नवबौद्धों के नीले सपने : भाग 10
यह नवबौद्धों का वैदिकों पर स्पष्ट आरोप है कि हमने अपने भगवान कृष्ण को गढ़ने के लिए घटजातक के वासुदेव को चुरा लिया ।
लेकिन क्या आप जानते हैं ?
भारतीय इतिहासकार हेमचंद्र रायचौधरी के अनुसार जातक कथाएँ पूरी तरह से काल्पनिक हैं और उनमें कोई ऐतिहासिक संदर्भ नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने भगवान कृष्ण की किंवदंतियों को संरक्षित किया, उन्हें पुराणों और महाकाव्य महाभारत की मूल कहानियों से अलग किया।
इससे यह सिद्ध हो गया कि इन लोगों ने वासुदेव कृष्ण की कहानियाँ हमसे चुरा लीं और उन्हें सारिपुत्र का पूर्व जन्म बना दिया ।
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यह नवबौद्धों का वैदिकों पर स्पष्ट आरोप है कि हमने अपने भगवान कृष्ण को गढ़ने के लिए घटजातक के वासुदेव को चुरा लिया ।
लेकिन क्या आप जानते हैं ?
भारतीय इतिहासकार हेमचंद्र रायचौधरी के अनुसार जातक कथाएँ पूरी तरह से काल्पनिक हैं और उनमें कोई ऐतिहासिक संदर्भ नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने भगवान कृष्ण की किंवदंतियों को संरक्षित किया, उन्हें पुराणों और महाकाव्य महाभारत की मूल कहानियों से अलग किया।
प्रसिद्ध भारतीय विद्वान RG Bhandarkar ने घटपंडित जातक का काल निर्धारण ईसा की बाद की शताब्दियों में किया है।
इससे यह सिद्ध हो गया कि इन लोगों ने वासुदेव कृष्ण की कहानियाँ हमसे चुरा लीं और उन्हें सारिपुत्र का पूर्व जन्म बना दिया ।
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पांडा का पोपट : भाग 15
पांडा बाबू का कहना है महाभारत महर्षि पाणिनि से भी नवीन है।
आइये इसके विपक्ष में ऐतिहासिक दृष्टिकोण देखते हैं ।
महर्षि पाणिनि अपने अष्टाध्यायी 6/2/38 के सूत्र में महान के पूर्वपद के उदाहरण में महाभारत को उद्धृत करते हैं। इसके भावार्थ और इसकी प्राचीन कशिका वृत्ति में भी इसको महाभारत ग्रंथ का ही प्रमाण माना गया है ।
प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीनिवास अयंगर कहते हैं , कि युद्ध के बाद महाभारत का पुनर्वचन शौनक ने किया था, जो अर्जुन के छठी पीढ़ी के अधिसिमकृष्ण के समकालीन थे। उनके अनुसर प्रारम्भिक ग्रन्थरचना 1400 ईसा पूर्व (अयंगर अनुसर भारतयुद्ध का काल) के ही आस पास हुआ था।
ऐसा माना जाता है कि पाणिनि कम से कम 6th-5th century BC के थे , इसलिए हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि महाभारत महाकाव्य पाणिनि और आश्वलायन से पहले अस्तित्व में था।
इति...
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पांडा बाबू का कहना है महाभारत महर्षि पाणिनि से भी नवीन है।
आइये इसके विपक्ष में ऐतिहासिक दृष्टिकोण देखते हैं ।
महर्षि पाणिनि अपने अष्टाध्यायी 6/2/38 के सूत्र में महान के पूर्वपद के उदाहरण में महाभारत को उद्धृत करते हैं। इसके भावार्थ और इसकी प्राचीन कशिका वृत्ति में भी इसको महाभारत ग्रंथ का ही प्रमाण माना गया है ।
प्रसिद्ध इतिहासकार दीक्षितर के अनुसार महाभारत और 2nd century BCE के संगमसाहित्य कुरल में बहुत समानता देखने को मिलती हैं।
प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीनिवास अयंगर कहते हैं , कि युद्ध के बाद महाभारत का पुनर्वचन शौनक ने किया था, जो अर्जुन के छठी पीढ़ी के अधिसिमकृष्ण के समकालीन थे। उनके अनुसर प्रारम्भिक ग्रन्थरचना 1400 ईसा पूर्व (अयंगर अनुसर भारतयुद्ध का काल) के ही आस पास हुआ था।
हेमचंद्र का मानना है, पाणिनि और आश्वलायन महाकाव्य महाभारत को उसके प्राचीन रूप में जानते थे ।
ऐसा माना जाता है कि पाणिनि कम से कम 6th-5th century BC के थे , इसलिए हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि महाभारत महाकाव्य पाणिनि और आश्वलायन से पहले अस्तित्व में था।
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Evidences of Vedas before 12th century : Part 14
This manuscript written in Sanskrit , but found in China belongs to 5th century CE , mentions a stotra to Devi Parvati , and Shivastuti.
In the 17th stanza , it says " वेद निर्मिता " , made/set by the Vedas ; for the glory of Goddess Parvati.
Also in the middle of Stotram , it uses ॐ for Goddess.
Hence proved that Vedas were existing during the period , when the manuscript was being written.
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The Weber's Manuscript : Part 1
This manuscript written in Sanskrit , but found in China belongs to 5th century CE , mentions a stotra to Devi Parvati , and Shivastuti.
In the 17th stanza , it says " वेद निर्मिता " , made/set by the Vedas ; for the glory of Goddess Parvati.
Also in the middle of Stotram , it uses ॐ for Goddess.
Hence proved that Vedas were existing during the period , when the manuscript was being written.
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उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् |
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ||
समुद्र के उत्तर हिमालय के दक्षिण में जो भूमि है , उसे भारत तथा उसकी संतानों को भारती कहते हैं।
~ विष्णु पुराण २.३.१
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ❤️❤️🇮🇳🇮🇳
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वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ||
समुद्र के उत्तर हिमालय के दक्षिण में जो भूमि है , उसे भारत तथा उसकी संतानों को भारती कहते हैं।
~ विष्णु पुराण २.३.१
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An X post of Salwan Momika , the Critic and Atheist who burns the Qur'an openly , is supporting Hindus and Hinduism..
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Evidences of Vedas before 12th century : Part 15
आइए एक-एक करके वेदों की शाखाओं और उनका अभ्यास करने वाले ब्रह्मचारियों और गोत्रों पर एक नजर डालें।
सबसे पहले, सामवेद की छांदोग शाखा के साथ वत्स और पराशर गोत्र।
पाराशर और वत्स वैदिक मंत्र द्रष्टा थे, जिनके नाम पर पाराशर और वत्स का गोत्र शुरू हुआ।
इससे सिद्ध हुआ कि वेद व उनकी शाखाएँ 12वीं शताब्दी से पहले भी विद्यमान थीं और फल-फूल रही थीं ।
अगले भाग में वेद का एक और महत्वपूर्ण ब्राह्मण ग्रन्थ होगा।
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The Weber's Manuscript : Part 2
आइए एक-एक करके वेदों की शाखाओं और उनका अभ्यास करने वाले ब्रह्मचारियों और गोत्रों पर एक नजर डालें।
सबसे पहले, सामवेद की छांदोग शाखा के साथ वत्स और पराशर गोत्र।
पांडुलिपि के अनुसार छान्दोग ब्रह्मचारियों के 6 विभाग थे; इनमें से 2 का जिक्र इसमें किया गया है.
उनकी माता पाराशर गोत्र की थीं और वे वत्स गोत्र के थे।
पाराशर और वत्स वैदिक मंत्र द्रष्टा थे, जिनके नाम पर पाराशर और वत्स का गोत्र शुरू हुआ।
इससे सिद्ध हुआ कि वेद व उनकी शाखाएँ 12वीं शताब्दी से पहले भी विद्यमान थीं और फल-फूल रही थीं ।
अगले भाग में वेद का एक और महत्वपूर्ण ब्राह्मण ग्रन्थ होगा।
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🔥3
Evidences of Vedas before 12th century : Part 16
अब बात करते हैं वेबर पांडुलिपि में पाए गए 2 अन्य गोत्रों के बारे में : कात्यायन और तांडायन।
जिनमें से एक ब्राह्मण ग्रंथ रचयिता का गोत्र यानि तांडायन गोत्र है।
ऋषि कात्यायन ही थे जिनसे कात्यायन गोत्रियों का उद्भव हुआ। हम सभी उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं तो चलिए आगे बढ़ते हैं।
ऋषि तण्डि ; पंचविंश ब्राह्मण अर्थात तांड्य ब्राह्मण के रचयिता; तांडायन गोत्र के आद्य पितामह थे।
इससे सिद्ध हुआ कि वेद 12वीं शताब्दी से पहले ही विद्यमान थे; ब्राह्मण ग्रंथों और अन्य शाखा ग्रंथों के साथ।
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The Weber's Manuscript : Part 3
अब बात करते हैं वेबर पांडुलिपि में पाए गए 2 अन्य गोत्रों के बारे में : कात्यायन और तांडायन।
जिनमें से एक ब्राह्मण ग्रंथ रचयिता का गोत्र यानि तांडायन गोत्र है।
ऋषि कात्यायन ही थे जिनसे कात्यायन गोत्रियों का उद्भव हुआ। हम सभी उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं तो चलिए आगे बढ़ते हैं।
ऋषि तण्डि ; पंचविंश ब्राह्मण अर्थात तांड्य ब्राह्मण के रचयिता; तांडायन गोत्र के आद्य पितामह थे।
ताण्ड्य ब्राह्मण सामवेद की राणायनीय और कौथुम शाखा से सम्बंधित है।
इससे सिद्ध हुआ कि वेद 12वीं शताब्दी से पहले ही विद्यमान थे; ब्राह्मण ग्रंथों और अन्य शाखा ग्रंथों के साथ।
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" येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।। "
इस साल का रक्षाबंधन मैं अपने उन भाइयों और बहनों को समर्पित करता हूं , जो अन्याय के शिकार हुए , न्याय मांगने गए तो धिक्कार मिली , जो स्वयं के हृदय से तिरस्कृत होकर बोझ बनकर जी रहे हैं , जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया , जिनका शोषण हुआ है , तथा जिन्होंने इस देश , हमारी मातृभूमि भारत की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान कर दिया ।
हम उन अमर शहीदों को नमन करते हैं , जो सही मायने में हमारे हीरो हैं तथा हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा जगाते हैं ।
हम अपने देश व धर्म की रक्षा करने का प्रण लेते हैं ।
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तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।। "
इस साल का रक्षाबंधन मैं अपने उन भाइयों और बहनों को समर्पित करता हूं , जो अन्याय के शिकार हुए , न्याय मांगने गए तो धिक्कार मिली , जो स्वयं के हृदय से तिरस्कृत होकर बोझ बनकर जी रहे हैं , जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया , जिनका शोषण हुआ है , तथा जिन्होंने इस देश , हमारी मातृभूमि भारत की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान कर दिया ।
हम उन अमर शहीदों को नमन करते हैं , जो सही मायने में हमारे हीरो हैं तथा हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा जगाते हैं ।
हम अपने देश व धर्म की रक्षा करने का प्रण लेते हैं ।
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