प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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आयुर्वेद की दृष्टि में मांसाहार : भाग 1

क्रूर , अत्याचारी , ईर्ष्यालु , मांसाहारी , क्रोधी बहुभक्षी स्वभाव वाले , राक्षसतत्व संयुक्त होते हैं ।

लंपट , बहुस्त्री गामी , डरपोक , दूसरों को कष्ट पहुंचाने वाले आहार व्यवहार की शुद्धता न रखने वाले , आमिष भोजी , आलसी तथा स्त्री लोलुप प्रवृत्ति के लोग पिशाच सत्व संबंधी होते हैं ।
यह दोनों रजोगुण प्रधान माने जाते हैं ।


- चरक संहिता शारीर स्थान , ४.४७ - ४८

इसी अध्याय के श्लोक ४५ अनुसार कल्याणभाग या शुद्ध सत्व में ब्राह्मसत्व सर्वोत्तम होता है , जो सत्वगुण प्रधान होता है । इससे संबंधी जीव मांसाहारी नहीं होते , स्वस्थ , दयालु , जितेंद्रिय , चरित्रवान/वती तथा अच्छे कर्म करने वाले होते हैं और जीवो को समभाव से देखते हैं ।


अतः हमें भी ऐसे ही कर्म करने चाहिए ब्राह्मासत्व प्रधान बने तथा समाज में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर सकें ।

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Exposing Gulamgiri : Part 2

Traitor Jyotiba and his love towards British Government.

Claim : Britihshers abolished Slavery in South Africa and America , without even seeing their own profit

Refutation : Any proofs ? As per the reports of the National Archives of the UK Government itself , Britain was one of the Largest Slave exporting country till 1807 along with Portugal.
As per records they transported approx. 3.1 million slaves to british colonies from Caribbean , South America and Africa b/w 1640-1807 They treated slaves as goods.
Even the Slavery Abolishment Act of 1833 was mainly due to free trade promotion & monopoly ending demands by the merchants.


How can you say that they abolished slavery without their profit ?


Moreover the Sudras and lower caste were more in no. in Gurukuls than Brahmins as per Thomas munro's report of 1822. Technically your claim regarding Sudra shiksha is also debunked.

He even called Britishers as his Masters and saviors in the book.


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आयुर्वेद की दृष्टि में मांसाहार : भाग 2

मेरी पिछली पोस्ट के बाद बहुत से लोग यह पूछ रहे थे की भाई आयुर्वेद में तो कई जगह मांसाहार करने का वर्णन मिलता है । इस शंका का भी समाधान कर देते हैं ।

यह बात बिल्कुल सत्य है कि आयुर्वेद में मांसाहार का विधान है , परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इन्हें करना अनिवार्य है ।

चरक संहिता शारीर स्थान ४.९८-९९ अनुसार रोग का उपचार शरीर के तत्व के अनुसार होता है अर्थात राक्षसी और पैशाचिक प्रवृत्ति वालों का इलाज भी रजोगुणी होगा यानी केवल उनके लिए ही मांस का इस्तेमाल किया जाता है ।


मांस का वैकल्पिक रुप :

मांस को कई जगह पर शुक्रवर्धक भी बताया गया है , परंतु गर्भाधान में इसका प्रयोग न होकर काकोल्यादिण वर्ग , ऐंद्री , ब्राह्मी , सहस्त्रवीर्या , अमोघा आदि औषधियों का प्रयोग होता है । उड़द को भी वीर्यवर्धक कहा है ।
वाजीकरण तथा वीर्यशुक्रादि के दोषों में इंद्राजौ पलाशभस्म , वटादिकघृत आदि प्रयोग में किए जाते हैं । वही आर्तव संबंधी दोषों में इंद्राजौ , चंदन , भद्रश्रिय आदि का प्रयोग होता है ।


अतः सिद्ध होता है कि , आयुर्वेद में मांसाहार अनिवार्य न होकर वैकल्पिक है ।

To be continued... 🙏
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बस ये बात याद रखें कि शास्त्र में अच्छी और बुरी दोनों चीजों का वर्णन मिलता है । यह हम लोगों पर है कि हम क्या चुनते हैं । जिस प्रकार आयुर्वेद में मांसाहार कुछ विशेष अवसरों पर ही प्रयोग में लाया जाता है , परंतु वह भी अनिवार्य न होकर वैकल्पिक है , हमें भी अपने जीवन में बुरी और अच्छी दोनों वस्तुओं में से सदैव अच्छी वस्तु को लेकर आगे बढ़ना चाहिए ।


महर्षि वात्स्यायन प्रणीत कामसूत्र 2.9.41-42
चरक संहिता सूत्रस्थान १८.३४

©️ Credit to : @manuvadii


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