" येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।। "
इस साल का रक्षाबंधन मैं अपने उन भाइयों और बहनों को समर्पित करता हूं , जो अन्याय के शिकार हुए , न्याय मांगने गए तो धिक्कार मिली , जो स्वयं के हृदय से तिरस्कृत होकर बोझ बनकर जी रहे हैं , जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया , जिनका शोषण हुआ है , तथा जिन्होंने इस देश , हमारी मातृभूमि भारत की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान कर दिया ।
हम उन अमर शहीदों को नमन करते हैं , जो सही मायने में हमारे हीरो हैं तथा हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा जगाते हैं ।
हम अपने देश व धर्म की रक्षा करने का प्रण लेते हैं ।
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तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।। "
इस साल का रक्षाबंधन मैं अपने उन भाइयों और बहनों को समर्पित करता हूं , जो अन्याय के शिकार हुए , न्याय मांगने गए तो धिक्कार मिली , जो स्वयं के हृदय से तिरस्कृत होकर बोझ बनकर जी रहे हैं , जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया , जिनका शोषण हुआ है , तथा जिन्होंने इस देश , हमारी मातृभूमि भारत की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान कर दिया ।
हम उन अमर शहीदों को नमन करते हैं , जो सही मायने में हमारे हीरो हैं तथा हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा जगाते हैं ।
हम अपने देश व धर्म की रक्षा करने का प्रण लेते हैं ।
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The Weber's Manuscript : Part 4
Let's move forward and talk about some other important Gotras in the manuscript.
1. अग्निवेश्य:- अग्निवेश से, आत्रेय पुनर्वसु के 6 प्राथमिक शिष्यों में से एक।
2.वशिष्ठ
3. कौशिकी : ऋषि कौशिक/विश्वामित्र से
4. कात्यायनी
5. हरितायन: ऋषि हरित से, आत्रेय पुनर्वसु के 6 प्राथमिक शिष्यों में से एक।
तो, यहां वे ऋषि-मुनि हैं, जो मुख्य रूप से प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित स्वदेशी औषधीय प्रणाली आयुर्वेद से जुड़े हैं।
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बौद्ध देवी तारा को हिंदू देवी की अवधारणा से लिया गया है।
सिर्फ उनकी ही नहीं, बल्कि पर्णसाबरी नामक एक अन्य देवी की नकल मां दुर्गा/आर्यादेवी से की गई है, जिसका उल्लेख हरिवंश और महाभारत में किया गया है।
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सिर्फ उनकी ही नहीं, बल्कि पर्णसाबरी नामक एक अन्य देवी की नकल मां दुर्गा/आर्यादेवी से की गई है, जिसका उल्लेख हरिवंश और महाभारत में किया गया है।
Source : The Sakti Cult and Tara , by Eminent Historian DC Sircar
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🔥3
" भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं है जो भगवान श्रीकृष्ण के तेज से परास्त ना हुआ हो । भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं जो उन्हें जीत सके ।
वेद-वेदांग आदि का ज्ञान , क्षमा दृष्टि पुष्टि धृति योग सांख्य यश शौर्य बल कीर्ति आदि सभी गुण भगवान श्रीकृष्ण में सर्वोच्च रूप में प्रतिष्ठित हैं । त्रैलोक्य के में कोई इनकी समानता नहीं कर सकता । "
- महाभारत सभापर्व अध्याय ३८ , भीष्म पितामह का मंतव्य
भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की भांति हमें भी श्रेष्ठ बनना चाहिए , वह योद्धा , गुरु , स्वयं नारायण , धर्मरक्षक तथा सत्यचरित्र थे ; छलिया , रणछोड़ तथा विलासी नहीं ।
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वेद-वेदांग आदि का ज्ञान , क्षमा दृष्टि पुष्टि धृति योग सांख्य यश शौर्य बल कीर्ति आदि सभी गुण भगवान श्रीकृष्ण में सर्वोच्च रूप में प्रतिष्ठित हैं । त्रैलोक्य के में कोई इनकी समानता नहीं कर सकता । "
- महाभारत सभापर्व अध्याय ३८ , भीष्म पितामह का मंतव्य
भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की भांति हमें भी श्रेष्ठ बनना चाहिए , वह योद्धा , गुरु , स्वयं नारायण , धर्मरक्षक तथा सत्यचरित्र थे ; छलिया , रणछोड़ तथा विलासी नहीं ।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं ।
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जो भरोसा आज आपने मुझ पर दिखाया है , आशा करता हूं वह भरोसा आगे तक चलेगा ।
हमारे समूह से 500 लोग जुड़ चुके हैं । उनमें से हर एक को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं , क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूं , आपके साथ के कारण हूं ।
मैं अपने अग्रज कार्तिक जी , आशीष जी , आर्यबोस जी और प्रिय मित्र पुष्यमित्र का भी आभार व्यक्त करता हूं , जिन्होंने हमेशा ही मेरी सहायता की ।
जयतु भारतम् जयतु संस्कृतम्
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्
जयतु देवी 🙏🙏
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हमारे समूह से 500 लोग जुड़ चुके हैं । उनमें से हर एक को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं , क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूं , आपके साथ के कारण हूं ।
मैं अपने अग्रज कार्तिक जी , आशीष जी , आर्यबोस जी और प्रिय मित्र पुष्यमित्र का भी आभार व्यक्त करता हूं , जिन्होंने हमेशा ही मेरी सहायता की ।
जयतु भारतम् जयतु संस्कृतम्
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्
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वामपंथी तथा नवबौद्धों द्वारा गायत्री मंत्र पर लगाए गए अश्लीलता के आरोप का खण्डन पर हमारा यह लेख जरूर पढ़े। 🙏🙏👇👇
https://vedkabhedexposse.blogspot.com/2024/08/blog-post_28.html?m=1
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Written by : Ashish Bhai 🗿🤝
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क्या पारस्कर गृह्यसूत्र १/३/२९-३० में गौहत्या है ?
जी हां आपने सही सुना । आजकल हमारे ग्रंथों पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं । जानकर और दुख होता है किया आरोप लगाने वाले कुछ हिंदू ही हैं ।
यह अतिथि सत्कार प्रकरण है जहां पर गवालभन् किया जा रहा है ।
आलभन शब्द का अर्थ मैं पहले ही समझा चुका हूं , कि इसकी धातु लभ् स्पर्श तथा प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाई जाती है ।
इसी प्रकार यहां पर गौ का स्पर्श किया जाता है । यहां तक तो फिर भी सब ठीक है , परंतु अचानक से सूत्र २९-३० आते ही हमें मांसाहार प्रकरण दिखता है , और वो भी गौ का ।
अब आपको एक चीज बताता हूं ।
खुद इस पारस्कर गृह्यसूत्र के भाष्याकार हरिहर तथा गदाधर ने खुद इस चीज को गलत , वेदविरुद्ध , स्मृतिविरुद्ध , तथा अप्रमाण्य माना है ।
आचार्य गदाधर , आचार्य जयराम का मत उद्धरित करते हुए बोलते हैं कि गोवध करने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मधुपर्क के साथ अजालभन् कर उसके दूध का पायस ( खीर ) देना चाहिए ।
इसके अलावा याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षराटीका १/१५६ में भी इसका स्पष्ट खंडन आता है :
मधुपर्के गोवधादिकम् नाचरेत्
ये सर्वकालिक धर्मविरुद्ध कार्य है ।
क्रमशः ।।
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इसके अलावा एक अजीब चीज हमें देखने को मिलती है ।
इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था ।
सायणाचार्य ने भी इसके अर्थ में कहा है कि हे मनुष्यो ! मेरी इस बात को सुनो और समझो । गौ अघन्या-अदिति है , देवी व मातृतुल्य है , न तो उसका वध किया जाना चाहिए और न ही उसके प्रति कोई भी हिंसा की जानी चाहिए ।
यही प्रमाण देते हुए गदाधर जी ने भी गौहत्या का खंडन किया है ।
अगर हम ध्यान दें , तो गोवध में गौरक्षा का मंत्र पढ़ने का कोई औचित्य नहीं होता । अतः स्पष्ट है कि गौहत्या नहीं होती ।
फिर सवाल उठता है कि वास्तविकता क्या है ?
तो इसका वास्तविक अर्थ हमें पाणिनि अष्टाध्यायी ३/४/७३ की काशिका वृत्ति में मिलता है : जहां गो का दाश करने की बात की गई है । आगे भ्वादिगण का उदाहरण देकर समझते हुए का कहा गया है :
दाशृ दाने
अर्थात दश् का अर्थ होता है दान करना । आगे इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब भी कोई अतिथि आता है तो अर्घ्य के साथ उसे गो का दान किया जाना , तथा अतिथि द्वारा उसको प्राप्त करना , ही इसका वास्तविक अर्थ है । इसके आगे तो उन्होंने स्पष्ट यह भी कह दिया की गोहनन बिल्कुल असत्य है ।
१. अर्घ्य में गोवध नहीं किया जाता और ना ही मांस दिया जाता है ।
२. अतिथि को गोदान किया जाता है ।
३. पूर्वाचार्यों की अस्वीकृति तथा इसे अप्रामाण्य , शास्त्रविरुद्ध तथा श्रुतिस्मृतिविरोधी बोलने से यही सिद्ध होता है कि यह बाद के किसी धर्मविरोधी का कार्य है ।
भला जब आगे सूत्र २८ में ही गो को जीवित छोड़ने की बात आ गई , तो काट कर उसका मांस खिलाने की बात कहां से युक्तिसंगत हो सकती है ?
अतः वेदादि आर्ष ग्रन्थों के विपरीत , पूर्वाचार्यों के मत , भाष्याकारों की अस्वीकृति से सिद्ध होता है की वैदिक धर्म पर गौहिंसा तथा गौमांस भक्षण पर लगने वाले आप बिल्कुल ही निराधार , तर्कहीन और गपोड़ें हैं ।
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इसके पहले सूत्र २७ में गौरक्षा का मंत्र ( ऋग्वेद ८/१०१/१५ : माता रुद्राणां दुहिता वसुनां ) पढ़ते हुए गौ का आलभन किया जा रहा था ।
इस मंत्र में स्पष्ट रूप से गांव के खिलाफ की जाने वाली हर प्रकार की हिंसा का निषेध किया गया है ।
सायणाचार्य ने भी इसके अर्थ में कहा है कि हे मनुष्यो ! मेरी इस बात को सुनो और समझो । गौ अघन्या-अदिति है , देवी व मातृतुल्य है , न तो उसका वध किया जाना चाहिए और न ही उसके प्रति कोई भी हिंसा की जानी चाहिए ।
यही प्रमाण देते हुए गदाधर जी ने भी गौहत्या का खंडन किया है ।
अगर हम ध्यान दें , तो गोवध में गौरक्षा का मंत्र पढ़ने का कोई औचित्य नहीं होता । अतः स्पष्ट है कि गौहत्या नहीं होती ।
इसके अलावा पराशर स्मृति का उद्धरण देते हुए आचार्य गदाधर कहते हैं कि गवालभन् ( यहां हनन संबंधी ) हर क्रिया , काल , परिस्थितियों में निषिद्ध है ।
फिर सवाल उठता है कि वास्तविकता क्या है ?
तो इसका वास्तविक अर्थ हमें पाणिनि अष्टाध्यायी ३/४/७३ की काशिका वृत्ति में मिलता है : जहां गो का दाश करने की बात की गई है । आगे भ्वादिगण का उदाहरण देकर समझते हुए का कहा गया है :
दाशृ दाने
अर्थात दश् का अर्थ होता है दान करना । आगे इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब भी कोई अतिथि आता है तो अर्घ्य के साथ उसे गो का दान किया जाना , तथा अतिथि द्वारा उसको प्राप्त करना , ही इसका वास्तविक अर्थ है । इसके आगे तो उन्होंने स्पष्ट यह भी कह दिया की गोहनन बिल्कुल असत्य है ।
अतः यहां से निष्कर्ष निकालते हैं :-
१. अर्घ्य में गोवध नहीं किया जाता और ना ही मांस दिया जाता है ।
२. अतिथि को गोदान किया जाता है ।
३. पूर्वाचार्यों की अस्वीकृति तथा इसे अप्रामाण्य , शास्त्रविरुद्ध तथा श्रुतिस्मृतिविरोधी बोलने से यही सिद्ध होता है कि यह बाद के किसी धर्मविरोधी का कार्य है ।
भला जब आगे सूत्र २८ में ही गो को जीवित छोड़ने की बात आ गई , तो काट कर उसका मांस खिलाने की बात कहां से युक्तिसंगत हो सकती है ?
अतः वेदादि आर्ष ग्रन्थों के विपरीत , पूर्वाचार्यों के मत , भाष्याकारों की अस्वीकृति से सिद्ध होता है की वैदिक धर्म पर गौहिंसा तथा गौमांस भक्षण पर लगने वाले आप बिल्कुल ही निराधार , तर्कहीन और गपोड़ें हैं ।
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