Evidence of Vedas before 12th century : Part 12
These are the Shakhas ( branches ) of 3 Vedas which are mentioned in Tevijja Sutta of Tripitaka.
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These are the Shakhas ( branches ) of 3 Vedas which are mentioned in Tevijja Sutta of Tripitaka.
Pali - Sanskrit - Veda
बहवरिच - बह्वृच - Rigveda
छंदोग - छान्दोग्य - Samveda
तित्तिरिय - तैत्तिरीय - Krishna Yajurveda
अद्धरिय - अध्वर्यु ( शतपथ ) - Yajurveda
Mark Addhariya brahman because as per me , possibly it can be Aiteraeya brahman of Rigveda...
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Understanding Kapala :
कपाल क्या है?
कई विधर्मियों का दावा है कि यज्ञ के दौरान वर्णित सिर या कपाल वास्तव में मानव का सिर है जिसे यज्ञ वेदी में गिरा दिया जाता है और इस प्रकार वैदिक धर्म में मानव बलि दी जाती है।
लेकिन ब्राह्मण ग्रंथ इस बारे में क्या कहते हैं? आइये एक नजर डालते हैं.
इसलिए यहां मानव सिर मानना हास्यास्पदता का शीर्ष स्तर है।
मैं इन मूर्खों से अनुरोध करता हूं कि कृपया किसी भी बात पर टिप्पणी करने से पहले कृपया वैदिक ग्रंथ पढ़ें ।
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कपाल क्या है?
कई विधर्मियों का दावा है कि यज्ञ के दौरान वर्णित सिर या कपाल वास्तव में मानव का सिर है जिसे यज्ञ वेदी में गिरा दिया जाता है और इस प्रकार वैदिक धर्म में मानव बलि दी जाती है।
लेकिन ब्राह्मण ग्रंथ इस बारे में क्या कहते हैं? आइये एक नजर डालते हैं.
शतपथ 1/2/1/2 के अनुसार पुरोडाश यज्ञ का मुख है । जिस बर्तन में इसे रखा जाता है, वह कपाल है । इसी प्रकार इसमें जो पिसा हुआ चावल पकाया जा रहा है वह मस्तिष्क है ।
इसलिए यहां मानव सिर मानना हास्यास्पदता का शीर्ष स्तर है।
मैं इन मूर्खों से अनुरोध करता हूं कि कृपया किसी भी बात पर टिप्पणी करने से पहले कृपया वैदिक ग्रंथ पढ़ें ।
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क्या स्त्री-शूद्र को वेद पढ़ने व सुनने का अधिकार नहीं ?
वाल्मीकि रामायण अयोध्याकांड सर्ग ६३-६४ ऋषिकुमार का वर्णन मिलता है ।
ऋषिकुमार शूद्र माता तथा वैश्य पिता से उत्पन्न हुए थे । ये वनवासी तापस ऋषि थे ।
शब्दभेदी बाण लगने से मरणासन्न हो ये कुछ बातें कहते हैं :
यहां से स्त्री-शूद्र का वेद व तपस्या का अधिकार सिद्ध होता है ।
वाल्मीकि रामायण अयोध्याकांड सर्ग ६३-६४ ऋषिकुमार का वर्णन मिलता है ।
ऋषिकुमार शूद्र माता तथा वैश्य पिता से उत्पन्न हुए थे । ये वनवासी तापस ऋषि थे ।
शब्दभेदी बाण लगने से मरणासन्न हो ये कुछ बातें कहते हैं :
श्लोक ६३/२७-२८ में स्वयं को तपस्वी तथा ऋषिमार्ग अनुयायी बताते हैं ।
३६-३७ में दशरथजी ने इन्हें तेजयुक्त तपस्वी बताया है ।
४२ में इन्होंने स्वयं को वेदाध्ययन करने वाला तथा तपस्वी कहा है । ( फलयोगश्रुतस्य वा )
५०-५१ में यह स्वयं को अब्राह्मण व द्विजाति-बाह्य बताते हैं , अर्थात् ये वर्णसंकर थे ।
६४/७ में सब जानने के बावजूद दशरथजी इनके पिता को मुनि कहते हैं ।
श्लोक २४ में इनके पिता इन्हें ब्रह्मवादी तपस्वी बताते हैं ।
श्लोक २९ में उनके माता-पिता को तपस्विनौ कहा गया है , अर्थात दोनों तपस्वी थे ।
३२-३३ अनुसार इनके माता-पिता संध्या करते थे तथा ऋषिकुमार का शास्त्र स्वाध्याय सुनते थे ।
३५ अनुसार उनकी शूद्रा माता तपस्विनी थीं ।
अंततः इनके पिता अपने समस्त कुल को ही तपस्वी कुल बताते हैं ।
यहां से स्त्री-शूद्र का वेद व तपस्या का अधिकार सिद्ध होता है ।
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अरे मूर्ख प्राणी 😂
गूगल अनुवाद से वेद कौन पढ़ता है ? वेद के शब्दों के अर्थ वेदांग अनुसार किए जाते हैं । गूगल ने कौन सा वेदांग पढ़ रखा है यह बता ? आज तक तुमने कभी अष्टाध्यायी भी पढ़ी है जो वेदों का अर्थ समझ सको ?
उदाहरण : लौकिक संस्कृत में गौ का अर्थ गाय होता है ।
वैदिक संस्कृत में गौ / गाव का मुख्य अर्थ गमनशील होता है ।
ब्रह्मचारी लोग १२ , २४ , ३६ , ४८ यह कभी-कभी तो संपूर्ण जीवन ही वेदों का अध्ययन करने में लगा देते थे । अगर वेदों को समझना इतना आसान ही होता तो कोई इतने लंबे समय तक उन्हें पढ़ता ही नहीं । यह मूर्ख नहीं थे , ये वही लोग थे जिन्होंने दुनिया में भारतीय ज्ञान का विस्तार किया ।
गूगल अनुवाद से वेद कौन पढ़ता है ? वेद के शब्दों के अर्थ वेदांग अनुसार किए जाते हैं । गूगल ने कौन सा वेदांग पढ़ रखा है यह बता ? आज तक तुमने कभी अष्टाध्यायी भी पढ़ी है जो वेदों का अर्थ समझ सको ?
उदाहरण : लौकिक संस्कृत में गौ का अर्थ गाय होता है ।
वैदिक संस्कृत में गौ / गाव का मुख्य अर्थ गमनशील होता है ।
और जहां तक ये सवाल कि भाष्याकारों ने संस्कृत में अनुवाद क्यों किया है , तो भारत में लंबे समय तक संस्कृत ही जनसामान्य की भाषा रही है । संस्कृत में पूरे भारत को जोड़कर रखा है । ऊपर से संस्कृत की कई सारे ऐसे शब्द है जिनका अन्य भाषाओं में बिल्कुल सही अनुवाद करना संभव नहीं । जिसे भी वेद पढ़ने होते थे वह संस्कृत भाषा सीखता था । संस्कृत जानने के बाद ही कोई वेद पढ़ और समझ सकता है । जैसे अंग्रेजी ग्रंथ , उसी रुप में सही समझ आता है ।
ब्रह्मचारी लोग १२ , २४ , ३६ , ४८ यह कभी-कभी तो संपूर्ण जीवन ही वेदों का अध्ययन करने में लगा देते थे । अगर वेदों को समझना इतना आसान ही होता तो कोई इतने लंबे समय तक उन्हें पढ़ता ही नहीं । यह मूर्ख नहीं थे , ये वही लोग थे जिन्होंने दुनिया में भारतीय ज्ञान का विस्तार किया ।
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
अरे मूर्ख प्राणी 😂 गूगल अनुवाद से वेद कौन पढ़ता है ? वेद के शब्दों के अर्थ वेदांग अनुसार किए जाते हैं । गूगल ने कौन सा वेदांग पढ़ रखा है यह बता ? आज तक तुमने कभी अष्टाध्यायी भी पढ़ी है जो वेदों का अर्थ समझ सको ? उदाहरण : लौकिक संस्कृत में गौ का अर्थ गाय…
ईसाइयों को संस्कृत नहीं आती , यह उनकी गलती है । उन्हें संस्कृत सीखनी चाहिए और फिर वेदों पर कुछ टिप्पणी करनी चाहिए ।
जहां तक वेदों की भाष्याकारों की बात है , पूर्वाचार्यों में इतना भी विरोध नहीं रहा कि वह एक दूसरे के भाष्य को ही मानने से मना कर दें ।
आज भी सायण , महिधर , वेंकट , उव्वट , स्कंदस्वामी , महर्षि दयानंद सरस्वती , श्रीराम शर्मा आचार्य के भाष्य सर्वमान्य हैं ।
इनमें कई जगह पर विरोधाभास होता है परंतु वेदांगानुकूल जाकर हम इसका सही अर्थ जान सकते हैं ।
जैसे वेदों के कुछ यज्ञपरक मंत्रों का महिधर भाष्य ब्राह्मण ग्रंथों में दिए अर्थ से मेल नहीं खाता , ब्राह्मण ग्रन्थ से आप उन मंत्र का सही आधिदैविक अर्थ जान सकते हैं ।
वैदिक धर्म में सत्य जानने के अनेकों मार्ग हैं । चलना तुम्हें है , रिसर्च तुम्हें करनी है , पढ़ाई तुम्हें करनी है और जानना भी तुम्हें है ।
लेख खत्म करने के पहले एक छोटा सा सवाल :
वेदों के भाष्याकारों को तुमने किस आधार पर गलत सिद्ध करने का प्रयास किया ?
इसके लिए तुम्हारे पास क्या शास्त्र व श्रुतिप्रमाण है ?
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मेरा येशु येशु : भाग 13
यह नेपत पेरुरा क्या बला है 😂😂
और ये बुद्धि का सर्प कौन सा आशीर्वाद देता है भाई 😨
और कौन सा देवता लंगड़ा है हमारे यहां 😂😂
यह है इनका गूगल अनुवाद जिसको यह सही अर्थ बता रहे हैं 😆👌
एक भी अर्थ इसका सही व सटीक नहीं लग रहा ।
मंत्रार्थ - :
यहां सभी मनुष्यों के कल्याणार्थ ईश्वर से शांतिप्रार्थना की जा रही है ।
वेदार्थ का अनर्थ न करो भाई ।
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यह नेपत पेरुरा क्या बला है 😂😂
और ये बुद्धि का सर्प कौन सा आशीर्वाद देता है भाई 😨
और कौन सा देवता लंगड़ा है हमारे यहां 😂😂
यह है इनका गूगल अनुवाद जिसको यह सही अर्थ बता रहे हैं 😆👌
एक भी अर्थ इसका सही व सटीक नहीं लग रहा ।
मंत्रार्थ - :
यहां सभी मनुष्यों के कल्याणार्थ ईश्वर से शांतिप्रार्थना की जा रही है ।
जहां पर गूगल ने देवताओं का देवता अर्थ किया है वहां पर वास्तविक अर्थ देवों द्वारा रक्षित पृथ्वी ( पृश्नि ) होगा ।
वैदिक संस्कृत में पेरू शब्द का अर्थ उपद्रवकारी होता है , अतः मन्त्रार्थ में ईश्वर से प्रार्थना की जा रही है कि समस्त विघ्नों की शांति हो ।
जहां पर बुद्धि का सर्प अर्थ किया है , वहां पर अहिर्बुध्न्य अर्थात समस्त विश्व को संतुलित रखने वाली शक्ति से शांतिप्रार्थना की जा रही है ।
देवता अजएकपाद की व्याख्या निरुक्त की दुर्गाचार्य वृत्ति में सूर्यरूप में की गई है अर्थात् सौरऊर्जा विश्व के लिए कल्याणकारक हो ।
इसी प्रकार अपानपात् अर्थात् मेघ से वर्षाजल द्वारा कल्याण करने की प्रार्थना है ।
वेदार्थ का अनर्थ न करो भाई ।
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https://www.thehindu.com/news/cities/Vijayawada/women-not-barred-from-learning-vedas/article5877128.ece
Finally I can say : " Mera desh badal raha hai , aage badh raha hai " 🗿🗿
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https://t.me/history_of_manuvadii/3068
Read our new khandan of Indra-Ahilya Prasanga and the historical story of Lord Indra becoming Sahasraksha.
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मनुवादियों का इतिहास पुरातत्व 🚩🚩
भगवान इंद्र को सहस्राक्ष के नाम से जाना जाता है, क्या आप जानते हैं क्यों ??
पद्म पुराण के अनुसार, यह इंद्र अहिल्या प्रकरण के कारण हुआ था।
लेकिन वास्तव में, Iconography के अनुसार, यह ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के भौतिक प्रतिनिधित्व के कारण था। यह इंद्र, रुद्र…
पद्म पुराण के अनुसार, यह इंद्र अहिल्या प्रकरण के कारण हुआ था।
लेकिन वास्तव में, Iconography के अनुसार, यह ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के भौतिक प्रतिनिधित्व के कारण था। यह इंद्र, रुद्र…