प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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कुतर्क का भी एक हद होता है ।
इसके दिमाग में जो गलत अश्लील भावनाएं हैं जिस से यह ✋ 🤝 का प्रेरणा पाता है , उसी दृष्टि से यह यज्ञिक कर्म काण्ड को भी देख रहा है। 😂😂

अबे गधा ले पढ़ शतपथ ब्राह्मण (१३/६/२/१०) पुरूष मेध के प्रकरण में साफ लिखा है की ब्रह्म ज्ञान के लिए ब्राह्मण को प्राप्त करें इस से ब्रह्म ज्ञान से ब्रह्म का संगम अर्थात एकीकरण होता है ब्राह्मण से प्राप्त ब्रह्म ज्ञान से ही कोई ब्रह्म को पा लेता है युद्ध विद्या के लिए क्षेत्रीय को प्राप्त करें अर्थात इस से कोई व्यक्ति युद्ध विद्या के साथ खुद को मिला देता है यह होता है पुरुष मेध।

जब पुरुष मेध के प्रकरण में साफ निषेध है की किसी भी पुरूष को इस यज्ञ में मारा नही जाता तो इसमें मारना अर्थ कहा से हो जाएगा बे प्रकरण अनुसार धातु का अर्थ लिया जाता है हिल्लूमल ।😜😜
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Exposing Adam Seeker on Maa Kali !!

Adam : Devi Kali is demon as she looks horrible.

Me. Choti Sadri Inscription of Gauriof 490 CE refers her as furious , yet most compassionate and loving everyone as her own children. Moreover Stutis also describe her as most graceful & source of beauty.

Adam : She will be against you if you follow Christianity.

Me. Divine mother won't be angry until & unless you are an enemy of humanity.

Adam : She is dangerous , how can she accept someone who is not her bhakta ?

Me : She is described as most kind , merciful & holder of justice. She even helps enemies who seeks her.

Adam : She destroys non believers reee 😭

Me : Fir wahi ! Those who have evil intentions in mind must fear her. Why do you fear justice of Mother ? She even punishes those who uses her bhakti for evil purposes.


Adam : Sorry saaar 😭

Sources : Aulikara inscriptions by Daniel Belogh , Mahishasuramardini Stotram by Adi Shankaracharya ji.

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निशुंभ शुंभ गर्जिनी , प्रचंड मुंड खंडिनी
वने रणे प्रकाशिनी , भजामि विन्ध्यवासिनी 🙏
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पांडा 🐼 का पोपट : भाग 12

पांडा बाबू 🐼 : अश्वमेध यज्ञ में कई पशुओं की बलि दी जाती थी । यजुर्वेद २४-२५ अनेकों पशुओं का आलभन ( 🐼 अर्थ : मारना ) करने की बात लिखी है ।

सर्वप्रथम आलभन का अर्थ जानते हैं ।
काशकृत्स्न धातुपाठ १/५६४ व १/३६२ अनुसार लभ् धातु का अर्थ धारण करना / प्राप्त करना होता है ।


शायद पांडा 🐼 ने अपने‌ ही आचार्यों को नहीं पढ़ा । महीधर-उवट्ट ने भी यहां पशुबलि नहीं मानी है ।

उवट्ट-महीधर २४/४० भाष्य : तेष्वारण्याःसर्वे उतस्रष्टव्या न तु हिंस्याः

अर्थात् यज्ञोपरांत समस्त पशुओं को वन में छोड़ दिया जाए व कोई हिंसा न की जाए ।


इसी प्रकार महीधर २५/१ के घोड़े के अंगों की बलि के प्रकरण में लिखते हैं :

आज्यमवदानानि कृत्वा आज्यमेवाश्वांगत्वेन परिकल्पयः

अर्थात् आज्य ( घृत ) में ही अश्व के अंगों की परिकल्पना करके आहुति दी जाए ।


२५/४५ उवट्ट-महीधर भाष्य में भी घोड़े को अखंडनीय माना गया है ।

तदोपरांत शतपथ १/२/३/९ में भी घोड़े को मेधयुक्त न होने के कारण यज्ञ में इसकी बलि देना वर्जित है ।
शतपथ १३/२/८/२ में घोड़े को बेहोश करना ही उसकी बलि मानी गई है । वहां पर भी घोड़े को मारने का कोई विधान नहीं है ।
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वैदिक ऋषिकाएं : भाग 1

जिस प्रकार वेदों के मंत्रदृष्टा ऋषि हैं , उसी प्रकार मंत्रदृष्टा ऋषिकाएं भी हैं ।
इस श्रृंखला में हम उनमें से ही चारों वेदों की कुछ महत्वपूर्ण और महाज्ञानी ऋषिकाओं के बारे में जानेंगे ।

1. विश्ववारा आत्रेयी :

अत्रि ऋषि की कन्या होने के कारण यह अत्रिदुहिता या आत्रेयी कही जाती हैं । ऋषिका विश्ववारा को उनके पिता अत्रि द्वारा वेदों की शिक्षा प्राप्त हुई थी ।
अत्रिदुहिता विश्ववारा यजुर्वेद ३३/१२ की मंत्रदृष्टा ऋषिका है । सर्वानुक्रमसूत्र ( ३/१७ ) में भी इन्हें ऋषिका मानते हुए सम्मान दिया है । आचार्य महिधर ने अपने यजुर्वेद ३३/१२ के भाष्य में विश्ववारा को ही इसकी मंत्रदृष्टा ऋषिका बताया है ।
ऋषिका विश्ववारा न सिर्फ एक मंत्र अपितु बहुत से मंत्रों की दृष्ट रही हैं । इनकी मेधा व महत्ता का अनुभव आप इसी बात से कर सकते हैं कि इन्हें यज्ञकर्तृ भी माना जाता है ।
अर्थात् न सिर्फ यह वेद मंत्रों की दृष्टा हैं अपितु इन्हें यज्ञों में भी ऋत्विजों का विशेष पद प्राप्त था । इन्होंने उस‌ नारीशक्ति को भी दर्शाया है जो सर्वगुण संपन्न है ।

क्रमशः ...

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वाजीकरण -

संदर्भ : चरक चिकित्सास्थान वाजीकरणाध्याय , प्रथम तीन पाद

वाजीकरण अर्थात् वीर्यशुक्र वृद्धि ताकि संतानोत्पत्ति हो सके व दांपत्य जीवन सुखमय हो ।

वाजीकरण की सलाह जितेंद्रियों को ही दी जाती है । यदि हिल्लन-डुल्लन इसका सेवन करेंगे तो व्यभिचार और अगम्यागमन प्रवृत्ति बढ़ेगी ।


वाजीकरण करने हेतु आयु 20/25 से लेकर संपूर्ण युवावस्था तक मानी गई है । बालकों और वृद्धो के लिए वाजीकरण उपयुक्त नहीं है क्योंकि ऐसा करने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है । शरीर सूखने लगता है ।

शुक्रक्षय तथा अल्पमैथुन शक्ति के निवारण हेतु भी वाजीकरण का उपयोग किया जाता है ।

वाजीकरण औषधियां कई वर्गों में बांटी गई है जिनमें से

विभिन्न प्रकार के स्वरस , गुटिका , घृत औदन , क्षीर , दधिसर , माष , वृष्यपूपलिका (सात्विक) आदि सात्त्विक आहारो द्वारा शुक्रवृद्धि करने का प्रमाण मिलता है ।


साथ ही पिंडरस , मांसरस , मांस , अंड , पूपलिका इत्यादि तामसिक पदार्थ द्वारा भी शुक्रपोषण की विधि देखने को मिलती है ।


अतः वाजीकरण में सिर्फ मांसयुक्त औषधियों का ही प्रयोग होता है , यह हिल्लन-डुल्लन की कपोल कल्पना है ।

स्पष्टीकरण के लिए ऊपर नजर डालें ।
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