ उसे गो का दान किया जाना , तथा अतिथि द्वारा उसको प्राप्त करना , ही इसका वास्तविक अर्थ है । इसके आगे तो उन्होंने स्पष्ट यह भी कह दिया की गोहनन बिल्कुल असत्य है ।

अतः यहां से निष्कर्ष निकालते हैं :-


१. अर्घ्य में गोवध नहीं किया जाता और ना ही मांस दिया जाता है ।
२. अतिथि को गोदान किया जाता है ।
३. पूर्वाचार्यों की अस्वीकृति तथा इसे अप्रामाण्य , शास्त्रविरुद्ध तथा श्रुतिस्मृतिविरोधी बोलने से यही सिद्ध होता है कि यह बाद के किसी धर्मविरोधी का कार्य है ।
भला जब आगे सूत्र २८ में ही गो को जीवित छोड़ने की बात आ गई , तो काट कर उसका मांस खिलाने की बात कहां से युक्तिसंगत हो सकती है ?

अतः वेदादि आर्ष ग्रन्थों के विपरीत , पूर्वाचार्यों के मत , भाष्याकारों की अस्वीकृति से सिद्ध होता है की वैदिक धर्म पर गौहिंसा तथा गौमांस भक्षण पर लगने वाले आप बिल्कुल ही निराधार , तर्कहीन और गपोड़ें हैं ।

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वाल्मिकी रामायण अयोध्याकाण्ड 54/18 अनुसार वैदिक ऋषि भरद्वाजजी, जो स्वयं ऋग्वेद के 6/28 अर्थात् गौसूक्त का मंत्रदृष्टा हैं ; उन्होंने भी भगवान श्री राम को अर्घ्य देने के साथ गौ समर्पित की थी, गोमांस नहीं ।

इसी प्रकार श्रीमद्भागवत पुराण 10/39/38-39 के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और भगवान बलराम जी ने भी अक्रूरजी को मधुपर्क और अर्घ्य के साथ गौ समर्पित की थी, न कि गोमांस।

इस प्रकार मेरा प्रमाण ऐतिहासिक रूप से भी प्रबल है और इसे वेद-वेदांगों द्वारा भी समर्थन प्राप्त है।

इति अधर्ममतः सर्वस्व खण्डनम्..


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इसके अलावा एक अजीब चीज हमें देखने को मिलती है । इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था । इस मंत्र में स्पष्ट रूप से गांव के खिलाफ की जाने वाली हर प्रकार की हिंसा का निषेध…
मैंने यहां पर सर्वकालिक गौहिंसा का निषेध दिखाया है , फिर भी कुछ लोगों को जबरदस्ती चुल्ल मची हुई है कि कहीं से भी इसको सामान्य परिस्थिति का दिखाकर आपातकालीन स्थिति को हटा दिया जाए ; ताकि आपातकाल में गोहिंसा का समर्थन किया जा सके ।

मैं समझ नहीं पा रहा मधुपर्क तथा अर्घ्य में इन्हें किस प्रकार का आपातकाल दिखाई पड़ रहा है ?


क्या यह अपने ही आचार्यों के विरुद्ध , स्मृति तथा वेद के विरुद्ध जाना चाहते हैं ?

इसके अलावा यह लोग सोम यज्ञ में बारंबार अर्घ्य दिए जाने को लेकर बारंबार मांसाहार का भी समर्थन करते दिख रहे हैं ।
अरे भाई जब मांसाहार का खंडन पहले ही हो गया , तो जबरदस्ती का उसे इतना लीपने का क्या औचित्य रहा ?

बार-बार अर्घ्य दिया जाना व बार-बार मांसाहार करना यह दो अलग-अलग बातें हैं । बारंबार अर्घ्य देना जिसमें गोदान शामिल है , ये वेद-वेदांगों द्वारा समर्थित होने से प्रमाण माना जाता है ।

परंतु जब गवालभन् करते समय ही गौ रक्षा का मंत्र पढ़ा जा रहा है , तो मांसाहार का विषय तो वैसे ही खंडित हो जाता है ।


आशा करता हूं उन्हें मेरा यह संदेश मिल जाए और वे इस बात को जल्द से जल्द समझ जाएं । बाकी उनके आगे के प्रमाणों का भी जल्द ही खंडन होगा ।

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