पांडा 🐼 का पोपट : भाग 12
पांडा बाबू 🐼 : अश्वमेध यज्ञ में कई पशुओं की बलि दी जाती थी । यजुर्वेद २४-२५ अनेकों पशुओं का आलभन ( 🐼 अर्थ : मारना ) करने की बात लिखी है ।
शायद पांडा 🐼 ने अपने ही आचार्यों को नहीं पढ़ा । महीधर-उवट्ट ने भी यहां पशुबलि नहीं मानी है ।
२५/४५ उवट्ट-महीधर भाष्य में भी घोड़े को अखंडनीय माना गया है ।
तदोपरांत शतपथ १/२/३/९ में भी घोड़े को मेधयुक्त न होने के कारण यज्ञ में इसकी बलि देना वर्जित है ।
शतपथ १३/२/८/२ में घोड़े को बेहोश करना ही उसकी बलि मानी गई है । वहां पर भी घोड़े को मारने का कोई विधान नहीं है ।
पांडा बाबू 🐼 : अश्वमेध यज्ञ में कई पशुओं की बलि दी जाती थी । यजुर्वेद २४-२५ अनेकों पशुओं का आलभन ( 🐼 अर्थ : मारना ) करने की बात लिखी है ।
सर्वप्रथम आलभन का अर्थ जानते हैं ।
काशकृत्स्न धातुपाठ १/५६४ व १/३६२ अनुसार लभ् धातु का अर्थ धारण करना / प्राप्त करना होता है ।
शायद पांडा 🐼 ने अपने ही आचार्यों को नहीं पढ़ा । महीधर-उवट्ट ने भी यहां पशुबलि नहीं मानी है ।
उवट्ट-महीधर २४/४० भाष्य : तेष्वारण्याःसर्वे उतस्रष्टव्या न तु हिंस्याः
अर्थात् यज्ञोपरांत समस्त पशुओं को वन में छोड़ दिया जाए व कोई हिंसा न की जाए ।
इसी प्रकार महीधर २५/१ के घोड़े के अंगों की बलि के प्रकरण में लिखते हैं :
आज्यमवदानानि कृत्वा आज्यमेवाश्वांगत्वेन परिकल्पयः
अर्थात् आज्य ( घृत ) में ही अश्व के अंगों की परिकल्पना करके आहुति दी जाए ।
२५/४५ उवट्ट-महीधर भाष्य में भी घोड़े को अखंडनीय माना गया है ।
तदोपरांत शतपथ १/२/३/९ में भी घोड़े को मेधयुक्त न होने के कारण यज्ञ में इसकी बलि देना वर्जित है ।
शतपथ १३/२/८/२ में घोड़े को बेहोश करना ही उसकी बलि मानी गई है । वहां पर भी घोड़े को मारने का कोई विधान नहीं है ।
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वैदिक ऋषिकाएं : भाग 1
जिस प्रकार वेदों के मंत्रदृष्टा ऋषि हैं , उसी प्रकार मंत्रदृष्टा ऋषिकाएं भी हैं ।
इस श्रृंखला में हम उनमें से ही चारों वेदों की कुछ महत्वपूर्ण और महाज्ञानी ऋषिकाओं के बारे में जानेंगे ।
1. विश्ववारा आत्रेयी :
अत्रि ऋषि की कन्या होने के कारण यह अत्रिदुहिता या आत्रेयी कही जाती हैं । ऋषिका विश्ववारा को उनके पिता अत्रि द्वारा वेदों की शिक्षा प्राप्त हुई थी ।
अत्रिदुहिता विश्ववारा यजुर्वेद ३३/१२ की मंत्रदृष्टा ऋषिका है । सर्वानुक्रमसूत्र ( ३/१७ ) में भी इन्हें ऋषिका मानते हुए सम्मान दिया है । आचार्य महिधर ने अपने यजुर्वेद ३३/१२ के भाष्य में विश्ववारा को ही इसकी मंत्रदृष्टा ऋषिका बताया है ।
ऋषिका विश्ववारा न सिर्फ एक मंत्र अपितु बहुत से मंत्रों की दृष्ट रही हैं । इनकी मेधा व महत्ता का अनुभव आप इसी बात से कर सकते हैं कि इन्हें यज्ञकर्तृ भी माना जाता है ।
अर्थात् न सिर्फ यह वेद मंत्रों की दृष्टा हैं अपितु इन्हें यज्ञों में भी ऋत्विजों का विशेष पद प्राप्त था । इन्होंने उस नारीशक्ति को भी दर्शाया है जो सर्वगुण संपन्न है ।
क्रमशः ...
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जिस प्रकार वेदों के मंत्रदृष्टा ऋषि हैं , उसी प्रकार मंत्रदृष्टा ऋषिकाएं भी हैं ।
इस श्रृंखला में हम उनमें से ही चारों वेदों की कुछ महत्वपूर्ण और महाज्ञानी ऋषिकाओं के बारे में जानेंगे ।
1. विश्ववारा आत्रेयी :
अत्रि ऋषि की कन्या होने के कारण यह अत्रिदुहिता या आत्रेयी कही जाती हैं । ऋषिका विश्ववारा को उनके पिता अत्रि द्वारा वेदों की शिक्षा प्राप्त हुई थी ।
अत्रिदुहिता विश्ववारा यजुर्वेद ३३/१२ की मंत्रदृष्टा ऋषिका है । सर्वानुक्रमसूत्र ( ३/१७ ) में भी इन्हें ऋषिका मानते हुए सम्मान दिया है । आचार्य महिधर ने अपने यजुर्वेद ३३/१२ के भाष्य में विश्ववारा को ही इसकी मंत्रदृष्टा ऋषिका बताया है ।
ऋषिका विश्ववारा न सिर्फ एक मंत्र अपितु बहुत से मंत्रों की दृष्ट रही हैं । इनकी मेधा व महत्ता का अनुभव आप इसी बात से कर सकते हैं कि इन्हें यज्ञकर्तृ भी माना जाता है ।
अर्थात् न सिर्फ यह वेद मंत्रों की दृष्टा हैं अपितु इन्हें यज्ञों में भी ऋत्विजों का विशेष पद प्राप्त था । इन्होंने उस नारीशक्ति को भी दर्शाया है जो सर्वगुण संपन्न है ।
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वाजीकरण -
संदर्भ : चरक चिकित्सास्थान वाजीकरणाध्याय , प्रथम तीन पाद
वाजीकरण अर्थात् वीर्यशुक्र वृद्धि ताकि संतानोत्पत्ति हो सके व दांपत्य जीवन सुखमय हो ।
वाजीकरण करने हेतु आयु 20/25 से लेकर संपूर्ण युवावस्था तक मानी गई है । बालकों और वृद्धो के लिए वाजीकरण उपयुक्त नहीं है क्योंकि ऐसा करने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है । शरीर सूखने लगता है ।
शुक्रक्षय तथा अल्पमैथुन शक्ति के निवारण हेतु भी वाजीकरण का उपयोग किया जाता है ।
वाजीकरण औषधियां कई वर्गों में बांटी गई है जिनमें से
अतः वाजीकरण में सिर्फ मांसयुक्त औषधियों का ही प्रयोग होता है , यह हिल्लन-डुल्लन की कपोल कल्पना है ।
स्पष्टीकरण के लिए ऊपर नजर डालें ।
संदर्भ : चरक चिकित्सास्थान वाजीकरणाध्याय , प्रथम तीन पाद
वाजीकरण अर्थात् वीर्यशुक्र वृद्धि ताकि संतानोत्पत्ति हो सके व दांपत्य जीवन सुखमय हो ।
वाजीकरण की सलाह जितेंद्रियों को ही दी जाती है । यदि हिल्लन-डुल्लन इसका सेवन करेंगे तो व्यभिचार और अगम्यागमन प्रवृत्ति बढ़ेगी ।
वाजीकरण करने हेतु आयु 20/25 से लेकर संपूर्ण युवावस्था तक मानी गई है । बालकों और वृद्धो के लिए वाजीकरण उपयुक्त नहीं है क्योंकि ऐसा करने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है । शरीर सूखने लगता है ।
शुक्रक्षय तथा अल्पमैथुन शक्ति के निवारण हेतु भी वाजीकरण का उपयोग किया जाता है ।
वाजीकरण औषधियां कई वर्गों में बांटी गई है जिनमें से
विभिन्न प्रकार के स्वरस , गुटिका , घृत औदन , क्षीर , दधिसर , माष , वृष्यपूपलिका (सात्विक) आदि सात्त्विक आहारो द्वारा शुक्रवृद्धि करने का प्रमाण मिलता है ।
साथ ही पिंडरस , मांसरस , मांस , अंड , पूपलिका इत्यादि तामसिक पदार्थ द्वारा भी शुक्रपोषण की विधि देखने को मिलती है ।
अतः वाजीकरण में सिर्फ मांसयुक्त औषधियों का ही प्रयोग होता है , यह हिल्लन-डुल्लन की कपोल कल्पना है ।
स्पष्टीकरण के लिए ऊपर नजर डालें ।
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
वाजीकरण - संदर्भ : चरक चिकित्सास्थान वाजीकरणाध्याय , प्रथम तीन पाद वाजीकरण अर्थात् वीर्यशुक्र वृद्धि ताकि संतानोत्पत्ति हो सके व दांपत्य जीवन सुखमय हो । वाजीकरण की सलाह जितेंद्रियों को ही दी जाती है । यदि हिल्लन-डुल्लन इसका सेवन करेंगे तो व्यभिचार और अगम्यागमन…
चतुर्थ पाद में हमें शक्तिवर्धक औषधियां देखने को मिलती हैं जो इन्हीं हिल्लन-डुल्लन लोगों के लिए है ।
यह ध्यान रखिएगा कि वाजीकरण का उपयोग मुख्य रूप से जितेंद्रियों को ही करना चाहिए । हिल्लन-डुल्लन लोग इसके दुरुपयोग से वीर्यनाश कर तथा बहुस्त्रीगामी होकर बस समाज में व्यभिचार ही फैलाते हैं ।
औषधि का सेवन रोग को दूर करने के लिए स्वास्थ्यलाभ तथा आयुवर्धन के लिए ही करना चाहिए । इनका दुरुपयोग विनाश को जन्म देता है ।
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जो लोग अतिशय मैथुन करने वाले हैं , शक्तिहीन है , बहुस्त्रीगामी है , वैश्यागमन करते हैं , अगम्यागमन प्रवृत्ति वाले हैं , केवल औषधीयों का दम पर मैथुन करने वाले हैं , बारंबार शुक्र का क्षरण करने वाले हैं , जो एक बार के मैथुन में ही अत्यधिक शुक्र का नाश करने वाले हैं , केवल हेमंत आदि ऋतुओं में ही गमन करने में सक्षम , अभ्यासानुसार बारंबार मैथुन में प्रयुक्त होने वाले हैं ,
कुल मिला-जुलाकर जिनके लक्षण इन्हीं हिल्लन-डुल्लन लोगों की भांति है , उन्हें भी वाजीकरण जैसी कुछ औषधियों का सेवन करने की अनुमति दी जाती है । साथ ही साथ बलवान अगर बलहीन हो जाए या बलवान को और बल की प्राप्ति करनी हो , तो चतुर्थ पाद की औषधियों का प्रयोग किया जा सकता है ।
यह ध्यान रखिएगा कि वाजीकरण का उपयोग मुख्य रूप से जितेंद्रियों को ही करना चाहिए । हिल्लन-डुल्लन लोग इसके दुरुपयोग से वीर्यनाश कर तथा बहुस्त्रीगामी होकर बस समाज में व्यभिचार ही फैलाते हैं ।
चतुर्थ पाद की औषधियां भी पहले के तीन पादों की तरह ही वृष्य तथा बलवर्धक होती हैं , उनमें भी तामसिक और सात्विक के भेद होते हैं ।
औषधि का सेवन रोग को दूर करने के लिए स्वास्थ्यलाभ तथा आयुवर्धन के लिए ही करना चाहिए । इनका दुरुपयोग विनाश को जन्म देता है ।
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पांडा बाबू 🐼 का पोपट : भाग १३
Existence of Saraswati River and Age of Vedas pe Panda babu 🐼 ki kutai !!!
वह बात अलग है कि पांडा बाबू 🐼 इन सबको फेक बोलते हुए इन सब पर यकीन नहीं करेंगे और कहेंगे कि तुमने कुछ सिद्ध नहीं किया 😂😂
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Existence of Saraswati River and Age of Vedas pe Panda babu 🐼 ki kutai !!!
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वैदिक ऋषिकाएं : भाग २
ऋषिका सार्पराज्ञी
सार्पराज्ञी एक चतुर्वेदी ऋषिका है । इनके द्वारा दृष्ट किए मंत्र चारों वेदों में निहित हैं ।
ऋषिका सार्पराज्ञी का नाम बृहद्देवता २/८४ में अन्य ऋषिकाओं के साथ देखने को मिलता है । यजुर्वेद के प्रसिद्ध भाष्याकार महिधर ने ३/६ के भाष्य में ऋषिका सार्पराज्ञी का ऋषित्व स्वीकार करते हुए उन्हें ही मंत्रदृष्टा माना है ।
इनके द्वारा दृष्ट किए गए मंत्र अग्न्याधान प्रक्रिया में प्रयोग होते हैं ।
आज के युग की प्रगतिशील स्त्रियों के लिए सार्पराज्ञी एक प्रेरणा स्रोत तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रवक्ता हैं ।
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ऋषिका सार्पराज्ञी
सार्पराज्ञी एक चतुर्वेदी ऋषिका है । इनके द्वारा दृष्ट किए मंत्र चारों वेदों में निहित हैं ।
ऋषिका सार्पराज्ञी का नाम बृहद्देवता २/८४ में अन्य ऋषिकाओं के साथ देखने को मिलता है । यजुर्वेद के प्रसिद्ध भाष्याकार महिधर ने ३/६ के भाष्य में ऋषिका सार्पराज्ञी का ऋषित्व स्वीकार करते हुए उन्हें ही मंत्रदृष्टा माना है ।
इनके द्वारा दृष्ट किए गए मंत्र अग्न्याधान प्रक्रिया में प्रयोग होते हैं ।
ये ऋग्वेद १०/१८९ सूक्त की ऋषिका हैं ।
इस सूक्त के तीन मंत्र हैं जो यजु ( ३/६-८ ) , साम ( ६३०-६३२ , १३७६-१३७८ ) और अथर्ववेद ( ६/३१/१-३ ) में भी दृष्टिगोचर होते हैं ।
यह तीनों मंत्र सूर्य को समर्पित हैं जहां पर सूर्य की महिमा तथा इसका वैज्ञानिक महत्व देखने को मिलता है ।
इन मंत्रों में पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना , सूर्य ज्योति का पृथ्वी पर प्रभाव तथा इससे मुहूर्त का निर्माण देखने को मिलता है ।
आज के युग की प्रगतिशील स्त्रियों के लिए सार्पराज्ञी एक प्रेरणा स्रोत तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रवक्ता हैं ।
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