प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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Evidences of Vedas before 12th century : Part 16

The Weber's Manuscript : Part 3


अब बात करते हैं वेबर पांडुलिपि में पाए गए 2 अन्य गोत्रों के बारे में : कात्यायन और तांडायन।

जिनमें से एक ब्राह्मण ग्रंथ रचयिता का गोत्र यानि तांडायन गोत्र है।

ऋषि कात्यायन ही थे जिनसे कात्यायन गोत्रियों का उद्भव हुआ। हम सभी उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं तो चलिए आगे बढ़ते हैं।

ऋषि तण्डि ; पंचविंश ब्राह्मण अर्थात तांड्य ब्राह्मण के रचयिता; तांडायन गोत्र के आद्य पितामह थे।


ताण्ड्य ब्राह्मण सामवेद की राणायनीय और कौथुम शाखा से सम्बंधित है।


इससे सिद्ध हुआ कि वेद 12वीं शताब्दी से पहले ही विद्यमान थे; ब्राह्मण ग्रंथों और अन्य शाखा ग्रंथों के साथ।

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" येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।। "

इस साल का रक्षाबंधन मैं अपने उन भाइयों और बहनों को समर्पित करता हूं , जो अन्याय के शिकार हुए , न्याय मांगने गए तो धिक्कार मिली , जो स्वयं के हृदय से तिरस्कृत होकर बोझ बनकर जी रहे हैं , जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया , जिनका शोषण हुआ है , तथा जिन्होंने इस देश , हमारी मातृभूमि भारत की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान कर दिया ।

हम उन अमर शहीदों को नमन करते हैं , जो सही मायने में हमारे हीरो हैं तथा हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा जगाते हैं ।
हम अपने देश व धर्म की रक्षा करने का प्रण लेते हैं ।

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The Weber's Manuscript : Part 4


Let's move forward and talk about some other important Gotras in the manuscript.

1. अग्निवेश्य:- अग्निवेश से, आत्रेय पुनर्वसु के 6 प्राथमिक शिष्यों में से एक।
2.वशिष्ठ
3. कौशिकी : ऋषि कौशिक/विश्वामित्र से
4. कात्यायनी
5. हरितायन: ऋषि हरित से, आत्रेय पुनर्वसु के 6 प्राथमिक शिष्यों में से एक।

तो, यहां वे ऋषि-मुनि हैं, जो मुख्य रूप से प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित स्वदेशी औषधीय प्रणाली आयुर्वेद से जुड़े हैं।

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बौद्ध देवी तारा को हिंदू देवी की अवधारणा से लिया गया है।

सिर्फ उनकी ही नहीं, बल्कि पर्णसाबरी नामक एक अन्य देवी की नकल मां दुर्गा/आर्यादेवी से की गई है, जिसका उल्लेख हरिवंश और महाभारत में किया गया है।

Source : The Sakti Cult and Tara , by Eminent Historian DC Sircar


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" भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं है जो भगवान श्रीकृष्ण के तेज से परास्त ना हुआ हो । भूमंडल पर कोई ऐसा राजा नहीं जो उन्हें जीत सके ।

वेद-वेदांग आदि का ज्ञान , क्षमा दृष्टि पुष्टि धृति योग सांख्य यश शौर्य बल कीर्ति आदि सभी गुण भगवान श्रीकृष्ण में सर्वोच्च रूप में प्रतिष्ठित हैं । त्रैलोक्य के में कोई इनकी समानता नहीं कर सकता । "

- महाभारत सभापर्व अध्याय ३८ , भीष्म पितामह का मंतव्य

भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की भांति हमें भी श्रेष्ठ बनना चाहिए , वह योद्धा , गुरु , स्वयं नारायण , धर्मरक्षक तथा सत्यचरित्र थे ; छलिया , रणछोड़ तथा विलासी नहीं ।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं ।


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जो भरोसा आज आपने मुझ पर दिखाया है , आशा करता हूं वह भरोसा आगे तक चलेगा ।

हमारे समूह से 500 लोग जुड़ चुके हैं । उनमें से हर एक को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं , क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूं , आपके साथ के कारण हूं ।

मैं अपने अग्रज कार्तिक जी , आशीष जी , आर्यबोस जी और प्रिय मित्र पुष्यमित्र का भी आभार व्यक्त करता हूं , जिन्होंने हमेशा ही मेरी सहायता की ।

जयतु भारतम् जयतु संस्कृतम्
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्
जयतु देवी 🙏🙏

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वामपंथी तथा नवबौद्धों द्वारा गायत्री मंत्र पर लगाए गए अश्लीलता के आरोप का खण्डन पर हमारा यह लेख जरूर पढ़े। 🙏🙏👇👇
https://vedkabhedexposse.blogspot.com/2024/08/blog-post_28.html?m=1

Written by : Ashish Bhai 🗿🤝


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क्या पारस्कर गृह्यसूत्र १/३/२९-३० में गौहत्या है ?


जी हां आपने सही सुना । आजकल हमारे ग्रंथों पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं । जानकर और दुख होता है किया आरोप लगाने वाले कुछ हिंदू ही हैं ।

यह अतिथि सत्कार प्रकरण है जहां पर गवालभन् किया जा रहा है ।

आलभन शब्द का अर्थ मैं पहले ही समझा चुका हूं , कि इसकी धातु लभ् स्पर्श तथा प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाई जाती है ।


इसी प्रकार यहां पर गौ का स्पर्श किया जाता है । यहां तक तो फिर भी सब ठीक है , परंतु अचानक से सूत्र २९-३० आते ही हमें मांसाहार प्रकरण दिखता है , और वो भी गौ का ।

अब आपको एक चीज बताता हूं ।

खुद इस पारस्कर गृह्यसूत्र के भाष्याकार हरिहर तथा गदाधर ने खुद इस चीज को गलत , वेदविरुद्ध , स्मृतिविरुद्ध , तथा अप्रमाण्य माना है ।


आचार्य गदाधर , आचार्य जयराम का मत उद्धरित करते हुए बोलते हैं कि गोवध करने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मधुपर्क के साथ अजालभन् कर उसके दूध का पायस ( खीर ) देना चाहिए ।

इसके अलावा याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षराटीका १/१५६ में भी इसका स्पष्ट खंडन आता है :
मधुपर्के गोवधादिकम् नाचरेत्

ये सर्वकालिक धर्मविरुद्ध कार्य है ।

क्रमशः ।।
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